Wednesday, May 4, 2022

भारतीय जीवन बीमा निगम के शेयरों को बेचने का अर्थ इसके बीमा धारकों को भविष्य में होने वाली आय को बेचना है...

भारतीय जीवन बीमा निगम के शेयरों को बेचने का अर्थ इसके बीमा धारकों को भविष्य में होने वाली आय को बेचना है...

देश आज 4 मई को देश की उस सबसे बड़े वित्तीय  फेरबदल की शुरुवात देख रहा है जिसे वित्तमंत्री होते हुए और बाद में प्रधानमंत्री रहते हुए भी नहीं कर पाने का अफसोस शायद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को अब भी अवश्य होता होगायह शायद जुलाई 2012 की बात है जब ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ ने प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को तात्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का पूडल कहा था मैंने तब अपने लेख ‘मनमोहनसिंह पूडल तो हैं पर किसके’ में यहीं पर कहा था कि;

“यदि मनमोहनसिंह पूडल हैं तो सोनिया के नहीं अमेरिका, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के पूडल हैं और पिछले दो दशकों में सत्ता का सुख प्राप्त कर चुके सभी दल इनके पूडल रह चुके हैं, यहाँ तक कि देश का मीडिया भी, विशेषकर टीव्ही मीडिया और बड़े अंग्रेजी दां अखबार भी इनके पूडल हैं।“

देश के आर्थिक परिदृश्य में सिर्फ इतना परिवर्तन आया है कि वह मनमोहनसिंह युग से और भी बद्तर हुआ है। पर, अब कोइ पूडल नहीं कहलायेगा, क्योंकि अब वर्ल्डबैंक, आईएएफ और डब्लयूटीओ को इशारे करने की जरूरत नहीं पड़ती है। आपदा से अवसर निकालकर हम आत्मनिर्भर हो गए हैं, पर कैसे, यह विचारणीय है?      

भारत के  जीवन बीमा क्षेत्र को, जो 1956 से पूरी तरह सरकारी संरक्षण में था, 1991 में विश्वबैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के तहत अपनाई गयी उदारवादी वित्त व्यवस्था के अनुरूप ढालने की सिफारिशें प्राप्त करने के लिए 1993 में आर ऍन मल्होत्रा कमेटी का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट 1994 में भारत सरकार को प्राप्त हो गयी थी और कहने की जरूरत नहीं है कि इसकी रिपोर्ट ठीक वैसी ही थी जैसी विश्वबैंक और मुद्राकोष के साथ साथ देशी विदेशी पूंजी चाहती थी याने जीवन बीमा के क्षेत्र में भाजीबीनि का एकाधिकार समाप्त करके न केवल विदेशी-देशी पूंजी को इसमें खेलने की अनुमति दी जाए बल्कि भाजीबीनी के स्वामित्व से भी भारत सरकार हटे और इसमें देशी-विदेशी पूंजी को घुसने का मौक़ा दिया जाए रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद लगभग दो वर्ष मनमोहनसिंह के नेतृत्व में 1995 तक कांग्रेस की सरकार रही पर वह उन सिफारिशों को दो वजह से लागू नहीं कर पाई| प्रथम तो भारतीय जीवन बीमा निगम की भारत की अर्थव्यवस्था में जो रणनीतिक भूमिका थी और देश के सामाजिक जीवन के उत्थान तथा प्रगति में जो योगदान था, उसमें एकदम और अचानक अवरोध से जो समस्याएँ खडी होतीं, उन्हें समझने की क्षमता तात्कालीन सरकार और कांग्रेस पार्टी में थी, जिसने मनमोहनसिंह को तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद इस कार्य को करने से रोका दूसरा महत्वपूर्ण कारण था भाजीबीनी कर्मचारियों का आन्दोलन और उस आंदोलन के साथ जुड़ी भाजीबीनि के बीमा धारकों और आम लोगों की एकजुटता पर, जो कार्य तमाम अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बावजूद 1995 तक कांग्रेस नीत सरकार और उसके बाद आईं मिली-जुली सरकारें नहीं कर पाईं, वह दिसंबर 1999 में भाजपा के नेतृत्व में बनी अटल वाजपाई सरकार ने कर दिया और जीवन बीमा का बाजार विदेशी-देशी पूंजी के लिए खोल दिया गया पर, एल आई सी को हाथ लगाने की जुर्रत उसके बाद भी पुरे 21 साल कोई सरकार नहीं कर पाई

आज सरकार अपने 3.5% शेयर बाजार के हवाले कर रही है और उसे पूरी उम्मीद है कि वह इससे वर्ष 2023 के लिए निर्धारित अपने विनिवेश के 78 हजार करोड़ के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगी                  

भारतीय जीवन बीमा निगम में राष्ट्रीयकरण के समय सरकार ने मात्र 5 करोड़ की पूंजी लगाई थी| उस प्रारंभिक निवेश के बाद व्यवसाय के विस्तार के लिए सरकार ने कभी कोई अतिरिक्त पूंजी का योगदान नहीं किया है। एलआईसी की पूरी उन्नति  और विस्तार एलआईसी द्वारा पॉलिसीधारकों से एकत्रित बीमा के लिए प्रदत्त धन से ही हुआ है। यहां तक ​​कि नियमों के अनुसार आवश्यक सॉल्वेंसी मार्जिन भी पॉलिसीधारकों से एकत्रित फंड के द्वारा ही हुआ है। यह कहा जा सकता है कि एलआईसी एक अनोखी ट्रस्ट या म्यूचुअल बेनिफिट सोसाइटी जैसी है, जो “लोगों के धन से, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा”, शुद्ध लोकतांत्रिक मूल्यों पर चलाई जाती है पिछले कई दशकों में निर्मित एलआईसी के सरप्लस फंड, इसकी 38 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति, इसके पॉलिसीधारकों की है, इसलिए वे ही एलआईसी के वास्तविक मालिक हैंसरकार अपने 5 करोड़ के एवज में 28 हजार करोड़ से ज्यादा का लाभांश और लगभग इतने का ही निवेश जनकल्याणकारी योजनाओं में एलआईसी से प्राप्त कर चुकी हैबीमा धारक ही इसके 100% इक्विटी शेयर धारक हैं। इसीलिए, एलआईसी का स्लोगन भी रहा है ‘पॉलिसीधारक हमारे स्वामी हैं’ यह हास्यास्पद सा लगता है कि इसके सच्चे स्वामियों को आज सरकार उपकृत सा करते हुए उन्हें आईपीओ में 10% निवेश की जगह देने का झुनझुना पकड़ा रही है

भारतीय जीवन बीमा निगम का निजीकरण मोदी सरकार के निजीकरण के अभियान के सबसे बुरे निर्णयों में से एक प्रमुख निर्णय होने जा रहा है 1956 से विकास के झंडे को देश के दूरदराज के आदिवासी तबकों से लेकर सम्पूर्ण ग्रामीण भारत के कोने कोने तक पहुंचाने वाली संस्था, जिसके पीछे चलकर ही बाकी तमाम वित्तीय योजनाएं और संस्थाएं उन इलाकों तक पहुँची, स्वतंत्रता पश्चात आत्मनिर्भर भारत के जिस स्वप्न को देखा गया और जिसे अमली जामा पहनाने निगम के लाखों कर्मचारियों, अधिकारियों और एजेंटों ने अपना खून पसीना दिया, उस ट्रस्ट को तोड़कर आज एलआईसी को पॉलिसीधारकों के ट्रस्ट से बदलकर शेयरहोल्डर्स के लिए मुनाफे अर्जित करने वाली कंपनी में बदला जा रहा है इसे करने के लिए इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDA)  दो बदलाव पहले ही कर चुकी है। पहला कि, नॉन-सेविंग लिंक्ड पॉलिसी एक अलग लाइफ फंड होगी जिसका रिटर्न पॉलिसीधारकों को नहीं बल्कि शेयरधारकों को जाएगा। दूसरा, पॉलिसी-धारकों को वितरित किए जाने वाले शुद्ध रिटर्न के अनुपात को 95 प्रतिशत से घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया है। जैसे-जैसे निजी शेयरधारक बढ़ेंगे, यह अनुपात निश्चित रूप से और घटेगा।सरकार एलआईसी में विदेशी पूंजी की भी अनुमति दे रही है। इससे निश्चित रूप से विदेशी पूंजी को  घरेलू बचत पर और अधिक पहुंच और नियंत्रण हासिल करने में मदद मिलेगी, जिससे राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं के लिए धन-संग्रह में रुकावट पहुंचेगी। आत्मनिर्भर भारत की रट लगाने वाली सरकार यह समझ भी रही है या नहीं, किसे पता?

एलआईसी के निजीकरण का निस्संदेह रूप से सरकार की तरफ से पॉलिसीधारकों को दी जाने वाली सॉवरेन गारंटी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारतीय जीवन बीमा निगम में आम लोगों के अटूट विश्वास के पीछे यह सॉवरेन गारंटी एक महत्वपूर्ण कारक थी। भारत के अधिकांश हिस्सों में, गरीबों को शायद ही कोई सामाजिक सुरक्षा सुरक्षा प्राप्त है। एलआईसी उन्हें कम प्रीमियम पर कई सामाजिक सुरक्षा बीमा कार्यक्रम, आकर्षक सावधि जमा योजनाएं और स्वयं सहायता समूहों के लिए विशेष योजनाएं प्रदान करती रही है और कर रही है। यदि क्रॉस-सब्सिडी समाप्त हो जाती है, तो ऐसी योजनाएं संकट में पड़ जाएंगी।

पॉलिसीधारकों और कर्मचारियों को शेयरों की पेशकश एक छलावे के अतिरिक्त कुछ नहीं है। शेयर मार्केट में आईपीओ आने के बाद एलआईसी का नियंत्रण किस और कैसे निवेशक समूह में स्थानांतरित होगा और वे इसके लाखों के असेट्स का तथा लाईफ और सरप्लस फंड का कैसा क्या उपयोग-गोलमाल करेंगे, इसे जानने के लिए राष्ट्रीयकरण के पहले का निजी बीमा कंपनियों इतिहास उपलब्ध है।

सरकार का एलआईसी का आईपीओ लाये जाने के पक्ष में दिये जा रहे तर्क कि इससे एलआईसी में और अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी, बोगस है, क्योंकि सरकार स्वयं साल दर साल संसद में एलआईसी का पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करने के बेदाग रिकॉर्ड पेश करती रही है। क्योंकि एलआईसी हर साल भारी निवेश योग्य सरप्लस देती है, इसलिए इस तर्क का कोई मतलब नहीं है कि इससे अधिक पूंजी एकत्रीकरण में मदद मिलेगी। यह तर्क तो और भी हास्यास्पद है कि एलआईसी का आईपीओ लाने से भारतीय जनता को लाभ होगा, क्योंकि शेयर बाजार में खुदरा निवेशक आबादी का लगभग 3% ही हैं। वास्तव में एलआईसी में अपने स्वामित्व के हिस्से के शेयरों को बाजार में बेचने का मतलब केवल और केवल अमीर, कॉर्पोरेट और विदेशी पूंजी को सस्ती कीमत पर एकत्रित सार्वजनिक संपत्ति-धन को उपलब्ध कराना ही है। सरकार एलआईसी में अपने शेयरों को बेचकर, वास्तव में, पॉलिसी-धारकों को भविष्य में होने वाली आय को अमीर, कॉर्पोरेट और विदेशी पूंजी को सस्ती कीमत पर बेच रही है।

 
अरुण कान्त शुक्ला 
4 मई, 2022 

Monday, January 31, 2022

क्या रोजगार के अवसरों में कमी का संकट भारत में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में फूटने का इंतजार कर रहा ज्वालामुखी है?

पिछले 8 वर्षों के दौरान देश के नवजवानों/छात्रों को जातीय पहचान और धर्म के नाम पर उत्तेजित होते, हुड़दंग करते, फसाद करते और लिंचिंग में शामिल होते देखकर यही लगता था कि उनके सामने नौकरी, रोजगार और सामाजिक कर्तव्यों में जुटने में आने वाली परेशानियों, पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसी किसी भी किस्म की कोई समस्याएँ शेष नहीं हैं। दुर्भाग्य से ही सही पर पिछले कुछ वर्षों में पहचान और धर्म पर हिंसा और उसमें नवजवानों का इस्तेमाल एक ऐसी चीज है जिसके हम अभ्यस्त से हो गए हैं। लेकिन पिछले सप्ताह मंगलवार को हमने कुछ दुर्लभ देखा, नौकरियों को लेकर दंगे।

बिहार में आरा, गया, पटना में क्रोधित छात्रों और पुलिस के बीच झड़प, हिंसा और आगजनी का मंजर देखा| उत्तर प्रदेश से भी एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ जिसमें पुलिस छात्रों और छात्रावासों पर धावा मारते दिख रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना था कि वे उन छात्रों की तलाश कर रहे थे जिन्होंने ट्रेन रोकने की कोशिश की थी।

बिहार और उत्तर प्रदेश के छात्र "गैर-तकनीकी लोकप्रिय श्रेणी" कहलाने वाली क्लर्क और स्टेशन मास्टर जैसी नौकरियों के लिए भर्ती होने वाली रेलवे परीक्षा के परिणामों से नाराज़ थे। दरअसल इन परीक्षाओं को  2019 में ही हो जाना चाहिए था लेकिन कोविड -19 महामारी के कारण वे टलती गईं थीं। चूंकि ये तकनीकी नौकरियां नहीं थीं, इसलिये, उम्मीदवारों के आवेदन भी बड़ी संख्या में आये। सोचिये, 35,000 पदों के लिए रेलवे को 1.25 करोड़ आवेदन प्राप्त हुए। अगर भर्ती प्रक्रिया ठीक-ठाक तरीके से पूरी भी हो जाये तब भी उन उम्मीदवारों की संख्या जिनको कि नौकरी नहीं मिलेगी, बेल्जियम की पूरी आबादी से भी ज्यादा होगी।

विश्व बैंक के द्वारा प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत की कामकाजी उम्र की आबादी में से केवल 43% के पास ही नौकरी है। रोजगार के अवसर मुहैय्या कराने के मामले में भारत बंगलादेश और पाकिस्तान से भी पीछे है। बांग्लादेश उसकी कामकाजी आयु के लोगों में से 53% को तो पाकिस्तान 48% लोगों को नौकरी देने में सफल रहा है। हालात के बद्तर होने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि  सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के दिए गए आंकड़ों के अनुसार लगभग 1.7 करोड़ भारतीय काम करना चाहते हैं, लेकिन वे निराश हो चुके हैं और उन्होंने सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश करना ही छोड़ दिया है। इनमें आधे से ज्यादा महिलाएं हैं और उनमें इकतालीस प्रतिशत 15 से 19 वर्ष की आयु के बीच हैं।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के ही आंकड़ों के अनुसार जिन परिवारों में एक से अधिक व्यक्ति कार्यरत हैं, उनका अनुपात 2016 के लगभग 35% से गिरकर 2021 में केवल 24% रह गया है। नौकरी प्राप्त करने के बाद भी वेतन का स्तर इतना कम हो सकता है कि परिवारों को लगता है कि बेहतर होगा यदि सदस्य बाहर कम वेतन वाले रोजगार की तलाश करने के बजाय घरेलु कार्य करे जिससे उस कार्य के लिए कोई वैतनिक कामगार न रखना पड़े। बड़ी संख्या में भारतीय नौकरी की तलाश में भी परेशान हैं। ऊर्जावान युवा भी निराश हैं। देश के 15-24 आयु वर्ग के नौजवानों में काम की तलाश कर रहे लोगों का अनुपात  केवल 29% है। हमने प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं के मुंह से अनेक बार सुना है भारत युवाओं का देश है पर दुःख की बात यह है कि भारत स्पष्ट रूप उस युवा श्रमबल को बर्बाद कर रहा है।
चीजें इतनी खराब क्यों हैं ? सरकारें इसके अनेक कारण गिना सकती हैं उनके पास पकौडा बेचने के व्यवसाय से लेकर स्टार्ट-अप तक स्टार्ट करने के अनेक रोजगार भी हैं वे महामारी को भी इसका कारण बता सकती हैं। वे सीख दे सकती हैं कि नौजवानों को आपदा से अवसर ढूंढ निकालना चाहिए। पर, साधारण सी बात यह है कि निजी क्षेत्र कम वेतन और ज्यादा श्रम-दोहन में ही अपना लाभ देखता है और रोजगार सृजन उसके लिये पैसे का अपव्यय है। नतीजतन हर वर्ष करोड़ से ऊपर रोजगार पाने की कतार में जुड़ने वाले इच्छुक शिक्षित, अर्द्धशिक्षित छात्र, नौजवान सरकारी नौकरियों की तलाश में ही रहते हैं, लेकिन निजीकरण, डिजिटलीकरण और आटोमेशन में वृद्धि के कारण सरकारी क्षेत्र में रोजगार सृजन में भारी गिरावट आई है।

जेएनयू और अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों के आंदोलन के कुचल दिए जाने और उनके ऊपर आतंकवादी, देशद्रोहिता के आरोप लगाए जाने के बाद तो यूँ लगता था जैसे उनकी सारी समस्याओं का हल निकाला जा चुका है और देश के छात्रों/नवजवानों के सामने अब यदि कोई लक्ष्य है तो वह देश में हिन्दुतत्व की स्थापना भर ही शेष है। किसी भी देश में, यदि उस देश के नवजवान/छात्र अपने मूल हकों को और उनके लिए संघर्ष करने के अपने धर्म को भूल जाएँ और राष्ट्रवाद, जातीयता और धर्म की आभासी प्राप्तियों में अपना भविष्य देखने लगें, यह परिस्थिति न तो उस देश के हित में है और न ही उस देश के बाशिंदों के हित में है। यह एक बैचैन कर देने वाली परिस्थिति थी। यद्यपि नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ पूरे देश में चले सफल आंदोलन और उसके बाद एक वर्ष से ज्यादा की अवधि तक चले सफल किसान आंदोलन ने उस वातावरण को बदला पर नवजवानों और छात्रों के आन्दोलन की अनुपस्थिति तीव्रता से महसूस हो रही थी।

रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश में छात्रों का विरोध भारत में रोजगार के अवसरों में बढ़ती कमी के संकट का एक लक्षण है, जो दिखने से कहीं अधिक गंभीर है। इसे अलग-थलग करके बिहार या यूपी की घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता है। ये दोनों राज्य एक उदाहरण पेश करते हैं कि कैसे सरकारी सेवाओं और विभिन्न भर्ती बोर्डों के साथ चीजें गलत हो रही हैं, जिससे युवाओं में गुस्सा है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस मुद्दे को हल करने के लिए सरकार की उदासीनता है।

उपरोक्त परिदृश्य में, हम में से अधिकांश के लिए, यह हिंसा एक अचंभे के रूप में सामने आई क्योंकि मीडिया या राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की बात तो छोड़ ही दी जाये, जन-जीवन तक में बेरोजगारी पर शायद ही कभी गंभीरता से कोई चर्चा आज की जाती है। पर, यह एक तथ्य जो इन दंगों से सामने आया है बताता है कि रोजगार के अवसरों की कमी भारत में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में फूटने का इंतजार कर रहा ज्वालामुखी है, और अगर ऐसा होता है, तो यह पिछले तीन वर्षों से लगातार जन-प्रतिरोध का सामना कर रही नरेंद्र मोदी सरकार के लिये एक और बड़ा कांटा हो सकता है, जिसे राष्ट्रवाद और हिन्दुत्त्व की लुभावनी बातों से टालना मोदी जी के लिये भी कतई मुमकिन नहीं होगा।

 

अरुण कान्त शुक्ला

31 जनवरी, 2022