Wednesday, July 27, 2016

छोटु बनेगा विधि सम्मत..

‘छोटु’ बनेगा विधि सम्मत..


सरकार से लेकर समाज की उस गहराई तक जो हमारे घरों तक भी पहुँचती है, बच्चे और स्त्रियाँ न केवल अनदेखी का शिकार होते हैं बल्कि प्राय: प्रत्येक तरह की प्रताड़ना के लिए सभी का आसान शिकार भी रहते हैं| बीते सप्ताह राज्य सभा ने बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन ) संशोधन बिल 2016 पास कर दिया| हमारे देश के नीति निर्माताओं, राजनीतिज्ञों की सामाजिक चेतना स्त्रियों और बच्चों के प्रति कितनी सजग और सतर्क है, इसका अंदाजा इससे लग जाता है कि जब ये बिल 19 जुलाई को राज्य सभा में बहस के लिए रखा गया और पास हुआ, राज्य सभा में सदस्यों की उपस्थिति कुल सदस्यों की संख्या की 25% से भी कम थी याने 60 से भी कम|

भारत में बाल श्रम की स्थिति 

यह बिल उन सभी विरोध करने वालों के मुंह पर तमाचा है, जो पिछले एक वर्ष या यूं कहें कि मई 2015 से जब मोदी मंत्रीमंडल ने इसे संसद से स्वीकृत कराने का निर्णय लिया अथवा दिसम्बर 2012 में जब पहली बार यूपीए सरकार ने लगभग वर्तमान संशोधनों वाला ही प्रारूप राज्य सभा में पेश किया था तब से इसका विरोध कर रहे थे| हमारे पास बाल श्रम को नियंत्रित करने के लिए 1986 का क़ानून था जो बच्चों को सूचीबद्ध 83 खतरनाक या जोखिम वाले उद्योगों (व्यवसायों और प्रक्रियाओं)में काम करने से निषेध करता था व अन्य व्यवसायों/प्रक्रियाओं में उसके काम करने की परिस्थितियों का नियंत्रण करता था| क़ानून के अनुसार बच्चे से अभिप्राय 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से होता था| हम सभी जानते हैं कि इस क़ानून का कितना पालन होता था? न केवल होटलों, ढाबों, खोमचों, पान की दुकानों, साईकिल/ऑटो रिपेयरिंग दुकानों घरेलु नौकरों के रूप में हमारे आसपास ‘छोटु’ घूमते रहते थे बल्कि बीड़ी, जरीकाम, गलीचा, चमड़ा, प्लास्टिक व्यवसायों से लेकर पटाखे/विस्फोटक बनाने वाले बड़े व्यवसायों में भी कम उम्र के बच्चे लगे रहते थे|
2011 के जनसांख्यकीय आंकड़े आँखें खोलने वाले हैं| इनके अनुसार प्रत्येक 20 कामगारों में एक 5-17 वर्ष का बच्चा या किशोर है| बाल श्रमिकों की कुल संख्या लगभग 2.5 करोड़ है| इससे भी ज्यादा चौकाने वाली बात यह है कि कुल बाल श्रमिकों में से लगभग साढ़े चार लाख पांच वर्ष से भी कम उम्र के हैं| लगभग 17% बाल श्रमिक अनुसूचित जाति या जनजाति से आते हैं| कहने की जरुरत नहीं है कि कुपोषित महिलाओं, कुपोषित 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों के समान ही बाल श्रमिकों की संख्या के मामले में भी भारत दुनिया में अव्वल नंबर पर है|

संशोधन लाने के पीछे सरकार के तर्क और संशोधन

सरकारें भले ही अलग अलग गठबन्धनों की हों पर संशोधनों के पीछे के तर्क दोनों के एक से हैं| पहला तर्क है कि वर्ष 2009 में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद यह जरुरी हो गया है कि 6-14 की आयु के बच्चों के रोजगार पर लगने के प्रावधान पर रोक लगाई जाए| 1986 का क़ानून गैर जोखिम वाले व्यवसायों में इसे इजाजत देता था| दूसरा तर्क है कि 1986 का क़ानून अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रावधान 138 तथा 182 के अनुरूप नहीं था, जिसके अनुसार रोजगार में प्रवेश की न्यूनतम आयु तय करना तथा 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा और नैतिक रूप से नुकसानदायक व्यवसायों में लगने से रोक लगाने का प्रावधान किया जाना है| इन उद्देश्यों और मंशा को सामने रखते हुए जो संशोधन सरकार ने रखे हैं और जिनका व्यापक विरोध शुरू से किया जा रहा है, उनमें पहला है; कोई भी बच्चा याने 14 साल से कम आयु का बालक किसी काम में नहीं लगाया जाएगा| लेकिन जब बालक अपने परिवार या परिवार के रोजगार में मदद कर रहा हो, स्कूल के बाद खाली समय में या छुट्टियों में और रोजगार खतरनाक नहीं है तो यह क़ानून लागू नहीं होगा| अगर बच्चा टी व्ही, फिल्म, विज्ञापन आदि में कलाकार के रूप में  काम करता है तो क़ानून लागू नहीं होगा बशर्ते यह सब करते हुए स्कूल की पढ़ाई प्रभावित न हो| सरकार का एक तर्क यह भी है कि परिवार के व्यवसाय में काम करते हुए मालिक-मजदूर का संबंध नहीं होता है| जबकि 2009 में अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद से ही बाल श्रम मामलों में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों की मांग थी कि अनिवार्य शिक्षा याने 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों के किसी भी तरह के व्यवसाय में लगने पर रोक लगे ताकि अनिवार्य शिक्षा क़ानून का लाभ अधिक से अधिक बच्चे उठा सकें| 

यदि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को परिवार के रोजगार में लगने की छूट दी गयी तो गरीबी और भरण-पोषण लायक कमाई बरकरार रखने के दबाव में परिवार वाले बच्चों का नाम तो स्कूल में दर्ज करा देंगे किन्तु बच्चे कभी भी स्कूल नहीं जा पायेंगे| और, ज्यादा से ज्यादा बच्चे बीड़ी बनाने, जरी, गलीचा, चमड़ा, जैसे व्यवसायों में लिप्त रहेंगे जोकि परंपरागत ढंग से कहने को तो पारिवारिक व्यवसाय हैं, पर, उन पर पूरा नियंत्रण बिचौलियों, ठेकेदारों, और बड़े व्यवसाईयों का होता है| 

विशेषकर, 1991 की उदारवादी नीतियों के आने के बाद से इस तरह के सभी व्यवसाय पूरी तरह ठेके के हवाले हैं और वर्तमान सरकार उसे बढ़ावा ही दे रही है| इसके चलते ये बच्चे स्कूल से बाहर होंगे| वैसे भी शिक्षा का अधिकार क़ानून का अमलीकरण बहुत धीमा तथा कमजोर है| इस संबंध में यूनेस्को की 2015 की रिपोर्ट का तथ्य ध्यान देने योग्य है कि विश्व में लगभग 12 करोड़ 40 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं और इनका बड़ा हिस्सा याने लगभग 1 करोड़ 77 लाख, लगभग 14% भारत में ही है|

दूसरा तर्क कि पारिवारिक कारोबार में मालिक-मजदूर का रिश्ता नहीं होता है, गले उतरने वाला नहीं है| हमारे देश में बच्चों के अधिकार को सुनिश्चित करने या पालक और अभिभावकों को बालकों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है| एक दशक पहले तक हम हर जगह एक न एक छोटु पा जाते थे| बहुत मुश्किल से 5 से लेकर 10-12 तक की आयु के बच्चों को कम से कम खुले तौर पर काम पर लगाने को हम रोक पाये हैं| अब बाबूजी, चाचा, मामा की आड़ में वह गौरखधंधा फिर से खोलने का रास्ता सरकार बना रही है|

तीसरा कि पहले ऐसे व्यवसायों को छान-बीन कर सूचीबद्ध किया गया था जो या तो प्रत्यक्षत: खतरनाक थे या जहां की परिस्थितियाँ बच्चों के काम करने के लिहाज से खतरनाक थीं| यह व्यापक सूची थी और इसमें 83 व्यवसाय थे| अब सरकार इन्हें घटाकर खदान, ज्वलनशील पदार्थ और विस्फोटक उद्योग तक सीमित कर तीन पर ले आई है याने बाकी जगह उसने शोषण के लिए खुली छोड़ दी हैं|

स्थायी संसदीय समिति के सुझावों के भी खिलाफ 

ऐसा लगता है कि मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप की दौड़ में लगातार फेल होती सरकार इन योजनाओं को गरीब बच्चों के कंधे पर रखकर चलाने की योजना में जुटी है तभी इन संशोधनों पर उसने न तो बच्चों के किसी समूह से बात की और न ही बाल श्रम के मामलें में काम कर रहे समूहों से कोई विमर्श किया| यहाँ तक कि उसने श्रम और रोजगार पर गठित संसद की स्थायी समिति के सुझावों को भी दरकिनार कर दिया, जिसने स्पष्ट रूप से बच्चों को स्कूल के बाद परिवार को मदद करने का प्रावधान हटाने, जोखिम वाले काम में किशोरों को स्वास्थ्य, नैतिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से नुकसानदायक व्यवसायों को शामिल करने, किशोरों को किसी भी व्यवसाय में लगने से पहले अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने, और सांसदों के उपर निरीक्षण की जिम्मेदारी सौंपने वाले प्रावधान शामिल करने कहा था|

प्रश्न बड़ा है

सरकार या वे सभी जो वर्तमान संशोधनों का यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि ये गरीब परिवारों को राहत देने के औजार के रूप में हैं, वे इस बात को या तो जानबूझकर अनदेखा कर रहे है या सामाजिक ताने-बाने की जानकारी से बिलकुल बेखबर हैं| किसी बच्चे को उसके बचपन से कम से कम मजदूरी पर शोषित होने के लिए अभिशप्त कर देना और उसे आगे शोषित होने का प्रशिक्षण देने का काम ये संशोधन करेंगे| यह उनकी गरीबी को स्थायी रूप से उनसे चिपकाना है| पारिवारिक व्यवसाय अनौपचारिक ढंग से चलाये जाते हैं| यहाँ काम के घंटे अनेक बार 12 से 14 घंटे तक खिंच जाते है| वहां बच्चों के अधिकारों और हितों की रक्षा कौन करेगा| थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि पालक और बच्चा दोनों स्कूल के साथ समन्वय बिठाकर चलते है तब भी स्कूल के बाद बच्चे के होम-वर्क का क्या होगा? उसके खेलने के समय का क्या होगा? उसके सोने के समय का क्या होगा? वह जो कुछ भी जो अवैधानिक है, वर्तमान सरकार उसे वैधानिक बनाने पर तुली है| यही वह श्रम कानूनों के साथ कर रही है| और यही वह बच्चों के क़ानून के साथ करने जा रही है| यदि इस क़ानून में यही संशोधन बरकरार रहते हैं और लोकसभा इसे पास करती है तो हमें फिर से अपने चारों और चाय-पान-किराना से लेकर मॉल तक की दुकानों में पटाखे से लेकर हर घरेलु उद्योग में छोटु ही छोटु देखने मिलेंगे|

अरुण कान्त शुक्ला
27/7/2016                                  





Thursday, June 30, 2016

       केन्द्रीय कर्मचारियों के वेतन पुनर्निर्धारण के पीछे का सच

आप चाहें तो केंद्र सरकार की इसके लिए प्रशंसा कर सकते हैं कि उसने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के एक हिस्से को मात्र छै माह के भीतर स्वीकार किया है| जबकि इसके पूर्व पांचवे वेतन आयोग की सिफारिशों को 19 माह तथा छटवें वेतन आयोग की सिफारिशों को 32 माह  तक केंद्र की सरकारों ने लटकाया था| सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें को इस मायने में यूनिक माना जा सकता है कि यह पहला वेतन आयोग है जिसने पिछले 70 वर्षों में सबसे कम ही नहीं बल्कि नगण्य वेतन वृद्धि की सिफारिश की है| ज्ञातव्य है कि छटवें वेतन आयोग ने 20% बढ़ोत्तरी की सिफारिश की थी, जिसे 2008 में लागू करते समय यूपीए-1 की सरकार ने दो गुना याने 40% कर दिया था| न्यूज पोर्टल्स, ई-अखबारों और प्रिंट मीडिया में इस वेतन पुनर्निर्धारण को “ढाई गुना बढ़े वेतन और पेंशन”, “वेतन में 23.5% की बढ़ोत्तरी की मंजूरी” जैसे शीर्षकों से नवाजा गया है| वहीं केन्द्रीय कर्मचारियों के असंतोष को भी प्रमुखता से उभारा गया है| यह बात और है कि यह असंतोष क्यों है, इसके विवरण में जाने की जरुरत नहीं समझी गयी| सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ केंद्र सरकार के कर्मचारियों का यह असंतोष नया नहीं है| नवम्बर 2015 में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आने के तुरंत बाद ही केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी संगठनों की राष्ट्रीय संयुक्त कार्यवाही समिति ने इसके अनेक प्रावधानों और सिफारिश की गयी 14.28% की वेतन वृद्धि को अपर्याप्त बताते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा की थी कि वह लागू करने का निर्णय लेते समय इनमें सुधार करेगी| पर, सरकार ने न तो वेतन वृद्धि के प्रस्ताव में कोई सुधार किया और न ही आयोग के द्वारा प्रस्तावित भत्तों में कटौती के प्रस्तावों को नकारा है| उन पर निर्णय आना शेष है|

बुधवार को मंत्रिमंडल के द्वारा प्रस्तावों को हरी झंडी मिलते ही देश में मौजूद कारपोरेट पोषित नवउदारवाद के भगत किस्म के स्तंभकारों ने तुरंत ही केन्द्रीय कर्मचारियों के 1946 के 35 रुपये के वेतन के साथ आज के वेतन की तुलना करते हुए आलोचना भी शुरू कर दी| जबकि आयोग की सिफारिशों में कर्मचारियों के मौजूदा भत्तों के उपर जो कैंची चली है, उस पर वे शातिराना ढंग से खामोश हैं| कर्मचारियों को मिलने वाले वर्त्तमान आवास भत्ते के स्लेबों को  30% से घटाकर 24%, 20% को घटाकर 16%, और 10% को घटाकर 8% करने, छोटा परिवार भत्ता, त्यौहार अग्रिम को समाप्त करने, नवजात शिशु की देखभाल के लिए दिए जाने वाले अवकाश में वेतन को घटाकर 80% करने जैसे अनेक मुद्दे हैं, जो इस बढ़े हुए वेतन की बढ़ोत्तरी को निष्प्रभावित करते हैं| सामान्यत: देश के कर्मचारी वर्ग के अलावा अन्य लोगों को सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों, बैंक, बीमा तथा सरकारी क्षेत्रों में होने वाले वेतन-पुनर्निर्धारण के बारे में अंदरुनी जानकारी नहीं होती है और वे आसानी से सरकार तथा कारपोरेट के पिठ्ठुओं के इस भ्रामक प्रचार को सच मान बैठते हैं|

वेतन पुनर्निर्धारण के पीछे का सच-

वेतन पुनर्निर्धारण किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो, स्वयं अपने आप में सरकार की स्वीकृति है कि वह दो वेतन पुनार्निर्धारणों के बीच की अवधि में महंगाई के बढ़ने पर रोक नहीं लगा सकी है और बढ़ी हुई महंगाई अब किसी भी तरह से वापस नहीं हो सकती| तब, एक तयशुदा समय के बाद, जो केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए 10 वर्ष है, सरकार को कर्मचारियों को प्रदत्त महंगाई भत्ते को मूल वेतन में जोड़ना पड़ता है| इसका अर्थ हुआ कि सरकार केवल पुराने वेतन के स्तर को संभालती है और मूल वेतन में आया परिवर्तन बढ़ोत्तरी न होकर केवल पुराने वेतन के बराबर लाया जाना होता है क्योंकि तब नए वेतनमान पर मिलने वाला महंगाई भत्ता निर्धारित तिथी, जो अभी 1 जनवरी 2016 है, को शून्य हो जाता है| इसे वर्त्तमान सन्दर्भ में इस तरह समझा जा सकता है कि छटवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 7000 रुपये तय किया था| उसमें 1.1.2016 को लागू 125% महंगाई भत्ता 8750 रुपये जोड़ने के बाद कुल न्यूनतम वेतन 15750 रुपये होता है| 18000 रुपये न्यूनतम वेतन तय करने का अर्थ हुआ कि कुल बढ़ोत्तरी मात्र 2250 रुपये अर्थात लगभग 14.28% हुई| यही तरीका सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, कर्मचारियों के दैनिक वेतन को तय करते समय अपनाना पड़ता है, जिसमें वह हमेशा ही हेराफेरी करती है| इस तरह मूल वेतन में वास्तविक बढ़ोत्तरी 23.55% नहीं है, जैसा कि कुप्रचार है| यह केवल 14.28% है|

14.28% की यह बढ़ोत्तरी भी कर्मचारियों पर कोई दया अथवा दान नहीं है| एक कर्मचारी लगभग 30 से 35 वर्ष तक सरकार की सेवा में रहता है, जिसके दौरान उसके ऊपर परिवार के भरण-पोषण के अतिरिक्त देश तथा समाज के लिए अच्छे सुशिक्षित नागरिक प्रदान करने की जिम्मेदारी होती है| जिसके लिए उसे अपने बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा दिलानी होती है, साथ ही उनके वैवाहिक संस्कारों को संपन्न कराने के दायित्व का भी निर्वाह करना होता है| यह हमारी समाज व्यवस्था की विडंबना है कि जिस दायित्व का निर्वाह सरकार और समाज को करना चाहिए उसे एक व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी में डालकर सरकार पल्ला झाड़ लेती है| समाज के अन्दर मौजूद कुपोषण से लेकर अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी अनेक समस्याओं के पीछे का सच यही है कि सरकारें समाज निर्माण के इस दायित्व पर निष्क्रीय हैं| ये दायित्व हमेशा बढ़ते क्रम में होते हैं और वेतन में मात्र 14.28% की बढ़ोत्तरी से उन्हें निभाना असंभव सा कार्य है|

न्यूनतम एवं अधिकतम वेतन में अंतर-

हमें केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों का प्रशासनिक ढांचा पराधीन भारत से विरासत में मिला है| अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए ऐसे प्रशासनिक अधिकारी चाहिए थे, जो न सामान्य देशवासियों को बल्कि केंद्र व राज्य के कमचारियों को भी प्रशासनिक अधिकारों के साथ साथ अपने रुतबे तथा रहन-सहन के ढंग से भी दबा कर रख सकें| इसीलिये, पराधीन भारत में निचले स्तर के कर्मचारयों का ही नहीं बल्कि आम कामगारों का भी वेतन अधिकारी, सुपरवाईजर्स स्तर के लोगों की तुलना में कई गुना कम रखा जाता था| आय में यह असमानता अनेक सामाजिक व्याधियों की जननी होती है| स्वतन्त्र भारत में केन्द्रीय कर्मचारियों के मामले में न्यूनतम और अधिकतम आय में यह अंतर पहले और दूसरे वेतन आयोग ने क्रमश: 36 तथा 37 गुना रखा था| लेकिन, तीसरे वेतन आयोग ने इसे कम कर 18 गुना, चौथे और पांचवें आयोग ने और कम करके 10 गुना तथा छटवें आयोग ने यह 11 गुना रखा| अब सातवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 18000 और अधिकतम वेतन 2,50,000 करके इस अंतर को 13 गुना कर दिया है| यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि नवउदारवाद के दौर में भी इस अंतर को कम नहीं किया गया तो बनाए रखने की कोशिश की गयी| अब इसे बढाने का सीधा अर्थ है कि केंद्र सरकार देश के अन्दर मौजूद और लागातार बढ़ती असमानता की खाई को कम करने की कतई उत्सुक नहीं है बल्कि उसे और बढ़ाने की ओर अग्रसर है| जबकि, केंद्र सरकार के कर्मचारी संगठनों की संयुक्त कार्यवाही समिति ने इसे घटाकर 1:8 करने की मांग की थी| सरकार की इस सोच को नजरअंदाज इसलिए भी नहीं किया जा सकता कि जिस निजी क्षेत्र के मुकाबले वेतन वृद्धि को सरकार ठहरा रही है वहां पहले से ही यह अंतर बहुत व्यापक है और सरकार के इस कदम से वहां उस खाई के और चौड़ा होने की संभावना बनती है|

क्या यह खजाने पर बोझ है-

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आते ही वित्तमंत्री ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया था कि इन सिफारिशों से सरकार के खजाने पर 1 लाख करोड़ रुपये का बोझ आयेगा, जिसे वर्तमान में सहन नहीं किया जा सकता है| केंद्र की सरकार ने नवउदारवाद के जिस दौर को अंतिम चरण तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है, उसमें देश के किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों और आम जनता के कमजोर तबकों के उपर होने वाले व्यय को सरकारें, कारपोरेट और संपन्न तबके  बोझ ही समझते हैं| यह केंद्र और राज्यों की सरकारों की प्रत्येक नीति में देखा जा सकता है| सरकार में वित्तमंत्री वंचित और दबे तबके के रक्षक के बतौर नहीं बल्कि बड़े कारपोरेट घरानों और संपन्न तबकों के रक्षक के रूप में दिखते हैं| तभी काले धन पर सिर्फ शब्द-वर्षा होती है और उसे एक माह में वापस लाया जाएगा, एक राजनीतिक जुमला बन जाता है| 4 लाख करोड़ रुपयों का वह कर्ज, जो कारपोरेट घरानों और संपन्नों ने बैंकों से लिया और डकार गए, वित्त मंत्री की भृकुटी में बल नहीं लाता| दो बजट में हंसते-मुस्कराते 4 लाख करोड़ की टेक्स राहत और कर अदायगी से मुआफी कारपोरेट को दे दी जाती है| जबकि आम लोगों पर अप्रत्यक्ष करों और उपकरों का बोझ लादा जाता है| सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले खर्चों में कटौती की जाती है| छोटी बचत योजनाओं पर दिए जाने वाले ब्याज में कमी की जाती है तथा कर्मचारियों के भविष्यनिधि पर निशाना लगाया जाता है|

14.28% की बढ़ोत्तरी क्यों कम है?-

केन्द्रीय कर्मचारियों तथा राज्यों के कर्मचारियों का वेतन पुनर्निर्धारण सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों तथा बैंक, बीमा अथवा ऐसे ही अन्य संस्थानों की तरह प्रत्येक पांच वर्ष में नहीं होता है| संगठित क्षेत्र में, जहां वेतन पुनर्निर्धारण पांच वर्ष में होता है, अमूमन वेतन वृद्धि 17 से लेकर 22-23% के मध्य कहीं होती है| केन्द्रीय कर्मचारियों की संयुक्त कार्यवाही समिति ने उसी अनुसार न्यूनतम वेतन 26000 करने की मांग की थी| इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए 2008 में यूपीए ने 40% की वेतन वृद्धि दी थी| वित्तमंत्री का यह कहना कि सिफारिशों को मंजूरी देते समय निजी क्षेत्र में दिए जा रहे वेतन से समरूपता हो, इसका खयाल रखा गया, केवल हवाई बात है| जबकि वास्तविकता यह है कि उच्च अधिकारियों के मामले में भी, जहां वेतन बढ़ोत्तरी निचले तबके के कर्मचारियों की तुलना में बेहतर है, उच्च अधिकारियों का वेतन निजी कंपनियों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की तुलना में कुछ भी नहीं है, जो करोड़ों रुपये के पैकेज पर कार्य करते हैं| जहां तक तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों का सवाल है, यह सर्वविदित तथ्य है कि निजी क्षेत्र सबसे बड़ा कम वेतन देने वाला शोषक नियोक्ता है| बल्कि सरकार ने निजी क्षेत्र के दबाव में ही आकर निचले कर्मचारियों के वेतन को कम रखा है| क्योंकि, सरकारी अथवा सार्वजनिक क्षेत्र में वेतन स्तर के ऊंचा उठने पर निजी संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों पर भी निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी का दबाव पड़ता है और उन्हें वेतन स्तर को उठाना पड़ता है| 18000 रुपये पर निर्धारित इस न्यूनतम वेतन में से यदि 1.1.2004 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों के मामले में नई पेंशन योजना की राशी 10% की दर से कम कर दी जाए, जो आवश्यक कटौती है तो वास्तविक बढ़ोत्तरी मात्र 450 रुपये रह जायेगी और वह भी 10 वर्षों के अंतराल के बाद| इसी तरह 1.1.2004 के पहले के कर्मचारियों के वेतन से 6% सामान्य भविष्य निधी की राशी निकाल दी जाए तो वास्तविक रूप से बढ़ोत्तरी केवल 1170 ही रह जाती है| अभी यह भी सपष्ट नहीं है कि सरकार उनके वर्त्तमान भत्तों के साथ क्या करने वाली है? स्वाभाविक है कि 10 वर्षों के अंतराल के बाद केवल आंकड़ों की कलाबाजी दिखाई जायेगी तो केन्द्रीय कर्मचारी असंतुष्ट और रुष्ट दोनों होंगे|

अरुण कान्त शुक्ला

30जून,2016                  

Friday, March 4, 2016

कर्मचारी भविष्य निधी पर आयकर या कर्मचारियों की पेट काटकर की गई बचत पर सेंधमारी-


स्वतन्त्र भारत के इतिहास में शायद ही किसी वित्तमंत्री या उसके विभाग को बजट में किये गए प्रस्तावों में से किसी एक पर इतने स्पष्टीकरण देने पड़े होंगे, जितने अरुण जेटली और उनके वित्त मंत्रालय को कर्मचारी भविष्य निधी के 60% जमा हिस्से को आयकर के दायरे में लाने पर देने पड़ रहे हैं| जाहिर है, वित्तमंत्री और उनका मंत्रालय उनके इस कदम पर जितने भी तर्क दे रहे हैं, वे इतने बेदम हैं कि उनमें से एक भी किसी के गले उतरने वाला नहीं है|

सामाजिक सुरक्षा योजना बनाम अनिवार्य बचत योजनाओं की सच्चाई-

भारत में यह एक कड़वी सच्चाई है कि वह चाहे संगठित क्षेत्र के श्रमिक, कर्मचारी हों अथवा असंगठित क्षेत्र के, उनका वेतन कभी इतना नहीं रहा कि वे अपने जीवन की रोजमर्रा की आवश्यकताओं, आकस्मिक जरूरतों और पारिवारिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए स्वयं होकर भविष्य अथवा वर्तमान की किसी सुरक्षा के लिए अपने वेतन का 8 से लेकर 12 प्रतिशत तक हिस्सा किसी भी बचत योजना में बिना अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं में कटौती किये लगा सकें| यह बात कर्मचारी भविष्य निधी से लेकर अन्य हर तरह की बचत योजना पर लागू होती है| इस बात की पुष्टी के लिए एक ही उदाहरण काफी है, सरकार यदि आज जीवन बीमा, आमबीमा, चिकित्सा बीमा और इससे जुडी सभी योजनाओं से आयकर की छूट समाप्त कर दे तो सारी बीमा कंपनियों का व्यवसाय केवल अति संपन्न तबके तक सिमिट कर रह जाएगा  और उच्च मध्य वर्ग तक के लोग बीमा से किनारा कर लेंगे| इसकी पुष्टी इस तथ्य से भी होती है कि हमारे देश में लगभग 57 करोड़ लोग ऐसे हैं जो बीमा के योग्य हैं,पर, सभी जीवन बीमा कंपनियों का व्यक्तिगत जीवनों पर बीमाधारकों की संख्या पांच करोड़ से उपर नहीं है| इसका अर्थ है कि बीमा के योग्य होने के बावजूद बीमा इसलिए नहीं है क्योंकि उसे खरीदने की ताकत बाकी लोगों में नहीं है|
श्रमिक/कर्मचारी के वेतन के कुछ हिस्से को इसीलिये उनकी भविष्य की जरूरतों और सुरक्षा की दृष्टि से बचत में डालना अनिवार्य किया गया| पूंजीवादी व्यवस्था के होने के बावजूद, इस सच्चाई को महसूस किया जाता रहा कि नियोक्ता/मालिक से श्रमिक/कर्मचारियों को कभी भी श्रम का उचित (पूरा) मूल्य नहीं मिलता है| इसीलिये, नियोक्ता/मालिक को भी कर्मचारी भविष्य निधी में कर्मचारी के लिए तय न्यूनतम अंशदान के बराबर की राशी जमा करने की बाध्यता रखी गई| श्रमिक/कर्मचारी के द्वारा कर्मचारी भविष्य निधी में जमा राशी कभी भी उनकी आय का हिस्सा नहीं रही, इसीलिये उसे इस अंशदान पर आयकर से छूट भी मिली और नियोक्ता को भी तय मानदंडों के अनुसार उस एकत्रित कोष को निवेश करके आय करने की छूट रही, जिसका एक हिस्सा ब्याज के रूप में जमा राशी पर दिया जाता रहा है| इस पूरे मायाजाल का एक दिलचस्प पहलू और है| नियोक्ता/मालिक कर्मचारी भविष्य निधी में दिए गए उनके योगदान के लिए उसी प्रकार आयकर में छूट प्राप्त करते हैं, जैसे श्रमिक कर्मचारी को मिलती है| अब यदि उस एकत्रित कोष, जिसका प्रबंधन भविष्य निधी के लिए बनाया गया ट्रस्ट करता है, के 60% हिस्से पर आयकर लगाया जाता है तो श्रमिक/कर्मचारी उस मूल हिस्से और उसके ब्याज पर भी आयकर देंगे, जिस पर नियोक्ता/मालिक आयकर की छूट प्राप्त कर चुका है| याने अपने जिस हिस्से पर कर्मचारी को आयकर की छूट मिली थी, उस पर तो वह आयकर देगा ही,साथ ही उस हिस्से पर भी आयकर देगा जिसकी छूट नियोक्ता/मालिक ले चुका है| यह घालमेल कितना अनैतिक है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है|

नीयत में खोट है-

सर्वप्रथम, हम बजट भाषण में कही गई इस बात को लेते हैं कि ये प्रस्ताव 1 अप्रैल 2016 के बाद जमा किये गए अंशदान पर लागू  होगा| यह सीधे सीधे श्रमिकों/कर्मचारियों में भेद करके उनकी एकता को तोड़ने वाला प्रस्ताव है| वे श्रमिक/कर्मचारी जो आनेवाले कुछ वर्षों में सेवानिवृत होने वाले हैं, यह सोचकर प्रस्ताव का विरोध करने में ढीले पड़ सकते हैं कि यह सरदर्द तो पिछले कुछ वर्षों में नौकरी पर आये तथा भविष्य में कामगार दुनिया में प्रवेश करने वालों का है क्योंकि उनको ही बड़ा नुकसान होगा| चूँकि, उन्हें (पुराने कर्मचारियों को) हानी का बड़ा हिस्सा नहीं झेलना है, अतएव वे क्यों पचड़े में पड़ें? अब यह किसी से छुपा नहीं है कि श्रम नियमों में सुधार मोदी सरकार का सबसे बड़ा एजेंडा है और इसके लिए विभाजित श्रम समुदाय सरकार को चाहिए, उसी अनुरूप ये प्रस्ताव भी है|

दूसरी बात, वित्तमंत्री का मुस्कराते हुए यह कहना है कि इस प्रस्ताव से यह फ़ायदा होगा कि निजी कंपनियों के कर्मचारी अथवा वे श्रमिक/कर्मचारी जो किसी पेंशन योजना के सदस्य नहीं हैं, उस 60% हिस्से को किसी बीमा कंपनी के एन्युटी (पेंशन) योजना में लगाकर स्वयं के लिए नियमित पेंशन का इंतजाम कर सकते हैं| यह सीधे सीधे बीमा कंपनियों के माध्यम से शेयर बाजार के जुआरियों के पास श्रमिक/कर्मचारियों की पेट काटकर की गई बचत को पहुंचाना है| यह सभी जानते हैं कि सरकार की शेयर मार्केट से जुड़ी कर्मचारी पेंशन योजना का पहले से ही श्रमिक/कर्मचारी विरोध करते आ रहे हैं, जहां उनका पैसा सदा जोखिम में रहता है| कुल मिलाकर संपन्नों के ऊपर हाथ डालने से हमेशा ही डरने वाली सरकार (चाहे वह कोई भी सरकार हो) वैश्विक मंदी में देशी/विदेशी कारपोरेट को पूंजी मुहैय्या कराने के लिए श्रमिक/कर्मचारियों की जीवन भर पेट काटकर की गयी बचत पर सेंधमारी कर रही है| बेहतर यही है कि यह श्रमिक/कर्मचारी पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह किस तरह अपनी गाढ़ी बचत का उपयोग/निवेश करना चाहता है|

देश की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में समझ की कमी-  

सरकारें जब कभी भी गरीब-गुरबा, श्रमिक/कर्मचारी/किसानों के बारे में इस तरह के घड़ियाली प्रस्ताव लेकर आती है तो अक्सर कहा जाता है कि एयर-कंडीशन में बैठकर प्रस्ताव बनाते समय सरकार के मुखियाओं और अधिकारियों को देश में व्याप्त सामाजिक सच्चाई का कोई ज्ञान नहीं होता| वित्तमंत्री का कर्मचारी भविष्य निधी के 60% हिस्से पर आयकर लगाने का प्रस्ताव उस धारणा को एक बार पुन: पुष्ट करता है| आज के सामाजिक हालात की सच्चाई यह है कि एक नवजवान की आयु पढ़ाई पूरी करके किसी स्थायी प्रकृति के रोजगार में लगते लगते 35वर्ष के आसपास हो जाती है और जब उसके रोजगार से सेवानिवृत होने की आयु आयेगी/आती है तब उसके बाल बच्चे रोजगार की बात तो दूर पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाते हैं या कर पायेंगे| यह वह समय होता है जब उसके समक्ष स्वयं के लिए घर, बच्चों की पढ़ाई (उच्च शिक्षा), शादी के अलावा अन्य तरह की सामाजिक जिम्मेदारियां मुंह बाए खड़ी होती हैं या होंगी| इन सबसे निपटने के लिए उसे एकमुश्त बड़ी धनराशी की जरुरत होती है और वह पूरी तरह भविष्य निधी की अपनी जमा राशी पर ही निर्भर रहता है, जिसे वित्तमंत्री बजट प्रस्तावों के जरिये शेयर बाजार के लुटेरों के हवाले करना चाहते हैं| इस क्रूर सामाजिक सच्चाई से सैकड़ों करोड़ की दौलत रखने वाला वित्तमंत्री भिज्ञ नहीं हो सकता, समझ में आता है| पर, प्रधानमंत्री क्यों नहीं समझ रहे, यह समझ से परे है!

अरुण कान्त शुक्ला

4मार्च, 2016                                                

Friday, January 8, 2016

प्रधानमंत्री मोदी के लिए परीक्षा का समय..

प्रधानमंत्री मोदी के लिए परीक्षा का समय..

पठानकोट एयर बेस पर हुए फिदायीन हमले ने भारत-पाकिस्तान के संबंधों पर लगातार चलने वाली बहस को और गर्म तथा तेज कर दिया है| विशेषकर पाकिस्तान आर्मी से शह पाये आतंकवादी संगठनों द्वारा भारत में मचाये गए उत्पातों में शामिल लोगों और संगठनों के खिलाफ पाकिस्तान की नागरिक सरकार के द्वारा कोई कार्यावाही न कर पाने की असमर्थता के खिलाफ भारत में एक हार्डलाईनर समूह हमेशा सक्रिय रहा है, जो पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक तथा आर्थिक(व्यापारिक) संबंध रखने के खिलाफ रहा है| संसद भवन, अक्षरधाम,मुम्बई अथवा जम्मू-कश्मीर में आये दिन हो रहीं आतंकवादी घटनाएं जहाँ एक तरफ भारत के हार्डलाईनर्स को मदद पहुंचाती हैं जो युद्ध के अलावा अन्य कोई लालसा नहीं रखते तो दूसरी ओर पाकिस्तान की नागरिक सरकार को कमजोर करती हैं जिस पर उनकी सेना का अप्रत्यक्ष दबाव हमेशा रहता आया है|

दुर्भाग्य से, प्रधानमंत्री मोदी, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद संभालने के पहले दिन अर्थात शपथ ग्रहण से ही, किन्ही भी कारणों से, घरेलु मोर्चे से ज्यादा समय विदेशी मोर्चे और विदेश नीति को दिया है, अपने चुनाव के दौरान और चुनाव पूर्व के कथनों से भारत के हार्डलाईनर समूह के प्रतिनिधी माने जाते रहे हैं| आज जब वे पाकिस्तान के साथ वार्ता का कोई भी प्रयास करते हैं तो घर में उनकी तीव्र आलोचना होती है| प्रधानमंत्री पद संभालने के 20 माह के बाद भी वे घरेलू मोर्चे पर स्वयं अपनी उस अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम विरोधी छवि को मिटाकर ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली छवि को बना नहीं पाये हैं| ऐसे में पाकिस्तान के साथ बातचीत के उनके प्रत्येक प्रयास को न केवल उनकी स्वयं की पार्टी की बल्कि सियासत में उनके सहयोगियों की भी आलोचना का शिकार होना पड़ता है|

ऐसी परिस्थिति में रूस तथा अफगानिस्तान के अपने दौरे के अंत में भारत लौटते समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के निमंत्रण पर लाहोर में रुककर उन्हें जन्म दिन की बधाई तथा उपहार देने के आठवें दिन ही पठानकोट एयरबेस पर फिदायीन हमला उन्हें तथा उनकी पाकिस्तान नीति को कठघरे में खड़ा करने की नीयत से किया गया हमला लगता है| आतंकवादी, चाहे वे यूनाईटेड जिहाद काउन्सिल से हों या जैश-ऐ-मोहम्मद से या लश्करे तयबान से, अब तक हुए सभी आतंकवादी हमलों के दो मकसद हर बार स्पष्ट होकर सामने आये हैं| पहला, भारत-पाकिस्तान की नागरिक सरकारों के बीच वार्ता को बंद कराना तथा दोनों देशों के आम-लोगों के मध्य स्थापित होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों को नष्ट करना| दूसरा, भारत के बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक दोनों तरह के समुदायों में मौजूद मुठ्ठी भर कट्टरपंथियों को उकसाकर भारत के बहुधर्मीय ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सामाजिक अराजकता फैलाना|

पठानकोट के एयरबेस पर हुआ कायराना फिदायीन हमला, जिसमें हमारे सात जवानों, अधिकारियों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी, दो तरह से प्रधानमंत्री मोदी के लिए परीक्षा का समय है| पहली परीक्षा यह है कि राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री, उनकी सरकार तथा उनकी पार्टी के लिए यह स्वीकार करना कितना भी मुश्किल हो और वे इसे पूरी तरह नकार दें, पर, सामान्य से सामान्य देशवासी भी यह बता सकता है कि सरकार से और सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों, अधिकारियों से इस फिदायीन हमले का मुकाबला करने तथा उसे नाकामयाब बनाने की रणनीति बनाने तथा उसे अमल में लाने में अक्षम्य भूलें हुई हैं| ऊपर से नीचे तक सभी ने घोर अपरिपक्वता का परिचय दिया है| इसका खामियाजा फिजूल (बिना लड़े) मेस में हुईं पांच शुरुवाती मौतों के रूप उठाना पड़ा है| चाहे वह सीमा पर सीमा सुरक्षा बल की चौकसी से संबंधित गलतियाँ हों या फिर एयरबेस में इतने भारी अमले के साथ फिदायीन के घुस पाने की चूकें हों या फिर मुकाबले के लिए उपलब्ध सेना की गारद की जगह एनएसजी को लगाने की रणनीतिक भूल हो या फिर दिल्ली में बैठे मंत्रियों-अधिकारियों की मामले की गंभीरता को न समझ पाने की गलती हो, प्रधानमंत्री को सभी गलतियों को संज्ञान में लेते हुए, तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए| प्रधानमंत्री को नाराजी और असंतोष मोल लेकर भी अपने कुनबे (मंत्रीमंडल) और सलाहकारों में से उन सभी को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, जो सरकार बनने से लेकर अभी तक अपनी अपरिपक्वता और अधकचरे ज्ञान का लगातार प्रदर्शन लगातार करते आ रहे हैं|

दूसरी परीक्षा यह है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी घुसपैठ तथा उसके तुरंत बाद अफगानिस्तान में भारत के वाणिज्य दूतावास पर हुई गोलीबारी से भारत में मोदी-शरीफ मुलाकातों और पाकिस्तान के साथ रक्षा सलाहकारों व विदेश सचिव स्तर पर चल रही व होने वाली वार्ताओं पर कई कोनों से प्रश्नचिंह लगने लगे हैं| कांग्रेस का विरोधी राजनीतिक दल होने के कारण विरोध करना स्वाभाविक है किन्तु कल तक मोदी का गुणगान करने वाले चैनल, अखबार तथा स्वयं उनकी पार्टी तथा सहयोगी दलों के उनके लोग ही मुखर होकर पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार तथा किसी भी स्तर की बातचीत का विरोध कर रहे हैं, यह प्रधानमंत्री के लिए सोचनीय बिंदु है| शुक्र है कि स्वयं प्रधानमंत्री का बयान पठानकोट के बाद संयत और साधा हुआ था| 

यह निश्चित रूप से विद्वेष में आने या विद्वेष फैलाने का समय नहीं है| पठानकोट जैसे आक्रमणों के बाद पाकिस्तान से बातचीत बंद करके कुछ नतीजा नहीं निकालता, यह हम देख चुके हैं| विशेषकर तब जब हमें अंतर्राष्ट्रीय या अमरीकन दबाव में पुन:-पुन: बातचीत के लिए तैयार होना पड़ता है| बातचीत बंद करके भले ही प्रधानमंत्री को लगे कि घरेलु मोर्चे पर उनकी पार्टी को कुछ सियासी बढ़त हासिल हो रही है किन्तु भारत को इससे अपने लिए सबसे ज्यादा मुश्किलात पैदा करने वाले पड़ौसी से कोई निजात नहीं मिलने वाली|

दूसरी बात, बातचीत बंद करने से पाकिस्तान की नागरिक सरकार तथा वहां की उन सियासी पार्टियों, नागरिक समूहों, संस्कृति कर्मियों, बुद्धिजीवियों, व्यापार केन्द्रों तथा शिक्षाविदों और विद्यार्थियों के समूहों को घोर निराशा तथा अवसाद से गुजरना होगा, जो भारत के साथ अच्छे संबंध के पक्ष में लगातार वातावरण बनाने में लगे रहते हैं|

दरअसल, प्रधानमंत्री ने स्वयं की तरफ से पहल करके पाकिस्तान के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी कूटनीतिक बढ़त हासिल की है| फिदायीन पाकिस्तान की जमीन से आये हैं, इसके प्रमाण हमने पाकिस्तान को दिए हैं| उन प्रमाणों को पूरी ताकत के साथ अब अंतर्राष्ट्रीय पटल पर और विशेषकर अमेरिका के सामने भारत को रखना चाहिए| पाकिस्तान की आर्मी, जो भारत के साथ संबंधों के सामान्यीकरण के लिए पाकिस्तान की नागरिक सरकार के साथ सहमत नहीं दिखती है, से सीधी बातचीत का कोई तरीका भारत के पास नहीं है| लेकिन यह काम अमेरिका आसानी से कर सकता है| अतएव, यह समय है कि भारत अमेरिका पर दबाव बनाए कि अमरीका पाकिस्तानी आर्मी पर दबदबा कायम करके उसे आतंकवादियों की मदद करने से बाज आने के लिए कहे| इसी के साथ प्रधानमंत्री को स्वयं अपनी सरकार के मंत्रियों, सांसदों तथा अपनी पार्टी के लोगों को पाकिस्तान तथा मुस्लिमों के बारे में उलजलूल बयानबाजी करने से रोकना चाहिए ताकि घरेलु मोर्चे पर उन्हें अबाध समर्थन इस मुद्दे पर मिले|

पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद करने का मतलब, विशेषकर जब स्वयं शरीफ ने फोन पर प्रधानमंत्री से बात करके सद्भावना प्रदर्शित की है, केवल पाकी फ़ौज-आईएसआई-जिहादी गठजोड़ को ताकत पहुंचाना हो जाएगा| अब यह स्वयं प्रधानमंत्री मोदी पर है कि वह स्वयं के चुनाव प्रचार के दौरान और बहुत पहले से निर्मित घेरे से बाहर आकर, अपनी स्वयं की पाकिस्तान नीति पर कायम रहते हैं या घरेलु कट्टरपंथियों के सामने समर्पण करते हैं|

अरुण कान्त शुक्ला
8 जनवरी, 2016                                
                   

Wednesday, December 23, 2015

वकील साहब आपको किकेट के कीचड़ में कौन सा कमल दिख रहा था, जिसे तोड़ने आप कीचड़ में उतरे?

केजरीवाल हो या कीर्ति उन्होंने जेटली पर पैसा लेने का आरोप लगाया भी नहीं है..एक भी पैसा तो मनमोहनसिंह ने भी नहीं लिया था | सवाल तो अंधत्व का है याने अंधा बांटे रेवड़ी अंधों को बीन बीन..| यह काम याने 'अंधों को बीन बीन' तो मनमोहन ने भी नहीं किया था | सबसे बड़ा सवाल यह है कि वकील साहब आपको किकेट के कीचड़ में कौन सा कमल दिख रहा था, जिसे तोड़ने आप कीचड़ में उतरे? क्रिकेट से जुड़ा हर व्यक्ति प्रबंधक, मीडिया, क्रिकेटसंघ, खिलाड़ी, निकृष्ट दर्जे के भ्रष्ट होते हैं हर तरह से ..बहुआयामी भ्रष्ट..आप कैसे इमानदार हो सकते हैं..? अब तो गिल साहब ने भी मोर्चा खोल दिया है| किस किस को अदालत में घसीटेंगे? अपनी गोल गोल आँखों को गोल गोल घुमाते हुए, हिन्दी को अंगरेजी स्टाईल में हर शब्द को चबा चबा कर बोलते हुए आप ही तो बमुश्किल डेढ़ बरस पहले हमें बताया करते थे कि भ्रष्टाचार का मतलब केवल खुद खाना नहीं है बल्कि खाने वालों की तरफ से धृतराष्ट्र बन जाना भी भ्रष्टाचार ही है| अब खुद को पाक साफ बताना किस मुंह से? वैसे मोदी जी की सलाह मन लीजीये और इस्तीफा देकर पूरी तरह अदालत में भिड़ जाईये, आपको ऐसे मामले जीतने का खासा अनुभव है और पाक-साफ़ होकर लौटियेगा, आडवानी जी की तरह, जिनको आपने कौने में बिठा दिया है| वैसे अदालत से साफ़ घोषित होने के बाद भी आप साफ़ रहेंगे, पाक तो हम नहीं मानेंगे| आपको क्या क्रिकेट से जुड़े किसी भी व्यक्ति को हम पाक नहीं मानते| राजनीतिज्ञ हो तो राजनीति करो| ये क्या, राजनीति भी करेंगे, क्रिकेट भी करेंगे, हॉकी भी करेंगे, वकालत भी करेंगे, क्यों? एक सरकारी कर्मचारी तो बिचारा आपसे कितना कम पाता है पर दूसरा काम नहीं कर सकता, और राजनेता सब जगह मुंह मारेंगे| मैं बताऊं, यही भ्रष्टाचार है| जहां तक बेईमानी का सवाल है, अनेक बार बेईमानी अदालतों में क्या कहीं भी साबित नहीं हो सकती पर इसका मतलब ईमानदार होना नहीं है| वैसे भी आपने आज तक कौन सा जनता के फायदे का मुकदमा लड़ा और जीता है| भ्रष्ट कंपनियों. गलत लोगों को बचाकर ही लोग बड़े वकील बनते हैं| यह उस ज्ञान का दुरुपयोग है जो वकील जनता के पैसे से प्राप्त करता है| गिरेबां में झांकेंगे तो आपका अपना दिल स्वयं को गलत हो..गलत हो..बोलेगा| वैसे भी आदमी को खुद के बचाव के लिए दूसरे को दोषी बोलना पड़े तो समझ लेना चाहिए कि उसकी पोल खुल गयी है|

अरुण कान्त शुक्ला
23/12/2015


Friday, October 23, 2015

प्रधानमंत्री केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री व्ही के सिंह को तुरंत बर्खास्त करें-

      प्रदेश के साहित्यकारों और सामाजिक कार्यों से जुड़े लोगों ने की मांग-

प्रदेश के साहित्य और सामाजिक कार्यों से जुड़े 19 से अधिक लोगों ने केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री व्ही के सिंह के गुरूवार को दिए गए उस बयान की घोर भर्त्सना की है, जिसमें केंद्रीय राज्यमंत्री ने हरियाणा के सुनपेड़ गाँव में दलितों को ज़िंदा जलाने की घटना का हवाला देते हुए दलितों की ह्त्या की तुलना कुत्तों को पत्थर मारने से की है| ज्ञातव्य है कि सुनपेड़ में दलितों के एक पूरे परिवार को ज़िंदा जलाकर मारने की साजिश भरी कोशिश में दलित परिवार के दो मासूम बच्चे ज़िंदा जल गए थे| इस घटना ने जहां पूरे देश के बुद्धिजीवियों तथा विचारशील लोगों के मानस को झकझोरा तो दूसरी ओर केंद्रीय राज्यमंत्री ने यह कहकर कि कोई कहीं कुत्ते को पत्थर मारे तो सरकार जिम्मेदार नहीं हो सकती है, देश के बुद्धिजीवियों, संवेदनशील लोगों तथा पूरे दलित समुदाय के लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं पर कठोर आघात किया है| सर्व/श्री प्रभाकर चौबे, ललित सुरजन, एडवोकेट एम बी चौरपगार, नथमल शर्मा, वेदप्रकाश, विनोद शंकर शुक्ल, तेजिंदर गगन, लोकबाबू, सत्यभामा अवस्थी, एडवोकेट निरुपमा बाजपेई, संजय शर्मा(शाम), संतोष ढांढी, अरुण कान्त शुक्ला, जीवेश प्रभाकर, डी के चटर्जी, उमाप्रकाश ओझा, रियाज़ अम्बर, बी रविकुमार, तेजिंदर सिंह जग्गी ने बयान जारी करते हुए प्रधानमंत्री से मांग की है कि ऐसी सामंती सोच रखने वाले मंत्री को प्रधानमंत्री केन्द्रिय मंत्रीमंडल से तुरंत बर्खास्त करें| सभी ने विदेश राज्यमंत्री के इस कथन की भी घोर निंदा की है, जिसमें राज्यमंत्री ने पत्रकारों द्वारा मामले की रिपोर्टिंग करने पर नाराजी जताते हुए पत्रकारों को आगरा में भरती होने के लिए कहा है| प्रदेश के इन जाने माने वरिष्ठ साहित्यकारों और सामाजिक कार्यों से जुड़े लोगों ने कहा है कि एक केंद्रीय मंत्री का इस तरह का बयान और कथन देश की प्रतिष्ठता  और स्वाभिमान पर तमाचा है, इसके लिए प्रधानमंत्री को देश से माफी मांगना चाहिए|
                                                   
   रायपुर: 23 अक्टोबर, 2015                 अरुण कान्त शुक्ला

                                 (उपरोक्त उल्लेखित व्यक्तियों की ओर से) 

Monday, August 31, 2015

मेहनतकश का जबाब है 2 सितम्बर की हड़ताल





    
 
सत्ता संभालने के साथ ही श्रम सुधारों को लागू करने की जो कवायद, हड़बड़ी एनडीए की सरकार ने दिखाई, उसकी हिम्मत तो सुधारों के पितामह मनमोहनसिंह भी नहीं कर पाए थे| सरकार बनने के दो महीने बाद ही, 30 जुलाई को मोदी कैबिनेट ने फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट 1948, अप्रेंटिसेज़ एक्ट 1961 और लेबर लॉज़ एक्ट 1988 जैसे श्रम क़ानूनों में कुल 54 संशोधन पास किए| यह सर्वविदित और स्थापित सत्य है कि मजदूरों के अधिकारों और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जितने भी क़ानून/कायदे गुलाम/आजाद भारत में बनाये गए, उनका पूरा क्या आंशिक लाभ भी देश के मेहनतकश के अधिकाँश हिस्से को नहीं मिला| इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो सार्वजनिक/सरकारी क्षेत्र के उद्योगों से लेकर निजी क्षेत्र के उद्योगों में ठेके/आकस्मिक आधार पर रखे गए मजदूरों और कर्मचारियों की लगातार बढ़ती संख्या ही है| जहां न छुट्टियां हैं, न भविष्यनिधी है, न स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, नौकरी की गारंटी तो है ही नहीं|  

संगठित क्षेत्र के कुछ मजदूर/कर्मचारी अवश्य उन कानूनों को अपनी संगठित शक्ति के अनुसार अपनी ओर मोड़ने में सफल हुए, पर अधिकाँश समय उन्हें भी कोर्ट/कचहरी के चक्कर लगाते रहना पड़ा और अधिकाँश मामलों में ऐसे सभी कानूनों को बदल दिया गया, जिनसे वे लाभ प्राप्त करने के योग्य हुए थे| पर, एक साथ इतना बड़ा आक्रमण भारत के मेहनतकश समुदाय के उपर कभी नहीं हुआ, जो दो दशक के बाद बहुमत से चुनी गयी एनडीए की सरकार ने किया है| यही कारण है कि स्वयं को देश का सबसे बड़ा मजदूर बताने वाले प्रधानमंत्री आज देश के मेहनतकश के निशाने पर हैं| यहाँ तक कि जब 26 मई को दिल्ली में हुए कामगारों के राष्ट्रीय सम्मलेन में देश की 11 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और बैक, बीमा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, रेलवे, रक्षा, टेलीकॉम और अन्य संस्थानों के कर्मचारियों के संगठनों ने 2 सितम्बर की हड़ताल का निर्णय लिया तो उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से संबद्ध केन्द्रीय युनियन भारतीय मजदूर संघ भी भी शामिल थी| राष्ट्रीय सम्मलेन के तुरंत बाद पत्रकारों के सवालों के जबाब में भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) के उपाध्यक्ष वृजेश उपाध्याय ने कहा था कि  ''पूर्व की सरकारों की नीति को ही मोदी सरकार ने आगे बढ़ाया है और हम इसकी हर तरह से मुख़ालफ़त करेंगे|” इतना ही नहीं वृजेश उपाध्याय ने सम्मलेन को संबोधित भी किया था| आज भले ही सरकार और संघ के दबाव में बीएमएस ने स्वयं को हड़ताल से अलग कर लिया हो, पर यह निश्चित है कि मोदी सरकार के श्रम सुधारों के जहर को बीएमएस उससे जुड़े मजदूरों के गले तो नहीं ही उतार पायेगी और वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 2 सितम्बर की हड़ताल के समर्थन में ही रहेंगे|

46वें श्रम सम्मलेन के उदघाटन भाषण में प्रधानमंत्री ने मालिक-मजदूरों के बीच परिवार भाव पैदा करने की बात करते हुए कहा था “....एक श्रमिक का दुःख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फेक्ट्री का कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता|” पर, उन्होंने स्वयं अपनी सरकार की पारी की शुरुवात परिवार भाव से नहीं करके श्रमिकों पर हमले के साथ की थी| सरकार जिन तीन श्रम कानूनों को पारित कराना चाहती थी, उनमें से 2 को वह शीतकालीन सत्र में पारित करवा चुकी है, वे हैं फेक्ट्रीज़ संशोधन बिल 2014 और अपरेंटिसेज़ संशोधन बिल 2014| फेक्ट्रीज़ संशोधन बिल 2014 के अनुसार फ़ैक्ट्रियों में कर्मचारियों की संख्या को बढ़ाने का पूरा अधिकार राज्यों को दिया गया है| इससे पहले यह अधिकार केंद्र के पास था|  काम के घंटे को नौ से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया है| पहले काम की अवधि आठ घंटे थी और एक घंटा का ब्रेक था| अब कंपनियां 12 घंटे में सुविधानुसार आठ घंटे काम ले सकेंगी|  ओवरटाइम को बढ़ा कर प्रति तिमाही 100 घंटे कर दिया गया है| कुछ मामलों में इसे 125 घंटे तक बढ़ा दिया गया है| पहले यह अधिकतम 50 घंटे था|  औद्योगिक विवाद मामले में केस दर्ज करने का अधिकार राज्य सरकार को दे दिया गया है| पहले यह अधिकार लेबर इंस्पेक्टर के पास था|

अपरेंटिसेज़ संशोधन बिल 2014 के अनुसार, कारखानों में अधिक से अधिक प्रशिक्षु श्रमिक रखे जा सकेंगे जिन्हें न्यूनतम वेतन से 30 प्रतिशत कम वेतन मिलेगा और तमाम श्रम क़ानूनों के दायरे में वे नहीं आएंगे|  हालांकि, सरकार का (हास्यास्पद) तर्क है कि इससे ग़ैर इंजीनियरिंग क्षेत्र के स्नातकों और डिप्लोमा होल्डरों के लिए उद्योगों में नौकरी की संभावनाएं खुल जाएंगी| कंपनियां पहले की अपेक्षा अधिक से अधिक प्रशिक्षु कर्मचारी रख सकेंगी| पहले वे कुछ निश्चित प्रतिशत में ही प्रशिक्षु कर्मचारी रख सकती थीं|  प्रशिक्षण कार्यक्रमों को पूरी तरह आउटसोर्स करने की अनुमति दी गई है| पहले यह फ़ैक्ट्री की ज़िम्मेदारी थी|  प्रशिक्षु रखने के लिए पांच सौ नए ट्रेड को खोल दिए गए हैं|  प्रशिक्षु कर्मचारियों को दिए जाने वाले स्टाइपेंड का पचास प्रतिशत हिस्सा सरकार देगी, जबकि पहले पूरी ज़िम्मेदारी फ़ैक्ट्री की थी|

वर्तमान में सरकार का मंथन वेतन अधिनियम को संशोधित करने पर चल रहा है| यदि यह भी संसद से पारित होता है तो न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948, सामान वेतन अधिनियम 1976, वेतन भुगतान क़ानून 1936, बोनस एक्ट 1965 में ऐसे बदलाव सामने आयेंगे, जो एक ही उद्योग में एक समान कार्य करने वालों के बीच भी भेदभाव पैदा करेंगे| न्यूनतम वेतन तय करने का अधिकार राज्य के पास चला जाएगा| श्रम मामलों के इतिहासकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर प्रभु महापात्रा के अनुसार यदि ये बिल पास होते हैं तो ‘हायर एंड फॉयर’ की नीति क़ानूनी हो जाएगी और महिलाओं से नाइट शिफ्ट में भी काम लिया जा सकेगा|''

आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार भी वही कर रही है, जो देश का श्रमिक नवउदारवाद के पिछले 25 वर्षों में देखता आया है| भारत निर्माण, चमकता भारत, विकास पथ पर अग्रसित भारत, ढांचागत सुधार, रोजगार मिलेगा, विदेशी निवेश लाना है, जैसे नारों/वायदों की आड़ में श्रमिक/श्रम के उपर हमले और मालिकों को रियायतें, लूट की छूट, तभी तो इस बजट में पूंजीपति घरानों को 5 लाख करोड़ रूपये की भारी छूट दी गयी है और जान न्यौछावर करने वाले सेना के जवान जंतर-मंतर पर बैठे हैं| 2 सितम्बर की हड़ताल मेहनतकश के उपर सरकार के हमलों का जबाब है|

अरुण कान्त शुक्ला , 1 सितम्बर, 2015