Tuesday, October 30, 2018

माओवादी किसकी मदद कर रहे हैं?

माओवादी किसकी मदद कर रहे हैं?
दंतेवाड़ा जिले के अरनपुर थाना क्षेत्र के नीलावाया गाँव के नजदीक आज फिर माओवादियों ने पुलिस की पार्टी पर हमला किया| दो पुलिस वालों के साथ वहाँ दूरदर्शन के एक केमरामेन की भी मृत्यु गोली लगने से हुई है| ऐसा बताया गया है कि दूरदर्शन की यह टीम वहाँ " वोटिंग सुरक्षित है" इस तरह की प्रचार फिल्म बनाने के लिए गई थी| माओवादियों के इस हमले की जितनी भी निंदा की जाये कम है| एक तरफ जहां निजी चैनल उस इलाके में एक सीमा से आगे जाने में कतराते हैं या फिर जाते ही नहीं, और यदि गए भी तो सुरक्षा का पूरा ताम-झाम उनके साथ होता है, ऐसे में दूरदर्शन की टीम को भेजना मूर्खतापूर्ण निर्णय ही कहा जाएगा|
माओवादी जिस हथियारबंद संघर्ष के जरिये तथाकथित क्रान्ति का सपना आदिवासियों को दिखाते हैं, उसका कभी भी सफल न होना, दीवाल पर लिखा एक ऐसा सत्य है, जिसे माओवादी पढ़ना नहीं चाहते हैं| जिस देश में अभी तक मजदूर-किसान के ही एक बड़े तबके को, जो कुल श्रम शक्ति का लगभग 98% से अधिक ही होगा, संगठित नहीं किया जा सका हो| जिस देश में नौजवानों और छात्रों के संगठन लगभग मृतप्राय: पड़ गए हों और वामपंथी शिक्षा कुल शिक्षा से तो गायब ही हो, स्वयं वामपंथ की शैक्षणिक गतिविधियां लगभग शून्य की स्थिति में आ गई हों, वहाँ, शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित आदिवासी समाज को जंगल में क्रान्ति का पाठ पढ़ाकर, बन्दूक थमा कर क्रान्ति का सपना दिखाना एक अपराध से कम नहीं है| इस बात में कोई शक नहीं कि जितनी हिंसा माओवाद के नाम पर राज्य सत्ता स्वयं देश के निरपराध और भोले लोगों पर करती है और सेना-पुलिस के गठजोड़ ने जो अराजकता, हिंसा,बलात्कार विशेषकर बस्तर के आदिवासी समाज पर ढा कर रखा है, उसकी तुलना में माओवादी हिंसा कुछ प्रतिशत भी न हो, पर, भारतीय समाज का अधिकाँश हिस्सा आज भी हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर पाता है| राज्य अपनी हिंसा को क़ानून, शांति कायम करने के प्रयासों, देशद्रोह, राष्ट्रवाद जैसे नारों के बीच छुपा जाता है, वहीं, माओवादियों के हर आक्रमण को या उनके नाम पर प्रायोजित आक्रमण को बढ़ा-चढ़ा दिखाता है, यह हम पिछले लंबे समय से देख रहे हैं|
माओवादियों को सोचना होगा कि उनकी इन सभी गतिविधियों से आखिर किसकी मदद होती है? आज इस देश के अमन पसंद लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या एक ऐसी सत्ता से छुटकारे पाने की है, जिसने इस देश की सदियों पुरानी सहिष्णुता और भाईचारे को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| जो, खुले आम, आम जनता के खिलाफ पूंजीपतियों के पक्ष में तनकर खड़ा है और जिसने अपना एकमात्र कार्य केवल किसी भी प्रकार से विरोधियों को समाप्त करके देश में फासीवाद को स्थापित करना घोषित करके रखा है| उस समय माओवादियों के हाथों, आम लोगों के ऊपर होने वाले ये आक्रमण, चाहे वे गलती से हों या जानबूझकर किये गए हों, अंतत; उसी सत्ता की मदद करने वाले हैं जिससे छुटकारा पाने की जद्दोजहद में इस देश के शांतिप्रेमी लोग लगे हैं|
यहाँ, मैं केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के उस बयान का जिक्र न करूँ जो उन्होंने घटना के तुरंत बाद दिया है तो वीरगति प्राप्त दूरदर्शन के उस केमरामेन के साथ बेइंसाफी होगी, जिसने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपनी जिंदगी गंवा दी| हमारे राज नेता कितने संवेदनहीन हो गए हैं कि इतने दुःख के समय भी मंत्री महोदय चुनाव को भूले नहीं और तुरंत ही इस घटना को वोट में बदलने की कोशिश में लग गए| उन्होंने कहा कि ‘‘दंतेवाड़ा में डीडी न्यूज की टीम पर हुए नक्सली हमले की कड़ी निंदा करता हूं। हमारे कैमरामैन अच्युतानंद साहू और सीआरपीएफ के दो जवानों की मृत्यु से बहुत दुखी हूं। ये उग्रवादी हमारे संकल्प को कमजोर नहीं कर सकेंगे। हम जीतेंगे।’’ जीत की यह लालसा बताती है कि कर्तव्यनिष्ठ, कर्मयोगी और देश की सेवा-साधना में लगे आम लोगों की जान की कितनी कीमत इनकी सोच में है|
अरुण कान्त शुक्ला
30/10/2018


Wednesday, October 17, 2018

राजनीति में नीतियों के प्रश्न पर


राहुल गांधी की आजकल कुछ तारीफें हो रही है और कहा जा रहा है कि वे विपक्ष के सशक्त नेता और भावी प्रधानमंत्री के रूप में उभर रहे हैं । उसी सांस में तारीफ़ करने वाले यह भी कहते हैं कि राहुल गांधी देश की किसी बड़ी समस्या के बारे में कुछ नहीं बोलते। उनके पास न तो कोई विचार दृष्टि है, न योजना है, न कोई कार्यक्रम है, न कोई रणनीति है जो गर्त में पड़े देश को उबार सके। वे केवल भाजपा की असफलताओं पर प्रहार कर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। उसी तरह जैसे भाजपा ने कांग्रेस की असफलताओं को एक बड़ा मुद्दा बनाया था।  इस तरह राहुल गांधी के प्रशंसक हों या आलोचक यह तो मान लेते हैं कि जब वर्तमान प्रधानमंत्री 2014 के आम चुनावों के लिए भारत भ्रमण पर थे तो उनके पास भी भारत के आर्थिक-सामाजिक ढाँचे में बुनियादी परिवर्तन लाने की कोई विचार दृष्टि नहीं थी| पर, वे यह भूल जाते हैं कि सामाजिक स्तर पर भाजपा के पास आरएसएस की वह विचारधारा थी, जिसे वह अटल काल में तमाम कोशिशों के बावजूद उतनी उग्रता के साथ लागू नहीं कर पाई थी, जितनी उग्रता के साथ आज लागू करने की कोशिशें हो रही हैं| दूसरी बात जो कही जाती है वह है कि अगले चुनाव में यदि सत्ता राहुल गांधी के पास आ भी गई तो देश का केवल इतना ही भला होगा की 'हार्ड हिंदुत्व' के स्थान पर 'सॉफ्ट हिंदुत्व' लागू हो जाएगा। बाकी सब जैसे का तैसा ही रहेगा। कारपोरेट को फायदा पहुंचाने वाली नीतियां कांग्रेस भी बनाती रही है और भाजपा ने भी बनाई है । इनमें से कोई भी दल सत्ता में आएगा तो कारपोरेट को फायदा होगा और साधारण आदमी का जीवन संकट में रहेगा।

आम लोगों से लेकर बुद्धिजीवियों तक के बीच बन रही इस धारणा पर मैं उनकी कोई आलोचना नहीं करना चाहता| इस धारणा के बनने के पीछे सबसे बड़ा और मुख्य कारण यह है कि  पिछले लगभग डेढ़ दशक की समयाविधी में भारत के मजदूर आन्दोलनों से लेकर जन आन्दोलनों तक से विश्व बैंक, आईएमएफ और विश्व व्यापार की खिलाफत के जरिये साम्राज्यवाद के खिलाफ, जिसे हम मोटे तौर पर कह सकते हैं कि अमेरिकन नीतियों के खिलाफ, चलने वाला संघर्ष फौरी श्रम विरोधी नीतियों और जनविरोधी नीतियों की खिलाफत के साथ, तुरंत कुछ राहत पाने के संघर्ष के आसपास सिमिट कर रह गया है| जन सामान्य ने चेतन और अवचेतन दोनों में यह बुझे मन से ही सही पर मान लिया कि 1991 में रोपी गईं नवउदारवाद की नीतियों का हाल फिलहाल कोई विकल्प नहीं है| इसीलिए, सरकार की नीतियों के खिलाफ उनकी आलोचना-समालोचना भी उसी के अनुसार फौरिया होती है| बुद्धिजीवियों और जनमानस के बीच बनी इस धारणा को बनाने में सबसे ज्यादा मदद की २००७ में अमेरिका के साथ हुए न्यूक्लियर समझौते ने जिसका पुरजोर विरोध करते हुए वामपंथी दलों ने यूपीए दो से अपना समर्थन वापिस लिया था और तबकी मुलायम के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने समर्थन देकर बचाया था| अब इस तथ्य के साथ हम राहुल गांधी या कांग्रेस और वर्तमान सरकार के लिए की जा रही टिप्पणियों पर गौर करें तो हमें राहुल या कांग्रेस और मोदी या भाजपा की नीतियों पर गौर करने में आसानी होगी और शायद कुछ ऐसे तथ्य भी निकल कर आयें जो हमें सोचने के लिए मजबूर करें|  

यह केवल 1995 तथा उसके बाद 1999 तक के चुनाव तक ही था, जब नीतियों के आधार पर आलोचना और चुने जाने के लिए अपील होती थी| उसके बाद के सारे आम चुनाव उन असफलताओं को भुनाकर जीते गए, जो नवउदारवाद की उन नीतियों के परिणाम हैं, जिन्हें मनमोहन सिंह 1991 से 1995 के बीच बो गए थे| 1994 के बाद देश पूरी तरह विश्व व्यापार संगठन के हाथों में चला गया और किसी को कितना भी बुरा लगे, देशप्रेम उफान मारे या राष्ट्रप्रेम उमड़े, सच्चाई यही है कि भारत की खुद की कोई आर्थिक नीति, शिक्षा नीति, स्वास्थ्य नीति, नहीं है| इसीलिये, सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, कोई भी नेता आज केवल भड़काने वाले और एक दूसरे को भ्रष्ट ठहराने वाले मुद्दों पर ही बोलता है या फिर धर्म, संस्कृति जैसे खोखले मुद्दे लेकर बैठ जाता है, जिनसे इस देश के ९०% लोगों का कोई वास्ता नहीं है| इसमें राहुल गांधी से यह अपेक्षा कि वे कोई नीति कांग्रेस की बताएँगे, शायद ज्यादती है|

फिर, क्या, कांग्रेस और भाजपा में केवल हिदुतत्व और साफ्ट हिन्दुतत्व का ही अंतर है? इस पर विचार और मंथन करके ही राय बनानी होगी, नहीं तो फिर वही गलती दोहराई जायेगी, जो 1999 में तथा 2014 में की गयी है| भाजपा और कांग्रेस में एक बुनियादी अंतर, हिदुतत्व के प्रश्न के इतर यह भी है कि कांग्रेस देश के स्वतंत्रता संग्राम से निकली पार्टी है और तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद वह देश के आम लोगों तथा निचले तबके के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझती है और उससे मुकरती नहीं, पूरा करती है| यहाँ सिर्फ एक दो उदाहरण देकर मैं अपनी बात समाप्त करूँगा|  1991से 1995 के मध्य, वित्तमंत्री रहते हुए मनामोहम सिंह ने अथक प्रयत्न किये कि आर्थिक नीतियों में कुछ मूलभूत परिवर्तन हो जाएँ, जैसे सार्वजनिक बीमा क्षेत्र का निजीकरण, रुपये को पूर्ण परिवर्तनशील बनाना ताकि विदेशी पूंजी अपना मुनाफ़ा बाहर भेज सके, थोक या खुदरा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवेश, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की पूंजी का विनिवेश, पेट्रोल को पूर्णता: बाजार पर छोड़ना, एवं अन्य कई, पर वे चाह कर भी ऐसा नहीं कर सके, क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी|  इसके बरक्स 1999 से 2004 के बीच का समय देखिये, वे अधिकाँश काम अटल सरकार ने किये और जो बचे वे मोदी सरकार ने किये हैं, यूपीए सरकार ने नहीं| यूपीए के दोनों कार्यकाल में मनरेगा, भोजन का अधिकार, आरटी आई, स्वास्थ्य के क्षेत्र में राज्यों को मदद देकर स्मार्ट कार्ड, शिक्षा का अधिकार, जैसी योजनाएं, चालू की गईं|  नीति किसी भी गैर वामपंथी पार्टी के पास नहीं है| वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और विश्व व्यापार संगठन के बताए रास्ते पर चलना उनकी अंतर्राष्ट्रीय मजबूरी है| पर, कांग्रेस के पास जमीन से जुड़े आदमी के लिए संवेदना है, जो उसे भाजपा से अलग करती है, हिन्दुतत्व से भी इतर| यदि आप इसे विकल्प नहीं मानेंगे तो भाजपा का विरोध करने का या उसे कोसने का कोई अर्थ नहीं है| आपको देश वासियों के लिए एक संवेदनात्मक और यथार्थवादी सरकार चुनना है या एक लफ्फाजी, धर्म तथा जाती के आधार पर भेदभाव करने वाली, कुशासन और अराजकता से भरी हुई सरकार चुनना है, इन दोनों के बीच जो निर्णय आप लेंगे, उसी पर कांग्रेस को कोसना चाहिए या नहीं, या यह समय राहुल के गुणदोष देखने का है या नहीं, यह निर्भर करेगा|

हमारे देश के लोकतंत्र में पार्टी के प्रतिनिधी चुने जाते हैं, प्रधानमंत्री नहीं|  भाजपा ने इसे पहले मोदी विरुद्ध मनमोहनसिंह और अब मोदी विरुद्ध राहुल गांधी बना दिया है| संसदीय लोकतंत्र में व्यक्ति विशेष को सामने रखकर वोट देने के बाद पार्टी का तो रोल ही खत्म हो जाता है| वे यही चाहते हैं कि लोग कांग्रेस को वोट राहुल को देखकर दें, कांग्रेस को देखकर नहीं| उन्हें राहुल में एक कमजोर व्यक्तित्व नजर आता है| यद्यपि सामूहिक नेतृत्व में व्यक्ति का व्यक्तित्व कोई मायने नहीं रखता| यही कारण है कि प्रारंभ से वे राहुल के लिए तमाम अपशब्दों और खिल्ली उड़ाने वाले शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं| एक बात ध्यान में रखने योग्य है कि व्यक्ति देश को केवल फासीवाद और तानाशाही ही दे सकते हैं और दल आधारित पार्टी में व्यक्ति नहीं पार्टी ही प्रमुख होती है|

यह हम देख चुके हैं, जब अनेक ऐसे कार्यों के लिए कांग्रेस की अनुमति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नहीं मिली तो उन्हें सोनिया का गुड्डा या पूडल बुलाया गया | व्यक्तियों की खिल्ली उड़ाकर भावनाओं को भड़काना गंभीर राजनीतिक अपराध है, जिसका संज्ञान केवल देश का प्रबुद्ध ही लेकर उसका विरोध कर सकता है और आम लोगों को भी समझा सकता है| देश एक गंभीर संकट से गुजर रहा है, इसे समझेंगे तो आने वाली पीढियां शायद कम परेशान होंगी और नहीं तो अतीत की गलतियों को तो वर्तमान को ढोना ही पड़ता है, वे ढोयेंगी |

अरुण कान्त शुक्ला

17/10/2018

Tuesday, May 29, 2018

गड़करी जी के बड़े बोल

गड़करी जी के बड़े बोल
बड़बोलापन कभी कभी स्वयं को ही कितना नुकसान पहुंचा सकता है, इसकी एक मिसाल आज सड़क मंत्री गड़करी जी ने पेश की| प्रणव मुखर्जी के द्वारा आरएसएस के समारोह में शामिल होने के निमंत्रण को स्वीकार करने पर कांग्रेस के द्वारा किये गए विरोध के खिलाफ वे प्रेस कांफ्रेंस ले रहे थे| प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि जब लोग शराब दूकान जा सकते हैं, बार जा सकते हैं, लेडीज बार जा सकते हैं और वो क्या होता है मुम्बई में उस बार जा सकते हैं तो आरएसएस में जाने पर सवाल क्यों? शब्द करीब करीब ऐसे ही थे| अब इसे क्या कहेंगे? वैसे मैं भाजपा के छुटभैय्या नेता जब अनर्गल कहते हैं तो उसे कोई तवज्जो नहीं देता, पर, जब बात आरएसएस से निकले गड़करी जैसे खांटी नेता ने कही हो तो ध्यान देना जरुरी है| एक तरफ तो आरएसएस के पदाधिकारी और भाजपा के नेता आरएसएस को गैर राजनीतिक निखालिस सांस्कृतिक संगठन बताने में धरती आकाश एक किये पड़े रहते हैं और दूसरी तरफ गड़करी जी उसके समारोह में पूर्व राष्ट्पति के जाने की तुलना किसी साधारण आदमी के शराब दूकान जाने या बार जाने से कर रहे हैं| इसे जुबान का फिसलना भी नहीं कह सकते| मैं भाषा के आधार पर उसकी आलोचना नहीं कर रहा हूँ| यह वह वैचारिक आधार है, जो उन्हें वहां से मिला है| नशा सिर्फ शराब या जुएँ का नहीं होता, नशा विचार का भी होता है और वह अगर गलत हो तो वैसे ही व्यक्ति को स्वयं को और समाज को बर्बाद करता है, जैसे शराब या किसी अन्य चीज का नशा| भाजपा हो या संघ , दोनों के ही उच्च स्तरीय नेता अकसर स्वयं को अत्याधिक समझदार और वाकपटु दिखाने की लालसा में ऐसे कमेन्ट करते रहते हैं| गड़करी किसका अपमान कर रहे थे , पूर्व राष्ट्रपति की या संघ का, यह तो वे ही बेहतर बता पायेंगे, किन्तु इससे उस मिट्टी का पता चलता है, जिसमें खेलकर वो यहाँ तक पहुंचे हैं| मुझे गड़करी जी से यह उम्मीद नहीं थी, पर सत्य यही है कि जब जब इनसे ऐसी उम्मीद लगाई जायेगी, आपको निराशा ही हाथ लगेगी|
अरुण कान्त शुक्ला
29/5/2018

Tuesday, November 21, 2017

भारतीयों की भावनायें इससे भी आहत होती हैं

दक्षिण पूर्व एशियन देशों के संघ की 13 नवम्बर को मनीला में अमेरिकन प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प के साथ हुई बैठक के पहले जो कुछ प्रधानमंत्री ने कहा देश के समाचार पत्रों, मीडिया चेनलों और यहाँ तक कि राजनीतिक दलों ने भी भले ही उसे कोई तवज्जो नहीं दी है, पर वह चिंतित करने वाला जरुर है| इसमें कोई शक नहीं कि पिछले तीन दशकों में और विशेषकर 2007-08 में हुए न्यूक्लीयर समझौते के बाद से भारत की विदेश नीति में अमेरिका के साथ संबंधों में व्यापक बदलाव आया है| उसके बावजूद भी प्रधानमंत्री तो दूर की बात भारत के किसी राजनयिक की भी भाषा अमेरिका के प्रति इतनी प्रतिबद्ध और समर्पणकारी नहीं रही| मनीला में बैठक के पहले प्रधानमंत्री ने जो कहा उसका हिन्दी रूपांतरण यह है कि “भारत-अमेरिकी संबंध व्यापक तथा और गहरे हो रहे हैं और आप स्वयं महसूस कर सकते हैं कि ये संबंध अमेरिका के साथ भारत के हितों से ऊपर उठकर, एशिया के भविष्य और विश्व में मानवता की भलाई के लिए कार्य कर सकते हैं”| यह उस अमेरिका के बारे में कहा जा रहा है, जिसके ट्रम्प राष्ट्रपति हैं और इनका नारा है कि अमेरिका सिर्फ अमेरिकियों के लिए| उनके राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिका की सारी वैश्विक और अन्दुरुनी नीतियाँ इसी के आधार पर तय हो रही हैं| प्रधानमंत्री उपरोक्त बयान देने के बाद रुके नहीं| उन्होंने भारत की ओर से अमेरिका के वैश्विक राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने का वायदा ही कर डाला| उन्होंने आगे कहा कि “मैं आश्वस्त करता हूँ कि भारत अपने सबसे अच्छे प्रयत्न करेगा कि वह उन आशाओं को पूरा करे जो अमेरिका और विश्व उससे करते हैं”| निश्चित ही उपरोक्त दोनों कथनों में सन्दर्भ में एशिया और विश्व वह एशिया और विश्व नहीं है जिसे हम जानते हैं या जैसा हम चाहते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री उस एशिया और विश्व की बात कर रहे थे जैसा डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं|
बावजूद इस तथ्य के पिछले दो दशकों में भारतीय विदेश नीति और संपन्न तबके के भारतीयों में अमेरिका के प्रति रुझान बढ़ा है और व्यापारिक से लेकर सैन्य तक सभी प्रकार के समझौते किये गए है, पर, ऐसा कभी नहीं हुआ कि इस तरह का कोई भी आश्वासन किसी प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या राजनयिक ने दिया हो| भारत एक सार्वभौमिक राष्ट्र है और आर्थिक, सामाजिक, वैश्विक मामलों में स्वालंबन हमारी हमेशा विशेषता रही है| यदि हम याद करें तो स्वयं प्रधानमंत्री 2014 में जब चुनाव प्रचार में थे तो अनेक बार उन्होंने भारत की विदेश नीति के बारे में बोलते हुए कहा था कि आवश्यकता भारत को दूसरे देशों के साथ आँख में आँख डालकर बात करने की है| आज जब वे अमेरिका की उम्मीदों पर खरा उतरने का आश्वासन दे रहे हैं तो चिंतनीय यह है कि उस ट्रम्प का अमेरिका है जो आज विश्व शान्ति के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है और विश्व में जलवायु और पर्यावरणीय खतरे के प्रति एक देश के रूप में गैरजिम्मेदार देश सिद्ध हुआ है| प्रधानमंत्री एक ऐसे राष्ट्रपति के सामने आश्वासन परोस रहे हैं, जिसके स्वयं के उपर नैतिक और चुनावी जांचें चल रही हैं और हो सकता है निकट भविष्य में उसे अमेरिका में महा-अभियोग का सामना करना पड़े|
बेहतर होता प्रधानमंत्री ने मनीला में उसी वक्तव्य में अपना अभिप्राय स्पष्ट कर दिया होता तथा  अमेरिका को किस प्रकार की आशाएं भारत से हैं, वह भी स्पष्ट कर दिया होता| अमेरिका की तमाम धन और सैन्य ताकत से प्रभावित (डरने) के बावजूद यह ऐतिहासिक सच्चाई आज भी बनी हुई है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका की छवि दूसरे देशों में अशांति फैलाने वाले, आपराधिक गतिविधियों के बढ़ावा देने वाले, युद्ध थोपने वाले राष्ट्र की है और उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है| एशिया तथा अरब बेल्ट के देश इसके सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं| किसी से छिपा नहीं रहा है कि अमेरिका की आशाओं या अमेरिका की वैश्विक आशाओं का मतलब एकाधिकारवादी और आपराधिक व्यक्तियों और ताकतों को एशिया तथा अरब देशों में सत्ता में स्थापित करना होता है जैसा हमने पाकिस्तान, सऊदी अरब, जॉर्डन, ईजराईल और अन्य देशों में देखा है| ईस्लामिक स्टेट और तालिबान बनाने वाला अमेरिका ही है| अमेरिका की वैश्विक राजनीति का केवल एक ही मकसद होता है कि पश्चिम, एशियन और अरब देशों में जो लूट मचा रहा है, उसकी तरफ से सारा ध्यान हटाकर यहाँ के देश सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद के बारे में ही सोचें और आपस में लड़ते रहें ताकि अमेरिका की मिलिट्री इंड्रस्ट्री फलती फूलती रहे| पाकिस्तान हमारा पड़ौसी है और अमेरिका के या अमेरिका से प्यार की कितनी भारी कीमत उसे चुकानी पड़ रही है, यह हम देख रहे हैं| विश्व मानवता के लिए, विश्व शान्ति के लिए या संपूर्ण एशिया में शान्ति, एकता, सौहाद्र और आर्थिक सहयोग के लिए आगे बढ़कर कार्य करने में कोई बुराई नहीं, पर फिर उसके लिए अमेरिकी आशाओं पर खरा उतरने की बात करना और अमेरिका को आश्वस्त करना किसी भी प्रकार से देश हितेषी स्वाभिमानी विदेश नीति तो नहीं ही है| यह, आँख में आँख डालकर याने निगाहें मिलाकर बात करना भी नहीं है| भारत और भारतीयों की भावनायें इससे भी आहत होती हैं|

अरुण कान्त शुक्ला,
21/11/20
  


Monday, November 6, 2017

सवाल अधिनायकत्व और लोकतंत्र के बीच किस का अस्तित्व रहेगा, उसका है?

हाल ही में यह देखने में आ रहा है कि सोशल मीडिया में सक्रिय अनेक वामपंथी कार्यकर्ता और झुकाव रखने वाले लोग वर्तमान सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते समय उसी सांस में कांग्रेस को भी बराबर से कठघरे में रखने का प्रयास करते हैं| इसमें न तो कुछ गलत है और न ही अचंभित करने वाला क्योंकि देश में नवउदारवाद को जन्म देने वाली और प्रारंभिक तौर पर लागू करने वाली कांग्रेस सरकार ही रही है| पर, यह शायद रणनीतिक तौर पर सही लाइन नहीं है| सभी प्रमुख वामपंथी राजनीतिक दल इस बिंदु पर हमेशा ही बहुत स्पष्ट रहे हैं कि जब प्रश्न आर्थिक नीतियों के साथ साथ लोकतंत्र को बचाने और अधिनायाकत्ववादी ताकतों को अलग थलग करने के बीच चुनाव का आता है तो प्रमुख संघर्ष लोकतंत्र को बचाने का होता है और आर्थिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष साथ-साथ चलने वाला दूसरी अहमियत का मसला होता है| मुझे नहीं लगता कि वामपंथियों की इस समझ में कोई बदलाव वर्तमान परिस्थितियों में आया होगा या उनकी रणनीतिक लाइन इससे कुछ अलग होनी चाहिए|   

बहरहाल, वह जो कुछ भी हो और वामपंथ राजनीति का जो भी फैसला हो, उससे इतर जो बात मैं कहना चाहता हूँ कि यह कांग्रेस को कोसने का समय नहीं है| यदि हम उन तमाम आर्थिक परिवर्तनों पर नजर डालें, जो नवउदारवादी दौर में हुए हैं तो पायेंगे कि आम देशवासियों को जिन परिवर्तनों से बुनियादी नुकसान पहुंचे हैं, मसलन बीमा का निजीकरण, पेट्रोल को बाजार के हवाले करना, फेरा में मूल बदलाव, विनिवेश के लिए अलग से मंत्रालय का निर्माण, सिंगल और मल्टीब्रांड में विदेशी कंपनियों को प्रवेश, सेज प्रावधान, सरकारी उपक्रमों जैसे विदेश संचार निगम को प्राईवेट बनाना, आई टी पार्क स्थापना, अप्रवासी भारतीयों को भारत की नागरिकता देना, विदेशी निवेश को बढ़ावा देना जैसे अन्य अनेक कार्य अटल जी के कार्यकाल में हुए हैं| मोदी जी श्रम कानूनों में बदलाव, नोटबन्दी, जीएसटी, बुलेट ट्रेन, डिजिटल मार्केट जैसे कामों में जुटे हैं| इन सभी के लिए देशी विदेशी पूंजी का दबाव था| कांग्रेस इनमें से अनेक कार्य करने में हिचक रही थी या उसने अत्यंत धीमे चलने की नीति अख्तियार की थी| इसीलिये कांग्रेस के खिलाफ वातावरण बनाने में देशी-विदेशी पूंजी ने पूरा जोर लगाया| यह 2014 के लोकसभा के चुनावों में स्पष्ट दिखा|    

जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, कांग्रेस इसको काबू रखने में नाकामयाब रही, नि:संदेह| पर, भाजपा के इस शासन में या एनडीए के पहले कार्यकाल में यह कम न था| एक बात जो कभी न भूलने वाली है कि विश्व पूंजीवाद, नवउदारवाद का चेहरा लेकर 1991 से भारत में नए तेवर में ज्यादा क्रूर और समर्थ होकर आया है और कांग्रेस ने कहीं न कहीं उसमें थोड़ा ही सही पर विवेक लगाकर उसे लागू किया| कृषी में सभी असफल रहे क्योंकि यह नवपूंजीवाद का रुख था कि देश के संसाधनों के ऊपर केवल पूंजीपतियों का कब्जा हो फिर वे चाहें देशी हों या विदेशी| भूमि के अधिकरण के बिना किसी भी संसाधन पर न तो कब्जा हो सकता है और न ही उसे बनाया जा सकता है| देश में शहरीकरण के लिए इसीलिये सभी राज्यों की सरकारें उत्सुक हैं| स्मार्ट सिटी, स्मार्ट गाँव इसी के लिए हैं| इसका विरोध न हो, इसलिए जरुरी है कि किसानी निरंतर हानि में हो और मध्यवर्ग का विकास हो| सभी नीतियों के नींव में यही है| यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है| अमीर देश ज्यादा क्षतिपूर्ति करते हैं और गरीब देश कम, उनकी औकात के हिसाब से| मध्यवर्ग के विकास में भी जोर इस पर रहता है कि निम्न और मध्य मध्य वर्ग ज्यादा बढ़े , न कि उच्च और उच्च मध्य वर्ग| कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियों में कोई अंतर नहीं है, सिवाय उस रफ़्तार और हिचक के जिसका जिक्र मैंने पहले किया है| इसलिए केवल आर्थिक नीतियों, भ्रष्टाचार से कांग्रेस और भाजपा के मध्य तुलना करने से काम नहीं चलने वाला| मूल में हिंदु राज कायम करने की मंशा याने एक नस्लवादी शासन का देश में उदय का सवाल है| देश में जाती, सम्प्रदाय, धर्म प्रमुख भूमिका निभाते हैं| यहाँ आकर भी कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद से भगवा सेक्युलर जरुर रही , पर भाजपा से हमेशा बेहतर है क्योंकि वह स्वतंत्रता आन्दोलन से निकली पार्टी है और उसे उस विरासत को अधिक नुकसान न पहुंचे, इसका हमेशा डर रहता है| पर, एक बात तय है कि हिंदु राज जैसे किसी छिपे लक्ष्य से वह कोसों दूर है और उसकी भगवा धर्मनिरपेक्षता भी मात्र वोट की खातिर होती है, जो चुनावी मजबूरी है| इसका यह अर्थ नहीं कि कांग्रेस में सभी सेक्युलर हैं| कट्टर उसमें भी हैं, पर वह इन पर काबू रखना जानती है| इसके ठीक उलट भाजपा है| यह तय है कि भारतीय राजनीति में अभी या आने वाले लम्बे समय तक कोई भी तीसरा विकल्प देने के लिए तैयार नहीं है| ऐसे में आर्थिक नीतियों या अन्य साम्यताओं को लेकर उसकी इस कदर आलोचना केवल भाजपा का ही मार्ग सरल करेगी|

सवाल केवल अर्थव्यवस्था का ही नहीं है| सवाल लोकतंत्र का भी है, जिसमें आर्थिक नीतियों से लेकर हिन्दूराज तक सब कुछ आता है| मुझे याद आता है, भारतीय जीवन बीमा निगम के निजीकरण के खिलाफ जब हमने डेढ़ करोड़ हस्ताक्षर आम लोगों के मध्य, घर घर जाकर एकत्रित किये थे और उन्हें सौंपने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के पास गए थे तो उन्होंने कहा था "100 करोड़ में से केवल डेढ़ करोड़ लोगों के हस्ताक्षर”| आज वही तर्क दोहराया जा रहा है, पर और भी खतरनाक ईरादों के साथ कि " 120 करोड़ लोगों की जनसंख्या में सिर्फ एक 'अख़लाक़' की मौत"| या, नोटबंदी के समय "120 करोड़ लोगों में से कतारबंदी में केवल एक की मौत"| उस समय जनता उनके साथ नहीं थी| आज उनके प्रायोजित, सिखाये-पढाये समर्थन में बेन्डबाजा लेकर मौजूद हैं| इतना ही नहीं, वे विरोध करने वालों के लिए हर अस्त्र लेकर घूम रहे हैं , जिसमें प्रताड़ना से लेकर मौत तक सभी सजाएं क़ानून नहीं , उनकी भीड़ तय कर रही है| यह अधिनायकत्व और लोकतंत्र के बीच किस का अस्तित्व रहेगा, उसका सवाल है| इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस पूर्ण बहुमत पाकर तानाशाह होती है|  पर, यहाँ तो सीधे सीधे अधिनायकत्व को चुन लिया गया है| जहां तक जो विकल्प दे सकते हैं उनके अन्दर एक अजीब ब्यूरोक्रेसी और अहंकार है| उनसे फिलहाल कोई उम्मीद की किरण दूर दूर तक नजर नहीं आ रही है| यह निराशा या किसी कारण उपजा क्षोभ नहीं, वास्तविकता है| हाँ, देश में अनेक जगह वे पूर्ण ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, पर शेष भारत में जनता के साथ उनका कोई संवाद तक नहीं है| जैसा भक्तों का एक समूह भाजपा ने तैयार किया है, वैसा ही एक समूह उन्होंने भी तैयार किया है और उसे भी संभालना उन्हें नहीं आ रहा है| बाकी सब तो नक़्शे में हैं ही नहीं| आज नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में कांग्रेस मुक्त भारत की बात नहीं कर रहे हैं| यह भारत के प्रधानमंत्री हैं जो भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने की बात कर रहे हैं| इसके निहितार्थ को समझना होगा| जैसे ही हम वह समझेंगे हमें लोकतंत्र के ऊपर मंडराते खतरे की झलक मिल जायेगी| इसीलिये मैं कहता हूँ कि यह कांग्रेस को कोसने का समय नहीं है| सवाल अधिनायकत्व और लोकतंत्र के बीच किस का अस्तित्व रहेगा, उसका है?


अरुण कान्त शुक्ला 7/11/2017    

Saturday, August 26, 2017

कोसने का नहीं, चिंतन करने का विषय

कोसने का नहीं, चिंतन करने का विषय

साक्षी महाराज को ऐसे ही बोलना था, जैसे वो बोले| साक्षी  महाराज ने जो कुछ भी कहा, वह एक सोची समझी रणनीति के तहत सरकार और भाजपा के आलाकमान की सहमति से ही कहा है| इसीलिये अभी तक किसी के भी तरफ से कोई खंडन या यह उनका व्यक्तिगत विचार है जैसा कोई बयान नहीं आया है| यहाँ तक कि प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष किसी ने भी कोर्ट के आदेश के आगे नतमस्तक होना चाहिए, जैसा कोई भी बयान नहीं दिया है| इसमें सबसे बड़ी मूर्खता इस देश के उन लोगों की है, जो ऐसे बाबाओं और स्वयंभू भगवानों के चक्कर में पड़ते हैंऔर ऐसे राजनेताओं को राजसत्ता में बिठाते हैं, जो तार्किक, धर्मनिरपेक्ष, समावेशी ढंग से राज चलाने की अपेक्षा आम लोगों को धर्म, सम्प्रदाय, जाती के नाम पर उलझाने और लड़ाने का काम करते हैं|

सभी विद्वान, टिप्पणीकार संविधान, सरकार की निष्क्रियता, प्रशासन की असफलता की बातें कर रहे हैं| पर, कोई भी उन सैकड़ों परिवारों के बारे में नहीं सोच और बोल रहा, जिन्होंने गुरमीत के बाबापन पर भरोसा करके अपनी बेटियाँ साध्वी बनाने के लिए उसके हवाले कर दीं थीं| अब समाज में उन परिवारों और उन साध्वी बनी स्त्रियों का क्या हर्श होगा और उन्हें कितनी यंत्रणाओं से गुजरना पड़ेगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है| गुरमीत पर फैसला आने के एक दिन पहले ही तीन तलाक पर फैसला आया था और बाद में खबर आई कि उस मामले को न्यायालय तक ले जाकर जीत हासिल करने वाली महिलाओं को समाज और परिवार में प्रताड़ित किया जा रहा है| क्या इन साध्वियों का हाल उससे कुछ अलग होने वाला है? भारतीय समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को इन बाबाओं के जरिये सोची समझी रणनीति के तहत राज्य की मिलीभगत से दकियानूसी और अन्धविश्वासी बनाकर रखा जा रहा है|

आजादी के बाद से कभी कम, कभी ज्यादा इस अस्त्र का इस्तेमाल लगातार होता रहा है| 1991 के बाद जब से आम लोगों की तकलीफों में ज्यादा ही इजाफा हुआ है, इस अस्त्र का इस्तेमाल करके कट्टरवादी ताकतें ज्यादा ही ताकतवर हुई हैं| आज जो लोग सत्ता में हैं, वे चाहते हैं कि आम लोगों का ध्यान लगातार ऐसी अनर्थक बातों की तरफ उलझाए रखा जाए, ताकि वे गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा जैसे सवालों पर सरकार से कोई सवाल नहीं कर पाए| यह आश्चर्यजनक जरुर है कि एक लाख मुसलमानों के सर काटकर लाने वाले हरियाणा के योग व्यापारी का कोई भी बयान न फरवरी 2016 में आया था और न ही आज आया है| यह बताता है कि किस तरह बाबाओं के बीच भी सांठ-गांठ है|     

स्वतंत्रता के बाद से अभी तक जितने राजनीतिक दलों ने सत्ता संभाली है या उसमें भागीदारी की है, उनमें कितने राजनेता अभी तक हुए हैं, जिन्होंने, तथाकथित आस्था, धर्म या बाबाओं सामने समपर्ण नहीं करके रखा हो| यह भारत के प्रथम नागरिक से लेकर कहीं के भी  नगरनिकाय के पार्षद तक सभी पर लागू होता है| इसमें अगर मगर न करें| सभी ने या तो समर्पण किया है या समर्पण करने वालों का साथ दिया है| कभी यह प्रत्यक्षत: देश के हिन्दुतत्व को जगाने के लिए किया जाता है तो कभी हिन्दुतत्व को तुष्ट करने के नाम पर| कभी मुस्लिमों को भड़काने के लिए तो कभी उन्हें तुष्ट करने के लिए| कभी वोट की राजनीति के लिए और कभी लोगों को अपनी समस्याओं से बहकाने के लिए| जब तक धर्म, बाबा, फ़कीर, मंदिर, मस्जिद, मजार, हिंदू, मुसलमान, क्रिश्चियन, जाती जैसे मुद्दों को देश की राजनीति से बाहर नहीं किया जाएगा और इनकी आड़ में उल्लू सीधा करने वालों को आप राजनीति में अगुआ बनाकर भेजते रहेंगे, तब तक अयोध्या, गुजरात, पंचकुला होते रहेंगे और रामपाल, गुरमीत, आशाराम, नित्यानंद, जैसे ढोंगी राजनेताओं को अपने चरणों में रखे बैठे रहेंगे|
आप संस्कृति, धर्म, समाजसेवा के नाम पर जितनी बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी संस्थाओं के अन्दर घुसोगे, उनके अन्दर उतनी ही बड़ी पोल दिखाई देगी| देशवासियों का कल्याण और हिफाजत करना राज्य का विषय है| इसमें किसी अन्य व्यक्ति , संस्था के बीच में कूदने की कोई आवश्यकता नहीं है| धर्म व्यक्तिगत मामला है| इसमें बाबाओं के नाम पर गौरखधंधा करने वालों को तुरंत पकड़कर दंड देने की क्षमता राज्य में होनी चाहिये और आवश्यकता हो तो ऐसे क़ानून भी बनना चाहिए| यह कोसने का नहीं, चिंतन करने का विषय है|

अरुण कान्त शुक्ला

26 अगस्त 2017