Monday, March 14, 2011
ऐसे विकास का क्या लाभ ?
Saturday, March 5, 2011
Tuesday, February 22, 2011
क्या कांग्रेस शीतकालीन सत्र के खर्चे की भरपाई करेगी ?
Sunday, February 20, 2011
वो पूरी नज़्म हूँ मैं -
अश्कों के सैलाब से , एक आंसू ढलक गया ,
सफर पर चले थे हम , अपना सलीब अपने काँधे पर लिये ,
रकीब क्या चढ़ाता सूली , खुद सलीब चढ़ लिये ,
न मोहब्बत कम हुई , न सुरूर कम हुआ ,
उन्होंने रास्ते बदल लिये , हमसे ये न हुआ ,
न शिकवा है , न शिकायत है ,
सैय्याद की बुलबुल से , ये पुरानी अदावट है ,
अब जख्म नहीं होते हरे , नये घाव नहीं लगते ,
राह के च़राग बुझाते हैं अब , वो और बेफ़िक्री से ,
न कवि हूँ मैं , न शायर हूँ मैं ,
जाहिलों ने पढ़ी अधूरी , वो पूरी नज्म हूँ मैं ,
Wednesday, January 26, 2011
स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के मायने –
स्वतन्त्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा के साम्प्रदायिक मंसूबों (फिलहाल तिरंगा प्रेम) से निपटने में केंद्र की और वह भी कांग्रेसनीत सरकार ने साहस और दृढ़ता का परिचय दिया है | यदि इसी दृढ़ता का परिचय 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाते समय दिया गया होता तो देश को बाद में मुम्बई और गुजरात जैसे नरसंहारों को नहीं देखना पड़ता | अब सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के इस रुदन का कोई अर्थ नहीं है कि जब पूरा देश कौम का इतना बड़ा जलसा मना रहा था तो देश के दोनों सदनों के विपक्ष के नेता हिरासत में थे | एक देश के लिये स्वतंत्रता दिवस और संप्रभुता दिवस के मायने क्या होते हैं , यह चिंतन तो उन्हें एकता यात्रा में शामिल होने से पहले कर लेना चाहिये था | जहाँ तक जनता के द्वारा जबाब माँगने का सवाल है , भाजपा निश्चिन्त रहे , जनता कोई भी जबाब किसी से भी नहीं माँगने वाली , क्योंकि , वैसे भी , जनता के सामने रोजगार , महंगाई , भ्रष्टाचार , क़ानून व्यवस्था , दैनिक जीवन में असुरक्षा , जैसे , अपनी जीवन यापन की चिंता को लेकर ही इतने सवाल हैं , और जिनके लिये भाजपा भी बराबर की जिम्मेदार है , कि वह श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने जैसे खोखले भावुक नारे में अब बहने वाली नहीं है |
श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की जिद के पीछे भाजपा के दो प्रमुख तर्क हैं | पहला कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है , इसलिए देश से प्यार करने वाले प्रत्येक भारतीय को श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने का अधिकार है | भाजपा से बहुत आसानी से यह पूछा जा सकता है कि उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर मुख्यालय में वर्ष 2003 तक कभी भी झंडा नहीं फहराया गया तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि वर्ष 2003 तक आरएसएस या भाजपा को राष्ट्रप्रेम के मायने नहीं पता थे ? वर्ष 2004 में भी आरएसएस ने यह काम लगभग मजबूरी में ही किया था क्योंकि भाजपा की उस समय की आँख का तारा नेत्री कर्नाटक के हुबली में झंडा फहराने की यात्रा पर निकली थीं और संघ मुख्यालय कड़ी आलोचनाओं के घेरे में आ गया था | तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अभी उमड़ रहा यह राष्ट्रप्रेम दिखावा है ? नहीं ऐसा कोई भी अर्थ निकालना गलत होगा | यह सीधे सीधे असंतोष और अलगाववाद को बढ़ावा देगा | ठीक यही बात भाजपा को समझना होगी कि हमारे देश की भूमी का प्रत्येक इंच देश का अभिन्न हिस्सा है और ठीक उसी तरह श्रीनगर का लाल चौक भी देश का अभिन्न हिस्सा है , फिर उसी जगह झंडा फहराने की मुहीम क्यों ? जबकि लाल चौक पर परम्परागत ढंग से कभी भी झंडा नहीं फहराया जाता रहा है | सिवाय , उस एक बार के जब 1992 में भाजपा के नए नए अध्यक्ष बने मुरली मनोहर जोशी ने इसी तरह की यात्रा निकाली थी और पूरी तरह से सरकारी संरक्षण में , सुरक्षा के भारी इंतजामों के बीच मुठ्ठी भर स्वयंसेवकों के साथ जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल थे , झंडा फहराया था | सभी इसे जानते हैं कि वह भाजपा की अंदरूनी प्रतिस्पर्धा थी और मुरली मनोहर जोशी ने पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी से प्रतिस्पर्धा में वैसा किया था , जिनकी कुप्रसिद्ध रथयात्रा ने देश में साम्प्रदायिक दंगों का जलजला फैलाया था और बाद में बाबरी मस्जिद के ध्वंस का रास्ता तैयार किया था | जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बिलकुल ठीक कहा कि जब आपने पिछले 19 वर्षों में लाल चौक का रुख नहीं किया , यहाँ तक कि जब एनडीएनीत सरकार थी , तब भी नहीं , तो अब क्यों ? अब , जब घाटी में शांती बहाल हो रही है , तब उसमें विघ्न डालकर , असंतोष और अलगाववाद को अवसर प्रदान कराकर तुच्छ राजनीतिक फ़ायदा उठाने के प्रयास को केंद्र सरकार ने ठीक ही पूरा नहीं होने दिया , जो काम वह 1992 में नहीं कर पायी थी और देशवासियों को उसकी कीमत जानें कुरबान करके चुकानी पड़ीं थी |
एक दूसरा सवाल और उठाया गया है कि क्या श्रीनगर में तिरंगा राष्ट्र का अहित कर सकता है ? यह शब्दों के आडम्बर में जनमानस को उलझाकर राजनीतिक फायदा बटोरने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है | इस पूरे एपीसोड में भाजपा ने तिरंगे के सम्मान को उलझन में डालने के अलावा और कुछ नहीं किया | जैसे कि सभी देशों के लिये है , भारत और भारतवासियों के लिये भी राष्ट्रीय ध्वज देश की आन और शान का प्रतीक है और इससे राष्ट्र के हित और अहित दोनों का कोई भी संबंध नहीं है | राष्ट्र का हित और अहित तो देश में काम कर रहीं राजनीतिक पार्टियों के सिद्धांतों , नीतियों , व्यवहारों और कार्यों से सधते और बिगड़ते हैं | राष्ट्र के हित और अहित , देशवासियों के हितों और अहितों से इतर और कुछ भी नहीं होते हैं | तिरंगे ने श्रीनगर सहित देश में कहीं भी किसी का भी अहित नहीं किया है , पर शासन में रहे राजनीतिक दलों ने कितना अहित किया है , जिसमें भाजपा भी शामिल है , उसकी बानगी यह है कि बाल मृत्यु दर में भारत का हिस्सा दुनिया में शर्मनाक ढंग से 20 प्रतिशत है | दुनिया के भूखे लोगों में से आधे भारत में हैं | भारत के प्रत्येक 100 में से 46 बच्चे कुपोषण का शिकार हैं | भारत की ग्रामीण जनता का मात्र 15 प्रतिशत और शहरी जनता का सिर्फ 61 प्रतिशत शौचालय का प्रयोग करते हैं | देश के सत्तर प्रतिशत लोग 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करते हैं और चोरी , घूसखोरी और घोटाले रत्नों के समान राजनीतिक दलों के नेताओं के मुकुटों में जड़े हैं | कॉफिन से लेकर तोप तक , कुछ बचा है ? पिछले दो दशकों में शासन में रही सभी पार्टियां भ्रष्टाचार को आपराधिक ढंग से संरक्षण देती रही हैं , जिसने दुनिया में भारत का खूब मखौल बनाया है , राष्ट्र का उससे बड़ा कोई और क्या अहित हो सकता है |
सभी जानते हैं कि जैसे भारत के दूसरे राज्यों में 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराया जाता है , वैसे ही जम्मू कश्मीर में भी फहराया जाता है | अगर कश्मीर के लोग लाल चौक पर झंडा फहराना चाहें तो वे उसके लिये स्वतंत्र हैं | राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास में जाए बगैर , यह सहज ही सभी को स्वीकार्य है कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है | यही मायने स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस के भी हैं | स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस देश की आजादी और सार्वभौमिकता को सूदृढ करने के अवसर हैं , चुनौती देकर , अलगाववाद को हवा देने के नहीं |
Friday, December 17, 2010
असली मुद्दा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का है --
संसद का शीतकालीन सत्र अपनी तेईस दिन की अवधि पूरी कर , व्यवाहरिक रूप में बिना कोई कामकाज किये समाप्त हो गया | मीडिया , राजनीतिक दुनिया , सरकार के पक्षधरों और यहाँ तक कि आलोचकों ने भी , इस बार , इस बात पर ज्यादा माथा नहीं पीटा कि संसद के नहीं चलने से कितना चूना जनता की जेब पर लगा क्योंकि राजा के पौने दो लाख करोड़ के सामने सौ दो सौ करोड़ की कोई बिसात नहीं है और इसका सियापा करने वालों पर लोग हँसेंगे ही , ये सभी जानते थे | हमारे देश के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण की यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि यहाँ विकास से लेकर भ्रष्टाचार तक के सभी मुद्दे पार्टियों और व्यक्तियों के राजनैतिक और व्यक्तिगत हितों और स्वार्थों के हिसाब से निपटाए जाते हैं और देश या समाज का समग्र हित राजनीतिक दलों और व्यक्तियों के हितों और स्वार्थों के सामने गौण हो जाता है | यहाँ आरोप लगाने पर अपने साफ़ और निष्कलंक होने का सबूत देने के बजाय प्रत्यारोपों धमकियों की शरण ली जाती है | रोग का रूप धर चुकी इस विडम्बना का फैलाव राष्ट्रीय राजनीति से लेकर नगर , कस्बों की सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं और जनसंगठनों के छुटभैय्ये नेताओं तक हो गया है |
2जी स्पैक्ट्रम के दौरान भी यह देखने में आया , जब शुरुवात में केंद्र सरकार और विशेषकर कांग्रेस ने विपक्ष (एनडीए) के समय के मामलों को भी जांच के दायरे में लेने की धमकी दी | पर , उस समय तक भाजपा स्वयं और गैरभाजपाई विपक्ष इतने आगे बड़ चुका था और उन्हें जेपीसी गठन के राजनीतिक फायदे इतने स्पष्ट दिख रहे थे कि पीछे वापस लौटने का तो कोई सवाल ही नहीं था | कांग्रेस और विशेषकर प्रधानमंत्री , जो इसके पूर्व हर्षद मेहता कांड के समय जेपीसी का सामना कर चुके थे , इस बात को अच्छी तरह समझ रहे थे कि मामले की तह तक जाने का सवाल तो बाद में आएगा , उसके पहले सरकार और प्रधानमंत्री की पदेन दायित्व के निर्वाह में लापरवाही बरतने और गठबंधन की मजबूरी के नाम पर भ्रष्टाचार की तरफ से आँखें मूंदने के सवाल पे जो छीछालेदर होगी और भद्द पिटेगी , उसके राजनीतिक नुकसान को संभालना एक कठिन काम होगा | कांग्रेस इस बात को भी अच्छी तरह समझ रही थी कि आज गठित जेपीसी को पूरे मामले की जांच पड़ताल करते करते दो से ढाई वर्ष का समय कम से कम लगेगा और याने जांच रिपोर्ट अगले आमचुनाव के छै महने या एक साल पहले आयेगी , जिसका पूरा पूरा राजनीतिक लाभ विपक्ष उठाएगा और नुकसान कांग्रेस के खाते में जायेगा | वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद को चलने देने के सवाल पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में , ऐसा ही चलते रहने पर संसद को भंग करने की अप्रत्यक्ष धमकियां भी दीं |
इस सबसे परे , इस प्रश्न पर ध्यान देने के लिये कोई तैयार नहीं दिखता कि देश के लिये सबसे ज्यादा नुकसानदायक क्या है ? भ्रष्टाचार या फिर संसद के नहीं चलने से अटकने वाले बिल और संसद पर जाया होने वाला रुपया ? निसंदेह सभी कहेंगे भ्रष्टाचार | प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जिन आर्थिक सुधारों , आर्थिक प्रगति और जीडीपी में वृद्धि का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपवाना चाहते हैं , उस प्रगति के लिये देशवासियों से ली गई कुरबानी की तुलना में लाभ देशवासियों के निचले तबके को नहीं के बराबर मिला है | केंद्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की , गरीबों के लिये चलाई गईं योजनाएं , राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से लेकर मितानिन तक , सभी भ्रष्टाचार के कोढ़ से ग्रसित हैं और गरीब तबके के हजारों करोड़ रुपये डकार कर नेता और अफसर मालामाल होकर बैठे हैं | ऐसे में यदि भ्रष्टाचार को पूरी ताकत और राजनीतिक ईमानदारी के साथ खत्म नहीं किया जाए तो सुधारों से जुड़े बिलों और योजनाओं का कोई फ़ायदा नहीं | कोई भी आर्थिक सुधार नीति और नियमों को भ्रष्टाचार से मुक्त रखे बिना पूरा नहीं हो सकता है | पर अफसोस की बात है कि जिस राजनैतिक ईमानदारी और इच्छाशक्ति की बात हम कर रहे हैं , स्वतन्त्र भारत में अपनाई गई व्यवस्था और एक के बाद एक आई सरकारों में उसका अभाव ही रहा है | यदि ऐसा नहीं होता तो देश के भ्रष्ट सम्पन्नों का करोड़ों खरब रुपया काले धन के रूप में विदेशों में जमा नहीं होता और भारत की गिनती सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में न होती |
जहाँ तक आम लोगों की सोच का सवाल है , सर्वोच्च न्यायालय के यह कहने के बावजूद कि 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच वर्ष 2001 से और सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में ही कराई जायेगी , उनका अनुभव बताता है कि कुछ नहीं होगा | यह तूफ़ान (शीतकालीन सत्र) गुजरने के बाद राजनेता , मीडिया , कारोबारी , नौकरशाही किसी दूसरे काम में लग जायेंगे और 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला , भारत के अन्य बड़े घोटालों की तरह सूचीबद्ध होकर इतिहास में दफ़न हो जायेगा | यदि आम लोगों की इस सोच को बदलना है , तो राजनैतिक दलों के सामने , जेपीसी गठित होने या नहीं होने के निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर , यह सोचने का समय है कि राजनैतिक दलों , राजनेताओं , नौकरशाहों और कारोबारियों की जो भ्रष्ट छवि बनी है , उनकी साख में जो गिरावट आई है , क्या उसमें सुधार के लिये ही , लीपापोती छोड़कर , दोषी भ्रष्ट जनों को सजा देने की शुरुवात शीर्ष से करेगी ? असली मुद्दा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का है , न कि जेपीसी के गठन का | आशा है , सरकार इस बात को समझेगी , तभी बजट सत्र सुचारू रूप से चल सकेगा |
अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"