Monday, March 14, 2011

ऐसे विकास का क्या लाभ ?


ऐसे विकास का क्या लाभ ?

पिछले चार दिनों से मैं जापान में आये विनाशकारी भूकंप और प्रलयकारी सुनामी के परिणामस्वरुप उत्पन्न त्रासदी पर अपनी संवेदना व्यक्त कराने के लिए शब्द खोज रहा था | दिन रात टी.व्ही. पर घरों , मोटर-कारों , जहाज़ों और हवाई जहाज़ों को ऐसे बहते और लुढकते देखना , जैसे कोई बच्चा अपने कमरे में खिलौंनों से खेल रहा हो , प्रकृति की शक्ति का अहसास कराने के साथ साथ ह्रदय में भयानक भय पैदा करने वाला है | क्या प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने वाला शासक वर्ग , जिसे मानवता की रत्ती मात्र फ़िक्र नहीं है , चेतेगा कि उसके सारे विकास का क्रोधित प्रकृति मात्र दो घंटे में संहार कर सकती है |

मरने वालों की विशाल संख्या , जो नहीं मिल रहे हैं , उनके जीवित रहने की कोई संभावना नहीं और उसके ऊपर न्यूक्लियर रिएक्टर्स में विस्फोट के बाद वर्त्तमान ही नहीं , आने वाली कई पीढ़ीयों के लिए एक बार पुनः विकलांग पैदा होने का अभिशाप , सोचने के लिए मजबूर करता है कि ऐसे विकास का क्या लाभ जो मानवता का ही नाश कर दे | मानवता भक्षी पूंजीवाद का विनाश ही मानवता को बचाने का एकमात्र शेष उपाय है | आईये , जापान के लोगों के लिए प्रार्थना करें |

अरुण कान्त शुक्ला   

Saturday, March 5, 2011



8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर –

क्योंकि , वह मर्द जात से है -

वर्ष 2011 का 8 मार्च विश्व के अनेक देशों में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की 100वीं वर्षगाँठ के रूप में मनाया जा रहा है | संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस बार के महिला दिवस का फोकस महिलाओं को शिक्षा , प्रशिक्षण , विज्ञान ,और तकनीकी में समान अवसर उपलब्ध कराने पर रखा है ताकि महिलाओं को उचित , शालीन और संतोषजनक ढंग से कार्यों में पुरुषों के साथ भागीदारी करने के उचित अवसर सुलभ हो सकें |
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दुनिया के कोने कोने में होने वाले सालाना जलसों का स्वरूप आज एक ऐसे उत्सव के रूप में परिवर्तित होते जा रहा है , जिसमें दुनिया की चंद महिलाओं के द्वारा आर्थिक , राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्राप्त की गईं उपलब्धियों का गुणगान करके , बाकी सब महिलाओं से कहा जाता है कि वे उनके नक्शेकदम पर चलें | 100 वर्ष पहले लोकतांत्रिक चुनावों में महिलाओं को वोट करने के अधिकारकी मांग को लेकर यह आंदोलन शुरू हुआ था | सात वर्ष बाद 1917 में रूस की महिलाओं ने रोटी और कपड़े की मांग को लेकर महिला दिवस पर हड़ताल रखी और महिला दिवस को समाजवादी संघर्षों के एक अस्त्र के रूप में पहचान दिलाई | पर , आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उद्देश्यों और उसे मनाने के तौर तरीकों से वह धार हट चुकी है और यह मुख्यतः महिलाओं के द्वारा अतीत और वर्तमान में प्राप्त उपलब्धियों को उत्सवित करने का मंच बनता जा रहा है | अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उद्देश्यों और मनाने के तौर तरीकों में आये परिवर्तनों के दो प्रमुख कारणों में से पहला तो यह है कि पिछले 100 वर्षों के संघर्षों के फलस्वरूप समाज की  उच्च और  मध्यम वर्ग की महिलाओं के लिए , सीमित ही सही , पर अवसरों के द्वार खुले और अंतरिक्ष से लेकर विश्विद्यालयों में , दफ्तरों और फेक्ट्रियों में तथा राजनीति में राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री जैसे प्रमुख पदों के साथ साथ वैश्विक निगमों के कुंजी पदों पर महिलाओं की सक्रियता बढ़ी | पूंजीवादी व्यवस्था में परिवारों में आय का क्षरण लगातार होता है और लगातार बढ़ते ओद्योगिकीकरण ने इस संभावना को पैदा किया कि शिक्षित वर्ग के अंदर की महिलाएं अर्थ उपार्जन के लिए घर से बाहर निकलें , पर इस प्रगति ने घरों और समाज के साथ उनके सामंती संबधों को समाप्त नहीं किया , इसीलिये सामान्यतः महिलाएं घर और परिवार दोनों संभालती दिखाई पड़ती हैं | इन अवसरों ने शहरी महिलाओं और ग्रामीण महिलाओं के मध्य की पहले से मौजूद खाई को और चौड़ा किया | ग्रामीण स्तर पर इस विकास का कोई फायदा नहीं पहुँचने के चलते , अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे अनेक कार्यक्रम शहर के पढ़े लिखे तबके तक सीमित होकर रह गए | इसका नतीजा हुआ कि अंतररष्ट्रीय महिला दिवस के सुर ताल में भी परिवर्तन आया और वह व्यवस्था को चुनौती देने वाले अवसर के बजाय , जो कुछ भी सकारात्मक प्राप्त हुआ , उसे उत्सवित करने वाला दिन बनता गया |

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की धार कम होने का दूसरा बड़ा कारण नवउदारवाद की उन नीतियों में छिपा है , जिन्होंने पिछले चार दशकों में समाज में स्वयं केंद्रित विकास की अवधारणा को मजबूत किया है | इसके चलते समाज के शोषित और दबे तबकों में मिलकर संघर्ष करने और एक दूसरे के लिए लड़ने की भावना में गंभीर ह्रास आया | इन चार दशकों के दौरान , पूंजीवाद ने स्वयं केंद्रित विकास , जो अंततः समाज के शोषण के खिलाफ लड़ने वाले तबकों में विभाजन पैदा करता है , को बलवती बनाने और अपनी चमक को बरकरार रखने के लिए जो उपक्रम किये , उनमें , अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का अपहरण भी शामिल है | आज दुनिया के 25 से ज्यादा देशों में इस अवसर पर अवकाश घोषित किया जाता है | दुनिया की विभिन्न देशों की सरकारें , बड़े नैगमिक घराने , सरकारी और अर्धसरकारी प्रतिष्ठान , स्वायत्त संस्थाएं , अपने स्तर पर महिला दिवस पर चमकीले कार्यक्रम आयोजित कराने लगे हैं | सरकारों और कारपोरेट घरानों की इस चमक दमक के बीच महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन और मजदूर यूनियनें अवश्य सतत प्रयत्न करती रहती है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का जुझारूपन बना रहे , मगर उन प्रयत्नों के बाद भी सचाई यही है कि नौजवान पीढ़ी का बहुत बड़ा हिस्सा सोचता है कि महिलाओं के लिए सभी लड़ाईयां जीती जा चुकी हैं और सामान अवसर के द्वार खुल चुके हैं | पर , दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं | भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में महिलाओं के साथ घट रही घटनाएं बताती हैं कि पितृ सत्तात्मक समाज की रूढियां , परम्पराएं , और सोच पूरी ताकत के साथ महिलाओं के खिलाफ सक्रिय हैं | आज भी महिलाओं को अपने पुरुष सहकर्मी की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है | महिलाएं आज भी राजनीति और व्यवसाय में पुरुषों से संख्या में कम तो हैं ही , उन्हें पुरुषों के समकक्ष भी नहीं समझा जाता | वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में वे न केवल भेदभाव का शिकार हैं बल्कि कार्यस्थल से लेकर प्राथमिक शिक्षा के स्तर तक उनके खिलाफ यौन हिंसा को एक सामान्य सी घटना मानना सरकारों , प्रशासकों और समाज के अगड़ों की सोच में कायम है |

नार्थ अमेरिका , नार्थ अफ्रीका , लेटीन अमेरिका और मध्यपूर्व एशिया के अनेक देशों में कल्चर या धर्म के नाम पर स्त्रियों और छोटी लड़कियों के जननांगों को विकलांग ( Genital Mutilation ) करना , भारत सहित मध्यपूर्व एशिया में सम्मान ह्त्या (Honour Killing) ,  या अन्य और तरह से महिलाओं को शारीरिक यंत्रणा देना , कुछ उदाहरण हैं , जो समाज की महिलाओं के प्रति सोच को दिखाते हैं | हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के महिलाओं की दशा पर बनाए गए आयोग की 55वीं बैठक में एक प्रतिनिधी ने कहा कि महिलाओं के ऊपर होने वाले हिंसक व्यवहारों तथा अपराधों के खिलाफ एक ऐसे जागरुकता अभियान की जरुरत है , जो न केवल लड़कियों और महिलाओं को उनके अधिकार के प्रति सचेत करे बल्कि उससे ज्यादा वो कार्यक्रम पुरुषों , लड़कों , समुदायों , राजनीतिक , सांस्कृतिक तथा धार्मिक प्रमुखों को शिक्षित करे कि वे उन सभी रूढ़ियों , परम्पराओं , संस्कृति और धर्म को बदलें , जो महिलाओं को कमतर और दोयम दर्जे की समझने की सोच समाज में पैदा करती हैं और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं |  भारत में यह विडंबनापूर्ण परिस्थिति है कि  अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस के आसपास ही देश के सर्वोच्च न्यायालय को पत्रकार पिंकी वीरानी की उस याचिका पर फैसला सुनाना है , जिसमें पिंकी वीरानी ने हिंसक बलात्कार की शिकार अरुणा शानबाग के लिए सुखमृत्यु (Euthanasia) माँगी है , जो पिछले 38 सालों से मुम्बई के केईएम अस्पताल में अचेतावस्था में पड़ी है | अरुणा शानबाग अभी 61 वर्ष की है | सर्वोच्च न्यायालय का फैसला जो कुछ भी हो , पर अरुणा शानबाग के ये ३८ वर्ष मृत जैसे ही गुजरें हैं , वो भी बिना उसके किसी कुसूर के | इसी अस्पताल में लगभग पांच माह पूर्व दीपिका परमार नाम की एक महिला ने अपनी 45 दिन की बच्ची को खिड़की से बाहर फेंक दिया था | बच्ची को गंभीर चोटें आईं थीं और बाद में उसकी मौत हो गयी | अस्पताल के डाक्टरों के अनुसार दीपिका प्रसव उपरांत नैराश्य से पीड़ित थी , एक ऐसी दशा जिससे कुछ महिलाएं गुजरती हैं | जबकि सच्चाई यह है कि दीपिका ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था , उनमें से दीपिका ने लड़की को फेंका , लड़के को नहीं | क्यों ? कड़वा सच यही हो सकता है कि परिवार और समाज का दबाव , जिसने दीपिका को नैराश्य में डाला और बच्ची को फेंकने पर मजबूर कर दिया | पिछले दो सालों का हिसाब उठाकर देखें तो ये दो साल खाप पंचायतों के असंवैधानिक , अतार्किक और अप्रगतिशील हिंसक फरमानों तथा सम्मान हत्याओं (Honour Honour Killing )  के रहे हैं , जिसे रोकने की सदिच्छा सरकार , प्रशासन , राजनीति और धर्म तथा संस्कृति के प्रमुखों , किसी ने नहीं दिखाई |

भारत में यदि प्रतिवर्ष लगभग एक लाख महिलाओं की प्रसव के दौरान मृत्यु होती है तो लगभग सात लाख लड़कियों की भ्रूणहत्या होती है | हमारा देश , संयुक्त राष्ट्रसंघ की लैंगिक असमानता सूची में 122वें नंबर पर है याने पाकिस्तान-112 , बंगला देश-116 और नेपाल-110 के भी बाद | ये वो देश हैं , जिनको हमारे देश के कतिपय संस्कृति और धर्म के स्वयंभू  ठेकेदार रूढ़िवादी और दकियानूसी बताते हैं | वे हैं , लेकिन हम कम नहीं हैं | हमारे देश में ऐसे अनेक स्कूल और कालेज हैं , जहां केवल रईसों और अतिसम्पन्न घरानों तथा राजा महाराजाओं के बच्चे ही पढ़ते है और वो भी केवल पुरुष बच्चे | ऐसे ही एक दून स्कूल के प्लेटिनम जुबली समारोह में बोलते हुए राष्ट्रपती प्रतिभा पाटील ने करीब छै माह पूर्व , वहाँ के दरवाजे लड़कियों के लिए भी खोलने की सिफारिश की थी | जब समाज के शिखर पर बैठे लोगों की सोच ऐसी हो तो किसी एक महिला के राष्ट्रपति बनने या पेप्सी जैसी कंपनी की दुनिया भर की प्रमुख बनने या चार चार महिलाओं का रिजर्व बैंक का डिप्टी गवर्नर बनना एक इत्तफाक से ज्यादा और क्या मायने रखेगा ! ऐसा नहीं है कि महिलाओं को समानता देने और दिलाने के प्रयासों के परिणाम नहीं निकले हैं | क़ानून भी बने हैं और सुविधाएं भी दी गईं हैं , पर जिन पर अमल कराने की जिम्मेदारी है , उनकी सोच रास्ते की बहुत बड़ी बाधा है | संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के सवाल पर इस सोच का प्रदर्शन हम लंबे समय से देख रहे हैं |

वर्षों पहले विख्यात उर्दू लेखिका इस्मत चुगताई ने अपना अनुभव लिखा था कि उनका बावर्ची खुद को उनसे श्रेष्ठ इसलिए समझता है , क्योंकि वह मर्द जात से है | एकबार यह सोच बदले तो महिलाओं के पक्ष में बदलाव , और तेजी से , और , और ज्यादा सकारात्मक होंगे | हमारे देश और समाज के शीर्ष पर बैठे लोगों को इसकी शुरुवात अपनी सोच में परिवर्तन लाकर करनी होगी , तभी समाज के सभी तबकों में भी परिवर्तन शुरू होगा |

अरुण कान्त शुक्ला                                                           

Tuesday, February 22, 2011

क्या कांग्रेस शीतकालीन सत्र के खर्चे की भरपाई करेगी ?


क्या कांग्रेस शीतकालीन सत्र के खर्चे की भरपाई करेगी ? --


आखिरकार , वही हुआ , जो बोफोर्स तोप सौदे के मामले की जांच जेपीसी से कराये जाने की माँग के समय हुआ था या फिर हर्षद मेहता मामले में या तहलका रक्षा सौदे के मामले में जेपीसी की माँग को लेकर हुआ था | संसद के दोनों सदनों के शीतकालीन सत्र को बर्बाद करने और देशवासियों की गाढ़ी कमाई से वसूले गए टेक्सों से लगभग एक सौ पचास करोड़ रुपये बर्बाद करने के बाद , बजट सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने सदन के शुरू होते ही घोषणा की कि सरकार ने 2-जी स्पैक्ट्रम आवंटन के मामले में जांच करने के लिये जेपीसी गठन का फैसला लिया है | ठीक यही , बोफोर्स , हर्षद मेहता और तहलका कांड के समय हुआ था , जब क्रमशः लगभग 19,14 और 16 दिनों तक संसद का काम ठप्प रहा था और बाद में तात्कालीन सरकारों ने पहले दो मामलों में जेपीसी तथा तहलका के मामले में जांच कमीशन गठन की माँग स्वीकार की थी | जेपीसी का गठन कांग्रेसनीत यूपीए-2 सरकार क्यों नहीं करना चाहती थी और जेपीसी की माँग के पीछे सच्चाई को सामने लाने के अलावा विपक्ष के और क्या छिपे हुए राजनैतिक मंसूबे होंगे , इस सब पहलुओं पर काफी चर्चा हो चुकी है और काफी कुछ लिखा भी जा चुका है | इस सबसे इतर प्रश्न यह है कि उस राजनैतिक दल या दलों के खिलाफ क्या विधायी कार्यवाही हो , जो यह जानते हुए भी कि गलती उनकी या उनके पक्ष की है , अपने राजनैतिक हितों की पूर्ती अथवा रक्षा के लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था की कार्यशाला (संसद) को ठप्प होने देते हैं या ठप्प करते हैं | ये , वो राजनैतिक दल भी हो सकते हैं , जिनकी सरकार हो या फिर विपक्षी राजनैतिक दल भी | जब वे संसद की कार्रवाई को ठप्प करते है , तो न केवल सरकारी खजाने का पैसा जाया होता है बल्कि उस अंतराल में राष्ट्र के नागरिको को  लोकतांत्रिक अधिकार भी नकार दिए जाते हैं | इसीलिये , लोकतांत्रिक व्यवस्था में  संसद के काम का ठप्प होना एक ऐसा गंभीर कदम है , जिसकी नौबत आने पर सरकार और विपक्ष दोनों से लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की उम्मीद देशवासी करते हैं | नवउदारवाद की नीतियों पर चल पड़ने के बाद जिन राजनीतिक परिस्थितियों का निर्माण देश में हुआ है और राजनैतिक मानदंडों का जिस तरह ह्रास हुआ है , उसमें संसद की कार्रवाई केवल अपने दल के स्वार्थों की पूर्ती के लिये रोक देना भी एक सामान्य घटना बन कर रह गई है | इसे रोकने का एकमात्र तरीका है कि ऐसा एक विधान बने , जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था और मर्यादाओं की अवेहलना करने पर राजनैतिक दलों की जिम्मेदारी और दंड तय करने का प्रावधान हो | राजनैतिक दल चाहें तो यह काम सर्वोच्च न्यायालय को भी सौंपा जा सकता है | 


 2-जी स्पैक्ट्रम पर जेपीसी की माँग को लेकर शीतकालीन सत्र के नहीं चल पाने की पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस की है | जैसा कि प्रधानमंत्री के साथ ए. राजा के पत्रव्यवहार से पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि प्रधानमंत्री को यह अच्छी तरह मालूम था कि ए.राजा 2-जी स्पैक्ट्रम  आवंटन के मामले में अनियमितता बरत रहे हैं और न केवल पूरे मामले में व्यक्तिगत लाभ उठाने की कोशिशें हैं बल्कि इसे सरकार को होने वाली आय की कीमत पर किया जा रहा है , तब भी प्रधानमंत्री ने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की | इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने स्वयं कैग को यह कहकर धमकाया कि उसे प्रक्रियागत गलती और घोटाले में अंतर करना आना चाहिये | कांग्रेस के सभी छोटे बड़े नेता उस समय यह प्रचारित करने में जुटे थे कि टेलीकाम मिनिस्ट्री में कुछ भी गलत नहीं हुआ है | कपिल सिब्बल , जिन्होंने राजा के बाद उस मंत्रालय को संभाला तो यहाँ तक कह गए कि कैग को ठीक से हिसाब करना ही नहीं आया और सरकारी खजाने को कोई नुक्सान नहीं पहुंचा है , जिसके लिये उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक से झाड़ खानी पड़ी | यूपीए की चेयरपर्सन और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी , महासचिव राहुल गांधी , के साथ पूरी कांग्रेस इस तरह प्रधानमंत्री को पाक साफ़ बताने पर तुल गई मानो यह इतनी बड़ी खूबी हो जिसकी आड़ में लाखों करोड़ का चूना लगता रहे और पूरा देश खामोश रहे क्योंकि प्रधानमंत्री कथित रूप से ईमानदार हैं | यूपीए के गठबंधन में शामिल सभी राजनैतिक दलों ने भी आपराधिक ढंग से चुप्पी साधे रखी | पूरा शीतकालीन सत्र बर्बाद होने के बाद कांग्रेस के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वे लेखा समीती के सम्मुख उपस्थित होने के लिये तैयार हैं | कांग्रेस का यह आपराधिक चरित्र कॉमनवेल्थ खेलों की तैय्यारियों में हुए घपलों के समय भी सामने आया था और आदर्श सोसाइटी में हुई गडबडियों के समय भी देखने को मिला |


आज मनमोहनसिंह कह रहे है कि यह बिलकुल गलत समझ है कि मैं जेपीसी का रास्ता रोके था | मैं किसी भी कमेटी का सामना करने से नहीं डरता ....मैंने हमेशा कहा है कि मेरा आचरण सीजर की पत्नी की तरह होना चाहिये , संदेह से ऊपर | तब प्रधानमंत्री या फिर कांग्रेस बताएगी कि शीतकालीन सत्र को किसलिए कुर्बान किया गया और विपक्ष की जेपीसी की जायज माँग क्यों नहीं मानी गई | आप कुछ भी कहें प्रधानमंत्री जी , पर , सचाई यही है कि आपकी अकर्मण्यता के कारण ही आपकी सरकार का एक मंत्री सरकारी खजाने को 1,76,000 करोड़ रुपये का चूना सरकारी खजाने को लगा पाया तो आपकी और आपकी पार्टी कांग्रेस की जिद के कारण संसद का शीतकालीन सत्र बर्बाद होने के चलते 150 करोड़ रुपये का नुकसान देश को उठाना पड़ा है , जो जनता की गाढ़ी कमाई से चुकाए गए टेक्स का पैसा है | क्या आपकी पार्टी कांग्रेस इसकी भरपाई करेगी ?

अरुण कांत शुक्ला                       

Sunday, February 20, 2011

वो पूरी नज़्म हूँ मैं -


वो पूरी नज्म हूँ मैं -

दिल का दर्द था , बाहर छलक गया ,
अश्कों के सैलाब से ,  एक आंसू ढलक गया ,

सफर पर चले थे हम , अपना सलीब अपने काँधे पर लिये ,
रकीब क्या चढ़ाता सूली , खुद सलीब चढ़ लिये ,

न मोहब्बत कम हुई , न सुरूर कम हुआ ,
उन्होंने रास्ते बदल लिये , हमसे ये न हुआ ,

न शिकवा है , न शिकायत है ,
सैय्याद की बुलबुल से , ये पुरानी अदावट है ,

अब जख्म नहीं होते हरे , नये घाव नहीं लगते ,
राह के च़राग बुझाते हैं अब , वो और बेफ़िक्री से ,

न कवि हूँ  मैं , न शायर हूँ मैं ,
जाहिलों ने पढ़ी अधूरी , वो पूरी नज्म हूँ मैं ,
अरुण कांत शुक्ला -

Wednesday, January 26, 2011

स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के मायने –

स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के मायने –

स्वतन्त्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा के साम्प्रदायिक मंसूबों (फिलहाल तिरंगा प्रेम) से निपटने में केंद्र की और वह भी कांग्रेसनीत सरकार ने साहस और दृढ़ता का परिचय दिया है | यदि इसी दृढ़ता का परिचय 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाते समय दिया गया होता तो देश को बाद में मुम्बई और गुजरात जैसे नरसंहारों को नहीं देखना पड़ता | अब सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के इस रुदन का कोई अर्थ नहीं है कि जब पूरा देश कौम का इतना बड़ा जलसा मना रहा था तो देश के दोनों सदनों के विपक्ष के नेता हिरासत में थे | एक देश के लिये स्वतंत्रता दिवस और संप्रभुता दिवस के मायने क्या होते हैं , यह चिंतन तो उन्हें एकता यात्रा में शामिल होने से पहले कर लेना चाहिये था | जहाँ तक जनता के द्वारा जबाब माँगने का सवाल है , भाजपा निश्चिन्त रहे , जनता कोई भी जबाब किसी से भी नहीं माँगने वाली , क्योंकि , वैसे भी , जनता के सामने रोजगार , महंगाई , भ्रष्टाचार , क़ानून व्यवस्था , दैनिक जीवन में असुरक्षा , जैसे , अपनी जीवन यापन की चिंता को लेकर ही इतने सवाल हैं , और जिनके लिये भाजपा भी बराबर की जिम्मेदार है , कि वह श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने जैसे खोखले भावुक नारे में अब बहने वाली नहीं है |


श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की जिद के पीछे भाजपा के दो प्रमुख तर्क हैं | पहला कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है , इसलिए देश से प्यार करने वाले प्रत्येक भारतीय को श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने का अधिकार है | भाजपा से बहुत आसानी से यह पूछा जा सकता है कि उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर मुख्यालय में वर्ष 2003 तक कभी भी झंडा नहीं फहराया गया तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि वर्ष 2003 तक आरएसएस या भाजपा को राष्ट्रप्रेम के मायने नहीं पता थे ? वर्ष 2004 में भी आरएसएस ने यह काम लगभग मजबूरी में ही किया था क्योंकि भाजपा की उस समय की आँख का तारा नेत्री कर्नाटक के हुबली में झंडा फहराने की यात्रा पर निकली थीं और संघ मुख्यालय कड़ी आलोचनाओं के घेरे में आ गया था | तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अभी उमड़ रहा यह राष्ट्रप्रेम दिखावा है ? नहीं ऐसा कोई भी अर्थ निकालना गलत होगा | यह सीधे सीधे असंतोष और अलगाववाद को बढ़ावा देगा | ठीक यही बात भाजपा को समझना होगी कि हमारे देश की भूमी का प्रत्येक इंच देश का अभिन्न हिस्सा है और ठीक उसी तरह श्रीनगर का लाल चौक भी देश का अभिन्न हिस्सा है , फिर उसी जगह झंडा फहराने की मुहीम क्यों ? जबकि लाल चौक पर परम्परागत ढंग से कभी भी झंडा नहीं फहराया जाता रहा है | सिवाय , उस एक बार के जब 1992 में भाजपा के नए नए अध्यक्ष बने मुरली मनोहर जोशी ने इसी तरह की यात्रा निकाली थी और पूरी तरह से सरकारी संरक्षण में , सुरक्षा के भारी इंतजामों के बीच मुठ्ठी भर स्वयंसेवकों के साथ जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल थे , झंडा फहराया था | सभी इसे जानते हैं कि वह भाजपा की अंदरूनी प्रतिस्पर्धा थी और मुरली मनोहर जोशी ने पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी से प्रतिस्पर्धा में वैसा किया था , जिनकी कुप्रसिद्ध रथयात्रा ने देश में साम्प्रदायिक दंगों का जलजला फैलाया था और बाद में बाबरी मस्जिद के ध्वंस का रास्ता तैयार किया था | जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बिलकुल ठीक कहा कि जब आपने पिछले 19 वर्षों में लाल चौक का रुख नहीं किया , यहाँ तक कि जब एनडीएनीत सरकार थी , तब भी नहीं , तो अब क्यों ? अब , जब घाटी में शांती बहाल हो रही है , तब उसमें विघ्न डालकर , असंतोष और अलगाववाद को अवसर प्रदान कराकर तुच्छ राजनीतिक फ़ायदा उठाने के प्रयास को केंद्र सरकार ने ठीक ही पूरा नहीं होने दिया , जो काम वह 1992 में नहीं कर पायी थी और देशवासियों को उसकी कीमत जानें कुरबान करके चुकानी पड़ीं थी |


एक दूसरा सवाल और उठाया गया है कि क्या श्रीनगर में तिरंगा राष्ट्र का अहित कर सकता है ? यह शब्दों के आडम्बर में जनमानस को उलझाकर राजनीतिक फायदा बटोरने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है | इस पूरे एपीसोड में भाजपा ने तिरंगे के सम्मान को उलझन में डालने के अलावा और कुछ नहीं किया | जैसे कि सभी देशों के लिये है , भारत और भारतवासियों के लिये भी राष्ट्रीय ध्वज देश की आन और शान का प्रतीक है और इससे राष्ट्र के हित और अहित दोनों का कोई भी संबंध नहीं है | राष्ट्र का हित और अहित तो देश में काम कर रहीं राजनीतिक पार्टियों के सिद्धांतों , नीतियों , व्यवहारों और कार्यों से सधते और बिगड़ते हैं | राष्ट्र के हित और अहित , देशवासियों के हितों और अहितों से इतर और कुछ भी नहीं होते हैं | तिरंगे ने श्रीनगर सहित देश में कहीं भी किसी का भी अहित नहीं किया है , पर शासन में रहे राजनीतिक दलों ने कितना अहित किया है , जिसमें भाजपा भी शामिल है , उसकी बानगी यह है कि बाल मृत्यु दर में भारत का हिस्सा दुनिया में शर्मनाक ढंग से 20 प्रतिशत है | दुनिया के भूखे लोगों में से आधे भारत में हैं | भारत के प्रत्येक 100 में से 46 बच्चे कुपोषण का शिकार हैं | भारत की ग्रामीण जनता का मात्र 15 प्रतिशत और शहरी जनता का सिर्फ 61 प्रतिशत शौचालय का प्रयोग करते हैं | देश के सत्तर प्रतिशत लोग 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करते हैं और चोरी , घूसखोरी और घोटाले रत्नों के समान राजनीतिक दलों के नेताओं के मुकुटों में जड़े हैं | कॉफिन से लेकर तोप तक , कुछ बचा है ? पिछले दो दशकों में शासन में रही सभी पार्टियां भ्रष्टाचार को आपराधिक ढंग से संरक्षण देती रही हैं , जिसने दुनिया में भारत का खूब मखौल बनाया है , राष्ट्र का उससे बड़ा कोई और क्या अहित हो सकता है |


सभी जानते हैं कि जैसे भारत के दूसरे राज्यों में 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराया जाता है , वैसे ही जम्मू कश्मीर में भी फहराया जाता है | अगर कश्मीर के लोग लाल चौक पर झंडा फहराना चाहें तो वे उसके लिये स्वतंत्र हैं | राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास में जाए बगैर , यह सहज ही सभी को स्वीकार्य है कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है | यही मायने स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस के भी हैं | स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस देश की आजादी और सार्वभौमिकता को सूदृढ करने के अवसर हैं , चुनौती देकर , अलगाववाद को हवा देने के नहीं |



 

Friday, December 17, 2010

असली मुद्दा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का है --

संसद का शीतकालीन सत्र अपनी तेईस दिन की अवधि पूरी कर , व्यवाहरिक रूप में बिना कोई कामकाज किये समाप्त हो गया | मीडिया , राजनीतिक दुनिया , सरकार के पक्षधरों और यहाँ तक कि आलोचकों ने भी , इस बार , इस बात पर ज्यादा माथा नहीं पीटा कि संसद के नहीं चलने से कितना चूना जनता की जेब पर लगा क्योंकि राजा के पौने दो लाख करोड़ के सामने सौ दो सौ करोड़ की कोई बिसात नहीं है और इसका सियापा करने वालों पर लोग हँसेंगे ही , ये सभी जानते थे | हमारे देश के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण की यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि यहाँ विकास से लेकर भ्रष्टाचार तक के सभी मुद्दे पार्टियों और व्यक्तियों के राजनैतिक और व्यक्तिगत हितों और स्वार्थों के हिसाब से निपटाए जाते हैं और देश या समाज का समग्र हित राजनीतिक दलों और व्यक्तियों के हितों और स्वार्थों के सामने गौण हो जाता है | यहाँ आरोप लगाने पर अपने साफ़ और निष्कलंक होने का सबूत देने के बजाय प्रत्यारोपों धमकियों की शरण ली जाती है | रोग का रूप धर चुकी इस विडम्बना का फैलाव राष्ट्रीय राजनीति से लेकर नगर , कस्बों की सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं और जनसंगठनों के छुटभैय्ये नेताओं तक हो गया है |


 

2जी स्पैक्ट्रम के दौरान भी यह देखने में आया , जब शुरुवात में केंद्र सरकार और विशेषकर कांग्रेस ने विपक्ष (एनडीए) के समय के मामलों को भी जांच के दायरे में लेने की धमकी दी | पर , उस समय तक भाजपा स्वयं और गैरभाजपाई विपक्ष इतने आगे बड़ चुका था और उन्हें जेपीसी गठन के राजनीतिक फायदे इतने स्पष्ट दिख रहे थे कि पीछे वापस लौटने का तो कोई सवाल ही नहीं था | कांग्रेस और विशेषकर प्रधानमंत्री , जो इसके पूर्व हर्षद मेहता कांड के समय जेपीसी का सामना कर चुके थे , इस बात को अच्छी तरह समझ रहे थे कि मामले की तह तक जाने का सवाल तो बाद में आएगा , उसके पहले सरकार और प्रधानमंत्री की पदेन दायित्व के निर्वाह में लापरवाही बरतने और गठबंधन की मजबूरी के नाम पर भ्रष्टाचार की तरफ से आँखें मूंदने के सवाल पे जो छीछालेदर होगी और भद्द पिटेगी , उसके राजनीतिक नुकसान को संभालना एक कठिन काम होगा | कांग्रेस इस बात को भी अच्छी तरह समझ रही थी कि आज गठित जेपीसी को पूरे मामले की जांच पड़ताल करते करते दो से ढाई वर्ष का समय कम से कम लगेगा और याने जांच रिपोर्ट अगले आमचुनाव के छै महने या एक साल पहले आयेगी , जिसका पूरा पूरा राजनीतिक लाभ विपक्ष उठाएगा और नुकसान कांग्रेस के खाते में जायेगा | वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद को चलने देने के सवाल पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में , ऐसा ही चलते रहने पर संसद को भंग करने की अप्रत्यक्ष धमकियां भी दीं |


 

इस सबसे परे , इस प्रश्न पर ध्यान देने के लिये कोई तैयार नहीं दिखता कि देश के लिये सबसे ज्यादा नुकसानदायक क्या है ? भ्रष्टाचार या फिर संसद के नहीं चलने से अटकने वाले बिल और संसद पर जाया होने वाला रुपया ? निसंदेह सभी कहेंगे भ्रष्टाचार | प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जिन आर्थिक सुधारों , आर्थिक प्रगति और जीडीपी में वृद्धि का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपवाना चाहते हैं , उस प्रगति के लिये देशवासियों से ली गई कुरबानी की तुलना में लाभ देशवासियों के निचले तबके को नहीं के बराबर मिला है | केंद्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की , गरीबों के लिये चलाई गईं योजनाएं , राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से लेकर मितानिन तक , सभी भ्रष्टाचार के कोढ़ से ग्रसित हैं और गरीब तबके के हजारों करोड़ रुपये डकार कर नेता और अफसर मालामाल होकर बैठे हैं | ऐसे में यदि भ्रष्टाचार को पूरी ताकत और राजनीतिक ईमानदारी के साथ खत्म नहीं किया जाए तो सुधारों से जुड़े बिलों और योजनाओं का कोई फ़ायदा नहीं | कोई भी आर्थिक सुधार नीति और नियमों को भ्रष्टाचार से मुक्त रखे बिना पूरा नहीं हो सकता है | पर अफसोस की बात है कि जिस राजनैतिक ईमानदारी और इच्छाशक्ति की बात हम कर रहे हैं , स्वतन्त्र भारत में अपनाई गई व्यवस्था और एक के बाद एक आई सरकारों में उसका अभाव ही रहा है | यदि ऐसा नहीं होता तो देश के भ्रष्ट सम्पन्नों का करोड़ों खरब रुपया काले धन के रूप में विदेशों में जमा नहीं होता और भारत की गिनती सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में न होती |


 

जहाँ तक आम लोगों की सोच का सवाल है , सर्वोच्च न्यायालय के यह कहने के बावजूद कि 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच वर्ष 2001 से और सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में ही कराई जायेगी , उनका अनुभव बताता है कि कुछ नहीं होगा | यह तूफ़ान (शीतकालीन सत्र) गुजरने के बाद राजनेता , मीडिया , कारोबारी , नौकरशाही किसी दूसरे काम में लग जायेंगे और 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला , भारत के अन्य बड़े घोटालों की तरह सूचीबद्ध होकर इतिहास में दफ़न हो जायेगा | यदि आम लोगों की इस सोच को बदलना है , तो राजनैतिक दलों के सामने , जेपीसी गठित होने या नहीं होने के निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर , यह सोचने का समय है कि राजनैतिक दलों , राजनेताओं , नौकरशाहों और कारोबारियों की जो भ्रष्ट छवि बनी है , उनकी साख में जो गिरावट आई है , क्या उसमें सुधार के लिये ही , लीपापोती छोड़कर , दोषी भ्रष्ट जनों को सजा देने की शुरुवात शीर्ष से करेगी ? असली मुद्दा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का है , न कि जेपीसी के गठन का | आशा है , सरकार इस बात को समझेगी , तभी बजट सत्र सुचारू रूप से चल सकेगा |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"