Tuesday, September 28, 2010

राजा नंद का संकट मगध का संकट नहीं -


 

कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के सीईओ माईक हूपर का बयान कि उन्हें भारत की इज्जत से कोई मतलब नहीं है , उनका काम तो खेलों को सही तरीके से आयोजित कराना है , भारत के शासक वर्ग के सम्मान और प्रतिष्ठा का ताबूत बन चुके कॉमनवेल्थ खेलों पर आखरी कील है | जितना सख्त हूपर का बयान है , उतनी ही लीचड़ और बेबस प्रतिक्रिया दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित ने दी कि हूपर साहब का बयान अनुचित और दुखद है | मैंने हूपर के उस बयान को कई बार पढ़ा , पर मुझे उसमें कुछ भी अनुचित या दुखद नहीं लगा | हूपर भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन की देख रेख करने आये हैं और उनकी पूरी जिम्मेदारी और जबाबदेही कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के प्रति है ,न कि भारत की प्रतिष्ठा बचाने की | यदि मनमोहन सिंह एंड कंपनी , शीला दीक्षित या कलमाड़ी एंड कंपनी की समझ यह रही कि ब्रिटेन की रानी के दूत उनकी (उनके भारत की) इज्जत रखेंगे तो इसे इनके दिमाग के दिवालियापन के अलावा और क्या कहा जायेगा ? मनमोहनसिंह , जो अब खेलों के आयोजन से सीधे जुड़ चुके हैं , को अभी तक यह तो समझ में आ गया होगा कि जी-20 , डबल्यूटीओ में बुश , ओबामा से अर्थशास्त्री होने का तमगा लेकर पीठ थपथपवाना अलग बात है और देश के अंदर भ्रष्टाचार रहित , पारदर्शी , जनोभिमुखी प्रशासन देना अलग बात है |

वैसे , वे सभी लोग जो भारत के शासक वर्ग की हरकतों में , भारत सरकार के कामों में और भारत के राजनीतिक नेताओं के हास्यास्पद क्रियाकलापों में से हास्य रस निकाल कर खुश रहने का मंत्र ढूँढ चुके हैं , पिछले लगभग दो माह से सुखी होंगे | मैं स्वयं भी उन्हीं सुखी इंसानों में से एक हूँ | दरअसल , कॉमनवेल्थ के खेलों के संकट हमारा संकट है ही नहीं और इन खेलों के साथ देश की प्रतिष्ठा या राष्ट्रप्रेम जैसी किसी भावना को जोड़ना कोरी भावुकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | चाणक्य जब राजा नंद के शासन को उखाड़ने की चेष्टा में लगा था , नंद का महामंत्री अमात्य राक्षस ने चाणक्य को उन संकटों के बारे में बताया जिनसे नंद का राज घिरा हुआ था | पूरी बात सुनने के बाद चाणक्य ने अमात्य से कहा कि राजा नंद के संकट मगध ( मगध की प्रजा ) के संकट नहीं हैं | चाणक्य की उपरोक्त उक्ति भारत सरकार और भारत के शासक वर्ग के ऊपर पूरी तरह फिट बैठती है |

आज भारत के शासक वर्ग के सामने मौजूद संकट , देशवासियों के समक्ष मौजूद संकटों से एकदम जुदा हैं और कोढ़ में खाज की तरह शासक वर्ग राष्ट्रभक्ति , राष्ट्रीय सम्मान के नारों की आड़ में देशवासियों को तो अपने संकटों को बौझ उठाने कह रहा है लेकिन खुद देशवासियों के समक्ष मौजूद संकटों का संज्ञान भी नहीं लेना चाहता | कॉमनवेल्थ खेलों के सफल आयोजन से अगर देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि में कोई इजाफा हुआ भी तो वह देशवासियों के लिये शेयर मार्केट में हुए इजाफे के समान ही होगा , जिसका आम लोगों के संकटों से कोई भी वास्ता नहीं होता | जो सरकार घोषित रूप से इन खेलों पर 40 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है , जिसमें से हजारों करोड़ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है और न जाने कितना चढ़ेगा , उसी सरकार के मुखिया को हम कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट को गरियाते देख चुके हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जो अनाज सड़ रहा है , उसे गरीबों को बांटने के लिये कहा था | इन खेलों की सफल मेज़बानी करके अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि में रौनक लाने के सपने देखने वाली सरकार को क्या कभी यह अपमान जनक लगता है कि उसके देश की एक अरब की आबादी में से आधी याने करीब पचास करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं याने उन्हें रोज भर पेट भोजन भी नहीं मिलता | भोजन याने क्या ? हलवा , पूड़ी , माल , मिठाई या फल , फूल नहीं सिर्फ दाल रोटी और जिस दिन तेल घी में बघरी सब्जी हो गई तो उनकी दिवाली हो जाती है | रोज मंहगाई कम करने के लिये रिजर्व बैंक के जरिये बाजार में तरलता ( पैसे का प्रसार ) कम करने के उपाय करने वाली सरकार ने पचास हजार करोड़ रुपये खर्च करने के पहले एक दफे भी नहीं सोचा कि आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है | उनकी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा खाने पीने की चीजों में खर्च हो जाता है | उनकी जेब में दवाई दारु के लिये भी पैसा नहीं बचाता है | यहाँ तक कि जरूरी भोजन याने दाल और सब्जियां उनकी पहुँच से दूर हो गईं हैं | इसीलिये मैं कहता हूँ , शासक वर्ग की चिंताएं अलग हैं और हमारी चिंताएं अलग | शासक वर्ग के संकट अलग हैं और हमारे संकट अलग | आपका संकट , हमारा मनोरंजन कर सकता है , हम उसे हमारा संकट नहीं बनाएंगे | आपका संकट राजा नंद का संकट है , वह मगध का संकट नहीं है |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Sunday, September 26, 2010

जाना बचपन के मित्र और मार्गदर्शक का – एक श्रद्धांजली

मेरा बचपन का समय और युवावस्था तक पहुँचने की अवधि वह दौर था , जब एक मध्यमवर्गीय परिवार में कम से कम एक अखबार के साथ एक पारिवारिक साप्ताहिक पत्रिका के साथ बच्चों के लिये कम से कम एक पत्रिका अवश्य ली जाती थी | बचपन में करीब तेरह चौदह वर्ष तक की उम्र तक हर साल की गर्मी की छुट्टियाँ नाना नानी के साथ ही बिताया करते थे , जहाँ कल्याण के अनेकों अंक जिल्द बंद थे और सारी छुट्टियाँ कृष्ण , अर्जुन , कर्ण , और महाभारत की कहानियां पढते बीत जाया करती थीं | वैसे पत्रिकाओं के पढने की सही शुरुवात चंदामामा से हुई थी ,जो घर में नियमित आया करती थी | एक अंक के लिये एक माह का इंतजार कितना बेसब्र बना सिया करता था कि हाथ में पडते ही आधे घंटे के भीतर पूरी चंदामामा खत्म हो जाती थी और फिर उन्ही कहानियों को और पुराने अंकों को पढते रहना ही काम रह जाता था | उसके बाद आया पराग का युग , जिससे , मेरी जानकारी में बाल साहित्य में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर शुरू हुआ |राजा –रानी , राक्षस , देवी –देवताओं और बेताल से आगे का युग | वैसे स्थानीय अखबार में उस समय के मृत्युंजय को भी पढने का बड़ा चाव रहता था | और फिर मेरे पन्द्रह बरस का होते होते "नंदन" शुरू हुआ , जिसमें मनोरंजन के अलावा शिक्षा के तत्व को भी डालने की शुरुवात हुई | उसी "नंदन" के जरिये पहली बार स्कूली शिक्षा के बाहर के किसी साहित्यकार को जाना | कन्हैय्यालाल नंदन उसमें बच्चों के नाम से एक चिठ्ठी लिखा करते थे | अक्सर वे चिठ्ठियां बहुत शिक्षाप्रद हुआ करतीं थीं | कहते हैं , कहते क्या हैं , में इसे मानता हूँ कि स्कूल की शिक्षा किसी को भी शायद असीमित योग्यता प्रदान कर सकती है , पर , जहाँ तक मानस पर अमिट प्रभाव छोडने की बात है , वह तो स्कूली और कालेजी शिक्षा से इतर जगहों से ही मिलती है | कन्हैय्यालाल नंदन ने अपने साहित्य जीवन में अनेकों बच्चों के लिये इस पुण्य काम को किया होगा , जिनमें से अनेक बच्चे इसे महसूस ही नहीं कर पाए होंगे | एक ऐसे साहित्यकार को मुझ जैसे अनाम और अकिंचन की भावभरी श्रद्धांजली |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Saturday, September 18, 2010

आम जनता दंगा फसाद नहीं करती --


अयोध्या की विवादित भूमि पर 24 सितम्बर को आने वाले फैसले को टालने के लिये दी गई याचिका के खारिज होने के साथ यह पक्का हो गया है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ 24 सितम्बर को ही मामले में अपना फैसला सुना देगी | यदि इस बात को सत्य माना जाये कि प्रत्येक देश और समाज को काल चक्र अतीत में की गई गल्तियों को सुधारने का अवसर अवश्य प्रदान करता है तो भारतीय समाज और विशेषकर हमारे
देश के राजनेताओं , संतों और इमामों के समक्ष यह अवसर इसी 24 सितम्बर को उपस्थित होने जा रहा है , जब विवादित भूमि पर अदालत का फैसला आयेगा |


यह देखते हुए कि अयोध्या विवाद भारत के हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव का एक प्रमुख मुद्दा रहा है , और देश की राजनीति को इसने न केवल प्रभावित किया है
बल्कि हमारे देश के राजकीय पक्षों ने इसका बेजा राजनीतिक इस्तेमाल भी अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये किया है , एक चुनौती हमारे सामने मौजूद है कि पुनः ऐसा न हो पाये | अदालत के निर्णय के संबंध
में मुस्लिम पक्ष ने हमेशा कहा है कि वह अदालत का फैसला मानेगा , लेकिन विश्व हिन्दु परिषद का एक तबका यह कहता आया है कि यह उनकी धार्मिक आस्था का मामला है , जिसका फैसला अदालत नहीं कर सकती | भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिन्दू परिषद के एक तबके सहित कई हिंदू संगठनों की मांग रही है कि सरकार संसद में कानून बनाकर विवादित जमीन उसे एक विशाल राम मंदिर बनाने के लिये दे दे , लेकिन देश के बहुसंख्यक लोगों के इससे सहमत नहीं होने के चलते भाजपा को भी सत्ता में आने के लिये इस मुद्दे को छोड़ना पड़ा था | यद्यपि आरएसएस प्रमुख मोहन राव भागवत कानून के दायरे में ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने और शांति बनाये रखने का आश्वासन दे रहे हैं लेकिन उसके सहयोगी विश्व हिन्दू परिषद के तेवर कड़े हो रहे हैं | माहौल फिर से तनाव पूर्ण है | कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है | आम देशवासी सहमे हुए हैं | यह सब तब है जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले के बाद सभी पक्षों के लिये आगे और कानूनी कार्यवाही करने के रास्ते खुले हुए हैं |


बहरहाल ,एक बात , अयोध्या मामले के चारों पक्षकारों सुन्नी वक्फ बोर्ड , निर्मोही अखाड़ा , राम जन्म भूमि न्यास ,गोपाल सिंह व्यास के साथ साथ आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों तथा भाजपा और कांग्रेस
के नेताओं को समझना पड़ेगी , कि , पिछ्ले तीन दशकों में घटी तीन बड़ी घटनाओं , सिख विरोधी दंगे , बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात का नरसंहार , ने भारतीय समाज के मानस को तोड़कर रख दिया है | राष्ट्रीय एकता , सर्व धर्म समभाव , हजार से ज्यादा वर्षों की साझा विरासत जैसे नारों से समाज के अन्दर पैदा हुए अलगाव को ढाका तो जा सकता है लेकिन जरा सी हलचल से उस अलगाव के घाव फिर हरे हो जाते हैं | उपरोक्त घटनाओं में केवल निरीह देशवासी ही नहीं मारे गये थे , बल्कि अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले भारतीय दर्शन की भी हत्या हुई थी | समाज की उस सामूहिक सोच को नकारा गया था , जो किसी भी समाज की समरसता और समग्र विकास के लिये अत्यंत आवश्यक होती है | प्रसिद्ध दार्शनिक रामचंद्र गांधी के शब्दों में बाबरी मस्जिद पर हमला मस्जिद पर नहीं बल्कि भारतीय सोच पर था | सत्ता प्राप्त करने की राजनीति में सामाजिक अलगाव फैलाने से प्राप्त होने वाले फायदे कितने तुच्छ और अल्पकालिक होते हैं , यह सभी देख चुके हैं | घ्रणा और द्वेश की जमीन पर राजनीतिक फसल हमेशा नहीं लहलहा सकती , इस सबक को हमेशा याद रखने की जरुरत है |


यह फैसला एक ऐसे समय आ रहा है , जब देश में संकटकालीन परिस्तिथि मौजूद है | एक तरफ कश्मीर का मामला है , जहाँ अलगाव वादी ताकतें पूर्ण उग्रता के साथ सक्रिय हैं तो दूसरी ओर कामन वेल्थ के खेल हैं , जिनकी तैय्यारियों पर अनेक प्रश्न खड़े हैं और आने वाले अतिथियों और खिलाड़ियों की सुरक्षा का बहुत बड़ा दायित्व केंद्र और दिल्ली की सरकार पर है | मामले की नजाकत को देखते हुए ही केंद्र सरकार ने सभी लोगों से शांति बनाये रखने की अपील की है | पर कांग्रेस को भी साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर अपने समझौता वादी रुख में सुधार करना होगा | कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस दोनो ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वे श्रीक्रष्ण आयोग की रिपोर्ट
को लागू करेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं | रिपोर्ट में जिन अफसरों और नेताओं की आलोचना हुई , उनमें से किसी को भी सजा नहीं हुई | यदि ऐसा हुआ होता तो आज जैसे अन्देशे वाली स्थिति का निर्माण नहीं हुआ होता |


हमारे देश के राजनेताओं के सोच का दायरा इतना संकीर्ण और सत्तालोलुप है कि वे समझ ही नहीं पाते कि सिख विरोधी दंगे , बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात नर संहार जैसी घटनाएं समाज के लोगों की मानसिकता पर कितना विपरीत प्रभाव डालती हैं | पिछले तीन दशकों में भारतीय समाज में जिस बढ़ी हुई असहनशीलता और क्रूरता को हम देख रहे हैं , उसमें पिछले तीन दशकों के दौरान अपनाई गईं आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरुप पैदा हुए असंतोष के अलावा उपरोक्त तीनो घटनाओं का भी बड़ा हाथ है | स्वयं जस्टिस श्रीकृष्ण ने हाल ही में दिये गये एक साक्षात्कार में यह पूछने पर कि कमीशन की बैठकों के दौरान जब लोग अपनी कहानियाँ बयान करते थे तो एक इंसान के नाते आप पर क्या प्रभाव पड़ा , बताया कि , इस कमीशन में काम करने से पहले मैं बहुत शांत व्यक्ति था | मुझे कभी गुस्सा नहीं आता था| कमीशन में लोगों की कहानियाँ सुनते सुनते मुझे बहुत गुस्सा आने लगा , मैं तेज मिजाज का हो गया | ये मेरे परिवार का कहना है | जस्टिस श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि अगर आप सुनते रहें कि इसे जला दिया गया , उसे मार दिया गया , इससे मानसिक व्यथा होती है और इसके
अंतरंग परिणाम होते हैं |


जब एक जस्टिस जिसे रोज तनावपूर्ण परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है , उद्वेलित हो जाता है तो साधारण जनों के उपर पड़े प्रभाव का संकेंद्रित सामाजिक प्रभाव तथा उसके सामाजिक परिणाम कितने घातक होते होंगे , समझा जा सकता है | देश के राजनियकों को सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह का भारतीय समाज चाहते हैं | आम जनता दंगा फसाद में नहीं पड़ती , उनको भड़काने वाले लोग होते हैं , जो उन्हें उद्वेलित करते हैं | जब व्यक्ति भड़क जाता है तो भटक भी जाता है | उम्मीद करें इस बार ऐसा न हो |


अरुण कान्त शुक्ला

Thursday, September 9, 2010

क्रिकेटर्स को भारत रत्न नहीं देना चाहिये --


जबसे सचिन तेन्दुलकर ने साउथ अफ्रिका में दोहरा शतक बनाया है , उन्हें भारत रत्न देने के लिये जबर्दस्त लाबिंग मीडिया की पहल परचल रही है | इस लाबिंग में कुछ खेल विशेषज्ञों , पुराने समकालीन क्रिकेटरों के साथ साथ राजनीतिज्ञों का जुड़ना आश्चर्य में डालने वाला रहा है | सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न देने की सिफारिश महाराष्ट्र सरकार ने तो की ही , लोकसभा तथा राजसभा में भी सांसदों ने ऐसी मांग केंद्र सरकार से किये | सचिन स्वयं इस सम्बंध में अपनी लालसा को छुपा नहीं पाते हैं | भारतीय वायु सेना में ग्रुप कैप्टेन की मानद उपाधी ग्रहण करने के समारोह के समय यह लालसा पुनः उजागर हुई है | बहरहाल , सचिन ही क्यों , कोई भी स्वयं को योग्य समझने वाला व्यक्ति यदि ऐसी आकांक्षा या लालसा रखता है तो उसमें गलत कुछ भी नहीं है | पर , सचिन तेंडुलकर ही क्यों , आज की व्यवसायिक क्रिकेट से जुडे किसी भी व्यक्ति को क्या भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देना चाहिये , यह जरुर गम्भीर और विचारणीय प्रश्न है ?
एक समय था , जब क्रिकेट को भद्र जनों का खेल कहा जाता था | पर यह भद्र जनों का खेल कब रहा , यह बताना बहुत मुश्किल है | हो सकता है , इसे भद्र जनों का खेल इसलिये कहा जाता रहा हो क्योंकि उस दौरान भद्र जनों के पास ही इतना समय रहता हो कि वे एक दिन विश्राम का मिलाकर छै दिनों का टेस्ट मेच खेल सकते हों | एक श्रंखला में न्यूनतम पांच मेच खेले जाते थे | दो टेस्ट मेच के बीच का अंतराल मिलाकर , पूरी श्रंखला के लिये दो माह से उपर का समय लगता था | इतना समय तो भद्र जन ही निकाल सकते थे | इसके अलावा इसमें कोई भद्रता कभी नहीं रही | यदि रही होती तो इंग्लेंड-आस्ट्रेलिया एशेज श्रंखला के दोरान बरसों पहले कुख्यात बाडी लाईन प्रकरण नहीं हुआ होता | हो सकता है कि हाकी - फुटबाल और अन्य खेलों के उपर अपनी सुप्रिमेसी , जो आज भी कायम है , बनाने के लिये भद्रजनों ने ही इसे भद्रजनों के खेल के नाम से प्रचारित किया हो | बहरहाल क्रिकेट आज भद्रजनों का नहीं भ्रस्टजनों का खेल है | इसमें भद्रता किंचित मात्र भी नहीं है , किंतु भ्रस्टता से यह लबालब भरा हुआ है | क्रिकेट खेलने वाले देशों में से कोई भी एक देश ऐसा नहीं है , जिसके खिलाड़ियों पर पैसा खाकर , ऐसा , खेलने के आरोप नहीं लगे हैं , जिससे खेल का परिणाम प्रभावित होता है | इंग्लेंड , आस्ट्रेलिया जैसे देश हैं , जहाँ क्रिकेट पर सट्टेबाजी के लिये बकायदा कंपनियां खुली हुई हैं और नामी गिरामी क्रिकेट खिलाड़ियों का उनसे व्यावसायिक रिश्ता है | जिस बात पर गौर किया जाना चाहिये वह यह है कि क्रिकेट में सट्टेबाजी कहीं भी क्यों न हो , भारत का नाम उसमें अवश्य जुड़ा रहता है | 1998 में आस्ट्रेलियन खिलाड़ी शेन वार्न और मार्क वाघ ने खुलासा किया था कि 1994 के टूर्नामेंट के दोरान उन्होनें एक इंडियन बुकी को जानकारियां उपलब्ध कराईं थीं | भारत , श्रीलंका , पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर सट्टेबाजों से पैसा लेकर खेल को प्रभावित करने के आरोप नये नहीं हैं | यहाँ तक कि कपिल देव , जो 1983 में एक दिवसिय क्रिकेट का विश्वकप जीतकर लाये , उन पर भी मनोज प्रभाकर ने सट्टेबाजों से पैसा लेने का आरोप लगाया था |
भारत में क्रिकेट लोकप्रियता से उपर उठकर लगभग एक जुनून है | इसे जुनून बनाने में उस ईलाक्ट्रानिक मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है , जो आज बिना सोचे , विचारे किसी भी मुद्दे पर न केवल जनभावनाओं बल्कि सरकारों सहित देश की अन्य सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने अनुसार चलाने की कोशिश में लगा रहता है | किंतु , फुटबाल सोसर के समान क्रिकेट पूरी दुनिया में नहीं खेला जाता है | भारत रत्न , कला , साहित्य , विज्ञान एवं टेकनालाजी तथा उच्च कोटी के लोक कार्यों के लिये देने का प्रावधान है | क्रिकेट भारत में उद्योग की सीमा से आगे बड़कर धंधे में परिवर्तित हो चुका है और क्रिकेट खिलाड़ी विज्ञापनों और फेशन परेडों से कमाई करने के अलावा करोडों रुपयों में खुद को बेच रहे हैं | इंडियन प्रीमियर लीग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है , जहाँ भारत के बड़े और नामी क्रिकेट खिलाड़ी , माने हुए विदेशी खिलाड़ियों के साथ , अपने मालिकों को खुश करने के लिये सरकस के शेर , भालू , बन्दर के समान करतब दिखा रहे हैं और असफल होने पर मालिकों से झिड़की भी खा रहे हैं | क्रिकेटर्स का कार्य किस श्रेणी में आयेगा ? जिन विज्ञापनों में किसी भी दौर के क्रिकेट खिलाड़ियों ने काम किया है , उनमें से ढेरों ऐसे हैं जो आम देशवासियों और विशेषकर बच्चों और युवाओं के लिये अत्यंत हानिकारक हैं | व्यावसायिक क्रिकेट , क्रिकेट में भ्रष्टाचार , सर्कस क्रिकेट , विज्ञापनों में काम , रेम्प पर केट वाक , क्रिकेटर्स के किस काम को और किस उपलब्धी को लोक कार्य की श्रेणी में रखा जायेगा ? इसलिये ,क्रिकेटर्स को भारत रत्न से जितना दूर रखा जाये , भारत रत्न के लिये उतना ही अच्छा होगा |

 

अरुण कांत शुक्ला

 

Saturday, August 14, 2010

सौदागर सरकारें और त्रस्त उपभोक्ता

किसी भी देश की राष्ट्रीय सरकार की जबाबदारी केवल अपने लिए अतिरिक्त आर्थिक ताकत पैदा करने के साथ पूरी नहीं हो जाती है |यह सच है कि आज के भूमंडलीकरण के दौर में विकसित देशों के सामने ठहरने के लिए उनके समान आर्थिक व्रद्धि हासिल करना जरूरी है , किन्तु उतना ही जरूरी देश के अंदर की आर्थिक गतिविधियों को समाज के निचले स्तर तक ले जाना भी है |
यदि देश की एक बड़ी जनसंख्या की भागीदारी आर्थिक तरक्की के अंदर नहीं होगी तो सरकारों के द्वारा बनाए गए नियम और नीतियां कालान्तर में देश के लिए बोझ ही साबित होते हैं |एक लक्षित और संतुलित विकास न केवल देशवासियों को विकास के पथ पर ले जा सकता है , बल्कि वैश्विक प्रतिद्वंदता में खड़े होने की शक्ति भी देता है |
भारत में मौजूदा अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की जगह और उन्नत वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लागू करने की कवायद के पीछे भी यही भावना काम करना चाहिये थी , पर , देशवासियों के दुर्भाग्य से देश की मौजूदा सरकार और उसके वित्तमंत्री जीएसटी के जिस ढाँचे को सामने लेकर आये हैं , वह विश्वव्यापार संगठन और विकसित देशों को जितना भी खुश कर दे , भारत के आम उपभोक्ताओं के लिए तो कहर बरपाने वाला ही है |


भारत से पहले 140 देश जीएसटी को अपने देश में लागू कर चुके हैं और उनमें से भी अधिकाँश ने इसे भूमंडलीकरण के दौर में याने पिछले तीन दशकों में ही इसे अपनाया है |उनके अनुभव हमारे सामने थे और भारत सरकार चाहती तो उन देशों में हुई और हो रही परेशानियों से सबक लेकर और भी बेहतर जीएसटी प्रस्ताव लेकर आ सकती थी |
आस्ट्रेलिया में जीएसटी लागू करने की कवायद 1985 में शुरू हुई थी , तब जाकर यह 1 जुलाई 2000 से लागू हो पाया था | इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह 10 प्रतिशत की दर से लागू हुआ था और आज भी 10 प्रतिशत ही है | बुनियादी खाद्यान्न , ताजा भोजन , लायब्रेरी बुक्स , स्कूल टेक्स्ट बुक्स को जीएसटी से छूट है |इसके बावजूद आस्ट्रेलिया में इसे एक प्रतिगामी टेक्स माना जाता है , जिसका विपरीत प्रभाव अल्प या कम आय समूह पर ज्यादा पड़ा है |आस्ट्रेलिया में जीएसटी लागू होने के बाद से मांग में कमी आई है |
न्यूजीलेंड में जीएसटी 10प्रतिशत की दर से 1986 में लागू हुआ था | 1989 में इसे बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत किया गया और अब अक्टोबर 2010 में इसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की योजना है | न्यूजीलेंड में जीएसटी की दरों में वृद्धि का भारी विरोध हुआ है |
कनाडा उन दो देशों में से एक है जहां भारत में प्रस्तावित जीएसटी के समान दोहरी दरें हैं | कनाडा में जीएसटी की दर अभी तक केवल 5 प्रतिशत ही है


यदि जीएसटी की दरों को विश्व के पैमाने पर देखा जाए तो इसका औसत प्रतिशत 15.5 आता है
इस लिहाज से देखा जाए तो वित्तमंत्री के प्रस्ताव न केवल अभी बहुत अधिक है , बल्कि तीन साल बाद जब वे कह रहें कि सभी वस्तुओं और सेवाओं पर एक ही दर 16 प्रतिशत लागू होगी , तब भी यह भूमंडलीय औसत से ज्यादा ही होगी | यहाँ यह याद रखना भी उचित होगा कि 13वें वित्त आयोग ने सरकार से सिफारिश की थी कि जीएसटी की कुल दर 12 प्रतिशत ही रखी जाए , 5 प्रतिशत सेन्ट्रल जीएसटी के लिए और 7 प्रतिशत स्टेट जीएसटी के लिए पर सरकारें भी अजीबोगरीब होती हैं , जब कोई कमेटी मूल्यों या करों में वृद्धि की सिफारिश करती है तो उसे तुरंत लागू करने के लिये सरकार पीछे पड़ जाती है , लेकिन यदि सिफारिश टेक्स कम करने या मूल्य कम करने की है , तो उसे रद्दी की टोकरी में डालने में सरकार को कोई समय नहीं लगता |इसीलिये 13वें वित्त आयोग की सिफारिशों को नकारने में सरकार को कोई समय नहीं लगा |
जहाँ तक सेवा कर का प्रश्न है , वर्त्तमान में यह 10 प्रतिशत है और शिक्षण तथा स्वास्थ्य सेवाओं को इससे छूट प्राप्त है |परन्तु , जीएसटी में इसे बढ़ाकर 16 प्रतिशत करने के साथ साथ शिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं को भी इसके दायरे में ले लिया गया है | इसका नतीजा यह होगा कि छोटी निजी शिक्षण संस्थाओं , छोटे अस्पतालों द्वारा दी जा रही सेवाएं महंगी होकर आम लोगों के लिए फजीहत का कारण बनेंगी |इतना ही नहीं सेवा कर के दायरे में और अधिक सेवाओं को शामिल करने से आम लोगों को अचानक छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सेवाओं के महंगे होने के चलते , उनका उपभोग त्यागना पड़ेगा , जिसके चलते सेवा क्षेत्र में रोजगार में लगे लोगों और स्वरोजगारियों को मंदी और बेरोजगारी को झेलना पड़ेगा |


जीएसटी में उन्हीं 99 वस्तुओं को कर मुक्त रखने का प्रस्ताव है , जिन्हें वेट कर व्यवस्था में कर मुक्त रखने की सिफारिश तात्कालिक इम्पावर्ड कमेटी ने की थी | लेकिन , अनुभव बताता है कि राज्यों में वेट व्यवस्था लागू होने पर उपरोक्त सूची व्यावाहारिक रूप से अपर्याप्त निकली और राज्यों ने उस सूची से इतर अनेक वस्तुओं को कर मुक्त किया था |प्रायः सभी राज्यों में लघु और घरेलु उद्योग के बतौर मसालों , बड़ी , पापड़ , अचार , दौना-पत्तल , जैसी अनेक वस्तुओं का उत्पादन होता है , जो उस सूची से बाहर हैं |
इसके अतिरिक्त प्रत्येक राज्य में स्थानीय शिल्प कला से सम्बंधित अन्य अनेक वस्तुओं का निर्माण होता है ,जो स्थानीय अपेक्षाकृत निर्धन किन्तु कुशल कारीगरों के द्वारा बनाई जाती हैं | उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में लकड़ी की कलाकृतियां , तो चांपा-जांजगीर क्षेत्र में कोसा के कपड़ों का काम बहुतायत से होता है |
ये कार्य  राज्य की हस्तशिल्प की सदियों पुरानी परम्परा के वाहक ही नहीं हैं , बल्कि राज्य की संस्कृति की पहचान भी हैं |जीएसटी की नयी व्यवस्था में यदि ये सब 16 प्रतिशत कर के दायरे में आये तो न केवल इन शिल्पों के समाप्त होने का भय है , बल्कि इनसे जुड़े सैकड़ों कारीगरों के बेरोजगार होकर बर्बाद होने का खतरा भी है | गरीबी , आय उपार्जन के साधन नहीं होने के कारण , कर्ज के चलते आत्महत्याओं के मामले अब गाँव और किसानों तक सीमित न होकर शहरों में भी होने लगे हैं |कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि ये बढ़कर हमारे पारंपरिक कार्य करने वाले कारीगरों तक पहुँच जायें |


इसी तरह दैनिक आवश्यकता की अनेक वस्तुओं के 12 प्रतिशत कर की सीमा में आने की संभावना है |सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसियेशन आफ इंडिया , जो खाद्य तेल उद्योग का संगठन है , ने वित्तमंत्री और राज्य वित्तमंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति के चेयरमेन असीम दास गुप्ता को ज्ञापन देकर कहा है कि खाद्य तेल जैसी वस्तुओं पर 12 प्रतिशत कर लगाने का व्यापक प्रभाव कीमतों पर पड़ेगा
ज्ञातव्य है कि खाद्य तेलों पर अभी उत्पाद शुल्क लगता ही नहीं है और वेट 4-5 प्रतिशत से अधिक कहीं नहीं है , बल्कि केरल जैसे अनेक राज्य हैं , जहां वेट भी शून्य है |
एसोसियेशन ने इसके सम्भावित परिणामों से भी आगाह किया है | एसोसिएशन के अनुसार , 12 प्रतिशत टेक्स लगाने पर , खाद्य तेलों की बिक्री पर टेक्स चोरी बढ़ने लगेगी | पिछले वर्षों में टेक्स कम होने के कारण टेक्स की चोरी में खासी कमी आयी है | इसके अलावा टेक्स बढ़ने पर खाद्य तेल महंगे हो जायेंगे और उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ जाएगा और इसका सबसे अधिक असर गरीबों पर ही होगा |
एसोसियेशन के अनुसार खाद्य तेल आवश्यक वस्तु के हिसाब से अत्याधिक संवेदनशील है |इससे महंगाई पर तुरंत असर दिखाई देगा और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़ने लगेगा |खाद्य तेलों में मिलावट की भी समस्या के बढ़ने की आशंका है
टेक्स चोरी और मिलावट की बात केवल खाद्य तेलों के साथ ही नहीं है बल्कि सभी वस्तुओं पर यह लागू होता है | देश के उद्योग जगत ने भी ऐसी ही आशंका जताते हुए कहा है कि जीएसटी को इस तरह डिजाइन करना चाहिये कि उससे समस्त आर्थिक गतिविधियों की कुशलता बढ़े तथा अर्थव्यवस्था की उत्पादकता में बढोत्तरी हो |साथ ही साथ घरेलु उत्पादों और सेवाओं के मूल्यों में कमी आये और उपभोग में वृद्धि हो |


जीएसटी में यह प्रावधान भी है कि उन सभी लघु उद्योग की इकाइयों पर , जिनका टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये से अधिक होगा , केंद्रीय जीएसटी भी लागू होगा |इसका मतलब हुआ कि वे सभी इकाईयां जों अभी सेन्ट्रल एक्साईज से मुक्त है , वे भी केंद्रीय कर के दायरे में आ जायेंगी | इसका संभावित परिणाम यह होगा कि प्रतिस्पर्धा में नहीं ठहर पाने के कारण बहुत सी इकाईयाँ बंद होने की कगार पर आ जायेंगी , जिससे अनेक लोगों के बेरोजगार होने की भी संभावनाएं हैं | इसके अतिरिक्त आम जनता भी इनसे प्राप्त होने वाले अपेक्षाकृत सस्ते उत्पादों से वंचित हो जायेगी |




राज्यों के वित्तमंत्रियों की अधिकार प्राप्त कमेटी ने केंद्रीय वित्तमंत्री के द्वारा सुरक्षित किये गए वीटो पावर तथा जीएसटी विवाद प्राधिकरण में केंद्रीय प्रतिनिधियों की दखलंदाजी के अलावा उपरोक्त सारे सवालों पर भी आपत्तियां उठाईं थीं | निश्चित रूप से राज्यों को ही बुनियादी रूप से जनता के साथ सीधे संबंधों में रहना पड़ता है , बल्कि राज्य के लोगों की बेहतरी की भी सीधी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ही होती है | अभी महंगाई के सवाल पर लोकसभा तथा राज्यसभा में हुई बहस के दौरान हमने देखा कि केंद्रीय वित्तमंत्री ने जमाखोरी और कालाबाजारी नहीं रोक पाने ठीकरा राज्यों के सर पर फोड़ा था |  इसलिए ,  राज्यों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जीएसटी के मामले में वे सोच समझकर कदम उठाएंगे |




जब केंद्रीय वित्तमंत्री कहते हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद एक वर्ष के भीतर देश की अर्थव्यवस्था एक खरब से दो खरब की हो जायेगी , तो , इसका अर्थ होता है कि जनता को आने वाले समय में और अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं पर बढ़ा हुआ कर देने के लिए तैयार हो जाना चाहिये | हाल के समाचारों के अनुसार केन्द्र जो नया फार्मूला लेकर आ रहा है , वह सभी राज्यों को स्वीकार्य होने की संभावना है | केन्द्र के द्वारा जीएसटी पर प्रस्तुत प्रारूप पर राज्य सरकारों को मुख्यतः उन प्रावधानों पर विरोध था , जो राज्य सरकारों के वित्तीय अधिकारों में कटौती करते थे या राज्य में जीएसटी पर होने वाले किसी विवाद में केंद्र के हस्तक्षेप को अवश्यंभावी ठहराते थे | समझा जाता है कि केंद्र सरकार अब मूल प्रस्ताव में संशोधन करने जा रही है जिससे जीएसटी परिषद में केंद्रीय वित्तमंत्री के वीटो पावर के साथ साथ राज्यों को भी वीटो पावर होगा | इसके परिणाम स्वरूप जीएसटी परिषद में तभी कोई निर्णय लिया जा सकेगा , जब केंद्र और सभी राज्य एकमत हों | इसी तरह से जीएसटी विवाद प्राधिकरण में केंद्र के प्रतिनिधी रहेंगे , पर वे राज्यों के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे |
यदि 18 अगस्त को होने वाली बैठक में राज्य केन्द्र के साथ ऐसे किसी समझौते पर राजी हो जाते हैं और बाकी सभी मुद्दों को छोड़ देते हैं तो सौदागर सरकारों के बीच फंसा उपभोक्ता त्रस्त तो होगा ही |


                                                                                                            अरुण कान्त शुक्ला .....

Thursday, August 5, 2010

संसद में महंगाई पर बेमतलब और बेनतीजा बहस --

लोकसभा में महंगाई पर एक बेमतलब और बेनतीजा बहस आज वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के जबाब के बाद अध्यक्ष मीरा कुमार के इस प्रस्ताव को पढ़ने के साथ पूरी हो गयी कि मुद्रास्फीति के अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव के कारण आम आदमी पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को सरकार थामने की कोशिश करे | देश की सबसे बड़ी पंचायत में पक्ष -विपक्ष दोनों के सांसदों ने आम आदमी के नाम पर जी भरकर सियापा किया और मगरमच्छी आंसू बहाकर ये दिखाने की कोशिश की , कि , वो सब ,जो शायद , इसी सत्र में महंगाई के नाम पर , अपना वेतन भत्ता खुद बढ़ाकर लाखों रुपये करने वाले हैं ,  आम आदमी के लिए कितने चिंतित हैं ?  जो विपक्ष कल तक महंगाई के नाम से ही और ऐसे नियम के तहत ही बहस के लिए अड़ा हुआ था , जिसमें मतदान का प्रावधान हो , वह प्रणव मुखर्जी के चाय-समौसे खाकर 342 में बहस के लिए राजी हो गया | एक ऐसे नियम के तहत बहस , जिसका न कोई अर्थ और न कोई नतीजा ! याने , तुम्हारी भी जय जय , हमारी भी जय जय | पिछले पूरे सप्ताह लोकसभा में बना रहा गतिरोध अंतत: एक ऐसी रस्साकशी साबित  हुआ , जिसमें सरकार और विपक्ष दोनों अंत में जाकर एक हो गये , और हार गया , असली पीड़ित , आम देशवासी |
मैंने अपने पिछले एक लेख मानसून सत्र धुल न जाए हंगामें में कहा था कि देशवासियों के बहुत बड़े हिस्से की हार्दिक इच्छा है कि उनकी जिंदगी से सम्बंधित इस गंभीर समस्या पर लोकसभा के अंदर सरकार और विपक्ष दोनों गंभीरता पूर्वक बहस करें , जिससे कुछ ऐसे उपाय निकलें और नीतियां बने , जों आम आदमी को राहत पहुंचाएं | पर , लगभग 10 घंटों से ऊपर चली बहस में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और जनता के खाते में एक खाली-पीली बहस आई है , जिसमें सियापा तो बहुत हुआ , पर हल कुछ नहीं निकला  | इस अर्थ में , संसद और संसद में होने वाली बहसों का पूरा सम्मान करते हुए भी , नि:संकोच कहना पड़ता है कि यह जनता के साथ धोका है और महंगाई के नाम पर भारत बंद कराने वाले विपक्षी दलों ने बहस के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां ही सेंकने का काम किया है |  मुख्य विपक्षी पार्टी की लोकसभा में नेता सुषमा स्वराज , सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी , सहित करीब-करीब सभी विपक्षी दलों के प्रमुखों ने नियम 342 के अंतर्गत बहस के लिए सरकार के राजी होने को अपनी उपलब्धी बताया है | इनसे पूछा जाना चाहिये कि यदि उन्हें बिना मत विभाजन की बहस पर राजी ही होना था तो चार दिनों तक लोकसभा को ठप्प रखने का औचित्य क्या था ?
जिस मुद्दे को लेकर भारत बंद किया गया था , उस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों  कितने गंभीर हैं , इसकी बानगी भी बहस के दौरान देखने को मिली |  सांसदों की उपस्थिति से लेकर बहस  के स्तर तक किसी का भी निराश होना स्वाभाविक है | विपक्ष के पास कोई वैकल्पिक नीति नहीं थी तो वित्तमंत्री के जबाब में वही घिसे-पिटे तर्क थे | उन्होंनें राज्यों के ऊपर जमाखोरी और मुनाफाखोरी रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं करने का आरोप लगाया , वहीं एनडीए को उसके शासन काल में केरोसिन सहित अन्य वस्तुओं के बढाए गए दामों की याद दिलाई | एक समय ऐसा भी आया जब सदन में प्रधानमंत्री , वित्तमंत्री , पेट्रोलियम मंत्री , गृह मंत्री कोई भी उपस्थित नहीं थे | जिन्हें राजनीति में प्रहसन और हास्य की दरकार रहती है , उनके लिए मुलायम सिंह तथा शरद यादव के भाषण थे | मुलायम सिंह को बड़ा अफ़सोस था कि सरकार को मालुम होने के बावजूद कि किन लोगों का काला धन स्विस बैंको के खातों में जमा पड़ा है , सरकार कुछ नहीं करती और मुलायम-लालू के पीछे सीबीआई लगाए रहती है | मुद्रास्फीति को विकास का स्वाभाविक परिणाम बताने वाला प्रणव मुखर्जी का पूरा जबाब यूपीए के दुबारा जीतकर  आने के दंभ को दिखा रहा था | बहरहाल , जिन्हें  इस चर्चा से कोई उम्मीद रही होगी , उनके हाथ निराशा के अलावा कुछ नहीं लगेगा |
एक बात जिस पर टिप्पणी आवश्यक है | बहस के दौरान चर्चा में हिस्सा लेने वाले करीब-करीब सभी सांसदों ने सरकार के ऊपर आम आदमी के प्रति संवेदनहीन होने का आरोप लगाया | बार-बार इसी बात को सुनकर प्रणव मुखर्जी तिलमिला गए और उन्होंने सांसदों के मार्फ़त पूरे देश को अपना बचपन बताना जरूरी समझा | उन्होंनें कहा कि " मैं गाँव से आया हूँ , मैंने दसवीं तक चिमनी में पढ़ाई की है , पैदल चलकर स्कूल गया हूँ , आज के हिसाब से यह दूरी प्रतिदिन 10 किलोमीटर रही होगी , मेरी संवेदनशीलता की हँसी मत उड़ाइए , यह कोई सामान्य वस्तु नहीं है |" इसका जबाब केवल यही है कि प्रणव दा 1950-51 के दौर में , जब आप दसवीं में पहुंचे होंगे , भारत के गाँवों की बात तो छोड़ दीजीये , तहसील और ब्लाक स्तर तक बिजली पूरी तरह नहीं पहुँची थी | आपके चिमनी में पढ़ने का कारण ,  मैं नहीं जानता , आर्थिक रहा या नहीं , पर मैंने स्वयं 1968 में केरोसीन लेम्प में बीएससी प्रथम वर्ष की पढ़ाई की है , क्योंकि , बिजली का जितना पैसा  मकान मालिक  मांगता था ,  उतना पैसा देने की हैसियत मेरे परिवार की नहीं रही | राजनीति तो आपको पारिवारिक विरासत में मिली है | परम आदरणीय आपके पिताश्री 1952-64 के मध्य पश्चिम बंगाल विधान परिषद के सदस्य रहे हैं | आज की बात कीजिये ,राहुल तो स्वयं कलावती लीलावती के घर होकर आये हैं |  क्यों , भारत में ऐसे गाँव हैं , जहां बिजली तो है , पर , वहाँ के निवासी कनेक्शन नहीं लेते , क्योंकि , आपकी बेची हुई दरों पर बिजली खरीदना उनकी हैसियत से बाहर की बात है | आज अधिकाँश राज्य सरकारें बीपीएल केटेगरी के लोगों को दो रुपया-तीन रुपया किलो की दर से चावल और गेहूँ बाँट रही हैं , क्यों ? केन्द्र की सरकार भी खाद्य सुरक्षा क़ानून लाने वाली है , क्यों ?  लाईये , बहुत अच्छा है | पर , यह उन नीतियों की हार है ,जिन पर दो दशक पहले मनमोहन सिंह ने इस देश को धकेला था | भारत के सत्तर करोड़ लोगों को अपनी कमाई पर स्वाभिमानी ढंग से जीने का अवसर दीजिए | आपने अपने जबाब में खुद स्वीकार किया है कि पिछले दो वर्ष में धन्नासेठों को दिये गए राहत पैकेजों ने मुद्रास्फीति बढाने में बहुत योगदान दिया है | यह तो उस समय भी आपसे कहा जा रहा था कि वे इन राहत पैकेजों का इस्तेमाल रोजगार देने में , उत्पादकता बढाने में नहीं करेंगे | इसके लिए एफिसियेंट मानिटरिंग की जरुरत होगी | अब ऐसा तो है नहीं कि ये आपको समझ में नहीं आया होगा | अवश्य आया होगा , इसी को क्रियान्वित करने के लिए आम आदमी की तरफ झुकी हुई संवेदनशीलता की जरुरत पडती है | जिसकी बात संसद में हो रही थी | इसका चिमनी में पढाई करने से कोई संबंध नहीं है | पैदा तो हम भी चिमनी के उजाले में ही हुए थे , इसे उदाहरण बनाकर क्या आज भी खराब होने दें | 

                                                                                                               अरुण कान्त शुक्ला

                          
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Thursday, July 29, 2010

वोटिंग से क्यों डर रही है सरकार -


वोटिंग से क्यों डर रही है सरकार

महंगाई के सवाल पर विपक्ष जहां नियम 168 या 183 के अंतर्गत चर्चा किये जाने की मांग को लेकर अड़ा है , वहीं सरकार किसी भी हालत में इसके लिये राजी होते नहीं दिखती | इसी गतिरोध पर हंगामे के चलते तीसरे रोज गुरुवार को भी लोकसभा तथा राजसभा स्थगित हो गईं | विपक्ष के हंगामे की वजह से लोकसभा या राजसभा के स्थगित होने पर हमेशा जनता का पैसा बर्बाद होने का ढिंढोरा पीटने वाला मीडिया भी इस बार पहले दिन थोड़ा शोरगुल करने के बाद चुप लगा गया |इतना ही नहीं, कल तक सीना फुलाकर मंहगाई को विकास का द्योतक बताने वाले प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री से लेकर सभी सरकारी नुमाईन्दों और सरकार के पक्ष में बोलने वाले बुद्धिजीवियों की जबान भी आज इस सवाल पर जबाब देते समय लड़खड़ा रही है | दरअसल , तमाम तर्कों से परे यह सचाई आम
देशवासियों के सामने खुलकर आ गई है कि वर्तमान महंगाई का कोई भी रिश्ता न सूखे से है और न ही खाद्यान्न की कमी से है , यह सिर्फ और सिर्फ मनमोहन सरकार की नीतियां हैं , जिनके फलस्वरुप आम देशवासियों को यह दिन देखना पड़ रहे हैं | बजट पेश करते समय ड्यूटी और टेक्स बढ़ाकर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में व्रद्धि के तीन महिनों के भीतर ही पुनः पेट्रो उत्पादों को छेड़ना यूपीए सरकार के लिये गले की हड्डी बन गया है , जो अब न उससे उगलते बन रही है और न निगलते |


इसके बावजूद कि भाजपा सहित विपक्ष के कमोबेश सभी दल पिछ्ले डेढ़ दशक में उन्ही नीतियों पर चले हैं , जिनसे महंगाई बढ़ने के साथ साथ आम देशवासियों के जीवन में त्रासदियां भी बढ़ी हैं , विपक्ष के लिये इस मुद्दे को छोड़ना , राज्यों में होने वाले आसन्न चुनावों को देखते हुए आत्मघाती होगा | आग में घी का काम प्रधानमंत्री , वित्तमंत्री , कृषिमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष के बयान कर रहे हैं कि दिसम्बर तक महंगाई काबू में आ जायेगी , क्योंकि अच्छे मानसून से उत्पादन में वृद्धि होगी | तो क्या , खाद्यान्नों के पिछ्ले तीन सालों में बढ़े हुए मूल्यों के लिये मानसून और सूखा ही जिम्मेदार हैं ? या , सरकार की लचर और आम लोगों के प्रति सम्वेदनाहीन नीतियों का इसमें ज्यादा हाथ है ?


इससे ज्यादा दुखदायी और क्या हो सकता है कि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने में तब असफल हुई है , जब भारतीय खाद्य निगम याने एफसीआई के गोदामों में 3.40 करोड़ टन गेहूं और 2.6 करोड़ टन चावल का स्टाक है | गेहूं , दलहन और तिलहनों के रबी के उत्पादन से भी खाद्य वस्तुओं की महंगाई कम नहीं हुई | सच यह कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली नाम की जिस सप्लाई चेन को मनमोहनसिंह और फिर उनके बाद आने वाली सरकारों ने बर्बाद किया , आज के हालातों में वही सबसे अधिक उपयोगी होती | इस पूरे दरम्यान सरकार ने एक बार भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि एफसीआई के पास पड़े विशाल खाद्यान्न भंडार का वितरण , कैसे बेहतर तरीके से किया जाये | बजाय उस अनाज को जरुरतमन्दों तक पहुंचाने के प्रबंध करने के , सरकार की प्राथमिकता , उस अनाज को सड़ते रहने देने की रही | एक और हास्यास्पद परिस्थिति का निर्माण , इस दौरान
महंगाई और पेट्रो उत्पादों के मूल्यों में बढ़ोत्तरी के बाद इन पर टेक्स कम करने के सवाल को लेकर हुआ है | केंद्र और राज्यों के मध्य पेट्रो उत्पादों , विशेषकर , पेट्रोल , डीजल , एलपीजी पर टेक्स कम करने तथा महंगाई पर नियंत्रण करने के सवालों को लेकर एक दूसरे के उपर दोषारोपण | केंद्र सरकार जहां राज्य सरकारों से बार बार पेट्रोल , डीजल सहित एलपीजी पर टेक्स कम करने को कह रही है तथा बर्बाद हो रहे अनाज के लिये राज्यों को दोषी ठहरा रही है , वहीं राज्य सरकारें केंद्र को स्वयं अत्याधिक टेक्स वसूली के लिये तथा गैरकांग्रेसी राज्यों में अनाज का कोटा कम करने के लिये दोषी ठहरा रहीं हैं | केंद्र तथा राज्य , दोनों सरकारें लालची , मुनाफाखोर सेठों की तरह व्यवहार कर रही हैं और आम देशवासी बेबसी और लाचारी से देख रहे हैं |


रोजमर्रा के जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं के दामों में लगातार बढ़ोत्तरी का यह दौर हाल का नहीं है, बल्कि यह सिलसिला यूपीए शासन काल के पहले चक्र के अंतिम दो वर्षों से लगातार चला आ रहा है | वर्ष 2009 के आम चुनावों के समय विपक्ष और विशेषकर वाम मोर्चा महंगाई के सवाल को उतनी दमदार तरीके से नहीं उठा पाया क्योंकि कुछ समय पूर्व ही उसने नाभकीय समझौते का विरोध करते हुए यूपीए से समर्थन वापिस लिया था| वे जब महंगाई के सवाल को लेकर जनता के सामने पहुंचे तो आम आदमी ने इस पर , इस बिना पर विश्वास नहीं किया कि इन्होनें समर्थन तो नाभकीय करार के मुद्दे पर लिया था | सरकार ने खाद्य वस्तुओं की सप्लाई बढ़ाने के लिये अभी तक फौरी उपाय ही किये हैं | मसलन उसने दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया | साथ ही यह घोषणा भी कर दी कि सरकारी एजेंसियों को दाल बेचने वालों को बोनस भी दिया जायेगा | जबकि यह जगजाहिर है कि किसान को खुले बाजार में ही दलहन की अच्छी कीमत मिल रही है | ऐसे में वह सरकार को दाल बेचेगा ही क्यों ? चीनी की कीमतों में भी इजाफा सरकार की नीतियों की वजह से ही हुआ | दूसरे जब दाम बढ़े तो सरकार मुनाफाखोरी और जमाखोरी पर लगाम नहीं लगा पाई |


मनमोहनसिंह एण्ड कंपनी दिलासा दे रही है कि आने वाले दिसम्बर तक खाद्य वस्तुओं की महंगाई 5 से 6 प्रतिशत तक सिमट जायेगी | जब सरकार के पास बाजार में वितरण और मूल्य नियंत्रण के पुख्ता तरीके ही नहीं हैं तो उसकी बात पर विश्वास कोई क्यों करे ? ऐसा कहीं से भी नहीं लगता कि सरकार का ध्यान फसल उत्पादन बढ़ाने से लेकर जल प्रबंधन और सिंचाई प्रबंधन , बीजों के विकास और बाजार में वितरण और मूल्य नियंत्रण तक , ऐसे
किन्हीं भी दीर्घकालीन उपायों पर है , जिनसे महंगाई पर वास्तविकता में अंकुश लग सकता है |

मनमोहनसिंह कुछ माह पूर्व ही कह चुके हैं कि उन्होने कि उन्होनें जानबूझकर महंगाई को रोकने के उपाय नहीं किये थे | समय आ गया है जब मनमोहनसिंह से पूछा ही जाना चाहिये कि क्या वो विकास दर को दोहरे अंक में देख्नने की खातिर देश के 70 करोड़ लोगों को महंगाई की आग में झोंक रहे हैं | यदि ऐसा है तो यह भयानक सौदा है | देशवासियों के सामने इसका पर्दाफाश होना ही चाहिये | ठीक इसी जगह आकर विपक्ष की महंगाई के मुद्दे पर चर्चा के बाद वोटिंग की मांग जिद्द नहीं बल्कि एक जायज मांग नजर आती है | यदि महंगाई पर नियंत्रण नहीं रख पाना सरकार की नीति है , तब भी , और यदि यह कार्यप्रलाणी सम्बंधित असफलता है तब भी सचाई जनता के सामने आना चाहिये ताकि जनता भी अपना रास्ता तय कर सके | वोटिंग होने से सभी राजनैतिक दलों की कलई भी जनता के सामने होगी | देशवासियों को कम से कम यह तो पता चलेगा कि कौन उनके पक्ष में है और कौन उनके विपक्ष में |


अरुण कांत शुक्ला