Wednesday, January 26, 2011

स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के मायने –

स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के मायने –

स्वतन्त्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा के साम्प्रदायिक मंसूबों (फिलहाल तिरंगा प्रेम) से निपटने में केंद्र की और वह भी कांग्रेसनीत सरकार ने साहस और दृढ़ता का परिचय दिया है | यदि इसी दृढ़ता का परिचय 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाते समय दिया गया होता तो देश को बाद में मुम्बई और गुजरात जैसे नरसंहारों को नहीं देखना पड़ता | अब सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के इस रुदन का कोई अर्थ नहीं है कि जब पूरा देश कौम का इतना बड़ा जलसा मना रहा था तो देश के दोनों सदनों के विपक्ष के नेता हिरासत में थे | एक देश के लिये स्वतंत्रता दिवस और संप्रभुता दिवस के मायने क्या होते हैं , यह चिंतन तो उन्हें एकता यात्रा में शामिल होने से पहले कर लेना चाहिये था | जहाँ तक जनता के द्वारा जबाब माँगने का सवाल है , भाजपा निश्चिन्त रहे , जनता कोई भी जबाब किसी से भी नहीं माँगने वाली , क्योंकि , वैसे भी , जनता के सामने रोजगार , महंगाई , भ्रष्टाचार , क़ानून व्यवस्था , दैनिक जीवन में असुरक्षा , जैसे , अपनी जीवन यापन की चिंता को लेकर ही इतने सवाल हैं , और जिनके लिये भाजपा भी बराबर की जिम्मेदार है , कि वह श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने जैसे खोखले भावुक नारे में अब बहने वाली नहीं है |


श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की जिद के पीछे भाजपा के दो प्रमुख तर्क हैं | पहला कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है , इसलिए देश से प्यार करने वाले प्रत्येक भारतीय को श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने का अधिकार है | भाजपा से बहुत आसानी से यह पूछा जा सकता है कि उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर मुख्यालय में वर्ष 2003 तक कभी भी झंडा नहीं फहराया गया तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि वर्ष 2003 तक आरएसएस या भाजपा को राष्ट्रप्रेम के मायने नहीं पता थे ? वर्ष 2004 में भी आरएसएस ने यह काम लगभग मजबूरी में ही किया था क्योंकि भाजपा की उस समय की आँख का तारा नेत्री कर्नाटक के हुबली में झंडा फहराने की यात्रा पर निकली थीं और संघ मुख्यालय कड़ी आलोचनाओं के घेरे में आ गया था | तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अभी उमड़ रहा यह राष्ट्रप्रेम दिखावा है ? नहीं ऐसा कोई भी अर्थ निकालना गलत होगा | यह सीधे सीधे असंतोष और अलगाववाद को बढ़ावा देगा | ठीक यही बात भाजपा को समझना होगी कि हमारे देश की भूमी का प्रत्येक इंच देश का अभिन्न हिस्सा है और ठीक उसी तरह श्रीनगर का लाल चौक भी देश का अभिन्न हिस्सा है , फिर उसी जगह झंडा फहराने की मुहीम क्यों ? जबकि लाल चौक पर परम्परागत ढंग से कभी भी झंडा नहीं फहराया जाता रहा है | सिवाय , उस एक बार के जब 1992 में भाजपा के नए नए अध्यक्ष बने मुरली मनोहर जोशी ने इसी तरह की यात्रा निकाली थी और पूरी तरह से सरकारी संरक्षण में , सुरक्षा के भारी इंतजामों के बीच मुठ्ठी भर स्वयंसेवकों के साथ जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल थे , झंडा फहराया था | सभी इसे जानते हैं कि वह भाजपा की अंदरूनी प्रतिस्पर्धा थी और मुरली मनोहर जोशी ने पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी से प्रतिस्पर्धा में वैसा किया था , जिनकी कुप्रसिद्ध रथयात्रा ने देश में साम्प्रदायिक दंगों का जलजला फैलाया था और बाद में बाबरी मस्जिद के ध्वंस का रास्ता तैयार किया था | जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बिलकुल ठीक कहा कि जब आपने पिछले 19 वर्षों में लाल चौक का रुख नहीं किया , यहाँ तक कि जब एनडीएनीत सरकार थी , तब भी नहीं , तो अब क्यों ? अब , जब घाटी में शांती बहाल हो रही है , तब उसमें विघ्न डालकर , असंतोष और अलगाववाद को अवसर प्रदान कराकर तुच्छ राजनीतिक फ़ायदा उठाने के प्रयास को केंद्र सरकार ने ठीक ही पूरा नहीं होने दिया , जो काम वह 1992 में नहीं कर पायी थी और देशवासियों को उसकी कीमत जानें कुरबान करके चुकानी पड़ीं थी |


एक दूसरा सवाल और उठाया गया है कि क्या श्रीनगर में तिरंगा राष्ट्र का अहित कर सकता है ? यह शब्दों के आडम्बर में जनमानस को उलझाकर राजनीतिक फायदा बटोरने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है | इस पूरे एपीसोड में भाजपा ने तिरंगे के सम्मान को उलझन में डालने के अलावा और कुछ नहीं किया | जैसे कि सभी देशों के लिये है , भारत और भारतवासियों के लिये भी राष्ट्रीय ध्वज देश की आन और शान का प्रतीक है और इससे राष्ट्र के हित और अहित दोनों का कोई भी संबंध नहीं है | राष्ट्र का हित और अहित तो देश में काम कर रहीं राजनीतिक पार्टियों के सिद्धांतों , नीतियों , व्यवहारों और कार्यों से सधते और बिगड़ते हैं | राष्ट्र के हित और अहित , देशवासियों के हितों और अहितों से इतर और कुछ भी नहीं होते हैं | तिरंगे ने श्रीनगर सहित देश में कहीं भी किसी का भी अहित नहीं किया है , पर शासन में रहे राजनीतिक दलों ने कितना अहित किया है , जिसमें भाजपा भी शामिल है , उसकी बानगी यह है कि बाल मृत्यु दर में भारत का हिस्सा दुनिया में शर्मनाक ढंग से 20 प्रतिशत है | दुनिया के भूखे लोगों में से आधे भारत में हैं | भारत के प्रत्येक 100 में से 46 बच्चे कुपोषण का शिकार हैं | भारत की ग्रामीण जनता का मात्र 15 प्रतिशत और शहरी जनता का सिर्फ 61 प्रतिशत शौचालय का प्रयोग करते हैं | देश के सत्तर प्रतिशत लोग 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करते हैं और चोरी , घूसखोरी और घोटाले रत्नों के समान राजनीतिक दलों के नेताओं के मुकुटों में जड़े हैं | कॉफिन से लेकर तोप तक , कुछ बचा है ? पिछले दो दशकों में शासन में रही सभी पार्टियां भ्रष्टाचार को आपराधिक ढंग से संरक्षण देती रही हैं , जिसने दुनिया में भारत का खूब मखौल बनाया है , राष्ट्र का उससे बड़ा कोई और क्या अहित हो सकता है |


सभी जानते हैं कि जैसे भारत के दूसरे राज्यों में 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराया जाता है , वैसे ही जम्मू कश्मीर में भी फहराया जाता है | अगर कश्मीर के लोग लाल चौक पर झंडा फहराना चाहें तो वे उसके लिये स्वतंत्र हैं | राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास में जाए बगैर , यह सहज ही सभी को स्वीकार्य है कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है | यही मायने स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस के भी हैं | स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस देश की आजादी और सार्वभौमिकता को सूदृढ करने के अवसर हैं , चुनौती देकर , अलगाववाद को हवा देने के नहीं |



 

Friday, December 17, 2010

असली मुद्दा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का है --

संसद का शीतकालीन सत्र अपनी तेईस दिन की अवधि पूरी कर , व्यवाहरिक रूप में बिना कोई कामकाज किये समाप्त हो गया | मीडिया , राजनीतिक दुनिया , सरकार के पक्षधरों और यहाँ तक कि आलोचकों ने भी , इस बार , इस बात पर ज्यादा माथा नहीं पीटा कि संसद के नहीं चलने से कितना चूना जनता की जेब पर लगा क्योंकि राजा के पौने दो लाख करोड़ के सामने सौ दो सौ करोड़ की कोई बिसात नहीं है और इसका सियापा करने वालों पर लोग हँसेंगे ही , ये सभी जानते थे | हमारे देश के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण की यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि यहाँ विकास से लेकर भ्रष्टाचार तक के सभी मुद्दे पार्टियों और व्यक्तियों के राजनैतिक और व्यक्तिगत हितों और स्वार्थों के हिसाब से निपटाए जाते हैं और देश या समाज का समग्र हित राजनीतिक दलों और व्यक्तियों के हितों और स्वार्थों के सामने गौण हो जाता है | यहाँ आरोप लगाने पर अपने साफ़ और निष्कलंक होने का सबूत देने के बजाय प्रत्यारोपों धमकियों की शरण ली जाती है | रोग का रूप धर चुकी इस विडम्बना का फैलाव राष्ट्रीय राजनीति से लेकर नगर , कस्बों की सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं और जनसंगठनों के छुटभैय्ये नेताओं तक हो गया है |


 

2जी स्पैक्ट्रम के दौरान भी यह देखने में आया , जब शुरुवात में केंद्र सरकार और विशेषकर कांग्रेस ने विपक्ष (एनडीए) के समय के मामलों को भी जांच के दायरे में लेने की धमकी दी | पर , उस समय तक भाजपा स्वयं और गैरभाजपाई विपक्ष इतने आगे बड़ चुका था और उन्हें जेपीसी गठन के राजनीतिक फायदे इतने स्पष्ट दिख रहे थे कि पीछे वापस लौटने का तो कोई सवाल ही नहीं था | कांग्रेस और विशेषकर प्रधानमंत्री , जो इसके पूर्व हर्षद मेहता कांड के समय जेपीसी का सामना कर चुके थे , इस बात को अच्छी तरह समझ रहे थे कि मामले की तह तक जाने का सवाल तो बाद में आएगा , उसके पहले सरकार और प्रधानमंत्री की पदेन दायित्व के निर्वाह में लापरवाही बरतने और गठबंधन की मजबूरी के नाम पर भ्रष्टाचार की तरफ से आँखें मूंदने के सवाल पे जो छीछालेदर होगी और भद्द पिटेगी , उसके राजनीतिक नुकसान को संभालना एक कठिन काम होगा | कांग्रेस इस बात को भी अच्छी तरह समझ रही थी कि आज गठित जेपीसी को पूरे मामले की जांच पड़ताल करते करते दो से ढाई वर्ष का समय कम से कम लगेगा और याने जांच रिपोर्ट अगले आमचुनाव के छै महने या एक साल पहले आयेगी , जिसका पूरा पूरा राजनीतिक लाभ विपक्ष उठाएगा और नुकसान कांग्रेस के खाते में जायेगा | वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद को चलने देने के सवाल पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में , ऐसा ही चलते रहने पर संसद को भंग करने की अप्रत्यक्ष धमकियां भी दीं |


 

इस सबसे परे , इस प्रश्न पर ध्यान देने के लिये कोई तैयार नहीं दिखता कि देश के लिये सबसे ज्यादा नुकसानदायक क्या है ? भ्रष्टाचार या फिर संसद के नहीं चलने से अटकने वाले बिल और संसद पर जाया होने वाला रुपया ? निसंदेह सभी कहेंगे भ्रष्टाचार | प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जिन आर्थिक सुधारों , आर्थिक प्रगति और जीडीपी में वृद्धि का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपवाना चाहते हैं , उस प्रगति के लिये देशवासियों से ली गई कुरबानी की तुलना में लाभ देशवासियों के निचले तबके को नहीं के बराबर मिला है | केंद्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की , गरीबों के लिये चलाई गईं योजनाएं , राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से लेकर मितानिन तक , सभी भ्रष्टाचार के कोढ़ से ग्रसित हैं और गरीब तबके के हजारों करोड़ रुपये डकार कर नेता और अफसर मालामाल होकर बैठे हैं | ऐसे में यदि भ्रष्टाचार को पूरी ताकत और राजनीतिक ईमानदारी के साथ खत्म नहीं किया जाए तो सुधारों से जुड़े बिलों और योजनाओं का कोई फ़ायदा नहीं | कोई भी आर्थिक सुधार नीति और नियमों को भ्रष्टाचार से मुक्त रखे बिना पूरा नहीं हो सकता है | पर अफसोस की बात है कि जिस राजनैतिक ईमानदारी और इच्छाशक्ति की बात हम कर रहे हैं , स्वतन्त्र भारत में अपनाई गई व्यवस्था और एक के बाद एक आई सरकारों में उसका अभाव ही रहा है | यदि ऐसा नहीं होता तो देश के भ्रष्ट सम्पन्नों का करोड़ों खरब रुपया काले धन के रूप में विदेशों में जमा नहीं होता और भारत की गिनती सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में न होती |


 

जहाँ तक आम लोगों की सोच का सवाल है , सर्वोच्च न्यायालय के यह कहने के बावजूद कि 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच वर्ष 2001 से और सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में ही कराई जायेगी , उनका अनुभव बताता है कि कुछ नहीं होगा | यह तूफ़ान (शीतकालीन सत्र) गुजरने के बाद राजनेता , मीडिया , कारोबारी , नौकरशाही किसी दूसरे काम में लग जायेंगे और 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला , भारत के अन्य बड़े घोटालों की तरह सूचीबद्ध होकर इतिहास में दफ़न हो जायेगा | यदि आम लोगों की इस सोच को बदलना है , तो राजनैतिक दलों के सामने , जेपीसी गठित होने या नहीं होने के निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर , यह सोचने का समय है कि राजनैतिक दलों , राजनेताओं , नौकरशाहों और कारोबारियों की जो भ्रष्ट छवि बनी है , उनकी साख में जो गिरावट आई है , क्या उसमें सुधार के लिये ही , लीपापोती छोड़कर , दोषी भ्रष्ट जनों को सजा देने की शुरुवात शीर्ष से करेगी ? असली मुद्दा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का है , न कि जेपीसी के गठन का | आशा है , सरकार इस बात को समझेगी , तभी बजट सत्र सुचारू रूप से चल सकेगा |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Friday, December 10, 2010

आज का ग्रेकस –


 

"घर और परिवार और इज्जत और शराफत और नेकी और जो कुछ भी अच्छा था और पवित्र था उसके मालिक गुलाम थे और वही उसकी रक्षा कर रहे थे – इसलिए नहीं कि वे अच्छे और पवित्र थे बल्कि इसलिए कि जो कुछ भी पवित्र था सब उसके मालिकों ने उन्ही गुलामों के हवाले कर दिया था |"

हावर्ड फ़ास्ट की महाकथा स्पार्टकस में उपरोक्त विश्लेषण रोम की सीनेट का एक सदस्य ग्रेकस करता है | "स्पार्टकस" में ईसा से 73 वर्ष पूर्व के रोम की कथा है जब गुलामी की प्रथा अपने चरम पर थी और उन्ही गुलामों में से एक "स्पार्टकस" ने उस पाशविक प्रथा को चुनौती देने का विवेक और साहस अपने आप में पाया था | ग्रेकस के उपरोक्त विश्लेषण का अर्थ कदापि यह नहीं लगाया जा सकता कि कि उसे विद्रोही गुलामों से कोई सुहानाभूति थी या फिर वह उस व्यवस्था को बदलना चाहता था | स्वयं ग्रेकस के अनुसार राजनीतिज्ञ चालबाज होता है और राजनीतिज्ञ के अंदर इस चीज (चालबाजी) को देखकर लोग अकसर इसको ईमानदारी समझने की भूल किया करते हैं | ग्रेकस की गणतंत्र के बारे में राय देखिये ;

"देखो हम लोग एक गणतंत्र में रहते हैं | इसका मतलब है कि बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है और मुठ्ठी भर लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत कुछ है | और जिनके पास बहुत कुछ है उनकी रक्षा , उनका बचाव उन्हीं को करना है जिनके पास कुछ भी नहीं |"

ग्रेकस के अनुसार इस तरह के गणतंत्र को बनाए रखने के लिये सीमेंट का काम राजनीतिज्ञ ही करते हैं | उच्चवंश (सम्पतिवान) इस काम को नहीं कर सकते क्योंकि उनकी निगाह में जनता भेड़ बकरी के सामान होती है | उच्चवंशीय को साधारण नागरिक के बारे में कुछ नहीं मालूम | अगर यह सब उसके भरोसे छोड़ दिया जाए तो समूचा ढांचा एक दिन में भहरा पड़े | इसे बचाने का काम राजनीतिज्ञ करते हैं | कैसे करते हैं , ग्रेकस से सुनिए ;

" ............ जो चीज नितांत असंगत है हम उसके अंदर संगती पैदा करते हैं | हम लोगों को यह समझा देते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता अमीरों के लिये मरने में है | हम अमीरों को यह समझा देते हैं कि उन्हें अपनी दौलत का कुछ हिस्सा छोड़ देना चाहिए ताकि बाकी को वे अपने पास रख सकें | हम जादूगर हैं | हम भ्रम की चादर फैला देते हैं और वह ऐसा भ्रम होता है जिससे कोई बच नहीं सकता | हम लोगों से कहते हैं – तुम्हीं शक्ति हो | तुम्हारा वोट ही रोम की शक्ति और कीर्ति का स्त्रोत है | सारे संसार में केवल तुम्हीं स्वतन्त्र हो | तुम्हारी स्वतंत्रता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज नहीं है , तुम्हारी सभ्यता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज नहीं है , तुम्हारी सभ्यता से अधिक प्रशंसनीय कुछ भी नहीं है | और तुम्ही उसको नियंत्रित करते हो ; तुम्हीं शक्ति हो , तुम्ही सत्ता हो | और तब वे हमारे उम्मीदवार के लिये वोट दे देते हैं | वे हमारी हार पर आँसू बहाते हैं , हमारी जीत पर खुशी से हँसते हैं | ................चाहे उनकी हालत कितनी भी गिरी क्यों न हो , चाहे वे नालियों में ही क्यों न सोते हों , .............. चाहे वे अपने बच्चों के पैदा होते ही उनका गला क्यों न घोंट देते हों , चाहे उनकी बसर खैरात पर ही क्यों न होती हो और चाहे पैदाईश से लेकर मरने तक उन्होंने एक रोज काम करने के लिये हाथ न उठाया हो , .......... यह मेरी कला है | राजनीति को कभी तुच्छ नहीं समझना |"

उपरोक्त भूमिका लंबी होने के बावजूद भारत की आज की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर एकदम सटीक बैठती है | एक तरफ , बड़े कारोबारियों , राजनीतिज्ञों , अधिकारियों , लाबिस्टों के अपवित्र गठबंधन हैं , जो देश की संपदा और आय (जोकि वस्तुत:देश के मेहनतकशों की खून पसीने की गाढ़ी कमाई है ) को लूटने में लगे हैं | जिनके सामने इज्जत और शराफत की कीमत दो कौड़ी भी नहीं है , जो नेकी और पवित्रता को त्याग चुके हैं क्योंकि नेकी और पवित्रता उनकी लालच , उनकी विलासिता , उनके ऐश-आराम के रास्ते में रुकावट पैदा करती हैं , क्योंकि देश की अस्मिता से लगाव , देशप्रेम उनके राह में बाधक है , इसलिए वे उसे त्यागकर , उनकी सत्ता में देश का जितना भी हिस्सा आया है , उसे बेचकर अपने घर को भरने में लगे हैं ताकि उनके बाद भी उनकी आने वाली बीसीयों पीढ़ी विलासिता और ऐश की जिंदगी गुजार सकें | इन्होने गणतंत्र के तीनों खम्भों को अपने अपवित्र घेरे में ले रखा है | इन्होने गणतंत्र के चौथे खम्भे पत्रकारिता को भी अपने अपवित्र घेरे में लेकर दलाली में लगा दिया है | दूसरी तरफ , देश की आबादी के लगभग पचास प्रतिशत याने पचास करोड़ लोग हैं जो भीषण गरीबी का शिकार हैं | सत्तर प्रतिशत परिवार बीस रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजारा कर रहे हैं | दुनिया के कुपोषित बच्चों में से आधे भारत में हैं | देश की आबादी का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा झुग्गी झोपडियों में अमानवीय जीवन जीने को अभिशप्त है और इनका बड़ा हिस्सा फुटपाथों , रेलवे स्टेशनों , बस स्टेंडों , दुकानों के सामने के पटियों , मंदिरों , घाटों पर रातें गुजारता है | लोगों को रोजगार देने के बजाय खैरात पर रहने की आदत डाली जा रही है | इस अपवित्र गठजोड़ के कारनामों की वजह से भारत को सर्वाधिक भ्रस्ट देशों में से एक माना जाता है | भारत में भी एक ग्रेकस है जो स्थिति की भयानकता के लिये जिम्मेदार भी है और इन विसंगतियों को संगत बनाने की पूरी कोशिश में लगा है | आईये , यह पता लगाने के लिये कि वह ग्रेकस कौन है , कुछ उद्धरणों पर ध्यान दें ;

"आगामी दशक , व्यैक्तिक वाणिज्य संस्थानों और सामूहिक प्रयासों के सृजन का दशक होना चाहिये | दरबारी पूंजीवाद (Crony Capitalism) और लोकप्रियता की राजनीति हमें अधिक दूर नहीं ले जायेगी |" (19.11.2004)

"क्या हम दरबारी पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं ? क्या यह आवश्यक है या फिर आधुनिक पूंजीवाद को भारत में विकसित करने के दौरान की यह एक संक्रमण अवस्था है ? क्या हम उपभोक्ता और छोटे व्यवसायियों को दरबारी पूंजीवाद से सुरक्षित रखने के लिये पर्याप्त कर रहे हैं ?...... ऐसा तो नहीं कि उनको ( घरेलु व्यापारिक संस्थानों ) सुरक्षा देने के नाम पर दरबारी पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं ?" (1.5.2007

"मैं मानता हूँ कि जब भी हमें नियमों की आवश्यकता होती है , मैं समझता हूँ कि वो नियंत्रक प्रभावी होने चाहिये , और , किन्तु , दरबारी पूंजीवाद वह खतरा है जिसे चाहने से दूर नहीं किया जा सकता | वह एक खतरा है , जिसके खिलाफ हमें सुरक्षा करनी होगी |" (6.11.2010)

दरबारी पूंजीवाद याने पूंजीवाद की वह अवस्था जिसमें कारोबार में सफलता कारोबारियों , राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों के घनिष्ठ (मित्र) संबंधों पर निर्भर होती है | यह सरकारी ग्रांट , सरकारी परमिटों के वितरण में पक्षपात , टेक्सों में विशेष छूट के रूप में होती है | अपने बदतरीन रूप में दरबारी पूंजीवाद भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में विकसित कर लेता है , जहाँ राजनीतिज्ञ और सरकारी अधिकारी घूस लेना सम्मान समझते हैं तो कारोबारी टेक्स में चोरी अपना अधिकार | इस अवस्था को अर्थशास्त्र में कई बार प्लूटोक्रेसी (धनिकों का राज) या क्लेप्तोक्रेसी ( Kleptocracy - चोरों का राज) कहा जाता है | उपरोक्त उद्धरणों में कोई इसी दरबारी पूंजीवाद के खिलाफ बार बार सावधान कर रहा है | यह हमारे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह हैं जिनके कुछ भाषणों से उपरोक्त उद्धरण लिये गए हैं | यदि याद किया जाए तो ऐसी ही बातें उन्होंने तब भी की थीं , जब वो नरसिम्हाराव के मंत्रीमंडल में वित्तमंत्री थे |

नवउदारवादी अर्थशास्त्री दरबारी पूंजीवाद को लायसेंस–परमिट राज के साथ जोड़ कर दिखाते हैं | यदि आप प्रधानमंत्री के 1 मई 2007 के भाषण पर गौर करें तो पायेंगे कि वो दरबारी पूंजीवाद को एक संक्रमण की स्थिति तो बता रहे हैं , साथ ही उसे आधुनिक पूंजीवाद के निर्माण के लिये आवश्यक भी बता रहे हैं | जहाँ तक मेरी याददाश्त जाती है , ऐसा ही उन्होंने 1994 में भी पंजाब नॅशनल बैंक के एक समारोह में भाषण देते हुए भी कहा था | समय ने सिद्ध कर दिया है कि कि यह भ्रष्ट आचरण कभी भी संक्रमण काल का नहीं हो सकता , बल्कि यह विशुद्ध रूप से उन नीतियों का प्रतिफलन है ,जो स्वयं प्रधानमंत्री ने वित्तमंत्री रहते हुए 1991 में शुरू की थीं | यह सच है कि आज दरबारी पूंजीवाद के स्वरूप में परिवर्तन आया है | तीन दशक पहले घूस देकर आउट आफ़ टर्न लायसेंस – परमिट हासिल कराने वाले दरबारी पूंजीवाद का अर्थ अब हो गया है स्पेशल इकानामिक जोन के अंतर्गत लाखों एकड़ जमीन हथियाना , एनरान जैसे सफ़ेद हाथी को प्रश्रय देना , वेदान्त , जिंदल , मोनेट , नेनो , जैसे बड़े घरानों को , किसानों से छीनकर हजारों एकड़ जमीन देना और उन्हें अनाधिकृत रूप से जंगलों को काटने देना और जंगल जमीन पर कब्जा जमाने देना | 2 जी स्पैक्ट्रम , कामन वेल्थ , आदर्श सोसाईटी , होम लोन और अब यू. पी. में अनाज घोटाले का पर्दाफ़ाश दरबारी पूंजीवाद का ही नतीजा हैं , जिसमें अरबों रुपये की घूस खाई गई होगी |

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री के रूप में इस घूसखोरी और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कोई कदम उठा सकते हैं ? 2 जी स्पैक्ट्रम के मामले में कुछ दिन पूर्व दिया गया उनका बयान कि कैग को घोटाले और प्रक्रिया संबंधी गलती में अंतर करना आना चाहिये , जे पी सी बनाने से उनका इनकार , निराश करने वाला ही है | उनके द्वारा दरबारी पूंजीवाद का भय दिखाना या उसके खतरे के प्रति चेतावनी देना मात्र एक असंगत को संगत बनाकर लोगों के गले उडेलने की कोशिश ही है | वे , यदि इन परिस्थितियों से यदि खुद को पज़ल (परेशान) दिखाते हैं तो यह पाखंड लोगों को गुमराह करने के लिये किया जा रहा है | वे क्या सोचते हैं ? आज जिस असमानता , असंतुलन , अराजकता , भ्रष्टाचार , घूसखोरी , लूट , शोषण , अव्यवस्था को भारत के लोग झेल रहे हैं , उन्हीं की नीतियों का परिणाम हैं | यदि वे दरबारी पूंजीवाद से सचमुच में पज़ल हैं और परिस्थितियों में सुधार देखना चाहते हैं तो उनके पास वर्तमान समय एक अच्छे अवसर के रूप में उपस्थित है | वे उजागर करें कि देश के संसाधनों की यह भयावह लूट कैसे हुई है ? वे इस लूटी हुई राशी को देश के खजाने में वापस लाएं और उस रकम को स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं तथा खाद्य सुरक्षा पर खर्च करें , जिसकी जनता को बहुत जरुरत है | यही एक रास्ता है , जिससे वे दिखा सकते हैं कि वे ग्रेकसनुमा राजनीतिज्ञ नहीं हैं |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"


 



 

Wednesday, November 17, 2010

क्या मनमोहनसिंह एक ईमानदार राजनीतिज्ञ हैं ?


 

सर्वोच्च न्यायलय की टिप्पणी ने मुझे एक बहुत पुरानी , लगभग सत्रह , अठारह वर्ष पुरानी घटना की याद दिला दी | बात उस समय की है , जब नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार में मनमोहनसिंह वित्तमंत्री थे | उस समय ऐसा कहा जा रहा था कि भारत अपनी देनदारियों को भी चुकाने की स्थिति में नहीं है और दिवालिया होने की कगार पर है | कहा जा रहा था , का प्रयोग मैंने इसलिए किया कि , न तो उस समय और न ही आज मैं भारत सरकार और उसके अर्थशास्त्रियों से सहमत हूँ कि भारत का ट्रेड बेलेंस दिवालिया होने की कगार पर था | यदि उस समय भी , और आज के दौर में भी यह बात उतनी ही सच है , स्विस बैंकों की बात छोड़ दीजिये , केवल भारत के अंदर छिपे हुए काले धन को बाहर निकाला जाता तो भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के किसी भी देश से बेहतर होती | बहरहाल , एक ऐसी व्यवस्था में , जैसी कि हमारे देश में है , काले धन को बाहर निकालने की बात सोचना उतना ही मूखर्तापूर्ण है , जितना मनमोहनसिंह से आज यह पूछना कि वो राजा के कारनामों पर दो वर्ष खामोश क्यों रहे या उन्होंने सुब्रमणियम स्वामी को राजा पर आपराधिक मुकदमा चलाने की अनुमति क्यों नहीं दी | खामोश रहने की कला मनमोहनसिंह ने नरसिम्हाराव से सीखी या मनमोहनसिंह ने नरसिम्हाराव को सिखाई थी , यह भी राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों के लिये शोध का एक अच्छा विषय हो सकता है | तो , मैं आपको उस दौर की बात बता रहा था , जब मनमोहनसिंह नरसिम्हाराव मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री थे और जगत प्रसिद्द शेयर मार्केट का घोटाला हुआ था , जिसे हर्षद मेहता कांड के नाम से उस दौर के लोग आज भी याद करते हैं | आज सारा का सारा विपक्ष , यह जानते हुए कि भी संयुक्त संसदीय समिति की जांचों का क्या हश्र होता है , टेलीकाम में हुए घोटाले के लिये संसदीय कमेटी से जांच करवाए जाने की माँग को लेकर अड़ा हुआ है | उस जगत प्रसिद्द घोटाले की जांच के लिये भी एक जेपीसी बनी थी , जिसके सामने मनमोहनसिंह पेश हुए थे | जब उनसे पूछा गया कि शेयर मार्केट में इतना बड़ा घपला हो रहा था , तब आप क्या कर रहे थे , तो मनमोहनसिंह का जबाब था , "मैं सो रहा था" | जब उनसे कहा गया कि आप ऐसा जबाब कैसे दे सकते हैं , तो उन्होंने जबाब दिया कि "मैं मजाक कर रहा था"|

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश और देशवासियों के साथ यह मजाक पिछले दो दशकों से निरंतर जारी है | आप यदि अपनी याददाश्त पर जोर डालेंगे तो पायेंगे कि हर प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री विशेषकर सरकारी विभागों में उदारीकरण की नीतियों को लागू करते समय किये जा रहे भ्रष्टाचार की तरफ से आँखे मूंदे रहा याने सोते ही रहा | चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र
की इकाइयों को निजी क्षेत्रों को ओने पौने दामों में सौंपने का मामला हो , जिसमें मार्डन फुड से लेकर व्हीएसएनएल और बाल्को तक सभी आ जाते हैं या फिर टेलीकाम इंडस्ट्री में हुए घोटालों का मामला हो , क्या कांग्रेसनीत और क्या भाजपानीत सभी सरकारों का रवैय्या जबाबदेही से भागने वाला ही रहा है | वैश्वीकरण के इस दौर में किये जा रहे निजीकरण को यदि रिश्वतीकरण और भ्रष्टाचारीकरण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |

भारत में 1991 , याने उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से ही जबाबदेही का बहुत ही संकुचित अर्थ लिया जा रहा है | जबाबदेही सिर्फ भ्रष्टाचार या अनैतिकता में लिप्त नहीं होने तक ही सीमित नहीं होती | जनतंत्र में व्यक्ति या संस्थान अपनी सार्वजनिक जिम्मेवारी के पालन के लिये उठाये गए कदमों के नतीजों के लिये भी जबाबदेह होते हैं | लेकिन भारत में इस तरह की जबाबदेही सरकार , प्रशासन और देश के विभिन्न संस्थानों तथा संस्थाओं से तो लुप्त हो ही चुकी है , विडम्बना यह है कि यह जबाबदेही हमारे देश के राजनेताओं , नौकरशाहों और संपन्न तबके के पास से भी गधे के सर से सींग की तरह गायब हो गयी है | जब चीजें गलत हो जाती हैं तो उसे व्यवस्था का दोष बताया जाता है और आजकल तो एक और नया फलसफा आ गया है , "गठबंधन" की मजबूरी | मानो व्यवस्था ईश्वर निर्मित हो और इसके लिये किसी इंसान को दोष देना पाप होगा या फिर गठबंधन बनाये रखना ऐसा ईश्वरीय आदेश है , जिसके लिये बेईमानी , भ्रष्टाचार और अनैतिकता को अनदेखा करना पुण्य का काम है |

एक बार पुनः 1992 में हुए उपर उल्लेखित वित्तीय घोटाले का स्मरण कीजिये | जब इस घोटाले का भेद खुला और उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे तब तात्कालीन वित्तमंत्री ने संसद में यह व्यक्तव्य दिया था कि , "अगर शेयर बाजार में एक दिन उछाल आ जाए और दूसरे दिन गिरावट हो तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी नींद हराम कर लूँ |" ( उद्धरण :प्रतिभूति एवं बैंक कारोबार में अनियमितताओं की जांच के लिये गठित संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट , खंड 1 , पेज 211 , लोकसभा सचिवालय , दिसंबर 1993 )| यह बताने की तो कोई जरुरत नहीं है कि 1992 में वित्तमंत्री कौन था | स्वतन्त्र भारत में मनमोहनसिंह पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो देश की जनता , संसद या फिर खुद के मंत्रीमंडल के सदस्यों का विश्वास हासिल किये बिना छै वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं | सार्वजनिक जीवन में उनकी छवि एक साफ़ सुथरे और ईमानदार व्यक्ति की है | प्रसिद्द पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपनी किताब "
Absolute Khushwant : The low down on life , Death and most things in-between " में मनमोहनसिंह को जवाहरलाल नेहरू से भी बेहतर प्रधानमंत्री बताया है | शायद इसकी वजह वे दो लाख रुपये हों जो मनमोहनसिंह ने उनके जीवन के एकमात्र चुनाव लड़ने के लिये , लिये थे और फिर उपयोग नहीं होने पर वापस कर दिए थे | बहरहाल , खुशवंतसिंह के साथ कोई पंगा लिये बिना इतना तो कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण सादगी के साथ मनमोहनसिंह के अंदर किसी भी कीमत पर सत्ता के साथ नजदीकी बनाए रखने की चतुराई भी हमेशा मौजूद रही | क्या कभी यह भुलाया जा सकता है कि मनमोहनसिंह 1991 में आर्थिक सुधारों को लागु करने से पहले भी वित्त सचिव , रिजर्व बैंक के गवर्नर या भारत सरकार के वित्त सलाहकार के रूप में भारत में उन्हीं नेहरूवियन नीतियों को आगे बढ़ाने में लगे थे , जिनके बारे में उन्होंने पहला बजट पेश करते हुए संसद में कहा था कि "लम्हों ने खता की थी ,सदियों ने सजा पायी" | पर , भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रहते हुए मनमोहनसिंह ने कभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाने या लाईसेंस , परमिट राज खत्म करने की वकालत नहीं की |

मनमोहनसिंह के नरसिम्हाराव मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री रहते हुए और उनके प्रधानमंत्रित्व के प्रथम कार्यकाल के दौरान घटी दो घटनाएं भी सत्ता और राजनीतिक शुचिता के प्रति उनकी सोच को प्रगट करती हैं | नरसिम्हाराव की सरकार अल्पमतीय सरकार थी , जो बाद में जोड़ तोड़ कर बहुमतीय सरकार बनी | मनमोहनसिंह के प्रधानमंत्रित्व में भी जब न्यूक्लीयर समझौते के विरोध में वामपंथी दलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया तो सरकार जोड़ तोड़ करके ही बचाई गयी | इससे पता चलता है कि सत्ता में बने रहने के लिये कुछ भी करने से उन्हें भी कोई परहेज नहीं है और इसा मायने में वे अन्य किसी राजनीतिज्ञ से बिलकुल अलग नहीं हैं और उनका स्वयं का कोई कनविक्शन नहीं है | वे नरसिम्हाराव के विश्वस्त थे , पर , जैसे ही सत्ता का केंद्र सोनिया गांधी बनीं , उन्होंने अपनी निष्ठा अविलम्ब बिना हिचक बदल कर सोनिया गांधी के प्रति कर ली | वे सौम्य हैं , पर अपने लिये चतुर भी हैं | सर्वोच्च न्यायालय कुछ भी पूछे , उन्होंने तो अपनी सफाई कैग को धौंसा कर दे दी , " जानबूझकर की गई गडबडी और भूलवश हुई गलती के बीच कैग को फर्क करना चाहिये , साथ ही आधिकारिक फैसलों के पीछे के संदर्भ और परिस्थितियों को समझना चाहिये | कैग पर भारी जिम्मेदारी है , इसलिए उसे ध्यान रखना चाहिये कि उसकी रिपोर्ट सटीक , संतुलित और समुचित हो "| अब आप चिल्लाते रहिये कि यह सटीक , संतुलित और समुचित की शब्दावली तो देश को दो लाख करोड़ की चोट देने वाली है | पर , जिसे ओबामा ध्यान से सुनता है , वो क्यों आपको ध्यान से सुनेगा ? वैसे , मैं आपको एक बात बता दूं कि सौम्यता और योग्यता बहत अच्छे गुण हैं , पर वे तो अमूमन हर सेल्समेन में पाए जाते हैं , एक अरब लोगों के देश के प्रधानमंत्री में तो लोग इससे कुछ ज्यादा ही देखना चाहेंगे |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"


Sunday, November 14, 2010

बराक ओबामा जाना पहचाना चेहरा –


 

बराक ओबामा जब मुम्बई के रास्ते भारत आये तो मुझे उनका चेहरा बहुत जाना पहचाना लगा | ऐसा लगा वो इसके पहले भी भारत आ चुके हैं | जबकि ओबामा पहली बार भारत आये थे |

जबसे उनके भारत आने की बात पता चली थी , जेहन में उस व्यक्ति का चेहरा उभरता था , जो अश्वेत होने के बावजूद अमेरिका का प्रेसीडेंट चुना गया था | 47 वर्ष का एक व्यक्ति जो ईराक पर हमले से लेकर , हर उस गलती को ठीक करने की इच्छा रखे था , जो बुश और उसके पहले के जमाने में की गईं थीं | एक ऐसा व्यक्ति , जिसने अपने कार्यकाल के पहले साल में अमेरिका के चेहरे पर लगे बदनुमा दागों को धोने की कोशिशें की थीं और पूरी दुनिया को यह सन्देश देने की कोशिश की थी कि अमेरिका जैसे हठीले , गर्वीले और दुनिया को अपने इशारों पर नचाने की इच्छा रखने वाले राष्ट्र के अंदर भी अपनी गलतियों को सुधारने और उनसे सीख लेने का माद्दा है | एक ऐसा व्यक्ति , जो टर्की से लेकर त्रिनिदाद तक यह सन्देश दे रहा था कि वह अपने पूर्ववर्तियों से इस लिहाज से अलग है कि उसके अंदर राष्ट्र के प्रति गहन जिम्मेदारी के साथ साथ विश्व के नागरिक होने के दायित्व का बोध भी था |

पर , यह बराक हुसैन ओबामा , जो मुम्बई के रास्ते भारत आया और जिसने आते ही दस अरब डालर का माल भारत को बेचा , जिसने बच्चों के साथ मय पत्नी नृत्य किया , जिसने मुम्बई में आतंकीयों के शिकार लोगों को श्रद्धांजली दी और फिर सेंट जेवियर्स की क्षात्रा के सवाल के जबाब में न केवल भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू पर तोल दिया बल्कि पाकिस्तान में स्थायित्व भारत के नौजवानों के भी हित में है , यह भी कहा , वह ओबामा निश्चित रूप से नहीं था , जिसने दो वर्ष पहले अमरीका का राष्ट्रपति पद संभालते समय अमेरिका के बाहर भी करोड़ों लोगों के दिल में खुशनुमा ख्याल पैदा किये थे | दिल्ली पहुंचते ही ओबामा का असली चरित्र बाहर आ गया | दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष होने के गुमान को प्रदर्शित करने वाला चरित्र | दिल्ली के अंदर हैदराबाद हाऊस में हुई पत्रकार वार्ता के बाद ओबामा ने जिस तरह मनमोहनसिंह की पीठ थपथपाई , वह क्या प्रदर्शित करता है ? इस थपथपाहट से मनमोहनसिंह भले ही गदगद हो गए हों , लेकिन , भारत की अमेरिका परास्त लाबी को छोड़कर , शेष करोड़ों भारतीयों को यह थपथपाहट काटों से कम नहीं चुभी होगी | यही वह क्षण था जब मुझे बराक हुसैन ओबामा का चेहरा पहचाना हुआ लगा | लगा यही तो बुश है | यही क्लिंटन , यही कार्टर ,यही आईजनहावर है | हमारे देश की यह राष्ट्रीय विडम्बना है कि देश में राष्ट्रीय शर्म नहीं है | यदि है भी तो उसे राष्ट्रीय नहीं कह सकते , क्योंकि वह केवल आम  देशवासियों के पास है ,राजनेताओं के पास नहीं |

 अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"  

Friday, November 5, 2010

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं ---

ब्लॉग जगत के समस्त पाठकों , ब्लॉगर बंधुओं , समस्त नाते-रिश्तेदारों , मित्रों , प्रियजनों को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं | 
अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"


























































Sunday, October 24, 2010

सी ज़ेड.आई.ई.ऐ. सम्मलेन और जनवाद – सम्मलेन अवैध है --


 

भोपाल में आज से सीजेडआईईऐ का त्रिवार्षिक सम्मलेन प्रारम्भ होने जा रहा है | मुझे तुरंत जबलपुर निकालना है , इसलिए सीधे सीधे बात को रख रहा हूँ | इसका विश्लेषण कभी बाद में समय आने पर करूँगा | इस सम्मेलन तक के लिये मैं तकनीकी सहित सभी नार्म्स के हिसाब से सम्मलेन का एक्स आफिसियो प्रतिनिधी हूँ , ठीक वैसे ही जैसे इस अपेक्स बाडी के अन्य वर्किंग कमेटी मेंबर हैं और मुझे न केवल सम्मलेन में शामिल होने का नोटिस मिलना चाहिये था बल्कि परंपरा के अनुसार रायपुर डिवीजन की मंडलीय इकाई को मेरा इंतजाम भी करना चाहिये था | लेकिन न तो मुझे नोटिस मिला और नहीं मूल संगठन ने उसके किसी साथी के साथ हो रही सांगठनिक प्रक्रिया के उल्लंघन के प्रति कोई ध्यान दिया और वे देते भी कैसे ? बासिज्म , फासिज्म और चमचागिरी की संस्कृति पर चलने वाले व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह किसी अन्य साथी के जनवादी अधिकार के लिये संगठन को संघर्ष के लिय प्रेरित करेगा बुद्धिहीन से पहाड़ा सुनने की इच्छा रखने के सामान है | लेकिन नोटिस देने और सम्मलेन में प्रतिनिधि पहुंचे इसे इंश्योर करने की जिम्मेदारी तो संगठन के महासचिव की होती है , पर जनवाद के नाम पर फासिज्म और तानाशाही चलाने वालों से यह अपेक्षा तो और भी व्यर्थ है , जिसके लिये कोई उपमा भी नहीं दी जा सकती | मंडलीय इकाई के एक उच्च नेता को मैंने यह बताया , तो उसका सीधा कहना था कि कामरेड वे सीधा झूठ बोल देंगे कि उन्हें नोटिस दिया गया था पर वे स्वयं नही आये | उसके अनुसार सीजेडआईईऐ का क्रियाशील नेतृत्व के एग्रीकल्चर में खप नहीं पाया | एग्री याने सहमती और कल्चर याने संस्कृति |बहरहाल, ट्रेड यूनियन में जनवाद को दफनाने वाले जनवाद पर भाषण झाड़ेंगे , किसी भी संगठन का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है | कुल मिलाकर यह सम्मलेन अवैध है | जल्दी में हूँ और भी बातें है समय आने पर बताउंगा |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"