Sunday, July 18, 2010

खुदरा क्षेत्र का वाल मार्टिकरण


खुदरा क्षेत्र का वाल मार्टिकरण एक खतरनाक कदम
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पेट्रोल के मूल्यों को अंतर्राष्ट्रिय मूल्यों के साथ जोड़ने के फलस्वरुप , जी-20 के विकसित देशों तथा विशेषकर अमरिका के प्रेसीडेंट ओबामा से मिली शाबाशी से उत्साहित मनमोहनसिंह अब भारत के खुदरा क्षेत्र का वाल मार्टिकरण करने में जुट गये हैं | इसमें कोई शक नहीं कि भारत का खुदरा बाजार अपने विस्तार और विशाल टर्नओवर के चलते पिछले दो दशक से देशी और विदेशी दोनो पूंजी के लिये लालच का कारण रहा है | बीएमआई (बिजनेस मानीटर इंटरनेशनल) ने हाल मे आंकलन पेश किया कि भारतीय खुदरा बाजार की कुल टर्न ओवर 2010 के 16.7 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2014 में 25 लाख करोड़ हो जायेगी | अमरिका की ग्लोबल मेनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म ए टी करनी जून' 2009 में भारत को पिछले पांच वर्षों में चौथी बार निवेश के लिये आकर्षक बाजार बता चुकी है | बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के मल्टीब्रांड खुदरा बाजार का अध्यन कितनी बारिकी से कर रही हैं , इसका दूसरा उदाहरण मेकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट है जिसमें बताया गया है कि वर्ष 2025 तक भारत दुनिया का पांचवा बड़ा बाजार बन जायेगा |

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवश्यकता नहीं --

भारत के खुदरा क्षेत्र की जीवन क्षमता केवल आर्थिक टर्न ओवर तक सीमित नही है बल्कि पूरे देश में एक करोड़ बीस लाख से अधिक खुदरा दुकानों के विस्तार के साथ यह भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूत सहारा भी है | भारत के जीडीपी में इसका योगदान 14 प्रतिशत का है | उद्योगपतियों के संगठन फिक्की के नवम्बर '2003 में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार उस समय खुदरा क्षेत्र में लगभग 11,00,000 करोड़ रुपये की बिक्री भारत के जीडीपी के 44 प्रतिशत के बराबर थी | फिक्की की 2003 की रिपोर्ट की तुलना यदि बीएमआई के उपर उल्लेखित मई ' 2010 के ताजा आंकड़ों से करें तो आसानी से समझा जा सकता है कि खुदरा क्षेत्र बिना किसी सरकारी सहायता के तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है | इसे किसी विदेशी पूंजी की आवश्यकता नहीं है |

तो , फिर क्या , संगठित खुदरा क्षेत्र के कारपोरेट जगत को विदेशी निवेश की जरुरत है ? यह सच है कि भारत में कुल खुदरा व्यवसाय में असंगठित खुदरा क्षेत्र का हिस्सा 98 प्रतिशत है और कारपोरेट समूह केवल 2 प्रतिशत व्यवसाय कर पाते हैं | यद्यपि , इस स्थिती में बहुत परिवर्तन हो गया है और आज कारपोरेट खुदरा का हिस्सा 10 प्रतिशत के लगभग है | यह भी सच है , जैसा कि सरकार के द्वारा 7 जुलाई को जारी किये गये परिचर्चा पत्र में भी उल्लेखित है कि जिस अवधि में असंगठित खुदरा क्षेत्र 15 प्रतिशत की दर से प्रगति कर रहा था , खुदरा क्षेत्र के कारपोरेट दिग्गजों को अपनी बिक्री में कमी का सामना करना पड़ रहा था | यद्यपि ,सरकार ने उस अवधि को बताने से परहेज किया , जिसमें संगठित खुदरा याने कारपोरेट जगत बिक्री में कमी का सामना कर रहा था | पर , थोड़ा भी जानकार यह बता सकता है , कि , यह विश्वव्यापी मंदी का वही समय है , जब विश्व कारपोरेट जगत ने रोजगारों में छटनी तथा वेतनों में कमी करने का बड़ा चक्र चलाया था और अमरिका सहित युरोप और एशिया के सभी देशों में आम आदमी की क्रय शक्ति में भारी गिरावट आई थी | उस विश्वव्यापी मंदी के समय दुनिया के सभी देशों की सरकारों ने उद्योग जगत को तो सार्वजनिक कोष से बड़े बड़े पेकेज दिये , पर , आम लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के कोई भी उपाय करने के बजाय उन्हें भाग्य भरोसे छोड़ दिया | उस दौर में भारत के कारपोरेट खुदरा ने ही क्या , वाल मार्ट ,केरीफोर , मेक्स जैसी भीमकाय कम्पनियों ने भी अमरिका और यूरोप में उनकी बिक्री में कमी का सामना किया था | वैसे भी बिक्री में कमी का अर्थ व्यवसाय में घाटा नहीं है और देश के कारपोरेट खुदरा ने घाटा उठाया भी नहीं है | जहाँ तक कुल खुदरा व्यापार में 2 प्रतिशत जैसे छोटे हिस्से का सवाल है , इसका कारण समाज के अन्दर आय और उपभोग में बिखरी पड़ी असमानता है | स्वयं सरकार की बनाई हुई अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार देश की 70 प्रतिशत आबादी बीस रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजारा करती है | इस 70 प्रतिशत आबादी की जरुरतें ऐसी हैं कि न तो वह उनकी पूर्ति के लिये कारपोरेट खुदरा के पास जा सकती है और न ही कारपोरेट खुदरा उनकी जरुरतों की पूर्ति कर सकता है |

उपरोक्त तथ्यों के बावजूद , कारपोरेट खुदरा की बढ़ोत्तरी के आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं | अभी तक सरकारी गैर सरकारी जितने भी सर्वे हुए हैं , सभी इस पर एकमत हैं कि कारपोरेट के स्वामित्व वाला खुदरा व्यवसाय वर्ष 1999 में 15000 करोड़ का था , जो 2005 में बढ़कर 35000 करोड़ रुपये का हो गया | इसकी व्रद्धि दर 40 प्रतिशत वार्षिक है | इस तरह कारपोरेट खुदरा , जब बिना खुद के पूंजी निवेश में व्रद्धि किये तेजी से बढ़ रहा है , तब , विदेशी निवेश की जरुरत क्या है ? वस्तुतः भारत के खुदरा क्षेत्र को किसी विदेशी निवेश या विशेष टेकनालाजी की जरुरत नही है बल्कि ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं , जो उनके देशों की जनता को लूटने के बाद अब भारत के 25 करोड़ के मध्य वर्ग पर निगाहें टिकाये हैं | यह देश का दुर्भाग्य है कि हमारे देश की सरकार और शासक वर्ग उनके हितों की पूर्ति का माध्यम बन रहा है , चाहे इसके लिये उन्हें 70 करोड़ भारतीयों के हितों की कुरबानी ही क्यों न देना पड़े |


सामाजिक सुरक्षा का सर्वोत्तम उपाय --

भारत का असंगठित खुदरा अपनी 1 करोड़ 20 लाख दुकानों के साथ विश्व का सबसे बड़ा खुदरा व्यवसाय है | भारत के कारपोरेट खुदरा में जहाँ केवल 5 लाख लोग रोजगार पाये हैं , असंगठित खुदरा 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है | कृषि के बाद रोजगार देने के मामले में इसका पहला स्थान है | यह एक अंतर ही दोनों क्षेत्रों की सामाजिक उपादेयता के प्रति उनके रव्वैये को स्पष्ट कर देता है |भारत में खुदरा दुकानों का घनत्व विश्व में सबसे अधिक है | ए.सी. नेल्सन एवं के.एस.ए.टेकनोपक के द्वारा वर्ष 2001 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में प्रति 1000 व्यक्ति 11 दुकानें हैं | देश की 1 करोड़ 20 लाख दुकानों में से बमुश्किल 4 प्रतिशत ऐसी होंगी जो 500 वर्ग फुट से बड़ी हों | इसका मतलब हुआ कि असंगठित खुदरा का 96 प्रतिशत हिस्सा खुदरा व्यापार में मुनाफा कमाकर धन्नासेठ बनने के लिये नहीं बल्कि येन-केन-प्रकरेण अपनी आजीविका चलाने के लिये है | इसीलिये , हम अपने घर से दस कदम की दूरी पर ही पान , किराना ,डेली नीड्स , जनरल स्टोर्स ,आईसक्रीम सेंटर , हार्डवेयर , नाश्ता चाय सेंटर , भोजनालय सभी कुछ पा जाते हैं |

असंगठित खुदरा व्यवसाय की व्यापकता और विस्तार के प्रमुख कारणों में से एक कारण यह है कि खुदरा क्षेत्र विवश और निराश बेरोजगारों की शरणस्थली है | पूंजीवादी व्यवस्था में , जैसी कि हमारे देश में है , बेरोजगारी एक स्थायी फीचर है | आजादी के बाद भी शिक्षित और अशिक्षित रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या देश में 5 करोड़ से कम कभी नहीं रही | पर पिछ्ले तीन दशक में जिस रोजगार विहिन विकास के रास्ते पर सरकारें चलीं , उसने स्थिती को और भयावह बना दिया | सरकारी आंकड़ों से इतर आज देश में 6 करोड़ से उपर केवल शिक्षित बेरोजगार हैं | पिछले तीन दशकों से केंद्र एवं राज्य की सरकारों , सेवा क्षेत्र के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों एवं निजी क्षेत्र ने रोजगारों का सृजन पूरी तरह बन्द कर दिया है ,जबकि इसी अवधि में सार्वजनिक और निजी प्रतिष्ठानों ने अपने व्यवसाय में वृद्धि की है और जबर्दस्त लाभ कमाया है | सार्वजनिक तथा निजी दोनों सेवा क्षेत्रों में हुए विस्तार और व्यवसाय में वृद्धि के फलस्वरुप कर्मचारियों पर काम का बोझ भी बढ़ा , किंतु रोजगार के नये अवसर नहीं पैदा किये गये | यही स्थिती मेन्युफेक्चरिंग क्षेत्र में बनी हुई है , जहाँ स्टेगनेशन का दौर चल रहा है | कृषि क्षेत्र में , सरकार की सेज तथा उद्योगों के लिये भूमि अधिग्रहण करने की नीतियों के चलते खेती का रकबा तो घटा ही है ,सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान करने वाला क्षेत्र होने के बावजूद यह क्षेत्र ओवर क्राउडेड है और लोग रोजगार के लिये यहाँ से शहर का रुख कर रहे हैं |

तब , उचित अवसरों के अभाव में किसी भी व्यक्ति के लिये यह एक स्वाभाविक निर्णय होता है कि वह उसके पास उपलब्ध संसाधनों और पूंजी के अनुसार एक दुकान , रिपेयरिंग शाप या इसी तरह का कोई अन्य खुदरा व्यवसाय खोल कर बैठ जाये | यह उसकी पसन्द नहीं होती ,पर परिस्थियां उसे खुदरा बाजार में धकेल देती हैं | इस तरह , एक खुदरा व्यापारी का जन्म हो जाता है | हम रोज ऐसा होते अपने आसपास देखते हैं | हमारे आसपास की लाखों किराना , पान , सब्जी , फल ,कपड़ों की दुकानों की यही कहानी है | ये सब मुश्किल से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाते हैं | असंगठित क्षेत्र के 4 प्रतिशत व्यापार को छोड़ दिया जाये तो शेष व्यापार कम लागत-कम जगह , छोटा स्तर तथा कम मुनाफा के आधार पर काम करता है , जिसमें पूरा का पूरा परिवार रोजगार पा लेता है | ऐसे क्षेत्र में विदेशी निवेश लाने की कोशिश न केवल वर्तमान चार करोड़ रोजगारशुदा लोगों के भविष्य को बर्बाद करेगी बल्कि खुदरा क्षेत्र में अपनी आजीविका की तलाश में बाहर खड़े लोगों के भविष्य को भी मिट्टी में मिला देगी |

सारे आश्वासन झूठे हैं --

सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि किसानों और डाइनिंग टेबल के बीच से बिचौलिये हट जाने से उपभोक्ताओं को सामान सस्ते में मिलेगा | पर , एक बार आपूर्ति श्रंखला पर पूरी तरह से कब्जा हो जाने के बाद बिला शक कारपोरेट खुदरा स्वयं सबसे बड़ा बिचौलिया बन जायेगा | इसके अलावा देश की 70 प्रतिशत जनता की जरुरत अन्य प्रकार की है | क्या , कारपोरेट खुदरा की कोई दुकान , रिक्शा चलाने वाले व्यक्ति को सुबह छै बजे दुकान खोलकर , सिर्फ दो रुपये की श्क्कर और चाय की पत्ती देगा ताकि उसका पूरा परिवार काली चाय पी सके ? क्या , एक मध्यम वर्गीय आदमी को कारपोरेट खुदरा बेटी की शादी के लिये हजारों रुपये के कपड़े , बरतन और अन्य सामान उधार देगा ताकि पहले वह अपनी बेटी की शादी कर ले और बाद में उसका पैसा धीरे धीरे किश्तों में चुका दे ? नहीं , कारपोरेट खुदरा भारत के तीस करोड़ के मध्यवर्ग को लूटने के लिये 70 करोड़ वंचितों को और वंचनाओं में डाल देगा |

जब विदेशी पूंजी निवेश में जटिलताएं इतनी हैं , तो केंद्र सरकार से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह सोच समझकर तथा सावधानी के साथ निर्णय लेगी | किंतु ,हम देख रहे हैं कि सरकार अमरिकन साम्राज्यवाद तथा विश्व व्यापार संगठन के दबाव में विदेशी बहुराष्ट्रीय क्म्पनियों एवं भारत के उद्योगपतियों के हितों के बारे में ही सोच रही है | मल्टी ब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पहले भी विरोध हुआ है | इस बार देश का व्यापारी वर्ग भी पूरी ताकत के साथ विरोध में खड़ा है | सारी आवाम को इसके विरोध में ख्ड़ा होना चाहिये क्योंकि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिये घातक है | आवाम के लिये घातक है |

अरुण कांत शुक्ला

2 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

...प्रभावशाली अभिव्यक्ति!!!

AK SHUKLA said...

धन्यवाद
अरुण कान्त शुक्ला