Sunday, October 24, 2010

सी ज़ेड.आई.ई.ऐ. सम्मलेन और जनवाद – सम्मलेन अवैध है --


 

भोपाल में आज से सीजेडआईईऐ का त्रिवार्षिक सम्मलेन प्रारम्भ होने जा रहा है | मुझे तुरंत जबलपुर निकालना है , इसलिए सीधे सीधे बात को रख रहा हूँ | इसका विश्लेषण कभी बाद में समय आने पर करूँगा | इस सम्मेलन तक के लिये मैं तकनीकी सहित सभी नार्म्स के हिसाब से सम्मलेन का एक्स आफिसियो प्रतिनिधी हूँ , ठीक वैसे ही जैसे इस अपेक्स बाडी के अन्य वर्किंग कमेटी मेंबर हैं और मुझे न केवल सम्मलेन में शामिल होने का नोटिस मिलना चाहिये था बल्कि परंपरा के अनुसार रायपुर डिवीजन की मंडलीय इकाई को मेरा इंतजाम भी करना चाहिये था | लेकिन न तो मुझे नोटिस मिला और नहीं मूल संगठन ने उसके किसी साथी के साथ हो रही सांगठनिक प्रक्रिया के उल्लंघन के प्रति कोई ध्यान दिया और वे देते भी कैसे ? बासिज्म , फासिज्म और चमचागिरी की संस्कृति पर चलने वाले व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह किसी अन्य साथी के जनवादी अधिकार के लिये संगठन को संघर्ष के लिय प्रेरित करेगा बुद्धिहीन से पहाड़ा सुनने की इच्छा रखने के सामान है | लेकिन नोटिस देने और सम्मलेन में प्रतिनिधि पहुंचे इसे इंश्योर करने की जिम्मेदारी तो संगठन के महासचिव की होती है , पर जनवाद के नाम पर फासिज्म और तानाशाही चलाने वालों से यह अपेक्षा तो और भी व्यर्थ है , जिसके लिये कोई उपमा भी नहीं दी जा सकती | मंडलीय इकाई के एक उच्च नेता को मैंने यह बताया , तो उसका सीधा कहना था कि कामरेड वे सीधा झूठ बोल देंगे कि उन्हें नोटिस दिया गया था पर वे स्वयं नही आये | उसके अनुसार सीजेडआईईऐ का क्रियाशील नेतृत्व के एग्रीकल्चर में खप नहीं पाया | एग्री याने सहमती और कल्चर याने संस्कृति |बहरहाल, ट्रेड यूनियन में जनवाद को दफनाने वाले जनवाद पर भाषण झाड़ेंगे , किसी भी संगठन का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है | कुल मिलाकर यह सम्मलेन अवैध है | जल्दी में हूँ और भी बातें है समय आने पर बताउंगा |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Saturday, October 23, 2010

अर्थ शास्त्र में नोबेल 2010 , बाजार की वास्तविकताओं से परे--


 

अर्थशास्त्र में दिया जाने वाला नोबेल , इस वर्ष " रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के बावजूद बेरोजगारी कम नहीं होने के कारणों की पड़ताल " करने वाली थ्योरी पर अमरीका के पीटर डायमंड और डेल मोर्टेन्सन तथा ब्रिटेन के क्रिस्टोफ़र पिसारिदेस को दिया गया है | मैसच्यूसेट्स इन्स्टीट्यूट आफ़ टेकनालाजी में प्रोफ़ेसर पीटर डायमंड ने " खोज संघर्ष के सिद्धांत के साथ बाजार का विश्लेषण " करते हुए सिद्धांत दिया कि " किसी भी बाजार में विक्रेता और खरीददार को एक दूसरे को ढूँढने में कठिनाई होती है , क्योंकि इसमें बहुत समय और संसाधनों की जरुरत होती है |" नार्थवेस्ट यूनिवर्सिटी के डेल मोर्टेन्सन तथा लंदन स्कूल आफ़ इकानामिक्स तथा पालिटिक्स साईंस के क्रिस्टोफ़र पिसारिदेस ने इस सिद्धांत को श्रम बाजार पर लागू करते हुए निष्कर्ष दिया कि बहुत से बाजारों में नौकरी देने वाले ( नियोक्ता ) जिन्हें कर्मचारियों की तलाश है और ऐसे लोग ( बेरोजगार ) जिन्हें नौकरी की तलाश है , एक दूसरे के संपर्क में नहीं आ पाते क्योंकि तलाश की इस प्रक्रिया में समय और संसाधन दोनों की जरुरत होती है , जिसके कारण बाजार में " संघर्ष की स्थिति ( खोज संघर्ष ) " पैदा होती है | इसके फलस्वरूप , कुछ खरीददारों ( नियोक्ताओं ) की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं तो कुछ विक्रेता ( बेरोजगार ) भी अपना उत्पाद ( श्रम ) नहीं बेच पाते हैं | यही वजह है कि श्रम बाजार में रिक्तियां होने के बावजूद लोग बेरोजगार रह जाते हैं |

उनका विश्लेषण , श्रम बाजार में खड़े करोड़ों लोगों की बेरोजगारी को इतने सहज और सरल ढंग से उचित ठहराते हुए रुक नहीं जाता , बल्कि एक कदम आगे बढ़कर वे कहते हैं कि बेरोजगारी भत्ता देने से बेरोजगारी बढ़ती है क्योंकि फिर नौकरी तलाशने में लोग ज्यादा वक्त लेते हैं |
यह विश्लेषण , चाहे वे शास्त्रीय हों या नवशास्त्रीय , दोनों ही तरह के अर्थशास्त्रियों के पूर्व विश्लेषणों से अलग नहीं है , जिसके अनुसार लोग इसलिए बेरोजगार हैं क्योंकि या तो वे नियोक्ताओं के द्वारा न्यूनतम वेतन पर अपेक्षित उत्पादन क्षमता को पूरी करने में असमर्थ हैं या फिर लोग अपनी उत्पादन क्षमता की तुलना में अधिक वेतन की माँग कर रहे हैं | दोनों परिस्थितियों में निष्कर्ष एक ही है कि लोग बेरोजगार हैं क्योंकि उन्होंने ने बेरोजगार रहना पसंद किया है | इसलिए यह बेरोजगारी स्वैच्छिक है | उपरोक्त तीनों महानुभावों ने इसी थ्योरी को कुछ ज्यादा अच्छे सभ्य ढंग से प्रस्तुत किया है कि नियोक्ताओं और बेरोजगारों का मेल समय और संसाधनों की उपलब्धता की कमी की वजह से नहीं हो पाता है |

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि " ढूँढते ही रह गए " कि इस थ्योरी को नोबेल मिलने के दस दिनों के भीतर ही ब्रिटेन के वित्तमंत्री जार्ज आसबार्न ने सरकारी खर्चों में कटौती के प्रस्ताव संसद में पेश करते हुए लगभग पांच लाख नौकरियाँ अगले चार वर्ष में खत्म करने की घोषणा की है | यह केवल ब्रिटेन के साथ ही नहीं है | वैश्विक आर्थिक संकट के वर्तमान दौर में प्रत्येक देश में सरकारों तथा निजी नियोक्ताओं ने करोड़ों की संख्या में रोजगारशुदा लोगों का रोजगार छीनकर उनको पहले से बेरोजगार खड़े लोगों की फ़ौज में धकेला है | दरअसल , श्रम बाजार के अंदर रिक्तियों और बेरोजगारों , दोनों की एकसाथ मौजूदगी का यह एक बहुत ही सरलीकृत विश्लेषण है , जो "मुक्त बाजार" की अवधारणा के प्रबल समर्थक नवशास्त्रीय अर्थशास्त्रियों के द्वारा दुनिया की विभिन्न देशों की सरकारों को मुंह छिपाने का अवसर प्रदान करने के
साथ ही नियोक्ताओं के द्वारा किये जा रहे श्रम के शोषण को ढकने का काम ही करेगा | अर्थशास्त्रियों के लिये , चाहे वे , शास्त्रीय हों या नवशास्त्रीय , विडम्बना यही है कि उनका मुक्त बाजार कभी भी उनके सिद्धातों पर नहीं चला बल्कि उन्हें हमेशा ही मुक्त बाजार की शैतानियों ( संकटों ) की तरफ से आँखें मूदनी पड़ी हैं या फिर पलटी मारकर अपने सिद्धातों को मुक्त बाजार के अनुसार ढालना पड़ा है | पूंजीवाद का इतिहास इस बात का गवाह है कि बाजार ने किसी भी दौर में अर्थशास्त्र के किन्ही भी नियमों का पालन नहीं किया है | बाजार को संचालित करने वाला एक ही नियम ( कारक ) है , और वह है , मुनाफ़ा और अधिक तेजी से अधिक मुनाफ़ा , चाहे उसके लिये बाजार को स्वयं को संकट में क्यों न डालना पड़े | मुक्त बाजार के इस व्यवहार पर इन अर्थशास्त्रियों का मुंह कभी नहीं खुलता और इनके बताए गए नुस्खे कभी भी बाजार को अनुशासित करने के लिये नहीं होते , बल्कि ये नुस्खे आमजनों की जेब से पैसा खींचकर बाजार की बेलगाम ताकतों के पास पहुंचाने का काम ही करते हैं | जैसा , हमने हाल के संकट के दौरान देखा कि दुनिया के करीब करीब सभी मुल्कों की सरकारों ने अपने अपने देश के भीमकाय वित्तीय और औद्योगिक निगमों को सार्वजनिक कोष से खरबों रुपयों के पैकेज दिए और जनता के ऊपर कर थोपे , जीवनोपयोगी वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि की और गरीब वर्ग के लिये चल रहे कल्याणकारी कार्यों के खर्चों में कटौतियां कीं |

वैश्विक आर्थिक संकट , जिससे पूरी दुनिया वर्ष 2008 से दो-चार हो रही है , बाजार की बेलगाम ताकतों की मुनाफे की हवस और उस मुनाफे को जल्दी से जल्दी बटोर लेने की लालच का ही परिणाम था , अब यह पुष्ट हो चुका है | अब समय आ गया है कि इन व इस तरह के सभी अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की विकासपरक उपादेयता पर चर्चा की जाए | इन अर्थशास्त्रियों के द्वारा दिए गए सिद्धांतों में से किसी ने भी मुक्त बाजार की मुख्य समस्या "आर्थिक मंदी" या "दबाव" को रोकने के लिये कोई भी असरदायक रास्ता कभी नहीं सुझाया | नवशास्त्रीय अर्थशास्त्रीयों की पूरी फ़ौज , जिनमें हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह भी शामिल हैं , वर्तमान संकट को रोकने का कोई उपाय तो सुझा ही नहीं पाई , बल्कि उन्हें आने वाले संकट का भान तक नहीं हुआ | उनकी पूरी की पूरी जमात शेयर बाजारों में आ रहे उछाल पर मुग्ध होकर , बाजार के गुणगान करती रही | आश्चर्यजनक तो यह है कि मुक्त बाजार के पैरोकार इन अर्थशास्त्रियों को अपनी अक्षमता या असफलता पर शर्म भी महसूस नहीं हुई , उलटे , सरकारों के द्वारा दिए गए बेलआउट को उन्होंने अपने सिद्धांतों की विजय बताया और आज भी वे इन पैकेजों को जारी रखने की वकालत कर रहे हैं |

बद से बदतर यह है कि कोई भी आज यह बताने की स्थिति में नहीं है कि विश्वव्यापी आर्थिक संकट के किस मुकाम पर दुनिया आज खड़ी है | संकट के गुजर जाने या खत्म हो जाने के कयासों के बीच , हमें कुछ अर्थशास्त्रियों से , जिन्होंने वर्तमान संकट के लिये भी चेताया था , हमें अगले संकट की भविष्य वाणी भी मिल रही है | इस मध्य में "नियोक्ता और बेरोजगार , दोनों को एक दूसरे को तलाशने में कठिनाई है" का सिद्धांत उन अर्थशास्त्रियों को सुकून देने वाला है , जो मुक्त बाजार की अनुशासनहीनता के खिलाफ किसी भी तरह के कड़े फैसले से बचना चाहते हैं | नोबेल पुरूस्कार देने वाली समीती सहित मुक्त बाजार के हिमायतियों का कहना है कि यह सिद्धांत बेरोजगारी की स्थिति पर सरकार की आर्थिक नीतियों से पड़ने वाले प्रभाव को समझाने में मददगार होगा | प्रश्न यह है कि क्या वर्त्तमान में सरकारों के पास इस प्रभाव को जानने का कोई तरीका नहीं है क्या ? जबाब यही है कि एक नहीं ढेरों तरीके हैं , पर उनका नतीजा तब सामने आएगा , जब सरकारें बाजार को नियंत्रित करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति रखेंगी | जब आर्थिक सिद्धांत ही बाजार में हस्तक्षेप नहीं करने का है तो "ढूंढते रह गए" का सिद्धांत तो सरकारों के मुंह छिपाने के ही काम आएगा | यह उम्मीद करना बेकार ही है कि सरकारें बाजार में नियोक्ताओं और बेरोजगारों को मिलाने के कुछ नीतिगत कदम उठाएंगी |

तीनों नोबेल प्रतिष्ठितों के इस निष्कर्ष का , कि बेरोजगारी भत्ता देने से बेरोजगारी बढ़ती है , बहुत से देशों में स्वागत हो सकता है जहाँ बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है या जहाँ इसकी माँग की जाती है | वैसे इस निष्कर्ष का निहितार्थ यही है कि ऐसे लोग जिनकी आय का कोई साधन नहीं है , कोई सा भी काम कितनी भी अल्प मजदूरी पर करने के लिये तैयार हों | भूखा मरे , क्या न करे | तीनों नोबेल सम्मानितों ने ठीक वही सुझाया है , मुक्त बाजार जो माँग रहा है |

Saturday, October 2, 2010

देश में अमन-चैन बनाए रखने की कीमत मत मांगो-


 

देश के अमन-चैन में सेंध लगाने वाले अमन-चैन बनाए रखने की कीमत के रूप में देश के संविधान , धर्मनिरपेक्ष चरित्र , न्याय प्रणाली और क़ानून व्यवस्था की कुर्बानी माँग रहे हैं | दुर्भाग्य से अयोध्या में विवादित स्थल के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का फैसला इस कीमत को चुकाता नजर आता है | हमारे देश के उच्चतम न्यायालय और अयोध्या मामले में 21 वर्ष पूर्व बनाई गई जस्टिस के सी अग्रवाल , जस्टिस यू सी श्रीवास्तव और जस्टिस सैय्यद हैदर अब्बास की खंड पीठ को यह अंदेशा पहले से ही था कि न्यायायिक प्रक्रिया का निष्पक्ष पालन इस मामले में मुश्किल होगा | शायद इसीलिए जब 21 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैजाबाद की जिला अदालत से रामजन्म भूमी बनाम बाबरी मस्जिद मुकदमा अपने पास बुलाया तो उपरोक्त तीनों जस्टिसों ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के अंत में टिप्पणी की थी कि "इसमें संदेह है कि मुकदमे में शामिल सवालों को न्यायिक प्रक्रिया से हल किया जा सकता है |" इतना ही नहीं 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर राय देने से मना कर दिया था कि क्या वहाँ पहले स्थित कोई हिंदू मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी ? इसका अर्थ हुआ कि हमारे देश की न्याय प्रणाली को उस समय लगा कि न्यायिक प्रक्रिया में तर्कों के ऊपर भावनाओं और आस्था के हावी होने की पूर्ण संभावनाएं इस मामले में मौजूद हैं और एक निष्पक्ष फैसला देने में रुकावट पड़ सकती है | दुर्भाग्य से जस्टिस धर्मवीर शर्मा , जस्टिस सुधीर अग्रवाल , जस्टिस एस यू खान का फैसला न केवल इसकी पुष्टि करता है बल्कि अनेक सवाल भी खड़े करता है |

  1. हमारे देश में धर्मस्थल क़ानून है जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति को मान्यता देता है | भारत के बहुरंगी धार्मिक एवं सांस्कृतिक समाज में विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों की टकराहट सर्वज्ञात है | मंदिर टूटे , मस्जिद टूटे , गिरजा और मठ भी टूटे हैं | लेकिन , इस टकराहट ने गंगा-जमुनी संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता वाले समाज को भी जन्म दिया है , उसे आगे बढ़ाया है | इसीलिये अतीत के सारे धार्मिक सांस्कृतिक विवादों को विराम देते हुए विवेकपूर्ण फैसला किया गया था कि 1947 में जो जहाँ है , वैसा ही माना जाए | वर्त्तमान फैसले में लखनऊ खंडपीठ के इस कथन को कि किसी हिदू मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद खड़ी की गई थी , यदि सही भी मान लें , तब भी उक्त क़ानून के मद्देनजर न्यायालय का फैसला न्यायोचित नहीं है तथा उपरोक्त क़ानून को कमजोर बनाता है | इस फैसले से अतीत में जो धर्मस्थल तोड़े गए हैं , और जो ऐतिहासिक रूप से सत्य है , उनका विवाद बड़े पैमाने पर उभरने की संभावना बनती है | विहिप के तोगड़िया और अन्य कुछ संतों के बयान इसकी पुष्टि भी करते हैं |
  2. राम मिथकीय पुरुष हैं , न कि ऐतिहासिक | मिथकों का अपना इतिहास होता है लेकिन इतिहास मिथक नहीं होता | अतः कोई भी कोर्ट राम की पैदाइश स्थल का सर्टिफिकेट नहीं दे सकता | न ही किसी पक्ष ने राम के जन्म का प्रमाण पत्र ही कोर्ट के सामने रखा है | अतः विवेक और क़ानून से संचालित कोई भी कोर्ट यह नहीं कह सकता कि राम वहीं पैदा हुए थे , जहाँ बाबरी मस्जिद का केन्द्रीय गुम्बद था और जहाँ दिसंबर 1949 की एक रात को राम की मूर्ति चोरी छिपे रखी गई थी | यही कारण है कि संघ और उसके विहिप , भाजपा सहित सभी अनुषांग बार बार यही कहते रहे कि राम के जन्मस्थल का सवाल आस्था का सवाल है और कोई कोर्ट इसका फैसला नहीं कर सकता | भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र , संविधान , न्याय और क़ानून व्यवस्था के दुर्भाग्य से कोर्ट के फैसले पर तर्क और विवेक की जगह आस्था हावी हो गई | इसीलिये , यह फैसला किसी भी स्तर पर विवाद समाप्त करने में सहायक नहीं हो सकता | कोर्ट के सामने विवाद भूमी के स्वामित्व निर्धारण का था , न कि इसका कि राम कहाँ पैदा हुए थे ? वैसे भी पैदाइश स्थल का स्वामित्व से सीधा संबंध नहीं होता |
  3. कोर्ट को 1949 में दायर शिकायत का फैसला करना था | यह फैसला 1949 की स्थिति पर ही हो सकता था , ना कि 2010 की स्थिति पर , जैसा कि कोर्ट ने किया है | इस फैसले में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात यह है कि ये हिंसा , अराजकता और साम्प्रदायिक राजनीति करने वाली आक्रांता ताकतों के राजनीतिक उपद्रव फैलाने के बाहुबल को कानूनी मान्यता देता है | सच यही है कि पूरे विवाद के दौरान "यथास्थिति" बनाए रखने के अदालती आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए साम्प्रदायिक राजनीतिक ताकतों ने "यथास्थिति" को हमेशा ध्वस्त किया लेकिन कोर्ट ने उसके आदेशों की अवेहलना करने वालों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की |
  4. कोर्ट को विवादित भूमी के स्वामित्व का फैसला करना था | लेकिन , कोर्ट ने मान्यता के आधार पर भूमी का बटवारा कर दिया | मालिकाना हक के मामले में मान्यता की दलील को मानकर , उस आधार पर फैसला देना क़ानून और निष्पक्षता के सभी सिद्धांतों के खिलाफ है |
  5. कोर्ट के फैसले से ऐसा लगता है कि कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट को अहं महत्त्व दिया है | पर , यह जगजाहिर है कि जिस दौरान याने 5 मार्च 2003 से 5 अगस्त 2003 के मध्य एएसआई ने विवादग्रस्त स्थल की खुदाई की , केंद्र में भाजपानीत गठबंधन की सरकार थी , जिसने इस संस्था के साम्प्रदायिकीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी थी | देश के जाने माने इतिहासकारों ने 28 अप्रैल 2003 को कोर्ट के सामने पेश की गई एएसआई की पहली रिपोर्ट पर ही अपनी आपत्तियां जता दी थीं |
    हाल ही में फैसले के परिप्रेक्ष्य में देश के जाने माने 61 नामचीन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने बयान जारी कर कहा है कि फैसले में कई ऐसे साक्ष्यों का जिक्र नहीं है जो फैसले के विरोध में पेश किये गए थे | फैसले में शामिल तीन जजों में से दो ने कहा है कि बाबरी मस्जिद एक हिंदू ढाँचे के गिराने के बाद बनाई गई | लेकिन , इन इतिहासकारों का कहना है कि इस मत के विरोध में एएसआई ने जो साक्ष्य प्रस्तुत किये , उन्हें दरकिनार किया गया है | खुदाई में मिलीं जानवरों की हड्डियां और इमारत तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सुर्खी और चूना से मुसलमानों की उपस्थिति साबित होती है और ये भी साबित होता है कि वहाँ मस्जिद से पहले मंदिर था ही नहीं , जैसे सभी तथ्यों को कोर्ट ने इग्नोर कर दिया है | इन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के अनुसार एएसआई की उस विवादित रिपोर्ट को फैसले का आधार बनाया गया है जिसमें खुदाई में खम्बे मिलने का उल्लेख है , जबकि खम्बे कभी मिले ही नहीं थे |
  6. यदि एकबारगी मान भी लिया जाए कि बाबरी मस्जिद के निर्माण में उपयोग की गई सामग्री में किसी हिंदू ढाँचे के अवशेष हैं भी तो इसमें अजूबा क्या है ? हमारे देश में अनेक इमारतें हैं , जिनमें मुस्लिम , इंग्लिश , फ्रेंच , हिंदू स्थापत्य कला का उपयोग किया गया है | मात्र क्या इस कारण से बाबरी मस्जिद गैर इस्लामिक हो जायेगी | कोर्ट ने एक सैकड़ों साल से जीवित खड़ी ऐतिहासिक इमारत को तरजीह न देकर , 1992 के बाबरी मस्जिद को ढहाने के आपराधिक कृत्य को ही मान्यता देने जैसा काम किया है , जो आने वाली पीढ़ियों के सामने कल्पनातीत मुश्किलें खड़ा करेगा |

देशवासियों ने जिस परिपक्वता , सौहाद्र और भाई-चारे को अभी निभाया है , उसमें न तो मंदिर समर्थकों की कोई भूमिका है और न ही मस्जिद समर्थकों की , और न ही सरकार के स्तर पर किये गए सुरक्षा प्रबंधों की कोई भूमिका है | यदि कोई बात महत्त्व रखती है तो वह यह है कि 1992 के बाद देशवासियों ने जिस साम्प्रदायिक तांडव को देखा है , उसने उन्हें साम्प्रदायिक मुद्दों की व्यर्थता का बोध अच्छी तरह करा दिया है और उन्होंने राजनीतिक रूप से साम्प्रदायिक ताकतों को हाशिए पर डालने के पूरे प्रयास किये हैं | उन्हें अच्छी तरह अहसास था कि हाई कोर्ट का निर्णय जो कुछ भी हो , कानूनी प्रक्रिया यहाँ समाप्त नहीं होती है | अब परिस्थिति यह है कि फैसला आने के तुरंत बाद जो प्रफुल्लित होकर जोरशोर से देशवासियों से मंदिर बनाने में सहयोग करने की मांग कर रहे थे , खुद सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रहे हैं | निश्चित रूप से देश में अमन–चैन , साम्प्रदायिक सदभाव बहुत जरूरी है | पर , यह दिल में रंज या मलाल के साथ नहीं होना चाहिये | यह अमन-चैन , सदभाव , भाई-चारा , उसे देश के संविधान , धर्मनिरपेक्ष ढाँचे , क़ानून व्यवस्था और न्याय व्यवस्था से मिलना चाहिये | इनकी कीमत पर प्राप्त अमन चैन स्थायी नहीं होगा , सुकून नहीं देगा | एक बैचेन समाज आने वाली कई पीढ़ियों के लिये बैचेनी और तल्खी छोड़ जाता है , इतिहास का यही सबक है , जिसे सभी को याद रखने की जरुरत है |


अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Tuesday, September 28, 2010

राजा नंद का संकट मगध का संकट नहीं -


 

कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के सीईओ माईक हूपर का बयान कि उन्हें भारत की इज्जत से कोई मतलब नहीं है , उनका काम तो खेलों को सही तरीके से आयोजित कराना है , भारत के शासक वर्ग के सम्मान और प्रतिष्ठा का ताबूत बन चुके कॉमनवेल्थ खेलों पर आखरी कील है | जितना सख्त हूपर का बयान है , उतनी ही लीचड़ और बेबस प्रतिक्रिया दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित ने दी कि हूपर साहब का बयान अनुचित और दुखद है | मैंने हूपर के उस बयान को कई बार पढ़ा , पर मुझे उसमें कुछ भी अनुचित या दुखद नहीं लगा | हूपर भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन की देख रेख करने आये हैं और उनकी पूरी जिम्मेदारी और जबाबदेही कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के प्रति है ,न कि भारत की प्रतिष्ठा बचाने की | यदि मनमोहन सिंह एंड कंपनी , शीला दीक्षित या कलमाड़ी एंड कंपनी की समझ यह रही कि ब्रिटेन की रानी के दूत उनकी (उनके भारत की) इज्जत रखेंगे तो इसे इनके दिमाग के दिवालियापन के अलावा और क्या कहा जायेगा ? मनमोहनसिंह , जो अब खेलों के आयोजन से सीधे जुड़ चुके हैं , को अभी तक यह तो समझ में आ गया होगा कि जी-20 , डबल्यूटीओ में बुश , ओबामा से अर्थशास्त्री होने का तमगा लेकर पीठ थपथपवाना अलग बात है और देश के अंदर भ्रष्टाचार रहित , पारदर्शी , जनोभिमुखी प्रशासन देना अलग बात है |

वैसे , वे सभी लोग जो भारत के शासक वर्ग की हरकतों में , भारत सरकार के कामों में और भारत के राजनीतिक नेताओं के हास्यास्पद क्रियाकलापों में से हास्य रस निकाल कर खुश रहने का मंत्र ढूँढ चुके हैं , पिछले लगभग दो माह से सुखी होंगे | मैं स्वयं भी उन्हीं सुखी इंसानों में से एक हूँ | दरअसल , कॉमनवेल्थ के खेलों के संकट हमारा संकट है ही नहीं और इन खेलों के साथ देश की प्रतिष्ठा या राष्ट्रप्रेम जैसी किसी भावना को जोड़ना कोरी भावुकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | चाणक्य जब राजा नंद के शासन को उखाड़ने की चेष्टा में लगा था , नंद का महामंत्री अमात्य राक्षस ने चाणक्य को उन संकटों के बारे में बताया जिनसे नंद का राज घिरा हुआ था | पूरी बात सुनने के बाद चाणक्य ने अमात्य से कहा कि राजा नंद के संकट मगध ( मगध की प्रजा ) के संकट नहीं हैं | चाणक्य की उपरोक्त उक्ति भारत सरकार और भारत के शासक वर्ग के ऊपर पूरी तरह फिट बैठती है |

आज भारत के शासक वर्ग के सामने मौजूद संकट , देशवासियों के समक्ष मौजूद संकटों से एकदम जुदा हैं और कोढ़ में खाज की तरह शासक वर्ग राष्ट्रभक्ति , राष्ट्रीय सम्मान के नारों की आड़ में देशवासियों को तो अपने संकटों को बौझ उठाने कह रहा है लेकिन खुद देशवासियों के समक्ष मौजूद संकटों का संज्ञान भी नहीं लेना चाहता | कॉमनवेल्थ खेलों के सफल आयोजन से अगर देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि में कोई इजाफा हुआ भी तो वह देशवासियों के लिये शेयर मार्केट में हुए इजाफे के समान ही होगा , जिसका आम लोगों के संकटों से कोई भी वास्ता नहीं होता | जो सरकार घोषित रूप से इन खेलों पर 40 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है , जिसमें से हजारों करोड़ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है और न जाने कितना चढ़ेगा , उसी सरकार के मुखिया को हम कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट को गरियाते देख चुके हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जो अनाज सड़ रहा है , उसे गरीबों को बांटने के लिये कहा था | इन खेलों की सफल मेज़बानी करके अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि में रौनक लाने के सपने देखने वाली सरकार को क्या कभी यह अपमान जनक लगता है कि उसके देश की एक अरब की आबादी में से आधी याने करीब पचास करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं याने उन्हें रोज भर पेट भोजन भी नहीं मिलता | भोजन याने क्या ? हलवा , पूड़ी , माल , मिठाई या फल , फूल नहीं सिर्फ दाल रोटी और जिस दिन तेल घी में बघरी सब्जी हो गई तो उनकी दिवाली हो जाती है | रोज मंहगाई कम करने के लिये रिजर्व बैंक के जरिये बाजार में तरलता ( पैसे का प्रसार ) कम करने के उपाय करने वाली सरकार ने पचास हजार करोड़ रुपये खर्च करने के पहले एक दफे भी नहीं सोचा कि आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है | उनकी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा खाने पीने की चीजों में खर्च हो जाता है | उनकी जेब में दवाई दारु के लिये भी पैसा नहीं बचाता है | यहाँ तक कि जरूरी भोजन याने दाल और सब्जियां उनकी पहुँच से दूर हो गईं हैं | इसीलिये मैं कहता हूँ , शासक वर्ग की चिंताएं अलग हैं और हमारी चिंताएं अलग | शासक वर्ग के संकट अलग हैं और हमारे संकट अलग | आपका संकट , हमारा मनोरंजन कर सकता है , हम उसे हमारा संकट नहीं बनाएंगे | आपका संकट राजा नंद का संकट है , वह मगध का संकट नहीं है |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Sunday, September 26, 2010

जाना बचपन के मित्र और मार्गदर्शक का – एक श्रद्धांजली

मेरा बचपन का समय और युवावस्था तक पहुँचने की अवधि वह दौर था , जब एक मध्यमवर्गीय परिवार में कम से कम एक अखबार के साथ एक पारिवारिक साप्ताहिक पत्रिका के साथ बच्चों के लिये कम से कम एक पत्रिका अवश्य ली जाती थी | बचपन में करीब तेरह चौदह वर्ष तक की उम्र तक हर साल की गर्मी की छुट्टियाँ नाना नानी के साथ ही बिताया करते थे , जहाँ कल्याण के अनेकों अंक जिल्द बंद थे और सारी छुट्टियाँ कृष्ण , अर्जुन , कर्ण , और महाभारत की कहानियां पढते बीत जाया करती थीं | वैसे पत्रिकाओं के पढने की सही शुरुवात चंदामामा से हुई थी ,जो घर में नियमित आया करती थी | एक अंक के लिये एक माह का इंतजार कितना बेसब्र बना सिया करता था कि हाथ में पडते ही आधे घंटे के भीतर पूरी चंदामामा खत्म हो जाती थी और फिर उन्ही कहानियों को और पुराने अंकों को पढते रहना ही काम रह जाता था | उसके बाद आया पराग का युग , जिससे , मेरी जानकारी में बाल साहित्य में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर शुरू हुआ |राजा –रानी , राक्षस , देवी –देवताओं और बेताल से आगे का युग | वैसे स्थानीय अखबार में उस समय के मृत्युंजय को भी पढने का बड़ा चाव रहता था | और फिर मेरे पन्द्रह बरस का होते होते "नंदन" शुरू हुआ , जिसमें मनोरंजन के अलावा शिक्षा के तत्व को भी डालने की शुरुवात हुई | उसी "नंदन" के जरिये पहली बार स्कूली शिक्षा के बाहर के किसी साहित्यकार को जाना | कन्हैय्यालाल नंदन उसमें बच्चों के नाम से एक चिठ्ठी लिखा करते थे | अक्सर वे चिठ्ठियां बहुत शिक्षाप्रद हुआ करतीं थीं | कहते हैं , कहते क्या हैं , में इसे मानता हूँ कि स्कूल की शिक्षा किसी को भी शायद असीमित योग्यता प्रदान कर सकती है , पर , जहाँ तक मानस पर अमिट प्रभाव छोडने की बात है , वह तो स्कूली और कालेजी शिक्षा से इतर जगहों से ही मिलती है | कन्हैय्यालाल नंदन ने अपने साहित्य जीवन में अनेकों बच्चों के लिये इस पुण्य काम को किया होगा , जिनमें से अनेक बच्चे इसे महसूस ही नहीं कर पाए होंगे | एक ऐसे साहित्यकार को मुझ जैसे अनाम और अकिंचन की भावभरी श्रद्धांजली |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Saturday, September 18, 2010

आम जनता दंगा फसाद नहीं करती --


अयोध्या की विवादित भूमि पर 24 सितम्बर को आने वाले फैसले को टालने के लिये दी गई याचिका के खारिज होने के साथ यह पक्का हो गया है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ 24 सितम्बर को ही मामले में अपना फैसला सुना देगी | यदि इस बात को सत्य माना जाये कि प्रत्येक देश और समाज को काल चक्र अतीत में की गई गल्तियों को सुधारने का अवसर अवश्य प्रदान करता है तो भारतीय समाज और विशेषकर हमारे
देश के राजनेताओं , संतों और इमामों के समक्ष यह अवसर इसी 24 सितम्बर को उपस्थित होने जा रहा है , जब विवादित भूमि पर अदालत का फैसला आयेगा |


यह देखते हुए कि अयोध्या विवाद भारत के हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव का एक प्रमुख मुद्दा रहा है , और देश की राजनीति को इसने न केवल प्रभावित किया है
बल्कि हमारे देश के राजकीय पक्षों ने इसका बेजा राजनीतिक इस्तेमाल भी अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये किया है , एक चुनौती हमारे सामने मौजूद है कि पुनः ऐसा न हो पाये | अदालत के निर्णय के संबंध
में मुस्लिम पक्ष ने हमेशा कहा है कि वह अदालत का फैसला मानेगा , लेकिन विश्व हिन्दु परिषद का एक तबका यह कहता आया है कि यह उनकी धार्मिक आस्था का मामला है , जिसका फैसला अदालत नहीं कर सकती | भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिन्दू परिषद के एक तबके सहित कई हिंदू संगठनों की मांग रही है कि सरकार संसद में कानून बनाकर विवादित जमीन उसे एक विशाल राम मंदिर बनाने के लिये दे दे , लेकिन देश के बहुसंख्यक लोगों के इससे सहमत नहीं होने के चलते भाजपा को भी सत्ता में आने के लिये इस मुद्दे को छोड़ना पड़ा था | यद्यपि आरएसएस प्रमुख मोहन राव भागवत कानून के दायरे में ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने और शांति बनाये रखने का आश्वासन दे रहे हैं लेकिन उसके सहयोगी विश्व हिन्दू परिषद के तेवर कड़े हो रहे हैं | माहौल फिर से तनाव पूर्ण है | कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है | आम देशवासी सहमे हुए हैं | यह सब तब है जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले के बाद सभी पक्षों के लिये आगे और कानूनी कार्यवाही करने के रास्ते खुले हुए हैं |


बहरहाल ,एक बात , अयोध्या मामले के चारों पक्षकारों सुन्नी वक्फ बोर्ड , निर्मोही अखाड़ा , राम जन्म भूमि न्यास ,गोपाल सिंह व्यास के साथ साथ आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों तथा भाजपा और कांग्रेस
के नेताओं को समझना पड़ेगी , कि , पिछ्ले तीन दशकों में घटी तीन बड़ी घटनाओं , सिख विरोधी दंगे , बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात का नरसंहार , ने भारतीय समाज के मानस को तोड़कर रख दिया है | राष्ट्रीय एकता , सर्व धर्म समभाव , हजार से ज्यादा वर्षों की साझा विरासत जैसे नारों से समाज के अन्दर पैदा हुए अलगाव को ढाका तो जा सकता है लेकिन जरा सी हलचल से उस अलगाव के घाव फिर हरे हो जाते हैं | उपरोक्त घटनाओं में केवल निरीह देशवासी ही नहीं मारे गये थे , बल्कि अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले भारतीय दर्शन की भी हत्या हुई थी | समाज की उस सामूहिक सोच को नकारा गया था , जो किसी भी समाज की समरसता और समग्र विकास के लिये अत्यंत आवश्यक होती है | प्रसिद्ध दार्शनिक रामचंद्र गांधी के शब्दों में बाबरी मस्जिद पर हमला मस्जिद पर नहीं बल्कि भारतीय सोच पर था | सत्ता प्राप्त करने की राजनीति में सामाजिक अलगाव फैलाने से प्राप्त होने वाले फायदे कितने तुच्छ और अल्पकालिक होते हैं , यह सभी देख चुके हैं | घ्रणा और द्वेश की जमीन पर राजनीतिक फसल हमेशा नहीं लहलहा सकती , इस सबक को हमेशा याद रखने की जरुरत है |


यह फैसला एक ऐसे समय आ रहा है , जब देश में संकटकालीन परिस्तिथि मौजूद है | एक तरफ कश्मीर का मामला है , जहाँ अलगाव वादी ताकतें पूर्ण उग्रता के साथ सक्रिय हैं तो दूसरी ओर कामन वेल्थ के खेल हैं , जिनकी तैय्यारियों पर अनेक प्रश्न खड़े हैं और आने वाले अतिथियों और खिलाड़ियों की सुरक्षा का बहुत बड़ा दायित्व केंद्र और दिल्ली की सरकार पर है | मामले की नजाकत को देखते हुए ही केंद्र सरकार ने सभी लोगों से शांति बनाये रखने की अपील की है | पर कांग्रेस को भी साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर अपने समझौता वादी रुख में सुधार करना होगा | कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस दोनो ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वे श्रीक्रष्ण आयोग की रिपोर्ट
को लागू करेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं | रिपोर्ट में जिन अफसरों और नेताओं की आलोचना हुई , उनमें से किसी को भी सजा नहीं हुई | यदि ऐसा हुआ होता तो आज जैसे अन्देशे वाली स्थिति का निर्माण नहीं हुआ होता |


हमारे देश के राजनेताओं के सोच का दायरा इतना संकीर्ण और सत्तालोलुप है कि वे समझ ही नहीं पाते कि सिख विरोधी दंगे , बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात नर संहार जैसी घटनाएं समाज के लोगों की मानसिकता पर कितना विपरीत प्रभाव डालती हैं | पिछले तीन दशकों में भारतीय समाज में जिस बढ़ी हुई असहनशीलता और क्रूरता को हम देख रहे हैं , उसमें पिछले तीन दशकों के दौरान अपनाई गईं आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरुप पैदा हुए असंतोष के अलावा उपरोक्त तीनो घटनाओं का भी बड़ा हाथ है | स्वयं जस्टिस श्रीकृष्ण ने हाल ही में दिये गये एक साक्षात्कार में यह पूछने पर कि कमीशन की बैठकों के दौरान जब लोग अपनी कहानियाँ बयान करते थे तो एक इंसान के नाते आप पर क्या प्रभाव पड़ा , बताया कि , इस कमीशन में काम करने से पहले मैं बहुत शांत व्यक्ति था | मुझे कभी गुस्सा नहीं आता था| कमीशन में लोगों की कहानियाँ सुनते सुनते मुझे बहुत गुस्सा आने लगा , मैं तेज मिजाज का हो गया | ये मेरे परिवार का कहना है | जस्टिस श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि अगर आप सुनते रहें कि इसे जला दिया गया , उसे मार दिया गया , इससे मानसिक व्यथा होती है और इसके
अंतरंग परिणाम होते हैं |


जब एक जस्टिस जिसे रोज तनावपूर्ण परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है , उद्वेलित हो जाता है तो साधारण जनों के उपर पड़े प्रभाव का संकेंद्रित सामाजिक प्रभाव तथा उसके सामाजिक परिणाम कितने घातक होते होंगे , समझा जा सकता है | देश के राजनियकों को सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह का भारतीय समाज चाहते हैं | आम जनता दंगा फसाद में नहीं पड़ती , उनको भड़काने वाले लोग होते हैं , जो उन्हें उद्वेलित करते हैं | जब व्यक्ति भड़क जाता है तो भटक भी जाता है | उम्मीद करें इस बार ऐसा न हो |


अरुण कान्त शुक्ला

Thursday, September 9, 2010

क्रिकेटर्स को भारत रत्न नहीं देना चाहिये --


जबसे सचिन तेन्दुलकर ने साउथ अफ्रिका में दोहरा शतक बनाया है , उन्हें भारत रत्न देने के लिये जबर्दस्त लाबिंग मीडिया की पहल परचल रही है | इस लाबिंग में कुछ खेल विशेषज्ञों , पुराने समकालीन क्रिकेटरों के साथ साथ राजनीतिज्ञों का जुड़ना आश्चर्य में डालने वाला रहा है | सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न देने की सिफारिश महाराष्ट्र सरकार ने तो की ही , लोकसभा तथा राजसभा में भी सांसदों ने ऐसी मांग केंद्र सरकार से किये | सचिन स्वयं इस सम्बंध में अपनी लालसा को छुपा नहीं पाते हैं | भारतीय वायु सेना में ग्रुप कैप्टेन की मानद उपाधी ग्रहण करने के समारोह के समय यह लालसा पुनः उजागर हुई है | बहरहाल , सचिन ही क्यों , कोई भी स्वयं को योग्य समझने वाला व्यक्ति यदि ऐसी आकांक्षा या लालसा रखता है तो उसमें गलत कुछ भी नहीं है | पर , सचिन तेंडुलकर ही क्यों , आज की व्यवसायिक क्रिकेट से जुडे किसी भी व्यक्ति को क्या भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देना चाहिये , यह जरुर गम्भीर और विचारणीय प्रश्न है ?
एक समय था , जब क्रिकेट को भद्र जनों का खेल कहा जाता था | पर यह भद्र जनों का खेल कब रहा , यह बताना बहुत मुश्किल है | हो सकता है , इसे भद्र जनों का खेल इसलिये कहा जाता रहा हो क्योंकि उस दौरान भद्र जनों के पास ही इतना समय रहता हो कि वे एक दिन विश्राम का मिलाकर छै दिनों का टेस्ट मेच खेल सकते हों | एक श्रंखला में न्यूनतम पांच मेच खेले जाते थे | दो टेस्ट मेच के बीच का अंतराल मिलाकर , पूरी श्रंखला के लिये दो माह से उपर का समय लगता था | इतना समय तो भद्र जन ही निकाल सकते थे | इसके अलावा इसमें कोई भद्रता कभी नहीं रही | यदि रही होती तो इंग्लेंड-आस्ट्रेलिया एशेज श्रंखला के दोरान बरसों पहले कुख्यात बाडी लाईन प्रकरण नहीं हुआ होता | हो सकता है कि हाकी - फुटबाल और अन्य खेलों के उपर अपनी सुप्रिमेसी , जो आज भी कायम है , बनाने के लिये भद्रजनों ने ही इसे भद्रजनों के खेल के नाम से प्रचारित किया हो | बहरहाल क्रिकेट आज भद्रजनों का नहीं भ्रस्टजनों का खेल है | इसमें भद्रता किंचित मात्र भी नहीं है , किंतु भ्रस्टता से यह लबालब भरा हुआ है | क्रिकेट खेलने वाले देशों में से कोई भी एक देश ऐसा नहीं है , जिसके खिलाड़ियों पर पैसा खाकर , ऐसा , खेलने के आरोप नहीं लगे हैं , जिससे खेल का परिणाम प्रभावित होता है | इंग्लेंड , आस्ट्रेलिया जैसे देश हैं , जहाँ क्रिकेट पर सट्टेबाजी के लिये बकायदा कंपनियां खुली हुई हैं और नामी गिरामी क्रिकेट खिलाड़ियों का उनसे व्यावसायिक रिश्ता है | जिस बात पर गौर किया जाना चाहिये वह यह है कि क्रिकेट में सट्टेबाजी कहीं भी क्यों न हो , भारत का नाम उसमें अवश्य जुड़ा रहता है | 1998 में आस्ट्रेलियन खिलाड़ी शेन वार्न और मार्क वाघ ने खुलासा किया था कि 1994 के टूर्नामेंट के दोरान उन्होनें एक इंडियन बुकी को जानकारियां उपलब्ध कराईं थीं | भारत , श्रीलंका , पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर सट्टेबाजों से पैसा लेकर खेल को प्रभावित करने के आरोप नये नहीं हैं | यहाँ तक कि कपिल देव , जो 1983 में एक दिवसिय क्रिकेट का विश्वकप जीतकर लाये , उन पर भी मनोज प्रभाकर ने सट्टेबाजों से पैसा लेने का आरोप लगाया था |
भारत में क्रिकेट लोकप्रियता से उपर उठकर लगभग एक जुनून है | इसे जुनून बनाने में उस ईलाक्ट्रानिक मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है , जो आज बिना सोचे , विचारे किसी भी मुद्दे पर न केवल जनभावनाओं बल्कि सरकारों सहित देश की अन्य सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने अनुसार चलाने की कोशिश में लगा रहता है | किंतु , फुटबाल सोसर के समान क्रिकेट पूरी दुनिया में नहीं खेला जाता है | भारत रत्न , कला , साहित्य , विज्ञान एवं टेकनालाजी तथा उच्च कोटी के लोक कार्यों के लिये देने का प्रावधान है | क्रिकेट भारत में उद्योग की सीमा से आगे बड़कर धंधे में परिवर्तित हो चुका है और क्रिकेट खिलाड़ी विज्ञापनों और फेशन परेडों से कमाई करने के अलावा करोडों रुपयों में खुद को बेच रहे हैं | इंडियन प्रीमियर लीग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है , जहाँ भारत के बड़े और नामी क्रिकेट खिलाड़ी , माने हुए विदेशी खिलाड़ियों के साथ , अपने मालिकों को खुश करने के लिये सरकस के शेर , भालू , बन्दर के समान करतब दिखा रहे हैं और असफल होने पर मालिकों से झिड़की भी खा रहे हैं | क्रिकेटर्स का कार्य किस श्रेणी में आयेगा ? जिन विज्ञापनों में किसी भी दौर के क्रिकेट खिलाड़ियों ने काम किया है , उनमें से ढेरों ऐसे हैं जो आम देशवासियों और विशेषकर बच्चों और युवाओं के लिये अत्यंत हानिकारक हैं | व्यावसायिक क्रिकेट , क्रिकेट में भ्रष्टाचार , सर्कस क्रिकेट , विज्ञापनों में काम , रेम्प पर केट वाक , क्रिकेटर्स के किस काम को और किस उपलब्धी को लोक कार्य की श्रेणी में रखा जायेगा ? इसलिये ,क्रिकेटर्स को भारत रत्न से जितना दूर रखा जाये , भारत रत्न के लिये उतना ही अच्छा होगा |

 

अरुण कांत शुक्ला