Monday, April 27, 2015

‘मैं तुम लोगों की शिकायत भगवान से करूंगा’


‘मैं तुम लोगों की शिकायत भगवान से करूंगा’



बम से घायल सिर्फ साढ़े तीन साल के सीरियन बच्चे की अंतिम कराह.. 


हम अभी नेपाल में आये भूकंप की त्रासदी से गुजर रहे हैं| मृतकों में जैसी कि सूचनाएं 
आई हैं वृद्धों और बच्चों की संख्या अधिक है| भूकंप एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जिसके बारे में विज्ञान की सारी प्रगति के बावजूद कोइ पूर्वानुमान लगाना या कोई भविष्यवाणी करना वैज्ञानिकों के लिए अभी तक संभव नहीं हो पाया है| पर, युद्ध एक ऐसी आपदा है, जो न केवल मानव जनित है बल्कि दुनिया के कुछ लोभी, क्रूर, स्वार्थी मनुष्यों की निकृष्ट सोच और अभिलाषाओं का क्रूरतम प्रदर्शन है| प्राकृतिक आपदाएं अपने रास्ते में आने/पड़ने वाले किसी भी अवरोध को चाहे वह जीव हो या निर्जीव हो नहीं बख्शती हैं पर वे प्राकृतिक हैं और मानव जिन प्राकृतिक आपदाओं से बच सकता है, उनसे बच निकलने की पूरी कोशिश करता है और बच भी जाता है| पर, युद्ध में ऐसा नहीं होता क्योंकि युद्ध में जीतने के लिए मानव निर्देशित विध्वंसकारी शक्ति जानते बूझते निरीह, निरपराध और भोले नागरिकों को अपना निशाना बनाती है|




उन्हें या किसी को भी मेरी यह बात पसंद आये न आये, पर यही सच है कि जिन्हें हम मानवता के पोषण, समृद्धता और विकास के लिए अपना रक्षक बनाकर दुनिया में काबिज इस लोकतंत्र के सिंहासन पर बिठाते हैं, उन्हें अपने स्वार्थों, मुनाफों, अहं के विवादों/झगड़ों को साधारण नागरिकों का रक्त बहाकर या उनकी जानें लेकर सुलझाने का अधिकार कभी नहीं देते| दुनिया के किसी भी शासक को, जिसने पूर्व में भी कभी या आज भी युद्ध की भाषा बोल रहा है, युद्ध करना तो दूर की बात, ऐसी भाषा को बोलने के लिए भी अपना लोकतांत्रिक मत जनता ने न कभी दिया होगा, न दिया है और न आगे कभी मिलेगा|



 



ऊपर आप जिस चित्र को देख रहे हैं, वह बम से घायल एक साढ़े तीन वर्षीय सीरियन बच्चे का है, जिसे एक रशियन वेब साईट पर रिचर्ड एड्मोंद्सों ने पोस्ट किया था| नीचे उन्हीं का कथन है  जिसका अंगरेजी में अनुवाद नीना सिदोरवा ने किया है|







बच्चे को अनेक आतंरिक चोटें लगी हैं, जिसके कारण शरीर के अन्दर खून का रिसाव हुआ| डाक्टरों ने बच्चे के चूर चूर हो चुके शरीर को बचाने के अथक प्रयास किये| कितु दुर्भाग्य से चोटें और घाव ज्यादा गंभीर थे और डाक्टरों के प्रयास उनके सामने असफल हुए| अस्पताल के अन्दर बच्चे को यह महसूस हो गया कि अब वह ज़िंदा नहीं रहेगा| मृत्यु शैय्या पर लेटे उस बच्चे ने जो कुछ कहा, उस कथन ने न केवल अस्पताल के स्टाफ को स्तब्ध किया, बल्कि बाहर आने के बाद उसका कथन पूरी दुनिया को झंझोड़ रहा है..







आंसुओं से भरी आँखों और चोटों की असहनीय वेदना से पीड़ित चेहरा लिए उस बच्चे ने कहा,







“मैं तुम लोगों की शिकायत भगवान से करूंगा, मैं उसे सब कुछ बताउंगा!”







अरुण कान्त शुक्ला



27अप्रैल, 2015           




          


Saturday, April 4, 2015

वास्तविक ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ एक बड़ा सवाल..




पिछले सप्ताह मंगलवार को शीर्ष न्यायालय द्वारा आई टी की धारा 66A को समाप्त किये जाने के बाद देश के मीडिया, प्रबुद्ध लोगों और विशेषकर फेसबुक, ट्वीटर, ब्लाग्स जैसे सोशल साईट्स  पर जुड़े लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई| यह स्वाभाविक भी था| समाज में जब जटिलताएं इतनी बढ़ गईं हों की कुछ ताकतें न केवल राज्य सत्ता से समाज में रहने वालों को नियंत्रित करने की स्थिति में हों बल्कि राज्य सत्ता से भी स्वतन्त्र होकर वे सभी तबकों को क्या खायेंगे, क्या पहनेंगे, क्या बोलेंगे, क्या देखेंगे, क्या सोचेंगे, क्या पढेंगे, कैसा आचरण करेंगे, किस धर्म का पालन करेंगे याने देशवासियों के जीवन के प्रत्येक पहलू को देश के क़ानून और संविधान को धता बताकर नियंत्रित करने की चेष्टा में हों और राज्य सत्ता निर्विकार, मूक होकर उन्हें संरक्षण, सुरक्षा, सहायता प्रदान कर रही हो तब शीर्ष न्यायालय का सामान्य नागरिकों को ‘अपना गुबार’ बाहर निकाल देने का अधिकार बहाल करना भी एक बड़ी खुशी का कारण बनना अचंभित करने वाली बात नहीं है| तब इस खुशी में किसे याद रहता है कि इसी मसले के साथ जुड़े दो मामलों में न्यायालय ने यथास्थिति कायम रखी है और आईटी क़ानून की धारा 69A  तथा 79 को कायम रखा है| 69A को कायम रखने का मतलब है सरकार हमारे निजी संचार, संवाद को निरीक्षण में डाल सकती है, पढ़ सकती है, अवरोधित कर सकती है और वेबसाईट को ब्लॉक कर सकती है| धारा 79 गूगल जैसे मध्यस्थों पर आपत्तिजनक ( इसकी परिभाषा इतनी व्यापक है कि आपका प्रत्येक विचार, कमेन्ट इसकी परिधि में आ सकता है) सामग्री नहीं अपलोड होने की जिम्मेदारी डालती है| एक जानकारी के अनुसार वर्ष 2014 में ही फेसबुक ने लगभग 10 हजार से उपर के लेखों को प्रकाशित होने से रोका था| तब इस खुशी में किसे यह याद रहता है कि राजद्रोह और ईशनिंदा जैसे क़ानून इक्कीसवीं सदी में भारत को ले जाने वालों के राज में, इस डिज़िटल बनते भारत में, डिज़िटल  भारत बनाने वालों के राज में जैसे के तैसे मौजूद हैं और वे कभी किसी अग्निवेश को या कभी किसी विनायक सेन को वर्षों तक जेल की चक्की पीसने के लिए मजबूर कर सकते हैं| फिर, अग्निवेश या विनायक सेन ही क्यों, सोनी सोरेन या अभी हाल में छूटी हिड्मे या बस्तर के जेलों में राजद्रोह के मामले में बंद सैकड़ों आदिवासी भी हो सकते हैं, जो न राज भक्ति का मतलब समझते हैं और न राजद्रोह का मतलब समझते हैं| उनके लिए तो उनकी रोटी और मकान, उनका जंगल और उनकी स्वतंत्रता ही सब कुछ है|

जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा है, समाज में जब जटिलताएं इतनी बढ़ गईं हों की कुछ ताकतें न केवल राज्य सत्ता से समाज में रहने वालों को नियंत्रित करने की स्थिति में हों बल्कि राज्य सत्ता से भी स्वतन्त्र होकर वे सभी तबकों को क्या खायेंगे, क्या पहनेंगे, क्या बोलेंगे, क्या देखेंगे, क्या सोचेंगे, क्या पढेंगे, कैसा आचरण करेंगे, किस धर्म का पालन करेंगे याने देशवासियों के जीवन के प्रत्येक पहलू को देश के क़ानून और संविधान को धता बताकर नियंत्रित करने की चेष्टा में हों और राज्य सत्ता निर्विकार, मूक होकर उन्हें संरक्षण, सुरक्षा, सहायता प्रदान कर रही हो तब शीर्ष न्यायालय का सामान्य नागरिकों को ‘अपना गुबार’ बाहर निकाल देने का अधिकार बहाल करना भी एक बड़ी खुशी का कारण बनना अचंभित करने वाली बात नहीं है| यह आज की बात नहीं है| हमारे देश में जो लोकतंत्र आज है, उसकी स्थापना तब हुई थी जब देश में ब्रिटिश शासन था और तभी जमींदारी, सामंती और साम्प्रदायिक ताकतों के साथ राज करने के लिए घालमेल किया गया| समाज पर अंकुश लगाने का सबसे अधिक आसान तरीका यही है कि समाज को धर्म, जाती, भाषा के आधार पर विभाजित रखो| आर्थिक विभाजन तो समाज के अन्दर एकता पैदा कर सकता है| यह दुनिया के अनेक कोने में आई समाजवादी क्रान्ति से हमारे ब्रिटिश शासकों ने ही नहीं सीखा, ये स्वतंत्रता के पश्चात आये देशी शासकों ने भी सीखा और इसीलिये आर्थिक विषमता को मिटाने की कोशिशें केवल आंसू पोछने तक ही सीमित रहीं| लोकतंत्र के जिस स्वरूप को आज हम फ्रांस, ब्रिटेन या अमेरिका में देखते हैं, वह भारत में नहीं है| भारत कहने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है किन्तु सही मायने में कहा जाए तो यह दलीय लोकतंत्र है| जिस राजनीतिक दल की सरकार है, चाहे वह केंद्र हो या राज्य, उसका अपनी विचारधारा के आधार पर अपना लोकतंत्र है, जो वे चुनाव में सफलता प्राप्त करने के बाद देश में लागू करने में जुट जाते हैं| इसीलिये ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का दायरा, अधिकार और कारक अलग अलग शासनों में भिन्न भिन्न रूप में हमारे सामने आते हैं| संविधान, क़ानून कितने ही अधिकार हमें क्यों न दे किन्तु यदि शासन पर राजा-प्रजा के संबंधों की छाया है तो लोकतांत्रिक अधिकार नागरिकों को केवल न्यायालय से अनुग्रहित होकर नहीं मिल जाते|

मुझे, यदि इसके लिए कुछ उदाहरण भी देने हैं तो मुझे अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है| कम से कम, पांच उदाहरण तो मैं अपने अनुभव से ही दे सकता हूँ| पाँचों उदाहरण यहीं रायपुर शहर से हैं, जो आज छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी है| पहला उदाहरण तब का है, जब राजीव गांधी, इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद तीन चौथाई बहुमत के साथ सत्ता में आये थे और कुछ समय के बाद ही उनका शासन अधिनायकत्व में बदलने लगा था| भ्रष्टाचार के आरोप से वे घिरने लगे थे और बोफोर्स तथा पनडुब्बी काण्ड सतह पर आ गए थे| तब जीवन बीमा के पंडरी स्थित कार्यालय में बीमा कर्मचारियों की मंडलीय युनियन के एक सक्रिय कार्यकर्ता और पदाधिकारी ने एक कार्टून बनाकर युनियन के नोटिस बोर्ड पर लगाया था| राजीव गांधी का दबदबा तब अपने चरम पर था| किसी तरह, शायद बीमा के इन्टुक के कतिपय समर्थकों ने यह खबर युवा कांग्रेस और प्रशासन तक पहुंचाई| उसी दिन रात्री में पोलिस प्रशासन ने पहले मुझे, क्योंकि मैं संगठन का सहसचिव था, आधी रात में घर से उठाकर पंडरी कार्यालय ले आये और उस पोस्टर को हटाने के लिए दबाव बनाने लगे| रात्री दो बजे तक जब वे अपने प्रयास में सफल नहीं हुए तो टिकरापारा से संगठन के सचिव बी सान्याल को रात्री ढाई बजे घर से उठा कर लाये और अंतत: धमकी दिए की आपको गिरफ्तार कर लिया जाएगा| हमारा स्पष्ट कहना था की यह केवल एक कार्टून है और इसे हटाने के लिए दबाव डालना या गिरफ्तार करना हमारी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है| खैर, किसी तरह सुबह पांच बजे हमें घर जाने दिया गया| मगर, दूसरे दिन जो हुआ, वह किसी भी न्यायालय और क़ानून से परे अभिव्यक्ति की आजादी पर किया गया हमला था| युवा कांग्रेस के शहर अध्यक्ष के नेतृत्व में करीब 200 लोगों का एक झुण्ड पोलिस प्रशासन की देख-रेख में बीमा कार्यालय पहुंचा और मेरे व कार्यालय के चौकीदार ( जो उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक रहा था) की पिटाई करने के बाद युनियन के नोटिस बोर्ड को तोड़कर उस कार्टून को निकाल कर ले गया| इस पूरे दरम्यान, कहने की जरुरत नहीं की पोलिस प्रशासन ने उन हुड़दंगियों को पूरा संरक्षण दिया| रायपुर ही नहीं, प्रदेश और देश के ट्रेड युनियन आन्दोलन ने इस घटना को गंभीरता पूर्वक लिया और इसके खिलाफ रायपुर में 10 हजार से अधिक कर्मचारियों और मजदूरों ने जुलुस निकालकर अपना प्रतिरोध दर्ज किया|           

दूसरा उदाहरण बाबरी मस्जिद के विध्वंस से जुड़ा है| बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद सभी राजनीतिक दलों ने, भाजपा को छोड़कर, दूसरे दिन भारत बंद के तहत रेली निकालने का कार्यक्रम हाथ में लिया| उन दिनों मैं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का राज्य समिति सदस्य था| अन्य अनेक लोगों के साथ, जिनमें वामपंथ के जाने माने जुझारू नेता सुधीर मुखर्जी भी थे, हम शहर के मध्य स्थित शारदा चौक पहुंचे| अचानक, वहां कुछ लोग आये और मुझे कटुओं  का दलाल कहते, माँ, बहन की गाली देते हुए मारना शुरू कर दिया| मुझसे कुछ आगे सीपीएम जिला समिति के सदस्य बी सान्याल जा रहे थे| यह देखकर, वे पीछे आये और मुझे बचाने की कोशिश की, जिसमें उन्हें आँख के पास हल्की चोट आई और चश्मा भी टूट गया| मारने वाले सभी शिवसेना के लोग थे| तीसरी घटना इसके तुरंत बाद की है| कुछ लोगों का एक जत्था, जो निश्चित ही शिवसेना का था, जिस क्षेत्र में मैं रहता हूँ, एक ईंट या एक रुपया माँगने निकला| मैंने मना कर दिया तो लगभग तीन माह तक कार्यालय या कहीं भी आते जाते मुझे न केवल धमकाया गया बल्कि मेरे घर पर फोन करके मेरी पत्नी और बच्चों के भी धमकाया गया| आज भी आप पूछेंगे तो मैं उनको धन्यवाद दूंगा कि केवल धमकाया, कोई नुकसान नहीं पहुंचाया, शायद इसलिए कि सरकार उनकी नहीं थी, वे केवल उभार पर थे| यदि सरकार उनकी होती तो ग्राहम स्टेन के समान वो मुझे और मेरे बच्चों को जलाकर राख भी कर सकते थे|

चौथी घटना तब की है, जब देश में अटल जी की सरकार थी| अचानक एक दिन मुझे पता चला कि कार्यालय में प्रबंधन की तरफ से सरस्वती पूजा की जा रही है| शायद जैसा देश, वैसा भेष, जो नौकरशाहों की प्रवृति होती है, उसी अनुरूप यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था| क्योंकि, न तो उसके पहले या कभी मेरे नौकरी में रहते, उसके बाद इस पूजा का आयोजन कभी कार्यालय में किया गया| खैर पूजा शुरू हुर्र और कमोबेश वहां उपस्थित सभी अधिकारियों ने सरस्वती की फोटो पर माला चड़ाई और पूजा की, जब बारी एक मुस्लिम अधिकारी की आई तो उन्होंने माला चढ़ाने के पहले जूते उतारे और फिर माला चढ़ाई| जब मेरे बोलने की बारी आई तो मैंने सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान में इस तरह की पूजा का विरोध किया| बस क्या था दूसरे दिन शिवसेना का कार्यालय पर धावा हो गया और न केवल मंडल प्रबंधक का घिराव हुआ, मुझे भी ढूंढकर मारने की कोशिश भी हुई| शहर में कई दिन तक मेरे पुतले जलाए गए और एक दिन कार्यालय पर हमले के लिए जुलुस की शक्ल में भारी संख्या में लोग आये| अंतत: प्रबंधन ने न जाने क्या समझौता करके उस मामले को निपटाया| मेरे कई बार पूछने के बाद भी मुझे क्या समझौता हुआ नहीं बताया गया| पर, उसके बाद कभी ऐसी कोई पूजा प्रबंधन की तरफ से कभी नहीं आयोजित की गयी| हाँ, हमारे मशीन विभाग के साथी पहले भी खुद होकर विश्वकर्मा पूजा करते थे और शायद आज भी करते होंगे, जिसमें प्रबंधन का कोई रोल नहीं होता है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क़ानून और शासन से इतर राजनीतिक और साम्प्रदायिक शक्तियाँ किस तरह हमला करती हैं, इसका पांचवां और अंतिम उदाहरण रविन्द्र मंच में आयोजित वह सभा है, जिसमें वृंदा कारात मुख्य अतिथि के रूप में आईं थीं| इसके कुछ माह पूर्व ही बाबा रामदेव के कारखानों में श्रमिकों के शोषण का मामला वृंदा कारात ने उजागर किया था, जिसके साथ रामदेव के उत्पादों में जानवरों की हड्डियों का प्रयोग होता है, ऐसा आरोप वहां के श्रमिको ने लगाया था| सभा शुरू होते ही वहां शिवसेना के हुड़दंगियों का एक जत्था पहुंचा और वृंदा कारात को काले झंडे दिखाने के साथ साथ उपस्थित लोगों के साथ मारपीट करने लगा| पोलिस ने उन्हें भगाया तो जरुर, किन्तु पहले हुड़दंग कर लेने के बाद| याने, न्यायालय, प्रशासन और राजसत्ता से परे की ताकतें हमारे अभिव्यक्ति के अधिकार को नियंत्रित करने में राज सत्ता से भी आगे हैं| आप चाहें तो इसमें पूने में इंजिनियर की ह्त्या, डॉ. नरेंद्र धाबोलकर तथा कामरेड गोविन्द पंसारे की हत्याओं के मामले भी जोड़ सकते हैं|

स्वतन्त्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी भी निरपेक्ष नहीं रही और न ही निरपेक्ष रूप से लोगों को प्राप्त हुई है| लोकतांत्रिक ढाँचे और मूल्यों के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा रिश्ता है| पहले भी और आज भी अकसर यह कहा जाता है की लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं| विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया और अब सोशल साईट्स को पांचवे स्तंभ के रूप में पेश करने की कोशिशें हो रही हैं| एक सरासर झूठ को बचपन से लेकर बड़े होने तक लोगों के गले में उतारने की कोशिश के सिवा यह कुछ और नहीं है| लोकतंत्र का आधार है, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा (बंधुत्व)| ये आधार कहाँ हैं? एक समय था, जब आप उस समय के मद्रास में हिन्दी नहीं बोल सकते थे| आज भी मुंबई में आप बंबई या बाम्बे नहीं बोल सकते हैं| एम एफ हुसैन को इतनी धमकी मिलती हैं कि उन्हें देश छोड़ना पड़ता है| अग्निवेश को धमकी दी है की बस्तर आओगे तो जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है| विजातीय पुरी के मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते| इंदिरा गांधी का पुरी के मंदिर में प्रवेश निषेध था| उदारवाद के दौर में किसानों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को दी जा रही है जहां वे सेज बनायेंगे, उनकी अपनी पोलिस होगी, क़ानून होगा, नियम होंगे और जहां सामान्य लोगों का प्रवेश वर्जित होगा| यही हाल समानता का है| देश के लगभग प्रत्येक शहर में शहर से अलग हटकर नगर-विहार केवल निजी बिल्डर नहीं सरकारी संस्थाएं भी बना रही हैं, जहां किसानों से कौड़ियों के मोल ली गई जमीनों पर करोड़ों की लागत वाले भवन बन रहे हैं और शहर का रईस तबका उन नगरों-विहारों में बस रहा है| याने, सामंती ढाँचे का पुनर्निर्माण जहां अमीर-उमराव राजा के साथ किले में रहेंगे और श्रमिक-दलित-गरीब जनता किले से बाहर| यही हाल भाईचारे का है, धार्मिक, जातीय भेदभाव पर बात करना तो ऐसा हो गया है, जैसे बहुत छोटी बात है| अब तो यह है कि हिन्दू तत्ववादी ताकतें यह कहने से नहीं चूक रहीं कि कोई भी देशवासी किसी भी धर्म का अनुयायी हो या किसी भी सम्प्रदाय या जाती का हो, है वह हिन्दू ही| साध्वी निरंजना तो एक कदम आगे हाकर एक नया भेद खड़ा कर रही हैं की जो भाजपा के हैं वे सब रामजादे हैं और जो भाजपा का नहीं है, वह हरामजादा है| मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि लोकतंत्र दुनिया में जिन आधारों पर आया था, भारत में वे स्वतंत्रता के बाद से लगातार कमजोर पड़ते गए हैं|

अमेरिकन शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश स्व.रॉबर्ट जेक्सन ने कहा था कि “विचारों पर नियंत्रण अधिनायकत्व का प्रतीक है, और हम (अमेरिका) यह दावा नहीं करते हैं| यह हमारी सरकार का काम नहीं है कि वह नागरिकों को गलतियों में पड़ने से रोके, यह नागरिकों का कार्य है की वह सरकार को गलतियों में पड़ने से रोकें|” पर, भारत में राजनीतज्ञों का वह वर्ग तैयार हो गया है जो उन्हें गलत बताने वाले का मुंह किसी भी तरह बंद करने को उतावला है| लोकतंत्र उसके लिए केवल राजा चुने जाने का रास्ता है और अभिव्यक्ति विशेषकर उसके खिलाफ उसे कतई मंजूर नहीं है| जब तक देश में लोकतंत्र के सही आधार स्वतंत्रता-समानता और भाईचारा मजबूत नहीं होंगे, अभिव्यक्ति का अधिकार हमेशा संकट में ही रहेगा|  

अरुण कान्त शुक्ला
1 अप्रैल, 2015  
               

Monday, March 16, 2015

सामाजिक ढाँचे के लोकतांत्रिकरण में छिपे हैं महिला सशक्तिकरण के बीज....



सामाजिक ढाँचे के लोकतांत्रिकरण में छिपे हैं महिला सशक्तिकरण के बीज....
अरुण कान्त शुक्ला, 9/3/2015

यह कैसा संयोग है कि जब भारत सहित पूरी दुनिया में विभिन्न संगठन, देशों की सरकारें, शैक्षणिक संस्थाएं, महिलाओं के संगठन और समूह, व्यवसायिक नैगम और मीडिया समूह, विश्व में महिलाओं के द्वारा अर्जित आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक उपलब्धियों को रेखांकित करने और दुनिया की इस आधी आबादी को और सशक्त बनाने के उपायों पर विचार करने की तैय्यारी में जुटी थीं, भारत में लेईस उडविन की उस डाक्यूमेंट्री पर बहस छिड़ी हुई थी, जिसमें लेईस ने निर्भया के बलात्कारी और बलात्कारी के वकीलों के साथ साथ अन्य लोगों का इंटरव्यू लिया है| भारत के दोनों सर्वोच्च सदन लोकसभा तथा राज्यसभा तर्क-वितर्क के अखाड़े तो बने किन्तु तुरंत बाद ही हास्यास्पद स्थिति भी निर्मित हुई, जब संसद के अन्दर लाल-पीले हो रहे सांसदों ने बाहर निकलते ही एक-दूसरे को रंगों से लाल-पीला करना शुरू कर दिया और भूल गए कि कुछ समय पूर्व ही वे भारत के समाज और उसमें स्त्रियों की अवस्था पर इतनी गर्म बहस में जुटे थे कि उनके चेहरे गुस्से से लाल-पीले हो रहे थे| इस पर भी एक अच्छी डाक्यूमेंट्री बनाई जा सकती है कि हमारे सांसद संसद के भीतर जो कुछ सामाजिक मुद्दों पर कहते-करते हैं, वह उनका ‘स्व’ है या ‘अभिनय-ढकोसला’|

बहरहाल, इस पूरे मामले में दो बातों को जमकर उछाला गया| पहली यह कि डाक्यूमेंट्री बनाने की अनुमति २०१३ में जब दी गयी, तब यूपीए की सरकार थी| मानो, इससे इस सरकार के सारे पाप धुल जाते हैं| इस बात को कौन नहीं जानता कि इस और इससे पहले की भी सरकारों तथा संसदों में और राज्यों की सरकारों में भी ऐसे लोग बहुतायत में मौजूद रहे हैं, जिन्होंने खुले आम खाप पंचायतों के द्वारा फरमान जारी करके की गयी हत्याओं और बलात्कारों को समर्थन दिया है| इंडिया टाईम्स वेबसाईट का एक वीडिओ अभी भी सोशल साईट्स में घूम रहा है, जिसमें एक आमसभा में भाजपा सांसद आदित्यनाथ की उपस्थिति में उनका एक समर्थक मुस्लिम सम्प्रदाय की मृत महिलाओं के शवों को कब्र से बाहर निकालकर उनके साथ बलात्कार करने के लिए आव्हान कर रहा है|

दूसरी बात, बलात्कारी और उसके वकील के बयान को लेकर है| मुझे हंसी तब आई, जब एक न्यूज चैनल की पेनल चर्चा में भाग ले रहे एक विद्वान ने कहा की मुकेश एक अपराधी है और उसकी सोच को समाज के सभी पुरुषों की सोच नहीं माना जा सकता| एक कदम और आगे बढ़ते हुए उन्होंने पेनल में उपस्थित अन्य पुरुष भागीदारियों से पूछा कि क्या वे मानते हैं की सभी पुरुष ऐसा ही सोचते हैं? क्या आप लोगों की सोच भी ऐसी ही है? सभी पुरुष ऐसा ही सोचते हैं या नहीं, यह तो शोध का विषय है| पर, स्त्रियों के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर, बलात्कार से लेकर घरेलु हिंसा तक, सभी पुरुष जब तक उसकी आंच उनके परिवार तक न आये, गंभीर नहीं रहते हैं, यह तो जग जाहिर है| इसके अलावा, समाज केवल पुरुषों को लेकर तो बनता नहीं है| स्त्रियाँ, स्वयं समाज का आधा हिस्सा हैं और स्त्रियों के बारे में समाज की अग्रणी स्त्रियों की सोच कैसी है, यह तो केंद्र और अनेक राज्यों की महिला आयोगों की कर्ता-धर्ता स्त्रियों के बयानों से और संसद में बैठी तथा संसद के बाहर मौजूद साध्वियों के बयानों से स्पष्ट हो जाता है| जहां तक समाज के अग्रणी पुरुषों का सवाल है, पूछा जा सकता है कि आशाराम, तरुण तेजपाल, ऐ के गांगुली और अब आर के पचौरी किस बात के उदाहरण हैं| जब दिल्ली में निर्भया के खिलाफ इंडिया गेट पर प्रदर्शन चल रहा था, देश के एक प्रसिद्द स्तंभकार ने अपने जीवन के उपर बड़ी साफगोई से दृष्टिपात करते हुए कहा था कि यह सब देखकर अत्यंत खुशी हो रही है, हमने तो स्त्री को हमेशा उपभोग की दृष्टि से ही देखा|

अब थोड़ी बात समाज के सोच की की जाए| लगभग ढाई वर्ष पूर्व अक्टोबर’12 में थर्ड बिलियन इंडेक्स नाम के वैश्विक सर्वे में 128 देशों में महिला सशक्तिकरण के मामले में भारत का स्थान 115वां था| पिछले दो दशकों से भारत की गणना विश्व की तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में हो रही है| विश्व में हम चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हैं| जाहिर है, हमारे देश में, अर्थव्यवस्था में, महिलाओं के योगदान के लिए जबर्दस्त सम्भावनाएं मौजूद हैं| किन्तु, अधिकाँश स्त्रियाँ इन संभावनाओं को अवसरों में कमी, लेंगिक भेदभाव तथा सांस्कृतिक अवरोधों के कारण खो देती हैं| देश में प्रतिवर्ष लगभग 1000 महिलाएं केवल ‘सम्मान’ के नाम पर मार दी जाती हैं| एसिड अटक, बलात्कार, कार्यस्थल पर यौन-प्रताड़ना, कन्या भ्रूण ह्त्या की खबरों से समाचारपत्र रंगे रहते हैं|
जैसा की मैंने उपर भी कहा है, समाज पुरुष और स्त्री दोनों से मिलकर बना है और इनकी सम्मिलित सोच ही समाज की सोच है| हम एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में रह रहे हैं किन्तु यदि हम अपने सामाजिक ढाँचे को ध्यान से देखें तो आश्चर्यचकित हो जायेंगे कि यह ज़रा भी लोकतांत्रिक नहीं है| निर्भया काण्ड के समय युवाओं का जबर्दस्त जुड़ाव आन्दोलन में दिखाई पड़ा था| इस जुड़ाव ने देश के प्रगतिशील तबके के अन्दर आशाओं का संचार भी किया था| किन्तु, धरातल पर सत्यता देखकर कोई भी स्तब्ध रह जाएगा| मात्र एक सप्ताह पहले ही, 2 मार्च 2015 को, बेंगलुरु के एक गैर सरकारी संगठन सीएमसीए ( Children’s Movement For Civic Awareness ) ने, जो युवाओं के मध्य नागरिक जिम्मेदारी को पोषित करने के लिए काम करती है, एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें देश के लोकतांत्रिक ढाँचे, लोकतंत्र तथा स्त्री पुरुषों की सामाजिक स्थिति पर स्कूलों तथा कालेजों के छात्रों की समझ पर किये गए सर्वे के परिणामों को बताया गया है| रिपोर्ट के अनुसार;

65% स्कूली छात्रों को यह नहीं मालूम कि वे भारत के नागरिक हैं|

कालेज जाने वाले 65% छात्र तथा छात्राएं सार्वजनिक स्थानों पर अलग-अलग धर्मों के लड़के-लड़कियों के आपस में मिलाने को सही नहीं मानते हैं|

44% कालेज छात्र मानते हैं की स्त्रियों के पास एक हद तक उनके उपर होने वाली हिंसा को बर्दाश्त करने के अलावा कोई अन्य चारा नहीं है|

51% कालेज छात्र इसमें विश्वास करते हैं कि स्त्रियों का मुख्य कार्य घर संभालना तथा बच्चों के पालन की जिम्मेदारी को पूरा करना ही है|

लोकतंत्र और समाज के निचले तबके के बारे में तो उनकी राय और भी विस्मयकारी है| 53% कालेज छात्र, याने बहुमत हिस्सा देश में मिलिट्री शासन के पक्ष में है| 

सर्वे किये गए छात्रों का आधे से अधिक हिस्से का कहना है कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन जैसा कोई अधिकार नहीं है| 

सर्वे की गईं छात्राओं का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा तथा छात्रों का एक चौथाई हिस्सा दहेज़ लेने-देने का समर्थन करता है|

सीएमसीए के निदेशक डॉक्टर मंजुनाथ सदाशिवा का कहना है कि सर्वे में सबसे अधिक व्यथित और चिंतित करने वाली बात यह सामने आई कि युवाओं का रुख-रवैय्या लिंगभेद, सामाजिक विविधता तथा सामाजिक समरसता और सरोकारों के प्रति अत्याधिक नकारात्मक और अवांछनीय था| बात लौटकर वहीं आती है कि देश में राजनीतिक व्यवस्था के लोकतांत्रिक होने के बावजूद, सामाजिक ढाँचे को लोकतांत्रिक बनाने के लिए प्रयास नहीं के बराबर किये गए हैं| इतना ही नहीं देश के अन्दर मौजूद हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों ही के तत्ववादी ताकतों ने सामाजिक ढाँचे को मध्ययुगीन काल में ले जाने और रखने के प्रयास किये हैं| इसका अत्याधिक नकारात्मक असर देश के युवाओं पर पड़ा है| 

देश के प्रधानमंत्री और अन्य प्राय: सभी राजनेता कहते नहीं थकते हैं कि भारत युवाओं का देश है| पर, दुर्भाग्य से देश का यही युवा समूह लोकतंत्र के सही मायने और कीमत को समझने में बहुत पीछे है| यह नहीं कहने का कोई कारण नहीं है की जो शिक्षण व्यवस्था आज देश में है और युवाओं को मिल रही है, वह उन्हें उस तार्किक सोच और कौशल से लेस नहीं करती, जो एक जीवंत लोकतांत्रिक समाज के ढाँचे के निर्माण के लिए आवश्यक है|

मुकेश का यह कहना की लड़की को रेप का विरोध नहीं करना चाहिए था| या फिर, यह कहना की हमें फांसी दी गयी तो आईंदा कोइ भी बलात्कारी रेप के बाद लड़की को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा, आग में घी नहीं है| आग में घी राजनेताओं का खाप पंचायतों को दिया जाने वाला समर्थन है| आग में घी, लड़कों से गलती हो जाती है, यह व्यक्तव्य है| या, एक योगी की उपस्थिति में मुसलमानों की महिलाओं को कब्र से निकालकर, उनके साथ बलात्कार करने के लिए किया गया आव्हान है| एक बलात्कार और ह्त्या का दोषी समाज का नायक नहीं हो सकता| पर, राजनेता और योगी समाज के नायक हैं| बेन, उन पर लगना चाहिए| महिला सशक्तिकरण की राह बड़ी कठिन है, क्योंकि महिला सशक्तिकरण के बीज सामाजिक ढाँचे के लोकतांत्रिकरण में छुपे हैं और इनका संघर्ष तत्ववादी ताकतों के साथ है, जो राजनीतिक लोकतंत्र तो चाहते हैं, पर सामाजिक लोकतंत्र नहीं, क्योंकि वह उनका रास्ता रोकता है|