Wednesday, August 15, 2012

रामदेव के नाम देश की आजादी का खुला पत्र..



मैं हमेशा आपकी अहसानमंद रहूंगी..


रामदेव जी,

मुझे अपना परिचय आपको देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि नौ अगस्त से आज  दोपहर तक तो मैं आपकी ही बंधक थी वैसे तो इस देश में मैं जब से आयी हूँ, किसी न किसी की बंधक बने रहना, मेरी नियति में ही शुमार है वैसे अंग्रेजों से मुझे छुड़ाकर लाने के लिए जिन लोगों के आप नाम लेते हैं याने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, गांधी, नेहरू, लाला लाजपत राय, आदि, आदि, उनके अलावा भी अन्य कई ढेरों लोगों ने मुझे अंग्रेजों से छुड़ाकर लाने में अपनी जान की कुर्बानियां दी थीं उनमें से जो मुझे प्राप्त करने के प्रयास में शहीद हो गए, उनके दिल में भी कभी ये नहीं रहा कि अंग्रेजों से मुझे प्राप्त करने के बाद वो मुझे केवल अपनी और अपनी बनाकर रखेंगे वो सब तो मुझे देश के पूरे लोगों के लिए प्राप्त करना चाहते थे

मुझे इस बात का मलाल हमेशा रहा और रहेगा कि वो जिन्होंने मुझे प्राप्त करने के लिए अपना जीवन न्यौछावर किये, अगर भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि में से कुछ लोग भी बच जाते तो मुझे पक्का विश्वास है कि वो मुझ आजादी को भी कुछ और आजाद करवाते, कुछ और आजादी दिलवाते इस प्यारे प्यारे भारत देश के खेतों को जोतकर करोड़ों लोगों के पेटों को पालने वाले किसानों के पास जाने, उनके पास रहने, उनसे प्यार करने की आजादी दिलवाते वो मुझे कारखानों के उन मजदूरों के पास जाने की आजादी मुझे दिलवाते, जो रात दिन मेहनत करने के बाद भी न खुद ढंग से रह पाते हैं और न ही अपने परिवार और अपने बच्चों को वो सब सुख और सुविधा दिला पाते हैं, जो देश में मेरे आने के बाद, मेरी ही कोख से मैंने जना है और वो भी इन्हीं किसानों और मजदूरों की बदौलत वो मुझे इस देश की नारियों के पास जाने देते, प्यारे प्यारे बच्चों के साथ खेलने देते यदि मैं उन माओं और बच्चों के साथ होती तो वो कभी कुपोषण से नहीं मरते पर, जो न हो सका, अब उसके लिए क्या रोना? पर, मुझे लाने वालों में से जो लोग बचे, उनमें से अनेक मुझसे बेइंतहाँ प्यार करने वाले निकले थे उन्होंने मुझे कभी अपनी बांदी नहीं समझा और उनमें से कई तो ऐसे सिरफिरे टाईप के मेरे दीवाने थे कि मुझे देश में सजाधजा कर और इज्जत से रखने के खातिर वो पागलपन की हद तक खुद के जीवन को त्यागमय और सादा रखते थे

मैं आज जार जार रोती हूँ, क्योंकि उनमें से अनेक बेतहाशा अभावों में और कष्टों में मृत्यु को प्राप्त हुए, लेकिन उन्होंने मुझे कभी भी लजाया नहीं पर, आज जो दौर आया है, उसमें तो मैं आज किसी की तो कल किसी की बांदी बनकर रहने को विवश कर दी जाती हूँ मुझे समझ में नहीं आता कि इस देश के लोग हैं तो उन्हीं पुरखों के वारिस, जो पूरे नब्बे साल लड़कर मुझे बड़े गर्व के साथ देश में लाये फिर, वे क्यों जब जी चाहे क्यों मुझे अपनी बंदी बना लेते हैं, क्यों वे मुझसे बांदी जैसा व्यवहार करते हैं कभी मेरा इस्तेमाल पढ़ने लिखने वाली लड़कियों को होटलों में, कालेजों में, बागीचों में बेईज्जत करने के लिए किया जाता है कभी दलितों को प्रताड़ित, यहाँ तक कि ज़िंदा जलाने के लिए किया जाता है कभी मेरा इस्तेमाल धर्म और जाती के नाम पर एक दूसरे को मारने के लिए किया जाता है कोई भी इस बात को समझने और मानने के लिए तैयार नहीं है कि इससे मेरी इज्जत तार तार हो रही है और जिनके दासत्व से मुझे छुड़ाकर लाया गया, वो मेरी इस स्थिति पर हंस रहे हैं

अब एक नयी चीज शुरू हुई है, सबको मालूम है कि अंग्रेजों ने मुझे व्यापारी बनकर ही अपनी दासी बनाया था आज देश को चलाने वाले सभी राजनीतिक दल फिर उसी रास्ते पर चल रहे हैं एक बात तो उन्हें समझनी होगी कि कोई अमरिकी, कोई अंग्रेज प्रत्यक्ष रूप से देश में आकार राज करे या नहीं, मुझे गुलाम तो बना ही लेगा, प्रत्यक्ष नहीं तो मानसिक पर, ये सब बातें, मैं आपसे क्यों कह रही हूँ| आप भी तो उन्हीं में से हो| आप काले धन की बातें करते हो, भ्रष्टाचार और लोकपाल की बातें करते हो आपसे पहले अन्ना जी के नेतृत्व में कुछ सिविल सोसाईटी के लोगों ने भी भ्रष्टाचार और लोकपाल की बातें कीं, पर कोई भी ये नहीं कह रहा कि अपना बाजार विदेशियों के हवाले न करो काला धन आने से गरीबी दूर हो जायेगी, चलो मान लिया, पर, जब तक काला धन नहीं आता, तब तक, अमीरों को सफ़ेद धन से ही हिस्सा देना कम कर दो और गरीबों का हिस्सा बढ़ा दो मुझे तो अपनी अस्मिता फिर बड़े खतरे में दिखाई देती है हो सकता है मैं अपने देश में ही रहूँ कोई गुलाम भी न बनाए लेकिन दूसरों के इशारे पर चलना भी तो गुलामी से कम नहीं है

पर, मुझे लग रहा है कि मैं विषय से थोड़ा भटक गई हूँ खत तो आपको ये बताने के लिए लिख रही थी कि मैं आपकी अहसानमंद हूँ और आपकी गलतियां निकालने लगी मैं आपकी अहसानमंद इसलिए हूँ कि वैसे तो आये दिन किसी न किसी के द्वारा बंधक बना लिए जाने की मैं आदी हो चुकी थी, पर, ऐसा कभी नहीं हुआ था कि येन अपने जन्म दिन के पहले कोई मुझे बंधक बना ले और जब आपने कहा कि आप प्रधानमंत्री को लाल किले पर झंडा नहीं फहराने देंगे तो मुझे बड़ा डर लगा। आप तो जानते ही हैं कि ये झंडा फहराना मेरे लिए केक काटने के समान है। फिर जब आपने कहा कि जब आप बोलते हो तो सरकार में लोगों की मौतें होती हैं और आप चाहो तो उनकी अर्थियां निकल जाएँ, तो मैं और भी डर गई मुझे लगा कि आज से ही ये देश गुलाम होने जा रहा है मुझे आपके अंदर, हिटलर के बेटों से लेकर, ओबामाओं के चेहरे दिखने लगे पता नहीं, फिर आपको किसने समझाया? जरुर हिटलर के बेटों और ओबामाओं के चेलों ने ही समझाया होगा आपने मुझे इस बार के लिए आजाद कर दिया मैं इस देश के लोगों की तरफ से भी आपको धन्यवाद देती हूँ

इतिहास गवाह है कि केवल मैं ही क्या, मेरी अनेक बहनें, जो अलग अलग देशों में हैं और मेरे नाम से ही जानी जाती हैं, कभी भी दंभी, बड़बोले और सनकी ताकतवरों के हाथों में सुरक्षित नहीं रहीं बहरहाल, मैं तो आपको अभी के लिए धन्यवाद देना चाहती हूँ कि आपके उपर हिटलर के बेटों और ओबामाओं के चेलों ने सरस्वती की कृपा बरसाई और मुझे आजादी मिली, इसके लिए मैं आपकी अहसानमंद हूँ
              
                  
                     आपकी कैद से छूटी देश की आजादी 

अरुण कान्त शुक्ला
14 अगस्त, 2012  

Monday, August 13, 2012

वरिष्ठ सेवानिवृत बीमाकर्मियों का सम्मान ..


रायपुर मंडल के सेवानिवृत वरिष्ठ बीमाकर्मियों का 12 अगस्त, रविवार को सम्मान किया गया.. 

भारतीय जीवन बीमा निगम का जन्म ही निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों के भ्रष्टाचार और भर्राशाही से त्रस्त देशवासियों को सुरक्षित और सुलभ बीमा सुरक्षा दिलाने के संकल्प के साथ हुआ था और राष्ट्रीयकृत बीमा उद्योग ने इस सामाजिक उत्तरदायित्व का वहन पूरी कर्मठता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ किया है| भाजीबीनि रायपुर मंडल के वरिष्ठ मंडल प्रबंधक सुधांशु शेखर ने उपरोक्त उदगार रविवार को रायपुर मंडल से, 15 वर्षों से अधिक हुए, सेवानिवृत हो चुके वरिष्ठतम बीमा कर्मचारियों के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किये| उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयकृत बीमा उद्योग की 56 वर्ष की यात्रा कभी भी चुनौती विहीन नहीं रही, लेकिन अपने कर्मचारियों की कार्यशक्ति और निष्ठा के चलते भाजीबीनि आज भी भारत के साथ साथ विश्व बीमा बाजार में सर्वाधिक विश्वसनीय और पसंदीदा ब्रांड है| भाजीबीनि के लिए उसके कर्मचारी सेना के जवान की तरह हैं और ऐसे जवानों के सेवानिवृत जत्थे के तीन वरिष्ठतम कर्मचारियों का सम्मान करते हुए वे भावविह्वल हैं और पूरे रायपुर मंडल के कर्मचारियों और अधिकारियों की ओर से तीनों साथियों का अभिनन्दन करते हैं और उन्हें  शुभकामनाएं देते हैं|

यह अवसर था, भाजीबीनि के रायपुर मंडल से सेवानिवृत वरिष्ठतम कर्मचारीगण सर्व/श्री के.एल.विश्नोई, एस.पी.शर्मा एवं पी.के.बनर्जी को सम्मानित करने हेतु आयोजित कार्यक्रम का, जिसका आयोजन छत्तीसगढ़ रिटायर्ड इंश्योरेंस एम्पलाईज एसोशियेशन ने रविवार को होटल लालबाग में किया था| प्रातः 11 बजे प्रारंभ हुए कार्यक्रम में भाजीबीनि रायपुर मंडल के वरिष्ठ मंडल प्रबंधक सुधांशु शेखर मुख्य अतिथि, विपणन प्रबंधक अपूर्व दत्ता एवं संगठन के बिलासपुर मंडल के सचिव ए.के.राव विशेष अतिथि थे| कार्यक्रम के प्रारंभ में संगठन के अध्यक्ष डी.के.दत्ता व महासचिव व्ही.सुन्दरेसन ने फूलमालाओं से अतिथियों का स्वागत किया| उपरोक्त तीनों सम्मानित व्यक्तियों के साथ जीवन यात्रा में सफलता पूर्वक उनका साथ निभाने वाली उनकी पत्नियों का स्वागत संगठन के अध्यक्ष,सचिव,अतिथियों के अलावा सभा में उपस्थित सेवानिवृत कर्मचारी द्वय श्रीमती शान्ति सुन्दरेसन व नलिनी शुक्ला ने भी किया| तत्पश्चात, व.मं.प्र.सुधांशु शेखर ने सर्व/श्री के.एल.विश्नोई, एस.पी.शर्मा, व पी.के.बनर्जी का शाल व श्रीफल भेंटकर सम्मान किया| विपणन प्रबंधक अपूर्व दत्ता ने सम्मानित कर्मचारियों की अर्द्धान्गानियों को स्मृति चिन्ह भेंटकर उनका सम्मान किया| सभा में रायपुर मंडल से सेवानिवृत 100 से अधिक संगठन के सदस्यों के अलावा संगठन के अनेक शुभेच्छु भी उपस्थित थे| सभा को सर्व/श्री अपूर्व दत्ता, ए.के राव, डी.के.दत्ता, व्ही.सुन्दरेसन, एन.के.गुप्ता, ने भी संबोधित किया| अंत में वरिष्ठ साथियों ने अपने अनुभवों और भाजीबीनि के साथ अपनी स्मृतियों को ताजा किया और बोलते बोलते वे अनेक बार भावविभोर होकर अपने आंसू नहीं रोक पाये| सभा का संचालन संगठन के सहसचिव आर.के.तिवारी ने किया| संगठन के उपाध्यक्ष अरुण कान्त शुक्ला ने सभी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोग के लिए धन्यवाद दिया|



                            

Thursday, August 2, 2012

अहं, अक्खड़पन और अति महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा लोकपाल आंदोलन-


अहं, अक्खड़पन और अति महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा लोकपाल आंदोलन-

जीटीव्ही सहित देश के अनेक चैनल अब सर्वे कर रहे हैं जिस मीडिया को टीम अन्ना कल तक कोस रही थी, वही चैनल अब टीम अन्ना की मेहरबानी से टीआरपी बटोर रहे हैं देश का अब तक का सबसे बड़ा सर्वे हो रहा है लोगों से कहा जा रहा है कि वो अन्ना टीम को राजनीतिक पार्टी बनाना चाहिए या नहीं, इस पर अपनी राय हाँ या नहीं में दें लोग दे भी रहे हैं और पूरी संभावना इस बात की है कि कल शाम को अन्ना टीम के नींबू पानी पीने तक तीन चार लाख लोग निकल आयें, जो समर्थन में मेसेज कर दें कम हों तो भी चलेगा क्योंकि राजनीतिक विकल्प देने का निर्णय तो हो ही चुका है बस देखना यह है कि इस नए राजनीतिक दल का नाम क्या होगा? दक्षिण भारत की तर्ज पर ऑल इंडिया एंटी करप्शन अन्ना पार्टी या अन्ना पार्टी फॉर सिविल सोसाईटी वैसे अभी एक चैनल पर एक दर्शक ने सुझाया है कि अन्ना को अपनी राजनीतिक पार्टी का नाम भारतीय अन्ना पार्टी (बाप) रखना चाहिए  खैर, नाम में क्या रखा है, जैसा कि शेक्सपियर ने भी कहीं कहा है कि गुलाब, गुलाब ही रहेगा, जब तक उसमें गुलाब की खुशबू रहेगी पूंजीवादी लोकतंत्र में, जिसमें भ्रष्ट राजनीति के ऐसे दौर हमेशा आते हैं, अन्ना टीम अपनी खुशबू को, जिसे वह अपनी विशेषता बताती है और जिसे अभी तक सूंघा नहीं गया है, कब तक बचा पायेगी, यह भविष्य ही बताएगा

अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जो वर्त्तमान दौर के पहले तक भ्रष्टाचार के खिलाफ आम लोगों के जहन में बसे गुस्से का पर्याय बन चुका था और काफी भीड़ भी अपने साथ जुटा रहा था, इस बार शुरू से उखड़ा उखड़ा नजर आ रहा था अन्ना और उनके साथ अनेक लोगों को ऐसा लग रहा था कि जब अन्ना पांचवें दिन से अनशन पर बैठेंगे तो पूरा आंदोलन पहले के समान गति पकड़ लेगा पर, सोचने और होने में जो अंतर होता है, वह आज नौवें दिन तक साफ नजर आता रहा टीम अन्ना की पूरी रणनीति पहले ही दिन मात खा गयी, जब उन्होंने तय किया कि जिस दिन प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति के लिए शपथ लेंगे, उसी दिन पन्द्रह मंत्रियों के साथ उनके ऊपर हल्ला बोला जाएगा वे भूल गए कि ये भारत है और राष्ट्रपति यहाँ संवैधानिक प्रमुख होने के चलते सभी तरह के आरोपों और आलोचनाओं से उपर होता है और खासकर उस अंदाज में और उस भाषा में तो राष्ट्रपति की आलोचना की ही नहीं जा सकती, जिस अंदाज में बात करने की अन्ना टीम की आदत है उसके बावजूद टीम अन्ना के एक सदस्य अपने पर काबू नहीं रख पाए और उन्होंने नव निर्वाचित राष्ट्रपति के खिलाफ उस भाषा का इस्तेमाल कर ही दिया, जिसके लिए वो जाने जाते हैं और अन्ना को इसके लिए मंच से माफी मांगना पड़ी अन्ना का माफी माँगने का ये सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर चलता ही गया प्रधानमंत्री के घर की दीवारों पर चोर लिखने के लिए माफी माँगी उसके बाद, मीडिया कर्मियों के उपर हमला किये जाने के लिए माफी माँगी गयी याने, सरकार के उपर दबाव बनाने की जिस रणनीति को लेकर अन्ना टीम मैदान में आयी थी और जिसके लिए उसने लोकपाल की अपनी मांग को ताक पर रख दिया था, जिसके चलते ही लोग उससे जुड़े थे, वही रणनीति उसे जनता से दूर ले गयी

जैसे इतना पर्याप्त न हो, भीड़ के लिए तरस रही अन्ना टीम के पास रामदेव भीड़ लेकर आये तो, पर, आने के पहले चैनलों पर अन्ना के आंदोलन को फ्लाप शो बताकर आये दो आन्दोलनों के दो दिग्गज, उस दिन जमाने के सामने गले तो मिले, पर, एक दूसरे को समर्थन देने नहीं, भीड़ जुटा पाने के अपने अहं और प्रतिद्वंदिता के साथ, मन में रार रखकर दो दिनों के बाद जब रामदेव ने अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला धर्मयोद्धा बताया तो अन्ना टीम ने उनके खिलाफ आरोपों की बौछार लगा दी मोदी को मानवता का हत्यारा बताने वाली अन्ना टीम आसानी से भूल गयी कि कुछ माह पहले इन्हीं मोदी की तारीफ़ स्वयं अन्ना ने की थी पूरे नौ दिन अन्ना टीम के सभी महत्वपूर्ण शूरवीर मंच से भाषण देते रहे और प्रत्येक दिन के साथ उनके अंदर का कनफ्यूजन भी देश के सामने बाहर आता रहा राजनीतिक विकल्प देने की बातें पहले दिन से बाहर आती रहीं तो साथ में बलिदान देने की शपथें भी ली जाती रहीं सरकार को भी सुध नहीं लेने के लिए कोसा जाता था तो यह भी कहा जाता था कि सरकार अरविन्द केजरीवाल को जान से मारने का षड्यंत्र रच रही है सरकार में प्रधानमंत्री सहित किसी भी भ्रष्ट मंत्री के साथ बात नहीं करने के संकल्प को दोहराया जाता था तो यह भी कहा जाता था कि सरकार किसी को बात करने नहीं भेज रही है यह तो पहले दो दिनों में ही तय हो गया था कि इस बार सरकार किसी भी तरह की बात नहीं करेगी सभी राजनीतिक दलों को कोसने, भ्रष्ट कहने के चलते सभी ने आंदोलन के इस दौर से पर्याप्त दूरी बनाये रखी आज नौवें दिन अनशन तुड़वाने के लिए जुटे सिविल सोसाईटी के लोग भी आज ही दिखे

स्वयं यह तय कर लेना कि वे ही अकेले है, जो सार्वजनिक जीवन में पवित्रता और सचाई के प्रतीक हैं और, यह तय करने के बाद, बाकी सभी से धमकाने, चमकाने और डांटने, डपटने के लहजे में डील करने को मानो टीम अन्ना ने अपना अधिकार समझ लिया था इस प्रवृति का खामियाजा, उन्हें ऐन आंदोलन के समय उसी सिविल सोसाईटी से कम समर्थन के रूप में चुकाना पड़ेगा, जिसका तमगा लेकर वो घूमते हैं, ये वे नहीं समझ पाए थे यहाँ तक कि सिविल सोसाईटी के जिन 23 लोगों की अपील पर वो अनशन खत्म करने जा रहे हैं, उनमें से कोई भी सामने नहीं आया और उन्हें एक अभिनेता से प्रस्ताव मिला एक वृहद आंदोलन का एक दुखद समापन है ये यह देश के लोगों के बड़े हिस्से के लिए वेदनामय होगा कि भ्रष्टाचार जैसे अहं मुद्दे पर शुरू किया गया आंदोलन, आंदोलन के नेतृत्व के अहं, अक्खड़पन और अति महत्वाकांक्षाओं के चलते राजनीतिक दलदल में फंसने जा रहा है
अरुण कान्त शुक्ला                                          

Tuesday, July 17, 2012

मनमोहनसिंह पूडल तो हैं, पर किसके?


मनमोहनसिंह पूडल तो हैं, पर किसके?


ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट ने प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का पूडल ठहराकर जाने अनजाने भाजपा और संघ परिवार को मदद पहुंचाने का काम किया है। यह वो आरोप है, जिसे भाजपा या संघ परिवार प्रधानमंत्री पर 2004 से लगातार लगाता रहा है। सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा इस बहाने कूटनीतिक तरीके से ज़िंदा रखने में उनको मदद मिलती है, जो उनकी साम्प्रदायिक राजनीति को सूट करता है। यही कारण है कि जब टाईम ने उनको अंडरएचीवर बताया तो भाजपा बहुत खुश हो गयी और अब जब द इंडिपेंडेंट ने उनको पूगल, पपेट या अंडर एचीवर, वह जो कुछ भी हो, बताया तो वह फिर खुश हो गयी।      

प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की छवि अपने प्रधानमंत्रित्व काल के दूसरे दौर में और विशेषकर पिछले दो वर्षों में ऐसे राजनीतिक नेता की बन गयी है जो न केवल राजनीतिक तौर पर अपरिपक्व, असफल, और अनिर्णायक है बल्कि पूरी सरकार और कांग्रेस में आलोचना के लिए एक साफ्ट टारगेट के रूप में अपने आलोचकों के लिए हमेशा उपलब्ध भी है। 1991 से 1995 के मध्य नरसिम्हाराव सरकार में वित्तमंत्री रहते हुए, जब भारत की अर्थव्यवस्था के दरवाजे उन्होंने विदेशी पूंजी के लिए खोले थे और वर्ल्डबैंक, आईएमएफ और उस समय के गाट और आज के विश्व व्यापार संगठन के निर्देशों पर सामाजिक उद्देश्यों के उपर खर्चों में कटौती, सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी हाथों में बेचने तथा देशी विदेशी पूंजी को सरकार से अबाध और अपार सहायता देने की जो मुहीम उन्होंने चलाई थी, उसके चलते जितनी आलोचना उनकी हुई थी, आज हो रही आलोचना उसके सामने मात्रात्मक रूप से बहुत कम है पर प्रकृति (गुणात्मक रूप में) में निकृष्ट और स्तरहीन होने के चलते अधिक चुभने वाली है, इसलिए ज्यादा लग रही है।

आलोचना की निकृष्टता में ही वह राज छिपा है, जो न केवल आलोचना करने वालों के मंसूबों को बल्कि भारत में उस आलोचना की हाँ में हाँ मिलाने वालों और उस पर खुश होने वालों के मंसूबों के राज खोलता है। आलोचना का स्तर आज निकृष्ट इसलिए है कि वह मनमोहनसिंह के उन मित्रों के द्वारा की जा रही है, जिनके कहने पर प्रधानमंत्री ने 1991 से 1995 के मध्य भूमंडलीकरण और उदारवाद की नीतियों को भारत में लागू किया था आज जब मनमोहनसिंह बचे हुए आर्थिक सुधारों को लागू नहीं कर पा रहे हैं तो उनके मित्र मित्रता को ताक पर रखकर उनकी आलोचना में जुट गए हैं

भारत में आज जो विपक्ष नजर आ रहा है, उसे हम दो भागों में बाँट सकते हैं पहला, वामपंथी विपक्ष, जो 1991 से ही भूमंडलीकरण और उदारवाद की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है इसका विरोध सैद्धांतिक है और वह मानता है कि भ्रष्टचार, आर्थिक मंदी, महंगाई आदि पूंजीवाद की ढांचागत मुश्किलें हैं, और इसी आधार पर सरकार के कदमों का विरोध वह करता है दूसरा, भाजपाई विपक्ष, जिसे चलना उसी रास्ते पर है, जिस पर मनमोहनसिंह ने वित्तमंत्री रहते हुए देश को डाला है, उसका विरोध सत्ता में बैठी पार्टी की राजनीति, उसके प्रोग्राम और उसकी नीतियों या गरीबी, भुखमरी, मजदूरों की कारखानों में लूट आदि जैसे सब से बुनियादी मसलों या पूंजीवाद की ढाचांगत कमजोरियों से नहीं है वह बहुत सुविधाजनक तरीके से सारा विरोध सत्ता में मौजूद पार्टी और उसके कुछ व्यक्तियों के खिलाफ खड़ा करके व्यवस्था को जैसे का तैसा बनाए रखने की नीति पर चलती है यही कारण है कि 1998 से 2004 के मध्य सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा देश की सामाजिक और आर्थिक नीतियों में कोई भी बदलाव तो ला ही नहीं पाई, उलटे देश को साम्प्रदायिकता की आंच में और तपना पड़ा

यही कारण है कि जब टाईम या द इंडिपेंडेंट मनमोहनसिंह को कम सफल, सोनिया की कठपुतली या  पूडल कहते हैं तो भाजपा के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है देश का गौरव या गर्व करने की उसकी सारी बातें हवा हो जाती हैं पर, वही भाजपा, जब ओबामा भारत को आर्थिक सुधारों को तेज करने की हिदायत देते हैं तो मुखर हो जाती है क्यों, क्योंकि, मनमोहन को टारगेट करके टाईम या द इंडिपेंडेंट का हमला उसकी राजनीति को सूट करता है, लेकिन ओबामा की बात उसकी देश प्रेम की छवि पर डायरेक्ट चोट करती है, जो उसके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक है उस समय भी वह आर्थिक सुधारों के लिए डाले जा रहे दबाव का विरोध नहीं करती, बल्कि, यह कहती है कि ऐसा तभी होगा, जब भारत ऐसा चाहेगा

मनमोहनसिंह , राष्ट्र के रक्षक हैं या सोनिया गांधी के पूडल हैं? या, मनमोहनसिंह, अभी तक के सबसे ज्यादा लाचार, असमर्थ और रिमोट कंट्रोल से याने सोनिया गांधी के निर्देशों पर चलने वाले प्रधानमंत्री हैं या उनमें त्वरित और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। ये वे आरोप हैं, जो भूमंडलीकरण और उदारवाद के समर्थक उनके विरोधी तब से लगा रहे हैं, जबसे मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री बने हैं। आज वही आरोप एक समय मनमोहनसिंह के कसीदे पढ़ने वाली मेगजीन टाईम, मनामोहनसिंह की पीठ थपथपाने वाले ओबामा और द इंडिपेंडेंट लगा रहा है। मकसद एक ही है, भारत की अर्थव्यवस्था को जितनी जल्दी हो देशी विदेशी कॉरपोरेट के हवाले कर दो। अमेरिका और यूरोप को भारत वासियों की कीमत पर अपनी हालत सुधारने दो याने आर्थिक सुधार भारत में करो और हालत उनकी सुधरे| ऐसे ही आरोप भारत के कॉरपोरेट भी लगा रहे हैं।  मनमोहनसिंह वो सब करना चाहते हैं, लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं हैं। भाजपा, जिसे सत्ता में अगर आयी तो वही सब करना है, विरोध में इसलिए है कि उसे 2014 का आम चुनाव नजर आ रहा है। एक असफल प्रधानमंत्री और बदनाम यूपीए उसे मुफीद बैठते हैं। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी का पूडल कहने का मतलब है कि वो ज्यादा संगीन सच्चाई, जो देश के लोगों के सामने आना चाहिये, उसे दबाना।          

इतिहास मात्र घटनाओं का अभिलेख नहीं होता बल्कि घटनाओं के परिणामों की विवेचना और समालोचना का रिकार्ड भी होता है। जब कभी मनमोहनसिंह के ऊपर लगने वाले इन आरोपों की विवेचना होगी, तब इतिहास में यह भी दर्ज होगा कि भारत में मनमोहनसिंह ने वर्ष 1991 में नवउदारवाद की जिन नीतियों के रास्ते पर देश को डाला, उसके बाद आने वाली सभी सरकारें, उन्हीं नीतियों पर चलीं, जो अमेरिका परस्त थीं और जिन पर चलकर देश की जनसंख्या का एक छोटा हिस्सा तो संपन्न हुआ लेकिन बहुसंख्यक हिस्सा बदहाली और भुखमरी को प्राप्त हुआ। इतिहास में यह भी दर्ज होगा कि 1991 के बाद के दो दशकों में भारत में शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल रहा हो, जो सत्ता में न आया हो या जिसने सत्ता में मौजूद दलों को समर्थन न दिया हो। इसलिए जब भी मनमोहनसिंह के ऊपर सोनियानिष्ठ होने के आरोप लगाए जाते हैं तो असली उद्देश्य मनमोहनसिंह के अमेरिका परस्त या वर्ल्ड बेंक परस्त चेहरे को छिपाना ही होता है। क्योंकि, उन्हें लगता है कि यदि कल वे सत्ता में आये तो उन्हें उसी रास्ते पर चलना है, इसलिए भूमंडलीकरण और उदारवाद को बदनाम करने से अच्छा है, व्यक्तियों को बदनाम करो। यदि मनमोहनसिंह पूडल हैं तो सोनिया के नहीं अमेरिका, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के पूडल हैं और पिछले दो दशकों में सत्ता का सुख प्राप्त कर चुके सभी दल इनके पूडल रह चुके हैं, यहाँ तक कि देश का मीडिया भी, विशेषकर टीव्ही मीडिया और बड़े अंग्रेजी दां अखबार भी इनके पूडल हैं|

अरुण कान्त शुक्ला 
18'जुलाई'2012 

   

Monday, July 16, 2012

हमारे किस काम की ये दुनिया -




हमारे किस काम की ये दुनिया,

इतनी बेचारगी, लाचारी और जिल्लत की ये दुनिया,
इंसानियत पे होती हावी हैवानियत की ये दुनिया,
आदमी की कोख से पैदा हुए भेड़ियों की ये दुनिया,
कपडे पहने, कपड़ों में नंगे घूमते सफेदपोशों की ये दुनिया,
झूठों,फरेबियों और मक्कारों के ईशारे पर नाचती ये दुनिया,
क्यों न इस दुनिया में आग लगा दें,
हमारे किस काम की ये दुनिया।।


कूड़े के ढेर पे खाना ढूंढते बच्चों की ये दुनिया,
कुत्तों को गोदी बिठालकर खाना खिलातीं मेमों की ये दुनिया,
अपनी जमीन से अलग होकर आत्महत्या करते किसानों की ये दुनिया,
अपना जमीर बेचकर राज करते सत्तानशीनों की ये दुनिया,
फुटपाथों, दुकानों के पटियों, प्लेटफार्म पर लाशों जैसे सोते लोगों की ये दुनिया,
क्यों न इस दुनिया में आग लगा दें,
हमारे किस काम की ये दुनिया।।
 

गरीबों से निवाले छीनकर महल तानने वालों की ये दुनिया,
अमरीका के तलवे चाटने वाले सियासतदाओं की ये दुनिया,
वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और डबल्यूटीओ की बनाई ये दुनिया,
दुनिया की आधी आबादी के लिए कब्र बनी ये दुनिया,
भूख की लपटों में आदमी को ज़िंदा जलाने वालों की ये दुनिया,      
क्यों न इस दुनिया में आग लगा दें,
हमारे किस काम की ये दुनिया।।

औरतों के जिस्म को नोचने वालों की ये दुनिया,
बच्चों को भूखे मारने वालों की ये दुनिया,
दुनिया को बनाने वालों का खून पीने वालों की ये दुनिया,
दुनिया को बनाने वालों को बेवकूफ बनाने वालों की ये दुनिया,
धर्म के नाम पर लूट मचाने वाले बाबाओं की ये दुनिया,
क्यों न इस दुनिया में आग लगा दें,
हमारे किस काम की ये दुनिया।।


इतनी बेचारगी , लाचारी और जिल्लत की ये दुनिया,
इंसानियत पे होती हावी हैवानियत की ये दुनिया,
आदमियत जिसमें हो रही शर्मसार, है ये वो दुनिया,
पैसा जिसमें करता इंसानियत से व्यभिचार, ऐसी ये दुनिया,
सलीब जिसमें पुण्य चढ़ा, खिलखिलाता है पाप, ऐसी ये दुनिया,       
क्यों न इस दुनिया में आग लगा दें,
हमारे किस काम की ये दुनिया,
क्यों न इस दुनिया में आग लगा दें,
हमारे किस काम की ये दुनिया।।

अरुण  कान्त शुक्ला-
     
 
  
         

Thursday, July 12, 2012

बस यही व्यापार चल रहा है -


बस यही व्यापार चल रहा है

गगन से लेकर धरा तक,
धरा से लेकर गगन तक,
यही व्यापार चल रहा है,
आदमी आदमी को छल रहा है,
यही व्यापार चल रहा है,
बस यही व्यापार चल रहा है||  

अब दुश्मन की जरुरत है कहाँ,
जब दोस्त दोस्त से लड़ रहा है,
रुपये का व्यापार इस कदर हावी है,
आदमी आदमीयत को भी छल रहा है,
यही व्यापार चल रहा है,
बस यही व्यापार चल रहा है||  


रिश्ते रुपये, पैसे, कौड़ी, में बदल गए,
पेशे अब कोई पवित्र नहीं रहे,
किताबें अब दोस्त नहीं,
उनका एक एक हर्फ़ अब छल रहा है,
यही व्यापार चल रहा है,
बस यही व्यापार चल रहा है||

राजा को नहीं प्रजा से प्यार,
काजी की है इन्साफ से रार,
खुदा है हाजी का व्यापार,
जो जहां है बस छल रहा है,
यही व्यापार चल रहा है,
बस यही व्यापार चल रहा है||

अरुण कान्त शुक्ला