Sunday, May 3, 2020

भारत सरकार ने दिया विस्थापित मजदूरों को मई दिवस का तोहफा : हसें या रोयें


लॉक-डाउन के पांच सप्ताह के बाद सरकार का यह फैसला कि देश में अनेक जगह फंसे हुए विस्थापित श्रमिकों को अपने गाँव-घर जाने लिये विशेष ट्रेनें चलाई जायेंगी, मई दिवस के एक तोहफे के रूप में सामने आया। यह उम्मीद सभी को थी कि 3 मई को दूसरे लाक-डाउन की अवधि सामाप्त होने पर सरकार अपने कार्य-स्थलों से लेकर हाई-वे की सड़कों और विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर फंसे इन श्रमिकों की घर वापसी के लिये कोई कोई कदम जरुर उठाएगी। शुक्रवार याने 1 मई को रेलवे ने सुबह-सबेरे अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के मौके पर पहली ट्रेन तेलंगाना में हैदराबाद से झारखंड के हटिया के लिये रवाना की जिसमें 1200 प्रवासी श्रमिक थे। महाराष्ट्र के नासिक से जो ट्रेन मध्यप्रदेश के भोपाल के लिये रवाना हुई उसमें लगभग 325 प्रवासी श्रमिक थे। 1 मई को कुल 6 ट्रेन चलाई गईं। आप अंदाज लगा सकते हैं कि एक करोड़ में से यदि आधे भी वापस लौटने वाले होंगे तो उनके वापस लौटने तक लॉक-डाउन का तीसरा दौर भी खत्म हो जाएगा।

प्रश्न यह है कि लॉक-डाउन के 5 सप्ताह के बाद सरकार के इस तोहफे पर वे श्रमिक जो सरकार की तरफ से निराश होकर भूखे-प्यासे पैदल, साईकिल से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर रवाना हो गए और आज देश में सड़कों के किनारे, राज्यों की सीमाओं पर लाखों की संख्या में फंसे हुए हैं, वे मई दिवस को मिले इस सरकारी तोहफे पर हसें या रोयें? ये पांच सप्ताह हिन्दुस्तान को गढ़ने वाले उन कामगारों के लिये बेरोजगार होने के साथ साथ भूख और लाचारी के थे और जिसमें कितनों ने तो अपनी जिंदगी भी गँवा दी जिन्हें विस्थापितों के लिये बनाए गए आश्रयस्थलों में रखा गया, उन्हें तो वहाँ जेल से भी ज्यादा बदतर ज्यादतियां झेलनी पड़ी हैं और अभी झेल रहे हैं
अर्थशास्त्रियों से लेकर सरकारी मशीनरी का छोटे से छोटा कर्मचारी भी जानता है कि कपड़े या गारमेंट्स से लेकर स्टील तक, खिलोनों से लेकर कार तक, सड़क बनाने से लेकर भवन निर्माण तक, सभी उद्योगों और निर्माण कार्यों में, तथा बड़े उद्योगों के लिये आवश्यक कल-पुर्जों के निर्माण के लिये जो सहायक छोटी और मंझौली औद्योगिक इकाई काम करती हैं, उनमें श्रमिकों की पूर्ति, चाहे वह स्थायी कर्मचारी के रूप में हो अथवा ठेकेदार के माध्यम से, भारत के सुदूर गाँवों और छोटे शहरों से आये इन श्रमिकों से ही होती है| सरकार ये भी अच्छी तरह से जानती थी कि इन बड़े अथवा छोटे उद्यमियों से कितना भी हाथ जोड़कर कहा जाये पर जब सरकारें खुद अपने कर्मचारियों को यथोचित वेतन तक देने की स्थिति में नहीं है तो ये उद्यमी जब उत्पादन और विक्रय दोनों बंद हैं, कहाँ से इन मजदूरों को वेतन का भुगतान करेंगे। तब देश में लॉक-डाउन घोषित करने के तुरंत बाद ऐसी ही विशेष ट्रेन चलाकर इन्हें अपने गाँव और घरों को वापस जाने का अवसर क्यों नहीं दिया गया? यहाँ यह विशेष रूप से स्मरणीय है कि जब लॉक-डाउन घोषित किया गया तब देश में कोविद संक्रमितों की संख्या मात्र 500 के आसपास थी और साथ ही इस बात की संभावना भी बहुत कम थी कि इन हजारों श्रमिकों में से कोई संक्रमित भी हो क्योंकि तब संक्रमण उन्हीं लोगों के मध्य था जो विदेश से लौटे थे अथवा किसी ऐसे संक्रमित के संपर्क में आए थे जो विदेश से लौटा हो।
सरकार का जबाब ये हो सकता है कि यदि इन श्रमिकों को इनके गाँव जाने दिया गया होता और इनसे संक्रमण गांवों और छोटे शहरों तक फैलता तो वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की समुचित व्यवस्था नहीं होने से संक्रमण के फैलाव को रोकना संभव नहीं हो पाता। लॉक-डाउन की अवधि में देश के छोटे से छोटे गाँव तथा नगर में कोरोना के परीक्षण तथा उपचार की व्यवस्था स्थापित हो जाएगी। पर धरातल पर इन पाँच सप्ताह के भीतर गांवों की बात तो छोड़ भी दें, बड़े शहरों में भी कोरोना परीक्षण का कोई माकूल ढांचा उस स्तर पर नहीं खड़ा हो पाया है कि संक्रमण को पहले ही पता करके रोका जा सके। न ही छोटे नगर अथवा जिला स्तर भी चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार करने के कोई प्रयत्न भी किए गए हैं। अब जब इन्हें वापस ले जाने के लिए ट्रेन चलाई जा रही है देश बुरी तरह कोरोना संक्रमण की गिरफ्त में है। संक्रमितों की संख्या 42000 से ज्यादा है और संक्रमण से हुई मृत्यु 1400 के आंकड़े को छू रही है।
सरकार के इन्हें वापस लाने के लिए विशेष ट्रेन चलाने के निर्णय के बाद भी सभी जानते हैं कि देश में गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और अनेक जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। शायद ही कोई विश्वास करेगा कि रेलवे के लिए यह संभव है कि वह समुचित संख्या में ट्रेन चलाकर देश के अनेक राज्यों की सीमाओं और हाईवे पर भटक रहे इन लोगों को वापस इनके घरों को वापस भेजने की कोई माकूल व्यवस्था कर पाये। उस पर तुर्रा यह कि रेलवे इन सभी का किराया राज्य सरकारों से वसूल करने वाली है। राज्य सरकारें पहले से ही अपने कर्मचारियों को वेतन तक नहीं दे पाने की स्थिति में हैं। यदि कोई व्यवस्था हो सकती थी तो वह केवल लॉक-डाउन की तिथी घोषित करने के बाद नियमित ट्रेनों को कुछ अवधि तक चलाकर इन्हें वापस जाने का अवसर प्रदान करने की ही हो सकती थी। तब इन श्रमिकों की आर्थिक हालत भी आज से बेहतर होती और ये रेलवे को खुद किराया दे सकते थे। वैसी स्थिति में अभी को यात्रा के पहले स्वास्थ्य परीक्षण हो रहा है उसका पैसा और राज्य में वापस जाने के बाद स्वास्थ्य परीक्षण पर को खर्च होने वाला है, सभी से बचा जा सकता था। जैसा कि सरकार ने स्वयं लोकसभा का सत्र समाप्त होने के बाद और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनाने के बाद लॉक-डाउन घोषित किया ताकि सांसद अपने घरों को वापस लौट सकें और मध्यप्रदेश में सरकार बन सके। क्या, इन मजदूरों के लिए जो वास्तव में देश का निर्माण करते हैं लौटने के लिए दो दिन का समय लॉक-डाउन घोषित करने के बाद नहीं दिया जा सकता था?
अरुण कान्त शुक्ला
3 मई 2020

               
   



               
   


Saturday, April 25, 2020

कर्मचारियों के वेतन पर हमला गलत है


तेलंगाना, आंध्रा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु के बाद अब केंद्र सरकार ने भी अपने लगभग 60 लाख कर्मचारियों और 40 लाख पेंशनधारियों से कोरोना से लड़ने की कीमत वसूलने के आदेश निकाल दिए हैं। यदि कोई चाहे तो इसे संकीर्णता कह सकता है पर मैं मंत्रियों, सांसदों, विधायकों या इसी तरह के पदों पर बैठे लोगों के वेतन-भत्तों में कमी को कोई महत्व नहीं देता। यह कुछ वैसा ही है कि हाथी के खाने में से 100 ग्राम खाना कम कर लिया जाये और हाथी कहे मैंने त्याग किया। इसी तरह सांसदों या विधायकों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाली रकम में कमी भी केवल दिखावा है। इधर खबरे आ रही थीं की सांसदों और विधायकों ने अपनी सांसद या विधायक राशी से पाँच-दस लाख रुपया पीएम केयर फंड में दिया, वह भी दायीं जेब से रुपया निकालकर बाईं जेब में रखने वाला ढोंग ही है। वैसे भी सभी जानते हैं कि इस राशी का कितना भाग कितनों की जेब में जाता है। प्रश्न यह है कि अभी भारत में सरकार को कोरोना महामारी को एक महामारी माने एक माह ही हुआ है। सरकार ने जो भी फंड इस महामारी से लड़ने के लिए घोषित किया है, उसका एक तिहाई भी अभी जारी नहीं किया होगा। यदि किया होता तो उसका परिणाम हमें देश के मेडिकल स्टाफ के पास पर्याप्त मात्रा में पीपीई किट, मास्क, पर्याप्त वेंटिलेटर और अन्य उपकरणों के रूप में दिखाई देने लगते। हमारे पुलिस विभाग के लोग, अन्य सुरक्षाकर्मी, सफाई कर्मचारी उस तरह निहत्थे न दिखते, जैसे दिखाई पड़ रहे हैं। राज्य सरकारें शिकायत कर रही हैं कि उन्हें पूर्व का ही जीसटी का हिस्सा, मनरेगा का पैसा नहीं मिला है और जो फंड दिया है वह अपर्याप्त है। देश के प्रत्येक समर्थ तबके ने, संगठित और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों सहित, पीएम केयर फंड में योगदान दिया है। उसमें कितना पैसा आया और उसका कितना हिस्सा इस्तेमाल हो चुका, यह किसी को नहीं पता है। पूर्व से मौजूद प्रधानमंत्री राहत कोष में पड़ी राशी का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है? यह अभी तक बताना भी मुनासिब नहीं समझा गया है। भारत के 63 अरबपतियों की कुल दौलत भारत सरकार के वर्ष 2019-20 के कुल बजट  27 लाख 83 हजार 349 रुपये से अधिक है। इन अरबपतियों की दौलत से एक पाई भी लेने में असमर्थ सरकार आश्चर्यजनक रूप से लॉक-डाउन के मात्र 27 दिनों के भीतर ही अपने कर्मचारियों को पूरा वेतन देने में अपनी असमर्थता दिखा रही है।  
तेलंगाना में मुख्यमंत्री, राज्य मंत्रिमंडल, एमएलसी, विधायकों, राज्य निगम अध्यक्षों और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के वेतन से 75%, आईएस, आईपीएस, आईएफएस और अन्य केंद्रीय सेवाओं के अधिकारी की सैलरी से 60% तथा अन्य सभी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन से 50% की कटौती होगी। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन से 10% की दर से कटौती की जाएगी। पेंशनर्स की पेंशन का भी कुछ हिस्सा काटा जाएगा। खबरों के मुताबिक, राज्य में इस बार सभी पेंशन धारकों के खाते में सिर्फ आधी पेंशन आएगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वेतन में कटौती कब तक जारी रहेगी और क्या कर्मचारियों को भविष्य में कटौती की गई राशि का भुगतान किया जाएगा। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों की तन्ख्वाह में 60%, ए और बी श्रेणी के कर्मचारियों की सैलरी में 50%, सी श्रेणी के कर्मचारियों की सैलरी में 25% की कटौती की जाएगी। गनीमत है इस फैसले से डी क्लास के कर्मचारियों को अलग रखा है और उन्हें पूरी तन्ख्वाह मिलेगी। आंध्र प्रदेश में कर्मचारियों को वेतन देना ही बंद कर दिया गया है। मध्यप्रदेश के राज्य कर्मचारियों को भी बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता नहीं दिया जाएगा। केंद्र सरकार इस मामले में बड़ी स्पष्टवादी है। उसने जनवरी तथा जुलाई 2020 और जनवरी 2021 में कर्मचारियों और पेंशनरर्स को मिलने वाले महंगाई भत्तों को देने से मना ही नहीं किया बल्कि यह भी कह दिया कि यह पैसा कभी मिलेगा ही नहीं। देश के वरिष्ठ नागरिक जो पेंशन पर ही निर्भर रहते हैं, कैसे यापन करेंगे, यह सरकार की चिंता का विषय नहीं है।
जाहिर है यह सिलसिला यहाँ रुकने वाला नहीं है। अन्य राज्य सरकारें भी देर-सबेर इसी रास्ते पर चलने वाली हैं। केंद्र सरकार भी निश्चित रूप से देश के बीमा, वित्तीय क्षेत्र के संस्थानों, कारखानों, पर दबाव बनायेगी कि वे भी ऐसा निर्णय करें और पैसा सरकार को सौंपें। प्रधानमंत्री ने अपने पिछले दो संबोधनों में हाथ जोड़कर देश के छोटे बड़े सभी उद्धमियों से प्रार्थना की थी कि वे अपने यहाँ काम करने वाले कामगारों की रोजी या वेतन न तो रोकें और न काटें। बुद्धूबक्से के समाचार वाले चैनलों से यह सुनते समय बहुत अच्छा लगा था। पर, प्रधानमंत्री ने उस समय यह नहीं बताया कि इन छोटे उद्धमियों, ठेकेदारों के पास काम बंद होने के बाद पैसा आयेगा कहाँ से, जिससे इन मजदूरों का वेतन दिया जाएगा? नतीजा, आज हम देख रहे हैं कि लाखों की संख्या में लोग अपने गांवों में पहुँचने के लिए बेताब हैं और पैदल निकल पड़े थे। सरकारों की आर्थिक स्थिति की बात को दरकिनार करके भी हम सिर्फ यह सोचें कि क्या जो व्यवस्था सामान्य समय में अपने पूरे नागरिकों को भोजन मिले इसकी गारंटी नहीं लेती, वह पूरे देश की अनगिनत सड़कों को नापते इन लोगों के पास पहुँचकर इन्हें भोजन मुहैया करा पायेगी? सामाजिक संस्थाएं लॉक-डाउन की परिस्थिति में कितनी मदद कर पाएँगी और क्या वह पर्याप्त होगी।
अब हम उन कामगारों की तरफ आते हैं जिनका नियोक्ता वह वर्ग है जिसका वेतन केंद्र और राज्य की सरकारें काट रही हैं या रोक रही हैं। संगठित क्षेत्र का यह कर्मचारी वर्ग मध्यवर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा तो है ही साथ ही घरेलु कामगारों का बहुत बड़ा नियोक्ता भी है। हमारे देश में इनकी संख्या भी कम नहीं है। लगभग चार करोड़ से अधिक लोग हैं जो घरेलु कामगार, माली, प्लमबर, धोबी, इलेक्ट्रिशियन, चौकीदार, गार्ड, ड्राईवर, आया, चाईल्ड केयर टेकर, तथा सफाई कर्मचारी के रूप में साप्ताहिक अथवा मासिक वेतन पर मध्यवर्ग से लेकर उच्च आयवर्ग तक के लोगों के घरों में काम करते हैं और लॉक-डाउन के बावजूद इनसे पूरा वेतन पा रहे हैं। इसके अतिरिक्त लगभग दो करोड़ से अधिक वे स्वरोजगारी हैं जो फेरी लगाकर घरों में लगने वाली रोज़मर्रा की जरूरतों जैसे सब्जी, फल इत्यादी की पूर्ति करते हैं। यह वह समानान्तर अर्थव्यवस्था है, जिससे समाज का वह वर्ग अपनी आजीविका चलाता है जो सरकार की जीडीपी में नहीं आता। जब सरकार के पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए पूरे पैसे नहीं हैं तो सरकार, अन्य नियोक्ताओं से जिनके कारखाने बंद हैं, जिनके कार्यों पर रोक है और जो एकबार बंद करने के बाद श्रम-शक्ति की अनुपलब्धता के चलते तुरंत चालू भी नहीं कर सकते, उम्मीद ही कैसे कर सकती है कि वे अपने कामगारों को वेतन दें? यह अद्भुत बात सरकार को समझनी तो होगी कि बंद बाजार को भी तरलता की जरूरत होती है। और, ऐसे संकट के समय वह तरलता सरकार ही उपलब्ध करा सकती है। सीधे उनके हाथों में पैसे देकर जो खुद रोजगार के जनक हैं। केंद्र और राज्यों की सरकारों को कर्मचारियों के वेतन में कटौती करने या वेतन को रोकने के निर्णय पर पुनर्विचार कर इसे वापस लेना चाहिए। कर्मचारियों के वेतन पर हमला गलत है।   
अरुण कान्त शुक्ला
25/4/2020

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना: हल एक, समस्याएँ अनेक



प्रधानमंत्री ने मात्र चार दिनों के पश्चात आज 24 मार्च को पुन: देश को संबोधित करते हुए भारत को 21 दिनों तक के लिए लॉक-डाउन मेँ डाल दिया है । वे सभी राज्य और केंद्र प्रशासित क्षेत्र जो पहले से ही या तो लॉक-डाउन में थे या कर्फ़्यू का सामना कर रहे थे, अब पूर्ण लॉक-डाउन मेँ होंगे। अब यह लॉक-डाउन संपूर्ण देश मेँ और कड़ाई से लागू किया जाएगा। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की ताजी रिपोर्ट के अनुसार अभी तक भारत संक्रमण  की तीसरी स्टेज याने सामुदायिक संक्रमण से दूर है। आईसीएमआर  के अनुसार संक्रमण अभी उन्हीं लोगों तक सीमित है जो या तो कोरोना वायरस प्रभावित देशों से आए हैं या ऐसे लोग जो विदेश से आए संक्रमित लोगों के संपर्क में आए हैं। यह एक राहत की बात हो सकती है। पर, इसका आधार कमजोर है क्योंकि देश में कोरोना से संक्रमित हैं या नहीं, इसकी टेस्टिंग सिर्फ उन्हीं लोगों की हो रही है जो उपरोक्त में से किसी श्रेणी में आते हैं। वह जैसा भी हो पर क्रूर सचाई यही है कि इस वायरस से संक्रमित होने के बाद इसका कोई इलाज नहीं है। कोई वेक्सीन नहीं है जो इससे बचा सके। हल केवल एक है संक्रमण से बचा जाये। अपने को सबसे अलग कर लो। किसी सार्वजनिक जगह पर न जाया जाये, जहां से संक्रमण आप तक और फिर आपके जरिये आपके परिवार और फिर उन सभी तक जो आपके संपर्क में आ रहे हैं, पहुंचे। यही सामाजिक दूरी है जिसे सोशल डिस्टेनसिंग भी कहा जा रहा है। चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, स्पेन से लेकर उन सभी देशों का अनुभव हमें बताता है कि उन्हें भी अपने लोगों को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए कर्फ़्यू या लॉक डाउन में ही जाना पड़ा और सोशल डिस्टेनसिंग को ही बलपूर्वक लागू करवाना पड़ा। प्रधानमंत्री ने लोगों को किसी भी तरह के अंधविश्वास से दूर रहने की भी अपील की। याने, अपरोक्ष रूप से उन्होने अपने ही सिपलसहारों को नसीहत दी कि गौमूत्र या गोबर का लेप, कोरोना गो बैक गाना, जुलूस निकालना या राम रक्षा करेंगे, इसका हल नहीं है, जैसा कि कुछ भाजपा और सरकार में बैठे मंत्री कह रहे थे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीन में इस वायरस के फैलाव और फिर अन्य देशों में इसके पहुँचने की रफ्तार को देखते हुए 30 जनवरी 2020 को ही इसे अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया था। हमारी सरकारों तथा देशवासियों ने तब इसे उस गंभीरता से नहीं लिया, जिसकी आवश्यकता थी। वे सभी एहतियाती कदम जो पिछले दो हफ्तों में उठाए गए हैं कुछ पहले उठाए गए होते तो परिस्थिति और ज्यादा नियंत्रण में होती। विशेषकर, उन सभी लोगों की कड़ाई से जांच होनी चाहिये थी जो कोरोना प्रभावित देश से आ रहे थे और फिर उन्हें सरकारी स्तर पर, सरकारी खर्च पर आईसोलेशन में रखने की व्यवस्था करनी चाहिये थी ताकि वे आईसोलेशन की अवधि में समाज में घुलमिलकर संक्रमण को फैला न पायें। इन दो हफ्तों मेँ हमारे सामने ऐसे अनेकों उदाहरण आए जिनमें रसूखदार अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय दोनों एयरपोर्ट से न केवल बिना जांच के निकल आए, बल्कि सोसाईटी में भी जमकर घूमे-फिरे, नाचे-गाये और फिर कोरोना पाजीटिव निकले। विश्व के किसी भी देश के संपन्न तबके की तुलना में भारत का संपन्न वर्ग बहुत ज्यादा अहंकारी, दिखावा पसंद, केवल नियमों को तोड़ने वाला नहीं बल्कि नियमों को तोड़कर लाभ उठाने में शान समझने वाला  और समाज के प्रति अपने दायित्वों-कर्तव्यों से भागने वाला है। यह पिछले दो हफ्तों में बार बार प्रमाणित हुआ है।
हमारे देश में कोविद-19 को लेकर जो भी जागरूकता-गंभीरता पिछले दो सप्ताह में दिखाई दी है, वह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 11 मार्च को कोविद-19 को वैश्विक महामारी घोषित करने के बाद आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे महामारी तभी घोषित किया जब चीन ने अपने बल पर इस पर काबू पा लिया और इस महामारी का केंद्र बदल कर यूरोप हो गया। आज ब्रिटेन, अमेरिका सहित यूरोप के सभी देश इस महामारी से अपने देश के लोगों को बचाने के लिए अरबों रुपये खर्च कर रहे हैं। चीन में इसे पूरे देश को लॉक डाउन करके काबू में किया गया और अब यूरोप भी उसी रास्ते पर है। हमारे देश में भी उन्हीं 5 बातों पर ज़ोर दिया जा रहा है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताईं हैं, सामाजिक दूरी, स्वप्रेरित-अलगाव, बार बार हाथों को धोना, खाँसते और छीकते वक्त कोहनी का इस्तेमाल और जरा भी महसूस होने पर कोविद-19 का टेस्ट कराकर आईसोलेशन में जाना। हमारे जैसे देश में जहां हाशिये पर रह रहे लोगों की संख्या अमेरिका की जनसंख्या से भी ज्यादा होगी, ये सभी उपाय, सिर्फ कोहनी की आड़ लेकर खाँसना-छींकना को छोड़कर, हाशिये पर जीवित लोगों की समस्याओं को कई गुना बढ़ाने वाले हैं।     
सामाजिक दूरी का पालन भारत के वे लोग जो झुग्गी-झौपड़ी में रहते हैं, कैसे करेंगे? अभी ही इस सामाजिक दूरी के पालन में तथा उसे बनाए रखने के लिए लगाए जा रहे लॉक-डाउन तथा कर्फ़्यू के चलते हजारों छोटी तथा माध्यम औद्योगिक इकाईयाँ, ढाबे, रेस्टोरेन्ट, खुदरा दुकाने जो बंद हैं उनमें काम करने वाले कर्मचारी, निर्माण क्षेत्र में लगे मजदूर, स्टार्ट-अप से स्व-व्यवसाय चालू करके व्यवसाय करने वाले, बेरोजगार होकर अपने अपने गाँव वापिस लौटने वाले लाखों लोग, आने वाले समय में अपना गुजारा कैसे करेंगे, इस समस्या से जूझ रहे हैं? सबसे ज्यादा कुपोषण भारत में है। देश के ये कुपोषित पुरुष-महिला और बच्चे कोविद-19 के वायरस का मुक़ाबला कैसे करेंगे? जबकि, हमारे देश का संपन्न और उच्च मध्यमवर्ग इस खुशफहमी को फैलाने में लगा है कि क्योंकि हमारे देश के लोग पूर्व से ही यूरोप और चीन की तुलना में अधिक असुरक्षित (Vulnerable) दशाओं में रहते हैं, इसलिए कोविद-19 के प्रति हमारे शरीर में प्रतिरोधक शक्ति ज्यादा है। अमेरिका, ब्रिटेन तथा अन्य यूरोपीय देशों में प्रति एक लाख लोगों में से हजारों की संख्या में कोरोना-परीक्षण कराया जा रहा है ताकि कम्यूनिटी ट्रांसमीशन को रोका जा सके। हमारे देश में ये प्रति लाख दस से भी नीचे है। जब परीक्षण ही इतने कम लोगों का हो रहा है तो कम्यूनिटी ट्रांसमीशन को कैसे जाना-रोका जा सकेगा?
प्रधानमंत्री जब 19 मार्च को देश के लोगों को संबोधित करने आए तो उनसे उम्मीद थी कि वे उन सारी सलाह के साथ साथ जो उन्होने दीं, लोगों के सामने आ रही और आने वाली आर्थिक और सामाजिक कठिनाईयों पर भी बोलेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। आज भी उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 15000/- करोड़ के पेकेज देने के अलावा हाशिये के लोगों का गुजारा कैसे होगा, उसके लिए कुछ नहीं कहा।  राज्यों की सरकारों ने जरूर कुछ एलान किए हैं और केरल में तो बाकायदा 20,000 करोड़ रुपए का पेकेज लागू किया गया है। हाल ही में वित्त मंत्री ने राज्यों को तीन महीने का राशन का कोटा उधार देने की बात कही है। उद्योगपतियों और व्यापारियों को जीएसटी देर से जमा करने जैसी छूट भी दी गई है। रजिस्टर्ड कामगारों तक तो राज्य सरकारें बैंक के माध्यम से कुछ नगद राशी पहुंचा सकेंगी, पर उन मजदूरों का क्या होगा, जो दिहाड़ी पर काम करते हैं और रजिस्टर्ड नहीं हैं?
कोरोना वायरस से देश के सामने त्रिस्तरीय चुनौतियाँ पेश हैं। पहली, हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा आम लोगों को उपलब्ध कराने के लिए पहले ही बहुत कम पैसा खर्च किया जाता है और देश की सार्वजनिक सेवाओं में यह दिखता भी है, जब आम तौर पर ही मरीज सरकारी अस्पतालों में बरामदे लेटे दिख जाते हैं, जिनके लिए बिस्तर तक उपलब्ध नहीं हो पाता है। यदि, ऐसा कभी न हो तो बेहतर है, कोरोना वायरस कम्यूनिटी ट्रांसमीशन में प्रवेश कर जाता है तो आईसीयू की बात छोड़िए, हम बिस्तर तक उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं हैं, जैसा कि एबीपी न्यूज चैनल की एक एंकर चिल्ला चिल्ला कर कह रही थी कि ये कोरोना संक्रमित लोग क्यों सोसाईटी में घूम रहे हैं, क्या ये नहीं जानते कि हम चीन नहीं हैं कि एक दिन में ही 1000 बिस्तरों वाला अस्पताल बना कर खड़ा कर देंगे। प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद भी इसमें संशय ही है कि भारत का निजी चिकित्सा सेवा वाला कारपोरेट सेक्टर दृण इच्छा-शक्ति के साथ सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के साथ संयोजन करके बिना शुल्क चिकित्सा सेवाओं को देने के लिए खड़ा होगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम कितना भी खुश हो लें कि प्रधानमंत्री के कहने पर 22 मार्च (रविवार) को जनता-कर्फ़्यू सफल रहा, पर, उसके पीछे की सचाई यही है कि आवाम का बहुत बड़ा हिस्सा इस बात को विश्वासपूर्वक समझता है कि महा-आपदाओं और त्रासदियों में उसे राहत पहुंचाने की सरकार की क्षमता बहुत ही सीमित है और उसे अपनी रक्षा और रोजी-रोटी का इंतजाम खुद ही करना होगा। इसीलिए, दूसरे दिन से ही लोगों का बाहर निकलना शुरू हो गया था। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि इन सारे उपायों से जो किए जा रहे हैं, कोरोना संक्रमण को हम सीमित रखने में सफल भी होते हैं तो पहले से ही जर्जर अर्थव्यवस्था को जो धक्का इससे लग चुका है, उसे संभालने की कोई भी ताकत इस सरकार के पास दिखाई नहीं देती है। कोरोना वायरस का हल एक ही है, जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है और विश्व के सभी देशों की सरकारे भी कह रही हैं रोकथाम, दूरी, बंद, लॉक-डाउन, कर्फ़्यू, पर, सबके सामने, इस वायरस के जीवित रहते भी और मर जाने के बाद भी समस्याएँ अनेक हैं और होंगी।
अरुण कान्त शुक्ला
24/3/2020                
     
     
  

Wednesday, March 18, 2020

यह आखिरी किला नहीं है


मुझे ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति द्वारा पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने के बाद शायद लोगों को सबसे ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया जस्टिस मदन बी लोकुर(हाल ही में रिटायर्ड) की ही लगी होगी। उन्होनें कहा कि “अटकलें लगाई जा रही थीं कि जस्टिस गोगोई को क्या सम्मान मिलेगा? तो ऐसे में उनका नामांकन आश्चर्यजनक नहीं है लेकिन जो आश्चर्य की बात है, वह यह है कि फैसला इतनी जल्दी आ गया। यह न्यायपालिका की स्वतन्त्रता, निष्पक्षता और अखंडता को फिर से परिभाषित करता है। क्या आखिरी किला भी ढह गया है?” जस्टिस मदन बी लोकुर ने अपनी बात की अंतिम पंक्ति में जिस सवाल को किया है, उसका एक ही जबाब हो सकता है कि ढहा तो है, पर, न यह पहला किला था और न ही आखिरी। एक ऐसी व्यवस्था में, जिसमें कि हम रह रहे हैं किले पहले भी ढहे हैं और आगे भी   ढहते रहेंगे। इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है कि सेवानिवृति के मात्र चार माह के अंदर राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया। राजनीति में उपकार करने वालों को हमेशा सम्मान (रिवार्ड) मिलता रहा है, बस कुछ नया है तो आज केंद्र की सत्ता में जो राजनीतिक ताकत बैठी है, उसका इस हाथ दे, उस हाथ ले’, वाला तरीका, ताकि शेष उपकार करने वाले भी आश्वस्त हो जाएँ कि उन्हें भी उपकार का ईनाम तुरंत मिलेगा।
गोगोई जी का कहना है कि वे शपथ लेने के बाद बताएँगे कि उन्होंने राज्य सभा की सदस्यता क्यों मंजूर की। वैसे इस बात की संभावना नहीं के बराबर ही है कि वे कोई ऐसा रहस्योद्घाटन करें कि जिससे हिंदुस्तान की सियासत में वो भूचाल आए जो सब कुछ उलट-पलट कर रख दे। इसके ठीक उलट संभावना इसी की ज्यादा लग रही हैं कि वे ऐसा कुछ कहें, जिससे इस हाथ दे, उस हाथ ले वाला सूत्र ही ज्यादा मजबूत हो। गोगोई उन चार जज में से एक थे, जिन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस करके पूर्व जस्टिस दीपक मिश्रा के निर्णयों और सरकार के न्यायालीन प्रक्रिया में असर डालने की कोशिश के खिलाफ खुलकर बातें की थी। पर, अपने मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल के समय के उनके निर्णय लोगों को हतप्रभ करने वाले ही रहे। 2018 में जब वे एक 5 जजों वाली बेंच के प्रमुख थे, उन्होंने किसी संदर्भ में रिमार्क दिया था कि रिटायरमेंट के बाद जजों का लाभ वाले पदों पर जाना स्वतंत्र न्यायपालिका के माथे पर एक दाग है। बहरहाल इस लेख में मेरा उद्देश्य न्यायाधीश और न ही मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उनके कार्यों, निर्णयों अथवा बातों को कुरेदना नहीं है।
बल्कि, उससे इतर मैं यह कहना चाहता हूँ कि राजनीति की जिस शैली में हम हैं सत्ता में जो भी दल हो वह राज्यसभा की सदस्यता, आयोगों के अध्यक्ष तथा सदस्य के पदों, विभिन्न बोर्डों के अध्यक्ष तथा सदस्यों के पदों, विश्वविद्यालयों के उपकुलपति के पदों, जांच आयोगों के पदों का इस्तेमाल कार्यपालिका और न्यायपालिका के बड़े और प्रमुख लोगों को लोभ देकर अपने पक्ष में कार्य कराने अथवा निर्णय पाने के लिए करता है। यह तरीका पहले भी अपनाया गया और आज भी अपनाया जा रहा है। फर्क सिर्फ यह है कि आज सिर्फ इसी तरीके को अपनाकर सरकार चल रही है। आज करीब करीब सभी स्वायत्त संस्थाएं, नाम के लिए भी स्वायत्त नहीं रह गईं हैं तथा सबके प्रमुखों को या तो संस्था को छोडकर जाना पड़ रहा है अथवा सरकार के इशारे पर सभी नियमों और संविधान के प्रावधानों तक की अवहेलना करके सरकार की मंशा के अनुसार कार्य करने मजबूर होना पड़ रहा है। देश के उच्च पदों पर बैठे ऐसे लोग जो भारत के 50 करोड़ गरीब लोगों की बात छोड़ भी दें तो ऊंचे दर्जे के मध्यवर्ग के रहन-सहन से भी ज्यादा बेहतर रहन-सहन से बल्कि ठसन और रुआब से जिंदगी भी बिताते रहते हैं और अपनी सद-इच्छा, भलमनसाहत और ईमानदारी तथा आम लोगों के प्रति अपने कर्तव्य को केवल इसलिए बेचते रहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद कुछ और वर्ष के लिए पद तथा सुविधाएं मिल जाएँ, तब वे नहीं जानते कि वे लोकतन्त्र को एक ताबूत में बंद कर उसमें कील ठोक रहे हैं।हमारे देश में ही क्या, किसी भी देश में जहां हमारे जैसा लोकतन्त्र है, लोकतन्त्र की आवश्यकता कभी उस देश के संपन्न तबके को नहीं पड़ती। संपन्न तबका तो अपने कानूनी और गैरकानूनी सभी काम अपने रसूख और पैसे के दम पर करवाता रहता है। यह तो निचला तथा मध्य-वर्ग ही है जो जायज कामों के लिए भी अपनी एड़ियाँ रगड़ते फिरता है। यही वर्ग है जो सरकारी सेवा के बड़े अफसरों, न्यायपालिका के जजों और देश के संपन्न तबकों, जिनमें डाक्टर,वकील जैसे पेशों के लोग भी शामिल हैं, की ओर, हजारों बार धोखे खाने के बाद भी आशा भरी नजरों से देखता रहता है। उसने बहुत किले ढहते देखे हैं। उसी तबके का विश्वास एक बार और टूटा है। पर, वह जानता है की यह आखिरी किला नहीं है।        
अरुण कान्त शुक्ला
18/3/2020     


पेट्रोल डीजल में एकसाईज़ ड्यूटी बढ़ाना यह तो सरासर पाकेटमारी है


सरकार का प्राथमिक काम नागरिकों की तथा उनके अधिकारों की रक्षा करना होता है। यादी दो नागरिक किसी एग्रीमेंट में जाते हैं और उनमें से कोई एक उसे पूरा नहीं करता अथवा किसी अन्य तरीके से उसका उल्लंघन करता है तो पीड़ित नागरिक के पास यह अधिकार होता है कि वह दोषी के खिलाफ न्यायालय में कार्यवाही की मांग कर सके। सरकार की अनेक नीतियों के साथ भी बिलकुल वही स्थिति होती है। ये नीतियाँ एकतरफा घोषणाएँ नहीं होती हैं बल्कि सरकार की तरफ से नागरिकों के साथ किया गया एक प्रकार का करार ही होती हैं जिन्हें तोड़ना नागरिकों के साथ किए गए करार को तोड़ने के बराबर ही होता है। दरअसल, मैं पेट्रोल और डीजल में एक दिन पहले केंद्र सरकार के द्वारा बढ़ाई गई एकसाईज़ ड्यूटी के बारे में बात कर रहा हूँ।

आप कह सकते हैं कि यह तो कोई पहली बार नहीं हुआ है। यह सच है, यह पहली बार नहीं हुआ है, पर, एक बार नीतिगत निर्णय के रूप में यह तय करने के बाद कि क्रूड आईल की कीमतों को तय करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं होगी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो भी तेल के भाव होंगे उपभोक्ताओं को उसी के अनुसार भुगतान करना होगा। ये भाव भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर रोज जो भाव होंगे देश में उसी के अनुसार रोज़मर्रा तय किए जाएँगे। याने, सरकार ने स्वयं को उपभोक्ताओं और कंपनियों के बीच से हटा लिया तथा अब ग्राहक या कंपनी को होने वाले मुनाफे-घाटे से उसका कोई संबंध नहीं रहा। अब जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रूड आईल के दाम घटकर 34 डालर प्रति बेरल रह गए हैं तो दामों में यह कमी सीधे सीधे उपभोक्ता के पास पहुंचनी चाहिए थी। पर, सरकार ने तुरंत पेट्रोल और डीजल पर 3/- प्रति लीटर की बढ़ौत्तरी के साथ साथ स्पेशल एक्साईज ड्यूटी तथा रोड सेस में भी बढ़ौत्तरी करके लगभग 6/- से 7/- प्रति लीटर का फायदा जो उपभोक्ता की पाकेट में जाना चाहिये था, अपनी जेब में डाल लिया है। यह पहली बार नहीं है कि ऐसा किया गया है। प्रशासनिक स्तर पर भाव नहीं तय किए जाने की नीति आने के बाद से यह सरकार पेट्रोल डीजल के उपभोक्ताओं के साथ लगातार इस पाकेटमारी को कर रही है। नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच 9 बार एक्साईज़ ड्यूटी बढ़ाई गई।

यह कहा जा सकता है कि टेक्स बढ़ाने का अधिकार सरकार के पास है और वह कभी भी इस अधिकार का प्रयोग कर सकती है। इसे पाकेटमारी कहना ठीक नहीं है। मैं इस तरह के तर्क से सहमत हो सकता था, यदि सरकार ने एक्साईज़ ड्यूटी नार्मल तरीके से नार्मल समय में बढ़ाई होती। पर, प्रत्येक समय यह तभी किया गया, जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रूड के दाम कम हुए और उसका फायदा उपभोक्ता को मिलने वाला था, उसे सरकार ने एक्साईज़ ड्यूटी बढ़ाकर उपभोक्ता के पाकेट में जाने से पहले छीन लिया। यह सरासर पाकेटमारी नहीं तो क्या है?

अरुण कान्त शुक्ला
16 मार्च 2020 

Thursday, May 30, 2019

अगले 5 साल मोदी-2, पूत के पाँव पालने में दिख रहे...


अगले 5 साल मोदी-2, पूत के पाँव पालने में दिख रहे...
जी हाँ, विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत के मतदाताओं ने 2019 के आम चुनावों में फैसला दिया है कि नरेंद्र मोदी ही अगले 5 सालों के लिए भारत के प्रधानमंत्री होंगे| पूर्ण बहुमत की सरकार को दोहराने का कारनामा इसके पूर्व सिर्फ देश के दो ही प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के नाम ही था| 50 वर्षों के बाद मतदाताओं ने यह मौका नरेंद्र मोदी को दिया है| यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर बढ़िया केंपेनर नरेंद्र मोदी की बम्पर जीत है| यदि भारतीय जनता पार्टी या उसकी गठबंधन की साथी पार्टी यह सोचतीं हैं कि यह जीत उनकी है तो यह खुशफहमी के अलावा कुछ और नहीं है| नरेंद्र मोदी इस चुनाव के बाद न केवल देश के एक बड़े और शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे हैं बल्कि उनका कद, जिसके सामने पहले ही भाजपा और एनडीए के बड़े से बड़े नेता नतमस्तक रहते थे, अब इतना बड़ा हो गया है कि किसी भी भाजपाई या एनडीए के नेता की जुबान उनके सामने खुलना असंभव ही है| यह सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी की जीत है, इसका प्रमाण प्रचार-अभियान के दौरान दिये गए उनके भाषण हैं जिनमें नरेंद्र मोदी खुद एक बार फिर- मोदी सरकार का नारा उपस्थित जनता से लगवाते थे और कहते थे भी थे कि आपका दिया हुआ एक एक वोट मोदी के खाते में जाएगा’|
2019 के आम चुनाव के परिणामों में यदि मोदी समर्थकों के लिए खुश होने का मसाला मौजूद है तो बाकी लोगों के लिए चिंतित और भयभीत होने के कारण भी मौजूद हैं| एक बात तय है कि 2013 में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिये चुने जाने के बाद से मोदी जी जिस चुनावी प्रचार के मोड में गए थे, अपने पूरे 5 साल के कार्यकाल के दौरान वे उससे कभी बाहर नहीं आये| कांग्रेस को कोसना, 60 सालों में देश में कोई विकास नहीं हुआ, इसका रोना रोना, कभी समाप्त नहीं हुआ| यहाँ तक की अपने ही द्वारा लाई गई उज्जवला, आयुष्मान, प्रधानमंत्री आवास योजना, जैसी फ्लेगशिप योजनाओं का जिक्र उनके भाषों में यदा-कदा ही रहता था और वह भी बस एक रिफरेंस के तौर पर| बेरोजगारी, नोटबंदी से फ़ैली अफरा-तफरी, जीएसटी से मची उथल पुथल, सीबीआई, रिजर्व बैंक, सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्ता,  जैसे विषयों पर बोलना उन्हें नहीं सुहाता था| मॉब लिंचिंग, दलितों पर अत्याचार, लव जिहाद को लेकर की गई लिंचिंग, जब 5सालों में उनके भाषण का हिस्सा नहीं बनी तो चुनाव प्रचार के दौरान तो उस पर बोलने का सवाल ही नहीं था| राष्ट्रीय सुरक्षा, उरी के बाद की सर्जिकल स्ट्राईक, पुलवामा का आतंकी हमला और बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राईक उनके प्रचार अभियान के प्रिय विषय थे| |
बहुत से लोगों को, जिनमें बुद्धिजीवी भी शामिल हैं, ऐसा लगा रहा है कि मोदी जी ने जिस तरह हिंदुत्व का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप से किया, उसने चुनाव में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| पर, क्या किसी भी समाज की मानसिकता में केवल पांच वर्षों के दौरान “हिंदुत्व” भरा जा सकता है जबकि उसी समाज को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने के प्रयत्न भी किये जाते रहे हों|  मुझे लगता है कि ऐसा तब तक नहीं हो सकता है जब तक उस समाज के अंदर धर्मान्धता, रूढ़ीवादिता और धर्म के आधार पर नफ़रत करने के बीज पहले से मौजूद न रहे हों| उस रूप में हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा| जितना धर्मनिरपेक्ष हमने उसे देखा और जाना वह अथक प्रयासों से आजादी की लड़ाई के दौरान बना था और वह भी कुल का बहुत थोड़ा हिस्सा था जो परिवर्तित हुआ था| यदि हम भारतीय समाज के उदारवादी तबके की उस धारणा से बाहर आकर देखें तो पायेंगे कि समाज के अंदर रोजमर्रा के जीवन की भी बातचीत और व्यवहार में धार्मिक विश्वास, जातीयता, के बिना पर भेदभाव करने की प्रवृति गहरे तक जड़ें जमाई हुई थी| यह संवैधानिक रूप से राज्य की उदारवादी अवधारणा का परिणाम था कि विधिमान्य रूप से कुछ क्षेत्रों में यथा शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, और अन्य सामाजिक जगहों पर समाज के बहुसंख्यक हिस्से को उदारवादी चेहरा बनाए रखना पड़ता है और था| पर, वह कभी भी शाश्वत स्थिति नहीं हो सकती और मोदी राज्य की शह पाते ही बहुसंख्यक हिस्से से वह उदारवादी नकाब हट गया|
23 मई को यह सुनिश्चित होने के बाद कि अब मोदी अपने दम पर 2014 से ज्यादा सीट पाकर और एनडीए के साथ मिलकर बड़े बहुमत की सरकार बनाने जा रहे हैं, उन्होंने ट्वीट करके एक सूत्र दिया कि अब “सबका साथ+सबका विकास+सबका विश्वास=विजयी भारत”| मोदी जी को यह सूत्र वाक्य देश के सामने परोसे ज्यादा समय नहीं गुजरा था कि 24 मई से एक वीडियो देशवासियों के सामने तैरने लगा जिसमें आधे दर्जन से ज्यादा लोग सिवनी में एक महिला समेत तीन लोगों को गौ-मांस ले जाने के शक में वीभत्स तरीके से पीट रहे हैं और उनके गले में गेरुआ दुपट्टा डालकर उनसे जय श्री राम कहलवा रहे हैं| बेगुसराय में एक मुस्लिम से नाम पूछा जाता है और फिर तुम्हें पाकिस्तान में होना चाहिये कहकर गोली मार दी जाती है| फिर, डाक्टर पायल तड़वी की आत्महत्या सामने आती है जिसमें उसकी सीनियर मेडिकल की छात्राएं उसे इतना प्रताड़ित करती हैं कि वह आत्म ह्त्या करने के लिये मजबूर हो जाती है| यह भी केवल उसके आदिवासी कोटे से आने का मामला नहीं है| हमें ध्यान देना होगा कि वह धर्म के आधार पर मुस्लिम थी| उसके पति, माँ और पिता की शिकायत के बाद भी कालेज प्रबंधन कोई कार्रवाई नहीं करता है| एक विदेशी साधू को, जो ध्यान लगाये बैठा था, बार बार जय श्री राम बोलने के लिये कहकर उकसाया जाता है और फिर उसके गले में चाक़ू मार दिया जाता है| मुम्बई में एक मुस्लिम युवक की टोपी उतरवाकर उससे मारपीट की जाती है| अल्पकाल में घटी ये सारी घटनाएं मोदी जी के सूत्र वाक्य को तिलांजली देने के लिये काफी हैं| मोदी जी चाहें और उनके समर्थक चाहें तो आसानी के साथ कह सकते हैं कि 130 करोड़ लोगों के देश में केवल पांच-छै मामले, पर हम तो यही कहेंगे कि पूत के पाँव पालने में दिख रहे हैं|
अंत में, यदि 2014 के आम चुनावों में किये गए वायदों के लिये चुनाव संपन्न हो जाने के कई माह बाद यह कहा गया था कि ये जुमले थे तो 2019 के आम चुनाव के लिये इंतज़ार की जरूरत नहीं है| ये चुनाव भी मोदी-अमित की जोड़ी ने जुमलों की घोड़ी पर चढ़कर ही जीते हैं| 2014 यदि अन्ना ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार की घोड़ी मोदी जी को मुहैया कराई थी तो इस बार मोदी जी ने पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों की शहादात और उसके बाद की गई एयर स्ट्राईक को सवारी बनाया| आज दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां राजनेता जनता की बुनियादी समस्याओं का हल ढूंढने के बजाय घूम-घूम कर नफ़रत भरे जुमले उछालते रहते हैं| ऐसा ही एक और जुमला हमने 23 मई की शाम को और फिर 25 की शाम को सुना जब मोदी जी ने क्रमश: भाजपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं को फिर संसद भवन के केन्द्रीय हाल में एनडीए के सांसदों को संबोधित किया| उन्होंने कहा कि मतदाताओं ने इस चुनाव में जाति की राजनीति को नकार दिया है| अब देश में दो ही जाति हैं एक गरीबी याने गरीब लोगों की और दूसरी जो गरीबी के खत्म करना चाहते हैं, उनकी| पर, दुर्भाग्य से उनके द्वारा दिए गए इस सूत्र के दूसरे हिस्से में याने गरीबी हटाने में मदद करने वालों में गरीबी के लिये जिम्मेदार अदानियों और अम्बानियों और सम्पत्तिवानों की भरमार है| हमने वालीवुड के अनेक अभिनेताओं को जुमलों की बदौलत सफल होते देखा है| अब हम यह राजनीति में देख रहे हैं| 
दुःख की बात यह है कि बेरोजगार मेहनतकश लोग लगभग दिशाहीन होकर नस्लवाद और राष्ट्रवाद को ही हल मानकर ऐसे जुमलेबाज नेताओं के झांसे में आकर गुमराह हो रहे हैं| उन्हें यह नहीं पता कि उनके हक कौन मार रहा है| वे कौन लोग हैं जिन्होंने उनकी जिंदगियों को तबाह कर डाला है| जुमले बाज नेता इस मायने में उस्ताद हैं कि वे आम देशवासी को उसकी बदहाली के वास्तविक कारणों का पता नहीं चलने देते| वे ऐसे अनेक ढेर सारे मुद्दे खड़े करने में प्रवीण होते हैं, जिनमें उलझकर लोग सोच भी नहीं सकें कि आखिर उनकी बदहाली के कारण क्या हैं|
अरुण कान्त शुक्ला
30/5/2019



Tuesday, May 21, 2019

भारत में लोकतंत्र का भविष्य


भारत में लोकतंत्र का भविष्य
देश के उदारवादी तबके के बुद्धिजीवि और प्रगतिशील लोगों के साथ साथ आमजनों का भी बहुत बड़ा तबका है जो भारत में लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंतित है| लोकतंत्र, जिसे स्वतंत्रता के 67 वर्षों में मात्र कुछ माह को छोड़कर हमारे देश के उदारशील प्रगतिवादी तबके ने, राजनीतिज्ञों ने, आमजनों ने बहुत ही शिद्दत के साथ लगातार पोषित किया था| यहाँ मैं 67 वर्ष इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के दिल्ली में काबिज होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि सरकार का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक ऐसे कट्टर अनुयायी के हाथों में चला गया है, जो भारत के संसदीय लोकतंत्र और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्ता को संघ के विचारों के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा मानता है और शनैः शनैः आज नहीं तो कल उन पर प्रहार अवश्य प्रारंभ होगा| पिछले ५ वर्षों के दौरान यह आशंका सच ही निकली है| वह चाहे सर्वोच्च न्यायालय हो, सीबीआई हो, रिजर्व बैंक हो या चुनाव आयोग हो, प्रत्येक संस्था संविधान के अंदर नियमों का प्रावधान करते हुए इसलिए गठित की गई थी कि वह देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिये सरकार से स्वतन्त्र होंकर स्वायत्त तथा पारदर्शी ढंग से कार्य करेगी, आज सरकार के हाथ में कठपुतली है और उसके निर्देशों पर समस्त संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाते हुए सिर्फ सत्ता प्रमुख और उसकी पार्टी को बचाने या उसके निर्देशों पर उन सभी के खिलाफ सक्रिय है, जो सत्तारूढ़ पार्टी की हाँ में हाँ मिलाने के लिये तैयार नहीं हैं|
आज जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ, 17वीं लोकसभा के लिये चल रहे आम चुनावों के आखिरी चरण के चुनाव का प्रचार अभियान पश्चिम बंगाल को छोड़कर शेष देश में थमने को है| पश्चिम बंगाल को छोड़कर इसलिए कि वहाँ मंगलवार 14 मई को भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुए अभूतपूर्व उपद्रव, आगजनी और हिंसा के बाद, जिसके दौरान पुनर्जागरण काल के समाज सुधारक, विधवा विवाह, स्त्रियों के लिये शिक्षा के अधिकार, विधवा विवाह के लिये कानून बनवाने(१८५६) के लिये आंदोलन चलाने वाले और पुरे देश में आदर के साथ याद किये जाने वाले ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की एक कालेज में स्थापित मूर्ति को तोड़ने की घटना के बाद चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए प्रचार पर पुरे दो दिन के बाद गुरूवार याने 16 तारीख की रात्री 10 बजे से रोक लगा दी थी| चुनाव आयोग के इस फैसले की सराहना होती यदि उसने ऐसा मंगलवार की रात्री अथवा बुधवार के प्रात: से भी किया होता| पर, चुनाव आयोग ने प्रचार पर बेन लगाने का फैसला लिया गुरूवार याने दो दिन के बाद रात्री 10 बजे से| राजनीतिक पार्टियों की बात तो छोड़ भी दें तो भी साधारण जन तक अचंभित थे कि यह कैसा फैसला है? स्पष्टत: गुरूवार को प्रधानमंत्री को पश्चिम बंगाल में दो रैलियां करनी थीं और चुनाव आयोग ने इसके लिये प्रधानमंत्री को पूरा वक्त दिया| वे सभी राजनीतिक दल जिन्होंने शुक्रवार को शाम 5 बजे चुनाव प्रचार थमने के पहले अपनी सभाएं रखी थीं, अपने प्रचार से वंचित हो गए| भारत में अभी तक हो चुके 16 आमचुनावों में चुनाव आयोग का सत्तारूढ़ दल के लिये इतना ममत्व भरा रवैय्या कभी नहीं देखा गया, जो आज पिछले 4 सालों के दौरान देखने मिल रहा है|
संसदीय लोकतंत्र में न्याय पालिका को विधायिका और कार्यपालिका के बाद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, पर, मेरे अनुसार, यद्यपि चुनाव आयोग उन तीनों स्तंभों में शामिल नहीं रहता, उसके बावजूद, क्योंकि वह चुनाव कराता है और उसके द्वारा घोषित परिणाम ही सरकार बनाते हैं, उसका महत्व लोकतन्त्र में किसी भी स्तम्भ से ज्यादा है| यदि वही पक्षपाती और फासीवादी प्रवृतियों का पिछलग्गू हो जाए तो बाद का पूरा लोकतन्त्र तो केवल नाटक ही है| ऐसा नहीं है कि केवल चुनाव आयोग की स्वायत्ता ही देश के लोकतन्त्र प्रेमियों को चिंता में डाल रही है|
चिंतित होने की जरूरत भारत की बहुलतावादी पहचान या संस्कृति पर हो रहे आक्रमण को लेकर भी है| जैसा मैंने पूर्व में इंगित किया कि पिछले 5 वर्षों में मोदी के नेतृत्व में संघ की सोच याने हिंदुत्व की अवधारणा को ही देश के लोगों में कूट कूट कर भरने के सबसे अधिक प्रयास हुए हैं| चाहे वे प्रयास सरकार के मंत्रियों के द्वारा किये गए हों या सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों, विधायकों और नेताओं के द्वारा अथवा लव जिहाद या गाय के नाम पर की गई मॉब लिंचिंग के दवारा, पर, पिछले 5वर्ष का इतिहास इसी से भरा पड़ा है| अटल बिहारी के पूर्ण रूपेण सत्ता में आने के बाद स्टेम ग्राहम की बच्चों सहित की गई ह्त्या पिछले 5 वर्षों के दौरान भीड़ के द्वारा की गई हत्याओं के सामने कुछ भी नहीं है|
यह पहला आम चुनाव है जिसमें प्रतिबंध के बावजूद भी धार्मिक प्रतीकों का खुल कर इस्तेमाल किया गया है| मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे की इस राजनीति का सबसे दुखद पहलू यह है कि देश की सबसे पुरानी और स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की अगुआ और उसमें से तप कर निकली कांग्रेस पार्टी भी भाजपा के इस ‘हिंदुत्व’ के आक्रमण का सामना करने के लिये ‘नरम हिंदुत्व’ की तरफ झुकी हुई दिख रही है| यही कारण है कि देश के बड़े उदारवादी-प्रगतिशील तबके को कांग्रेस की विचारधारा में आ रहे इस परिवर्तन से चिंता हो रही है| यदि मध्यमार्गी कांग्रेस का सामाजिक और धार्मिक आधार पर झुकाव भविष्य में भी हिंदुत्व की तरफ इसी तरह नरमतर रहेगा तो देश की बहुलतावादी संस्कृति को खतरा न केवल गहरा होगा बल्कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्व की विचारधारा को और भी गहरे तक पाँव पसारने का मौक़ा मिलेगा जो कहने की जरुरत नहीं कि देश के लोकतंत्र के लिये घातक ही होगा| इसका सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि देश का एक भी चुनाव ऐसा नहीं गया है जिसे किसी पार्टी ने जाति और सम्प्रदाय के आधार पर न लड़ा हो| देश की जनता का बड़ा मतदाता वर्ग भी इसे स्वीकार कर चुका है और इस बारे में चिंतित नहीं दिखता है, सिवाय, धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हिस्से को छोड़कर जो लोकतंत्र में घर कर गये इस क्षरण से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं| ऐसे में ‘हिंदुत्व’ का सामना ‘नरम हिंदुत्व से करने की चेष्टा राष्ट्र की बहुलता वादी संस्कृति के लिये घातक है| 
राष्ट्रवाद के नाम पर संसदीय लोकतंत्र में न केवल हमारे देश में बल्कि विश्व के अन्य अनेक देशों में राजनीतिज्ञों ने चुनाव जीते हैं| हमारे देश में ही विशेषकर पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद, जिसमें बंगला देश का निर्माण हुआ और इंदिरा गांधी की ह्त्या के बाद उपजे राष्ट्रवाद के चुनावों में मतदाताओं का राष्ट्रवाद के लिये रुझान हमने देखा है| पर, वह एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में सामने आया था| अमेरिका में ट्रम्प ने राष्ट्रवाद को उभारने के लिये “America for Americans only” का नारा दिया था| भारत में आज ‘हिदुस्तान हिंदुओं के लिये’ नारा दिया जा रहा है| यह एक कदम आगे “अति-राष्ट्रवाद” की श्रेणी में आता है| यद्यपि, खुले तौर पर 2014 के आम चुनावों में यह कोई विशेष मुद्दा नहीं था| पर, 2014 में सत्ता में आने के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस विचार को शनैः शनैः देशवासियों के रोजमर्रा के सार्वजनिक जीवन में घुसेड़ने में एक हद तक सफल हुई है, इसे नकारा नहीं जा सकता| यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो हिंदुत्व की अवधारणा से जुड़ा हुआ है और राष्ट्रीय झंडे से होते हुए गाय, लव जिहाद, धर्मपरिवर्तन, पाकिस्तान से नफ़रत, आतंकवाद, वंशवाद तक सब कुछ अपने में समेटे हुए है| यह राष्ट्रवाद गंभीर और विचारवान नहीं है| यह उत्तेजना और उच्छृंखलता से भरा हुआ है| यह जय हिंद, भारतमाता की जय पर समाप्त नहीं होता, इसकी सीमा जय श्री राम के उद्घोष से शुरू होकर सरकार की नीतियों और संघ-भाजपा या प्रधानमंत्री की आलोचना करने वालों को पाकिस्तान भेजने तक है, भले ही वह आलोचना आर्थिक नीतियों की हो अथवा कानून का शासन लागू करने में सरकार की विफलता की हो| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब का इस अति-राष्ट्रवाद को 17वीं लोकसभा के लिये हो रहे चुनावों में विशेष हथियार के रूप में इस्तेमाल करना महज एक संयोग नहीं है| इस अति-राष्ट्रवाद को 17वीं लोकसभा के लिये होने वाले आम चुनावो में प्रमुख हथियार बनाया जाएगा, इसकी तैय्यारी बाकायदा देशवासियों की आँखों के सामने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथे तथाकथित स्तंभ मीडिया की सहायता के साथ पिछले 5 सालों के दौरान की गई ताकि देशवासियों को यह सब स्वाभाविक लगे और वे इसे स्वीकार करें| मैं यहाँ उस अंडरग्राउंड तैय्यारी की बात तो कर ही नहीं रहा हूँ जो संघ अपने जन्म से लेकर अभी तक करता रहा है| जो, इस तैय्यारी को समझ रहे थे और इसके खिलाफ खुछ भी कहने का साहस कर रहे थे, उनके साथ चारों स्तंभों ने साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीके अपनाए| कलाबुर्गी, पंसारे और लंकेश की हत्याएं उसी की कड़ी हैं| पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले ने और उसके बाद बालाकोट में की गई एयर-स्ट्राईक ने इस अति-राष्ट्रवाद को और ऊँचाई दी| सेना, जिसका नाम कभी भी देश की राजनीति में नहीं आया, पहली बार उसका इस्तेमाल वोट हासिल करने के हथियार के रूप में होते हमने देखा, बावजूद इसके कि ऐसा करना चुनाव आयोग ने प्रतिबंधित किया था| सत्तारूढ़ दल ने और स्वयं प्रधानमंत्री ने पिछले पूरे कार्यकाल में आतंकवाद और सर्जिकल स्ट्राईक को लगातार इस तरह प्रचारित और व्याख्यायित किया मानो कि देशवासियों की एकमात्र इच्छा और आवश्यकता है कि देश को एक मजबूत नेता की आवश्यकता है और वह नेता ‘नरेंद्र मोदी’ ही हैं| चाहे, उन्हें वह मजबूती देने के लिये देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की आहुती ही क्यों न देना पड़े? चाहे इसके लिये देशवासियों के सारे लोकतांत्रिक अधिकार त्यागना ही क्यों न पड़ें? यह एक बड़ी चिंता का सबब होना चाहिये, क्योंकि यह वह रास्ता है जो सीधा अधिनायकवाद की ओर ले जाता है| चाहे उस अधिनायकवाद में चुनाव होते रहें, देशवासी सरकार चुनते रहें लेकिन जनता की सारी इच्छाएं, आवश्यकताएं उस अति-राष्ट्रवादी अधिनायकवाद के सामने कोई अस्तित्व नहीं रखेंगी| यही कारण है कि इस लंबे चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री, उनके मंत्रियों और उनकी पार्टी के नेताओं ने चुनाव प्रचार को कभी भी अति-राष्ट्रवाद से इतर देशवासियों की आवश्यकताओं के किसी भी अन्य मुद्दे पर केंद्रित नहीं होने दिया| 
आज से एक दिन बाद चुनावों का अंतिम चरण भी समाप्त हो जाएगा| 23 मई को परिणाम बताएँगे कि देशवासियों ने कौन सा रास्ता चुना है? जनता के द्वारा, जनता के लिये, जनता की सरकार के लोकतंत्र का अथवा उस लोकतंत्र का जो ज़िंदा तो रहेगा लेकिन अधिनायकवाद के नीचे घुटी घुटी साँसे लेते हुए| जिसमें वोट देने का अधिकार तो होगा, पर केवल, प्रत्येक 5 साल में एक नेता का राजतिलक करने के लिये| उसे अपनी आवश्यकताओं को प्रगट करने और उनकी पूर्ति के लिये कोशिशें करने पर अपराधी माना जाएगा| और, यदि पहला रास्ता भी इस देश के प्रबुद्ध मतदाता चुनते हैं तो उनके ऊपर यह जिम्मेदारी तो बनी रहेगी कि जो भी लोकतांत्रिक सरकार आये उससे वे पिछले 5 सालों में लोकतंत्र के अंदर जो छिद्र हुए हैं, उन्हें मजबूती से रिपयेर कराने के लिये संघर्ष करे, क्योंकि अति-राष्ट्रवाद लोकतंत्र में सत्ता पर बने रहने के लिये सभी राजनीतिक नेताओं को बहुत प्रिय होता है|
अरुण कान्त शुक्ला    
18मई, 2019