Sunday, November 20, 2016

क्या इस तरह खत्म होगा बस्तर में माओवाद ?

क्या इस तरह खत्म होगा बस्तर में माओवाद ?
अरुण कान्त शुक्ला : 12 नवम्बर, 2016 
अभी कुछ दिनों पूर्व ही राज्योत्सव के शुभारंभ के लिए आये प्रधानमंत्री से मुलाक़ात करते हुए आई जी बस्तर, एसआरपी कल्लूरी ने प्रधानमंत्री से कहा कि वे चुनाव के पहले तक बस्तर में माओवाद को पूरी तरह खत्म कर देंगे| इस, अब विवादग्रस्त, मुलाक़ात में कही गई यह दंभोक्ति पुलिस सेवा में रत आईजी की कम तथा किसी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के छुटभैय्या नेता की अधिक लगती है| आईजी बस्तर की इस दंभोक्ति ने अगले दिन अखबारों में मुख्य पेज पर हेडलाईन बनाई थी| बावजूद इसके कि पिछले तेरह वर्षों में राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आसीन रमन सिंह भी माओवाद के खात्मे के लिए कृतसंकल्पित होने के दावे के अलावा कभी कोई डेडलाइन इसके लिए घोषित नहीं कर पाए हैं, आई जी का यह दावा आने वाले समय में पुलिस-अर्धसैनिक तथा सैनिक बालों द्वारा बस्तर के आदिवासियों पर प्रताड़नाओं को और अधिक बढ़ाए जाने के खतरे की तरफ ही इशारा करता है|
पुलिस ने बनाया बस्तर को एक अभेद दुर्ग
पिछले लम्बे समय से बस्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों के रहवासियों, बाकी देश और दुनिया के लिए एक ऐसा अभेद दुर्ग बना हुआ है, जिसके बारे में सभी को उतना ही जानने का हक़ है, जितना वहां के पुलिस और सैन्य अधिकारी आपको बतायें| तनिक भी सत्यान्वेषण का प्रयास और उसे प्रसारित करने के प्रयास आपके ऊपर माओवाद को मदद पहुंचाने, माओवादी होने का ठप्पा लगा देता है| मैंने लगभग छै वर्ष पूर्व अपने लेख ‘आखिर चाहते क्या हैं माओवादी’ और फिर झीरम में हुए हत्याकांड पर त्वरित टिप्पणी करते हुए माओवाद के खिलाफ लिखा था| उस समय भी बस्तर के आदिवासी माओवाद और पुलिसया दमन के दो पाटों के बीच पिस रहे थे और आज भी वे दोनों पाटों के बीच पिस रहे हैं| पर, जो फर्क आया है वह बहुत बड़ा है| माओवादी घोषित रूप से शासकीय प्रतिष्ठानों, पुलिस और सैन्य बलों के दुश्मन हैं और उनके अधिकाँश हमले आज भी उन्हीं पर होते हैं| आदिवासियों में वे ही उनके शिकार होते हैं जिन्हें पुलिस दबाव डालकर, जबरिया या लालच देकर अपना मुखबिर बनाती है और माओवादियों के इसका संदेह हो जाता है| पर, पुलिस या सैन्यबलों के मामले में ऐसा नहीं है| गाँव के गाँव और सैकड़ों की संख्या में आदिवासी उनके संदेह के घेरे में आते हैं| गाँव के गाँव जलाने से लेकर, गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस देना, बिना गिरफ्तारी दिखाए वर्षों बंद रखना, आदिवासियों स्त्रियों के साथ बलात्कार, स्कूल के विद्यार्थियों को नक्सल बताकर मार देना, पुलिस कस्टडी में मौतें, मुठभेड़ दिखाकर ह्त्या कर देना, सब उसमें शामिल रहता है| इस सत्य को बस्तर से बाहर पहुंचाने वाले पत्रकार, आदिवासियों की मदद करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, कानूनी मदद करने वाले वकील सभी उनके लिए माओवाद के समर्थक हैं या माओवादी| उन्हें बार-बार गिरफ्तार करके, झूठे मुकदमे चलाकर तंग करने के अलावा येन-केन-प्रकारेण उनसे बस्तर छुडवाने का ही उनका उद्देश्य रहता है| यह काम दोनों तरह से होता है| पुलिस-सैन्यबल इसे प्रत्यक्ष तौर पर भी करते हैं और सलवा जुडूम को सर्वोच्च नयायालय दवारा अवैधानिक घोषित करने के बाद पुलिस द्वारा पिछले छै वर्षों में सामाजिक एकता मंच जैसे गठित अनेक समूहों द्वारा भी कराया जाता है| यूं तो ऐसे अनेक उदाहरण हैं लेकिन करीब आठ माह पूर्व एक वेबसाईट की पत्रकार मालिनी सुब्रमणियम को सामाजिक मंच के लोगों के द्वारा घर पहुंचकर मार पीट करना और उसके मकान मालिक को पुलिस द्वारा धमकाकर मकान खाली कराने का मामला तेजी से प्रकाश में आया था| सोनी सोरी का मामला सर्व विदित है| यह कहने की जरुरत नहीं कि राज्य शासन की सहमति के बिना यह सब करना न तो पुलिस और न ही उन निजी सेनाओं द्वारा संभव है, जिन्हें पुलिस ने खड़ा किया है|
उपरोक्त लम्बी भूमिका की आवश्यकता मुझे इसलिए पड़ी कि बस्तर के दरभा में नक्सल विरोधी टंगिया ग्रुप के लीडर सामनाथ बघेल की ह्त्या के मामले में सुकमा पुलिस ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो.नंदिनी सुन्दर, प्रो.अर्चना प्रसाद सहित 22 लोगों पर एफ़आईआर दर्ज की है| पुलिस के अनुसार सामनाथ की पत्नी ने लिखित आवेदन देकर एफ़आईआर दर्ज करने की मांग की थी| आईजी बस्तर एसआरपी कल्लूरी के अनुसार नामा गाँव के ग्रामीणों की शिकायत पर धारा 302 से लेकर आर्म्स एक्ट सहित विभिन्न 8 धाराओं के तहत एफ़आईआर दर्ज हुई है| यह स्पष्ट है कि उपरोक्त तीनों ने पार्टी के कुछ अन्य लोगों के साथ लगभग छै माह पूर्व मई में दरभा में कुमाकोलेंग और नामा गाँवों का दौरा किया था| तभी से वे बस्तर पुलिस के निशाने पर थे| ज्ञातव्य है की तब नंदिनी सुन्दर ने ऋचा केशव के नाम से दौरा किया था| नंदिनी सुन्दर के अनुसार क्योंकि वे बस्तर पहले भी आती रही हैं और बस्तर पर उनकी खोजपूर्ण किताबें भी हैं, उनका नाम पुलिस के लिए पहचाना है और पुलिस उन्हें असली नाम से जाने नहीं देती, उन्होंने ऐसा किया था और वापिस लौटते ही अपना असली नाम उजागर कर दिया था| यह सच है क्योंकि पहले स्वामी अग्निवेश, ताड़मेटला की जांच करने वाली सीबीआई की टीम और मार्क्सवादी पार्टी के ही डेलिगेशन के साथ ऐसा हो चुका है| उसी समय आईजी पुलिस ने राज्य शासन को अलहदा रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय को पत्र लिखकर नंदिनी सुन्दर और अर्चना प्रसाद के खिलाफ कार्यवाही की मांग की थी| फिलवक्त जो खबर है, उसके अनुसार आईजी कल्लूरी ने डीजीपी को पत्र लिखकर पूरे मामले की जांच सीबीआई से करने की सिफारिश की है| वह जैसा भी हो और आगे पुलिस की जांच के बाद जो भी कार्यवाही हो, पर, पूरे मामले पर राय बनाने से पहले कुछ बातों का खुलासा आवश्यक है| 
राष्ट्रीय वामपंथी दल माओवाद के समर्थक नहीं हैं
पहली यह कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी देश के दो बड़े राजनीतिक दल हैं और अनेक बार राष्ट्रीय सरकारें इनके कन्धों पर चढ़कर बनी हैं| बंगाल में वामपंथ की सरकार स्वयं नक्सलवाद का सामना करती रही है| इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की नक्सलवाद-माओवाद के बारे में घोषित कार्यनीति है कि वे माओवादी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती हैं और माओवाद के खात्मे के लिए संयुक्त राजनीतिक अभियानों और जन-आन्दोलन की पक्षधर हैं| उनकी स्पष्ट मान्यता है कि आदिवासियों को उनकी जमीन और जंगल से बेदखली की कार्यवाही को रोककर शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को सुदूर ईलाकों तक पहुंचाकर माओवाद पर अंकुश लगाया जा सकता है| इन दोनों दलों की इस कार्यनीति का अवलोकन उनके राजनीतिक दस्तावेजों में किया जा सकता है, जो उनकी वेबसाईट पर उपलब्ध हैं| दूसरी बात कि दोनों राजनीतक दल इतने अनुशासित हैं कि केंद्र से लेकर कसबे स्टार तक कोई साधारण कार्यकर्ता भी इस कार्यनीति के उल्लंघन की बात सोच भी नहीं सकता| दोनों राजनीतिक दलों के अनेक कार्यकर्ता बस्तर व अंता:गढ़ क्षेत्र में नक्सली हमलों का शिकार होकर मारे गए हैं| पुलिस ने कभी भी किसी मामले में ठोस कार्यवाही नहीं की|
तीसरी बात की शुरुवात मैं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक प्रतिनिधी मंडल की तात्कालीन डीजीपी से लगभग आठ दस पूर्व हुई मुलाक़ात का उदाहरण देकर करना चाहता हूँ| पार्टी के एक प्रतिनिधी मंडल ने बीजापुर क्षेत्र में जाने के पूर्व डीजीपी से रायपुर में मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि वे बस्तर के हालात जानने के लिए बीजापुर, दोरनापाल इलाकों में जाना चाहते हैं| उन्होंने कहा आराम से जाईये पर थोड़ा सावधान रहियेगा| महत्वपूर्ण इसके बाद की बात है| उन्होंने कहा कि आप लोगों की भी जिम्मेदारी बनती है| क्योंकि, आप लोगों के जन-आन्दोलन आदिवासी क्षेत्र में बहुत कम और कमजोर हो गए हैं, उस जगह को माओवाद ने कब्जा लिया है| शहरी क्षेत्र तो ठीक है पर थोड़ा आदिवासी क्षेत्र पर भी ध्यान दीजिये| आप जानते हैं कि वामपंथी राजनीतिक दलों के आन्दोलन-जनसंघर्ष शोषित-पीड़ित जनता के उपर होने वाले व्यवस्था-जन्य उत्पीड़न के खिलाफ होते हैं| इसका अर्थ यह हुआ कि माओवाद अथवा नक्सलवाद को प्रारंभ से ही क़ानून-व्यवस्था का मामला मानने बावजूद, कहीं न कहीं, प्रशासन के अवचेतन में यह बात थी कि माओवाद केवल क़ानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि व्यवस्था से पैदा हो रही समस्याओं का भी परिणाम है| पिछले छै वर्षों में और केंद्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद से प्रशासन और राजनीति की यह सोच पूरी तरह समाप्त हो चुकी है|
छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र से ‘लोक’ गायब है
चौथी बात, छत्तीसगढ़ में आज हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं, उसमें से ‘लोक’ पूरी तरह गायब है| इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुख्यमंत्री द्वारा आज से कुछ वर्ष पूर्व बुलाया गया विधानसभा का वह ‘गुप्त’ सत्र है, जो बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति तय करने के लिए बुलाया गया था| इसमें भाजपा, कांग्रेस, राकपा, बसपा सभी शामिल थे, पर आज तक प्रदेशवासियों को इसकी जानकारी नहीं मिली की आखिर क्या रणनीति बनाई गयी थी? और क्यों, उसके बाद से बस्तर में माओवाद से कई गुना अत्याचार आदिवासी पर पुलिस का हो रहा है| यहाँ यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि क्या क्लोज सेशन में प्रताड़ित कर आदिवासियों को बस्तर से भगाने का निर्णय हुआ था? क्योंकि उसके बाद से लाखों आदिवासी या तो पलायन कर गए हैं या लापता हैं| शहरी क्षेत्र में आचानक पुलिस कस्टडी में होने वाली मौतें आम सी हो चली हैं| यदि यह कहा जाए कि पूरे प्रदेश में और बस्तर में तो पूरी तरह एक भयभीत करने वाला लोकतंत्र पसरा पड़ा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| आप सुरक्षित हैं, जब तक ‘राज्य’ के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते| अधिकाँश प्रिंट मीडिया और स्थानीय चैनल पूरी तरह राज्य शासन के नियंत्रण में हैं और उनका काम पुलिस तथा शासन की प्रस्तुती को ही लोगों के समक्ष रखना है| इसे समझने के लिए सिर्फ दो उदाहरण पर्याप्त हैं| राज्य सरकार ने आदिवासियों को आदिवासियों से ही लड़ाने की मंशा रखते हुए सलवा जुडूम शुरू किया| यह कोई नक्सलवाद के खिलाफ शांतिपूर्ण मार्च या मोर्चा नहीं था बल्कि आदिवासी बालिग़-नाबालिग युवकों को कुछ हजार रुपये की तनख्वाह पर रखकर एसपीओ याने विशेष पुलिस बल कहकर उन्हें हथियार थमा दिए गए| इन एसपीओ की सहायता से पुलिस प्रशासन ने आदिवासियों को मजबूर किया कि वे अपना घर द्वार छोड़कर शासन निर्मित केम्पों में जाकर रहें| गाँव के गाँव खाली करा लिए गए| आदिवासियों को इन केम्पों में अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर किया गया| हालात यह थे कि केम्प छोड़ कर गाँव वापिस जाने की कोशिश करने वाले परिवारों-व्यक्तियों को ये विशेष पुलिस बल के आदिवासी जवान ही मार डालते थे और उन्हें नक्सली कहा जाता था| इन केम्पों में बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश असंभव था और उन इलाकों में जाने की कोशिश करने वालों को ये एसपीओ वर्चुअली मारपीट कर भागने को मजबूर कर देते थे| पूरे प्रदेश में इस सलवा-जुडूम और एसपीओ का विरोध हो रहा था,पर,राज्य शासन ने कोई कान नहीं दिया| अंतत: सर्वोच्च न्यायालय ने सलवा-जुडूम और एसपीओ के गठन दोनों को अवैधानिक घोषित किया| थोड़े अंतराल के बाद ही उन्हीं एसपीओ को राज्य शासन ने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के नाम से फिर नियुक्त कर लिया| उसके बाद से पुलिस और स्थानीय प्रशासन की शह और दबाव में ऐसे अनेक मंच बने हैं, जो लगातार बस्तर में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों पर हमले करते हैं और पुलिस खामोशी से उन्हें देखती रहती है| यह कौनसा लोकतंत्र का मॉडल है जिसमें राज्य और प्रशासन गैरकानूनी ढंग से लोगों को डराने, धमकाने के लिए युवकों की भर्ती करता है?
दूसरा उदाहरण ताड़मेटला, मोरापल्ली, तिम्मापुर गाँवों में 250 से अधिक आदिवासियों के घरों को जलाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश की गयी सीबीआई की हाल में ही आई रिपोर्ट पर बस्तर के प्रशासनिक अमले की तरफ से व्यक्त की गईं प्रतिक्रियाओं का है| कथित तौर पर सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि न केवल घरों को फ़ोर्स ने जलाया बल्कि फ़ोर्स को दंतेवाड़ा के तत्कालीन एसपी और वर्तमान आईजी बस्तर एसआरपी कल्लूरी के निर्देश पर भेजा गया था| ज्ञातव्य है कि इस मामले में पुलिस और सैन्य-बलों दवारा यह स्टेंड लिया जा रहा था कि घरों को माओवादियों ने जलाया है| इस पर प्रदेश के राजनीतिक दलों ने उन्हें हटाने और उनके खिलाफ जांच करने की मांग की| अमूमन राजनीतिक दलों के द्वारा लगाए आरोपों और मांग पर राज्य शासन या सत्तारूढ़ पक्ष ही जबाब देता है| पर, आश्चर्यजनक रूप से इस पर प्रेस कांफ्रेंस करके कांग्रेस को चुनौती देते हुए आईजी बस्तर ने ही चुनौतीपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त की| इसके मायने हुए कि बस्तर के लोकतन्त्र को राज्य शासन और सत्तारूढ़ दल ने पूरी तरह पुलिस के हवाले कर दिया है| आई जी बस्तर से इस शह को पाकर दूसरे दिन बस्तर के कई इलाकों में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के जवानों ने ड्रेसबद्ध होकर (जोकि वास्तव में पुराने एसपीओ ही हैं) सर्वोच्च न्यायालय गए सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाए और पुलिस ने कोई प्रतिरोध नहीं किया| यहाँ न तो यह कहने की जरुरत है कि बिना सर्वोच्च अधिकारी की शह के ऐसा नहीं हो सकता था और न ही यह बतलाने की जरुरत है कि इसमें राज्य शासन की सहमती अवश्य ही रही होगी क्योंकि अभी तक राज्य शासन ने, जिसने की इन रिजर्व गार्डों की भर्ती की है, कोई ठोस कार्यवाही नहीं की है| क्या प्रशासन का कोई अंग विशेषकर पुलिस अथवा सेना लोकतांत्रिक कार्यवाही और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ ऐसा कदम लोकतंत्र में उठा सकता है?
क्या इस तरह खत्म करेंगे बस्तर में माओवाद को आईजी एसआरपी कल्लूरी?   
मामले में ताजा घटनाक्रम यह है कि प्रो. नंदिनी सुन्दर की सर्वोच्च न्यायालय में एफआईआर रद्द करने के लिए लगाई गयी याचिका पर राज्य शासन ने सर्वोच्च न्यायालय के रुख को भांपते हुए भरोसा दिलाया है कि 15 नवम्बर तक किसी की गिरफ्तारी नहीं की जायेगी और राज्य शासन जांच की पूरी कार्यवाही की रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज सीलबंद लिफ़ाफ़े में 15नवम्बर तक सर्वोच्च न्यायालय को सौंपेगा| यह भी खबर है कि सामनाथ की पत्नी ने कहा है कि उसने पुलिस को कोई नाम नहीं दिए थे| किंतु, पिछले छै साल में बस्तर में माओवाद से निपटने के नाम पर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किये जाने वाले अनेक मामले में आरोपित व्यक्तियों को बेदाग़ अदालतों ने छोड़ा है बल्कि पुलिस तंत्र और राज्य सरकार की कटु आलोचना भी की है| सोनी सोरी की गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत में उस पर की गयी अमानवीय ज्यादती सर्व विदित है| हाल ही में सोनी सोरी पर रसायन फिकवाने का आरोप भी पुलिस पर लगा है| किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए अदालतों में उसके कार्यों को पलटा जाना और उसकी निंदा होना न केवल सरकार और तंत्र के लिए शर्म का विषय होना चाहिए बल्कि यह यह भी दर्शाता है कि वह सरकार कितनी अलोकतांत्रिक ढंग से परिस्थिति से निपटती है| बस्तर की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए मैं एक उद्धरण देना चाहता हूँ;
“ जिन घटनाओं से हमारा साबका पड़ा है उन पर यकीन नहीं होता; लेकिन ये हुईं तो हैं| दरअसल, रिपोर्ट में भयानक घटनाओं को पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता| और न ही उन लोगों की नाक़ाबिले-बयान क्रूरता और हैवानियत का ब्यौरा दिया जा सकता है, जो जिले के प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी संभाले थे| जिस सवाल का जबाब चाहिए वो है; सरकार की नौकरी में रहते हुए कैसे इन लोगों को लगा कि उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है| कैसे उनकी हिम्मत हुई कि सरकारी साधनों का इस्तेमाल करके वे ऐसे अकथनीय गुनाह कर सके, जिनके लिए हमारे सामने पेश किये गए सबूतों के बिना पर हम आपको जिम्मेवार समझते हैं?”
उपरोक्त उद्धरण 1930-1934 के बीच हुए चिटगांव विद्रोह पर मानिनी भटाचार्य की किताब ‘करो या मरो’ से लिया गया है| मानिनी आगे लिखती हैं; “ चिटगांव शस्त्र भंडार पर हमलों के कुछ दिन ही बाद बकरगंज के पुलिस डीआईजी, जे सी फारमर ने इन्सपेक्टर खान साहब असानुल्ला का तबादला बरिसाल से चिटगांव कर दिया| उसको क्रांतिकारियों को ढूँढने में पुलिस की मदद करनी थी| 6मई 1930 को फारमर ने असानुल्ला के बारे में कहा कि ‘जानकारी एकत्रित करने और निगरानी में वो काफी चालू है’ और सबसे बड़ी बात है कि वो खुद बहुत सक्रिय है’|” चिटगांव की घटनाओं पर आई रिपोर्ट और ताड़मेटला पर आई सीबीआई की रिपोर्ट में पूरा साम्य होने के बावजूद एक बड़ा फर्क है जो काबिले-गौर है| चिटगांव पर आई रिपोर्ट एक गैर सरकारी जांच कमेटी की थी और सीबीआई की रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ‘सरकारी एजेंसी सीबीआई’ की है| ठीक यही परिस्थिति आज बस्तर के अन्दर मौजूद है| केंद्र और राज्य शासन ने माओवाद के खिलाफ लड़ने के नाम पर बस्तर में युद्ध छेड़ दिया है| आदिवासियों पर जुल्म ढाने के लिए पुलिस के उन तमाम लोगों को बस्तर में तैनात किया है जिनके ऊपर पूर्व से ही मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप हैं| बस्तर आईजी, जो पहले वहां एसपी थे, के ऊपर फर्जी मुठभेड़ आयोजित करने से लेकर आदिवासी स्त्री से बलात्कार जैसे आरोप भी लग चुके हैं|

यह वह परिप्रेक्ष्य है, जिसमें हमें बस्तर में हो रहे माओवादियों के नकली आत्मसमपर्ण, मुठभेड़ के नाम पर हो रही हत्याओं, बलात्कारों तथा राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ऊपर होने वाले आक्रमणों तथा उनके खिलाफ फर्जी एफआईआर दर्ज करने के प्रकरणों का अवलोकन करना पड़ेगा| यह सच है कि क्रान्ति की माओवादी अवधारणा, जिसकी राह पर माओवादी चल रहे हैं, न तो भारतीय समाज और न ही भारतीय परिस्थति के अनुरूप है| पर क्या, बस्तर में लोकतंत्र को ताक पर रखकर, वहां पर उपस्थित राजनीतिक और सामाजिक ताकतों को अपराधी घोषित करके, माओवाद के नाम पर आदिवासियों पर राज्य की हिंसा को लादकर क्या बस्तर में माओवाद का खात्मा कर पायेंगे, बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी?                                                                

Wednesday, September 21, 2016

प्रधानमंत्री बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं..

प्रधानमंत्री बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं..

देश में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसे उरी स्थित सैनिक बेस पर रविवार के तडके हुए आतंकी हमले ने झकझोरा न हो| यद्यपि तीन घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद भारतीय सेना के जवानों के हाथों चारों आतंकी घुसपेठिये मारे गए, मगर इस दौरान भारतीय सेना के 18 जवानों को देश ने खोया और लगभग 20 जवान घायल हुए| सबसे ज्यादा दुखित करने वाली बात यह है कि जो जवान शहीद हुए हैं वे टेंटों में सो रहे थे और अधिकाँश की जान अनजाने में आतंकियों द्वारा टेंटो में आग लगाने के कारण जलकर हुई है| दुश्मन सेना का या इस उद्देश्य के लिए आतंकियों के हमलों का भी सामना करते हुए बन्दूक की गोली से जान जाने से एक सैनिक या उसके परिवार को शायद थोड़ा ढांढस होता होगा कि वह या उनके परिवार का सदस्य मुकाबला करते हुए शहीद हुआ है| पर, जैसा कि आतंकी हमलों का चरित्र होता है, ये ऐसे समय में और ऐसे लोगों के द्वारा करवाए जाते हैं, जो हमले तब करते हैं, जब सुरक्षा के मापदंड और प्रबंध थोड़े ढीले होते हैं और आतंकी स्वयं मरने के लिए तैयार होकर आते हैं| यह प्रत्येक आतंकी हमले की सच्चाई है| देशवासियों को यह भी थोड़ा असहज लगना स्वाभाविक है कि नियंत्रण रेखा से लगभग 18-19 किलोमीटर स्थित बेस केम्प तक आतंकी पहुँच जाएँ और सीमा सुरक्षा बलों, सेना को भनक तक नहीं लगे| इसका अर्थ है कि इतने आतंकी हमलों को सीमा पर और देश के अन्दर झेलने के बाद भी क्या हम उतने सतर्क नहीं हैं, जितना भारत जैसे विशाल फ़ौज और असले वाले देश को होना चाहिए? यह सवाल पठानकोट एयर बेस पर हमले के बाद भी उठा था और उसके पहले संसद पर हमले और फिर मुम्बई हमलों के बाद भी उठा था| इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए| देश का एक साधारण नागरिक तो रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, सरकार में बैठे लोगों और सेना के अधिकारियों से यह उम्मीद ही कर सकता है कि वे इस मामले में गंभीर तो होंगे ही, उन सभी छेदों को भी भरेंगे, जिनके चलते भारत में आतंकी घटनाएं करना आसान हो जाता है|

आतंकवाद छिपकर की जाने वाली ऐसी सैन्य कार्यवाही है, जिसका उद्देश्य कम से कम नुकसान उठाकर अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाना होता है| आतंकी समूह या गुट किसी भी देश को हों, जाहिरा तौर पर वह देश उनसे अपना संबंध नहीं दिखाना चाहता| इसीलिये पाकिस्तान से भी संचालित आतंकी गुट के साथ पाकिस्तान की सरकार कभी भी अपना संबंध नहीं मानेगी| अमूमन एक बार आतंकी समूह गठित होने के बाद जिस भी देश की सरकार की शह पर वह गठित हो, वह आतंकी समूह उस देश के भी नियंत्रण से बाहर हो जाता है और अधिकाँश मामलों में उस देश की सरकार तक उससे डरने लगती है| पाकिस्तान के साथ यही हो रहा है|
जैसा कि मैंने पहले ही कहा आतंकी हमले छिपकर और ऐसे समय में किये जाते हैं, जब अमूमन उनकी कोई आशंका नहीं होती, दो देशों के बीच लड़ा जाने वाला परंपरागत युद्ध कभी आतंकवाद का माकूल जबाब नहीं हो सकता है| इसका सबसे अच्छा विकल्प यही है कि संबंधित देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग थलग ही नहीं किया जाए बल्कि सैनिक साजो सामान उस देश को मुहैय्या कराने वाले देशों को भी रजामंद किया जाए कि वे पाकिस्तान को सैनिक सामान, नगद मदद देना बंद करे| जब भारत, अपने देश की बहुमत की अनिच्छा को भी अनदेखा करके, अमेरिका के साथ साझा सैन्य रणनीतिक समझौतों में जा रहा है, तब उसे अमेरिका के उपर पूरा दबाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए कि अमेरिका पाकिस्तान को सामरिक सामग्री और नगद मदद देना न केवल स्वयं बंद करे बल्कि अन्य यूरोपीय देशों को भी ऐसा करने से रोके| ओबामा से कई बार गले मिल चुके हमारे प्रधानमंत्री चाहें तो ओबामा के गले पड़कर इस काम को करवा सकते हैं|

अभी तक सेना के अधिकारियों और प्रधानमंत्री सहित अन्य जिम्मेदार मंत्रियों ने समझदारी का ही परिचय दिया है| सेना के अधिकारियों ने हमले के एक दिन बाद कहा कि “हम अपने चुने हुए समय और मैदान पर इसका माकूल जबाब देंगे”| प्रधानमंत्री के द्वारा बुलाई गयी बैठक के बाद भी जो लब्बो-लुआब निकलकर आया है, वह सही कूटनीतिक दिशा की ओर ले जाने वाला है| ऐसा बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने विदेश मंत्री, रक्षामंत्री और गृह मंत्री से कहा कि पाकिस्तान को कूटनीतिक तरीके से सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों, संयुक्त राष्ट्र संघ सहित, पर अलग थलग करने के प्रयास और तेज किया जाएँ| फौरी तौर पर देखा जाए तो भारत के इन प्रयासों को सुहानभूति और सफलता दोनों मिलने की संभावनाएं हैं| अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन याने संयक्त राष्ट्र संघ के लगभग सभी स्थाई सदस्यों ने इस हमले की भर्त्सना की है| रशिया ने तो पाकिस्तान के साथ की जाने वाली संयुक्त सैन्य कवायद को समाप्त भी कर दिया है| संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बेन-कि-मून ने भी इसकी भर्त्सना की है| याने जब विदेशमंत्री वहां जायेंगी तो उन्हें एक भारतीय पक्षधरता वाला माहोल मिल सकता है|

इन सबके बीच यदि प्रधानमंत्री के लिए कुछ असुविधाजनक है तो उनका स्वयं का हालिया अतीत, जिसमें उन्होंने यूपीए की सरकार को बुजदिलों की सरकार कहते हुए बहुत लताड़ा था| जम्मू-कश्मीर में रविवार को हुए आतंकी हमले में 17 भारतीय जवानों के मारे जाने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर आलोचनाओं में घिर गए हैं। भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स भारतीय जवानों की श्रद्धांजलि देने के साथ ही नरेंद्र मोदी के पुराने भाषणों और बयानों का हवाला दे रहे हैं। कुछ यूजर्स नरेंद्र मोदी  2013 में दिए एक भाषण का वीडियो भी शेयर कर रहे हैं जिसमें उन्होंने चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान द्वारा की जाने वाली घुसपैठ को लेकर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था, “डूब डूब मरो मेरे देश की सरकार चलाने वालों, आपको शर्म आनी चाहिए।” उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। कुछ लोग उनके पुराने ट्वीट सामने ला रहे हैं तो कुछ उनका रजत शर्मा के साथ वाला इंटरव्यू दिखा रहे हैं| हो सकता है प्रधानमंत्री को अब अपने चुनाव के दौरान बोले गए बड़बोलों के लिए कुछ पछतावा होता हो| यह सब करने वाले वे ही भक्त हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं अपने बड़बोलों से पैदा किया था|

इस अवसर पर मुझे बूमेरंग की याद आ रही है| एक ऐसा आस्ट्रेलियाई औजार जो वहां के मूलनिवासी चिड़ियों के शिकार के लिए इस्तेमाल करते थे| एक लकड़ी की चपटी प्लेट जिसे आसमान में फेंको तो वह लौटकर फेंकने वाले के पास ही आती है और यदि वह सतर्क न हो तो चोटिल हो सकता है| आज यही हो रहा है| जब जिम्मेदारी नहीं होती तो जुबान बहुत चलती है|  मोदी ही क्यों, सुषमा, जेटली, राजनाथ सबकी जुबान बहुत चलती थी और युद्ध इन्हें बच्चों का खेल लगता था| लेकिन , वह सब आसान नहीं है, अब समझ में आ रहा है| मोदी स्वयं कबूल कर चुके हैं, सेना के पेंशन वाले मामले में कि वे इसे जितना आसान समझ रहे थे, वह है नहीं| सभी मामलों में ऐसा ही है| इसीलिये एक राजनीतिज्ञ को वह सत्ता में रहे या विरोध में, बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए| खासकर जनता की भावनाओं को भड़काकर सत्ता हासिल करने की कोशिश तो कभी नहीं करना चाहिए| यह एक बूमेरंग है जो पलटकर फेंकने वाले को ही मारता है| मोदी जी उसी बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं|

अरुण कान्त शुक्ला

21/9/2016

Wednesday, August 31, 2016

2 सितम्बर की हड़ताल को मिलना चाहिए अपार जनसमर्थन

देश के सभी प्रमुख केन्द्रिय श्रम संगठनों तथा किसानों, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार और असंगठित क्षेत्र के प्रमुख संगठनों के आव्हान पर देश के श्रमिक/कर्मचारी 2 सितम्बर को एक दिनी हड़ताल पर रहेंगे| नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ भारत के श्रमिक वर्ग के अनवरत चलते संघर्ष के मध्य पिछले 25 वर्षों में की जा रही यह 17वीं हड़ताल है| पिछली 16 हडतालों में फरवरी 2013 में की गयी ‘लगातार 48 घंटों की हड़ताल’ भी शामिल है जिसका उल्लेख भारत ही नहीं विश्व के कामगार आन्दोलन में हमेशा गौरवपूर्ण ढंग से किया जाता है|

सरकार लेकर आई झुनझुने

हमेशा की तरह सरकार ने इस बार भी श्रमिकों/कर्मचारियों के इस कदम के प्रति अवेहलना भरा रवैय्या ही अपनाया| केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने यद्यपि इस संयुक्त कार्यवाही की घोषणा 30 मार्च, 2016 को ही कर दी थी, पर, सरकार ने श्रमिकों/कर्मचारियों के प्रतिनिधि संगठनों के साथ बातचीत की कोई पहल नहीं की| पहल हुई हड़ताल के लिए निश्चित तिथी 2 सितम्बर के चार दिन पहले याने रविवार, 28 अगस्त को| वह भी शायद औपचारिकता निभाने के लिए, क्योंकि मंत्रिमंडल की एम्पावर्ड कमेटी के पास न तो कोई ठोस प्रस्ताव थे और न ही ठोस आश्वासन| इसके 2 दिनों के बाद वित्तमंत्री कुछ झुनझुने लेकर आये| अखबारों में इन झुनझुनों को कितने भी बड़े बेनर में क्यों छापा गया हो या सरकार के पेड खबरिया चैनलों ने इन्हें कितना भी क्यों न बजाया हो,पर, श्रमिकों के मूलभूत और बुनियादी हकों तथा कल्याण पर लगातार हो रहे हमलों से परेशान श्रमिक वर्ग को ये झुनझुने बहलाने के बजाय खिजाने वाले ज्यादा हैं| 18000 रुपये न्यूनतम मासिक मजदूरी की मांग के सामने ही नहीं, आज के महंगे जीवन-यापन में, सरकार की दैनिक वेतन को वर्तमान 246 से बढ़ाकर 350 रुपये प्रतिमाह करने की घोषणा हास्यास्पद ही है| केन्द्रिय कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग का एरियर और 2 वर्ष का रुका हुआ बोनस जारी करना कोई नया फ़ायदा नहीं है| यह वह हक़ है जिसे सरकार दबाये बैठी थी|

सरकार के आश्वासनों-वायदों पर विश्वास क्यों हो?

फिर, सरकार के आश्वासनों/वायदों पर देश का मेहनतकश विश्वास क्यों करे? यही सरकार जो आज असंगठित क्षेत्र के कामागारों की दैनिक मजदूरी 350 रुपये करने का ढोल पीट रही है, बीते दिनों उनकी भविष्य निधी की निकासी पर जाम थोपने और उसके 60% हिस्से पर आयकर लगाने की जुगत में थी| इसी सरकार ने इस वित्तीय वर्ष से छोटी बचत योजनाओं पर मिलाने वाले ब्याज की दरों में कमी की है| जबकि गरीब और कमैय्या वर्ग के लिए ये योजनाएं ही सुरक्षा और आकस्मिक परिस्थितियों से निपटने का सबसे बड़ा और सशक्त जरिया हैं| इन सारी योजनाओं को स्वत्तंत्र भारत में सरकारों ने समाज की सरंचनात्मक परिस्थितियों में पैदा होने वाली अड़चनों से स्वयं निपटने की शक्ति कमैय्या वर्ग को प्रदान करने के लिए बनाया था| ये सरकारी कोष के लिए भी बड़ा स्रोत हैं| यह भी कैसे भूला जा सकता है कि सत्ता संभालने के साथ ही श्रम सुधारों को लागू करने की जो कवायद, हड़बड़ी एनडीए की सरकार ने दिखाई, उसकी हिम्मत तो सुधारों के पितामह मनमोहनसिंह भी नहीं कर पाए थे| सरकार बनने के दो महीने बाद ही, 30 जुलाई को मोदी कैबिनेट ने फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट 1948, अप्रेंटिसेज़ एक्ट 1961 और लेबर लॉज़ एक्ट 1988 जैसे श्रम क़ानूनों में कुल 54 संशोधन पास किए और असंगठित क्षेत्र के लगभग 98 प्रतिशत मजदूरों को श्रम कानूनों के दायरे से बाहर कर दिया|

ऐसा नहीं है कि सरकार के प्रति यह अविश्वास का भाव सिर्फ देश के श्रमिकों/कर्मचारियों में है| जनता का कुछ प्रतिशत ऐसा हिस्सा जो अघाया और पेड भक्त है, को, यदि छोड़ दिया जाए तो आम जनता का प्रत्येक तबका सरकार की नीतियों और व्यवहार से त्रस्त है| 2 सितम्बर की हड़ताल में शामिल होने वाले करोड़ों छोटे किसान, खेतिहर मजदूर, जहां एक तरफ पिछले वर्षों में लगातार पड़े सूखे या अतिवृष्टि से परेशान होकर कर्जों में दबे अपने भाईयों को आत्महत्या करते देखकर परेशान और दुखी हैं तो वहीं सरकार की मगरमच्छी योजनाएं, जिनमें बहुप्रचारित फसल बीमा योजना भी है, उनके जले पर नमक छिडकने का काम कर रही हैं| पूरी दुनिया में भारत ही शायद एकमात्र देश होगा जहां फसल के मुआवजे के तौर पर राज्य सरकारें एक या दो रुपये का भुगतान भी डिजिटल करती हैं|

हड़ताल को मिलना चाहिए व्यापक जनसमर्थन

आम जनता के प्रत्येक तबके को 2 सितम्बर की हड़ताल को व्यापक समर्थन देना चाहिए| श्रमिकों/कर्मचारियों के इस संघर्ष को आम लोगों का समर्थन सिर्फ इसलिए नहीं मिलना चाहिए कि श्रमिक/कर्मचारी भी उनका हिस्सा है| बल्कि यह समर्थन इसलिए मिलना चाहिए कि 2 सितम्बर की हड़ताल की 12 मांगों में महंगाई, बढ़ती साम्प्रादियक्ता, पूरी तरह बेकाबू क़ानून व्यवस्था से लेकर वे सभी मुद्दे मौजूद हैं जो आम आदमी के जीवन को दूभर कर रहे हैं| हमें आजाद भारत में पहली बार एक ऐसी सरकार मिली है जिसके अभी तक के कार्यकाल ने ही आम लोगों के जीवन को आर्थिक-सामाजिक दोनों स्तरों पर अराजक परिस्थितियों में डाल दिया है| जिस सुशासन की बात आम चुनावों के वक्त प्रधानमंत्री करते थे, वह राजनीतिक जुमला था| सच्चाई दु:शासन बनकर आम लोगों पर टूटी है| एक तरफ अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी सामाजिक रूप से पीड़ित, प्रताड़ित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो दूसरी तरफ महंगाई प्रत्येक की थाली पर असर डाल रही है| 2 सितम्बर की हड़ताल इसे ही आवाज देने के लिए है| इसे आम जनता के प्रत्येक तबके से अपार समर्थन मिलना चाहिए|

अरुण कान्त शुक्ला

1 सितम्बर, 2016                                      

Wednesday, July 27, 2016

छोटु बनेगा विधि सम्मत..

‘छोटु’ बनेगा विधि सम्मत..


सरकार से लेकर समाज की उस गहराई तक जो हमारे घरों तक भी पहुँचती है, बच्चे और स्त्रियाँ न केवल अनदेखी का शिकार होते हैं बल्कि प्राय: प्रत्येक तरह की प्रताड़ना के लिए सभी का आसान शिकार भी रहते हैं| बीते सप्ताह राज्य सभा ने बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन ) संशोधन बिल 2016 पास कर दिया| हमारे देश के नीति निर्माताओं, राजनीतिज्ञों की सामाजिक चेतना स्त्रियों और बच्चों के प्रति कितनी सजग और सतर्क है, इसका अंदाजा इससे लग जाता है कि जब ये बिल 19 जुलाई को राज्य सभा में बहस के लिए रखा गया और पास हुआ, राज्य सभा में सदस्यों की उपस्थिति कुल सदस्यों की संख्या की 25% से भी कम थी याने 60 से भी कम|

भारत में बाल श्रम की स्थिति 

यह बिल उन सभी विरोध करने वालों के मुंह पर तमाचा है, जो पिछले एक वर्ष या यूं कहें कि मई 2015 से जब मोदी मंत्रीमंडल ने इसे संसद से स्वीकृत कराने का निर्णय लिया अथवा दिसम्बर 2012 में जब पहली बार यूपीए सरकार ने लगभग वर्तमान संशोधनों वाला ही प्रारूप राज्य सभा में पेश किया था तब से इसका विरोध कर रहे थे| हमारे पास बाल श्रम को नियंत्रित करने के लिए 1986 का क़ानून था जो बच्चों को सूचीबद्ध 83 खतरनाक या जोखिम वाले उद्योगों (व्यवसायों और प्रक्रियाओं)में काम करने से निषेध करता था व अन्य व्यवसायों/प्रक्रियाओं में उसके काम करने की परिस्थितियों का नियंत्रण करता था| क़ानून के अनुसार बच्चे से अभिप्राय 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से होता था| हम सभी जानते हैं कि इस क़ानून का कितना पालन होता था? न केवल होटलों, ढाबों, खोमचों, पान की दुकानों, साईकिल/ऑटो रिपेयरिंग दुकानों घरेलु नौकरों के रूप में हमारे आसपास ‘छोटु’ घूमते रहते थे बल्कि बीड़ी, जरीकाम, गलीचा, चमड़ा, प्लास्टिक व्यवसायों से लेकर पटाखे/विस्फोटक बनाने वाले बड़े व्यवसायों में भी कम उम्र के बच्चे लगे रहते थे|
2011 के जनसांख्यकीय आंकड़े आँखें खोलने वाले हैं| इनके अनुसार प्रत्येक 20 कामगारों में एक 5-17 वर्ष का बच्चा या किशोर है| बाल श्रमिकों की कुल संख्या लगभग 2.5 करोड़ है| इससे भी ज्यादा चौकाने वाली बात यह है कि कुल बाल श्रमिकों में से लगभग साढ़े चार लाख पांच वर्ष से भी कम उम्र के हैं| लगभग 17% बाल श्रमिक अनुसूचित जाति या जनजाति से आते हैं| कहने की जरुरत नहीं है कि कुपोषित महिलाओं, कुपोषित 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों के समान ही बाल श्रमिकों की संख्या के मामले में भी भारत दुनिया में अव्वल नंबर पर है|

संशोधन लाने के पीछे सरकार के तर्क और संशोधन

सरकारें भले ही अलग अलग गठबन्धनों की हों पर संशोधनों के पीछे के तर्क दोनों के एक से हैं| पहला तर्क है कि वर्ष 2009 में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद यह जरुरी हो गया है कि 6-14 की आयु के बच्चों के रोजगार पर लगने के प्रावधान पर रोक लगाई जाए| 1986 का क़ानून गैर जोखिम वाले व्यवसायों में इसे इजाजत देता था| दूसरा तर्क है कि 1986 का क़ानून अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रावधान 138 तथा 182 के अनुरूप नहीं था, जिसके अनुसार रोजगार में प्रवेश की न्यूनतम आयु तय करना तथा 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा और नैतिक रूप से नुकसानदायक व्यवसायों में लगने से रोक लगाने का प्रावधान किया जाना है| इन उद्देश्यों और मंशा को सामने रखते हुए जो संशोधन सरकार ने रखे हैं और जिनका व्यापक विरोध शुरू से किया जा रहा है, उनमें पहला है; कोई भी बच्चा याने 14 साल से कम आयु का बालक किसी काम में नहीं लगाया जाएगा| लेकिन जब बालक अपने परिवार या परिवार के रोजगार में मदद कर रहा हो, स्कूल के बाद खाली समय में या छुट्टियों में और रोजगार खतरनाक नहीं है तो यह क़ानून लागू नहीं होगा| अगर बच्चा टी व्ही, फिल्म, विज्ञापन आदि में कलाकार के रूप में  काम करता है तो क़ानून लागू नहीं होगा बशर्ते यह सब करते हुए स्कूल की पढ़ाई प्रभावित न हो| सरकार का एक तर्क यह भी है कि परिवार के व्यवसाय में काम करते हुए मालिक-मजदूर का संबंध नहीं होता है| जबकि 2009 में अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद से ही बाल श्रम मामलों में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों की मांग थी कि अनिवार्य शिक्षा याने 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों के किसी भी तरह के व्यवसाय में लगने पर रोक लगे ताकि अनिवार्य शिक्षा क़ानून का लाभ अधिक से अधिक बच्चे उठा सकें| 

यदि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को परिवार के रोजगार में लगने की छूट दी गयी तो गरीबी और भरण-पोषण लायक कमाई बरकरार रखने के दबाव में परिवार वाले बच्चों का नाम तो स्कूल में दर्ज करा देंगे किन्तु बच्चे कभी भी स्कूल नहीं जा पायेंगे| और, ज्यादा से ज्यादा बच्चे बीड़ी बनाने, जरी, गलीचा, चमड़ा, जैसे व्यवसायों में लिप्त रहेंगे जोकि परंपरागत ढंग से कहने को तो पारिवारिक व्यवसाय हैं, पर, उन पर पूरा नियंत्रण बिचौलियों, ठेकेदारों, और बड़े व्यवसाईयों का होता है| 

विशेषकर, 1991 की उदारवादी नीतियों के आने के बाद से इस तरह के सभी व्यवसाय पूरी तरह ठेके के हवाले हैं और वर्तमान सरकार उसे बढ़ावा ही दे रही है| इसके चलते ये बच्चे स्कूल से बाहर होंगे| वैसे भी शिक्षा का अधिकार क़ानून का अमलीकरण बहुत धीमा तथा कमजोर है| इस संबंध में यूनेस्को की 2015 की रिपोर्ट का तथ्य ध्यान देने योग्य है कि विश्व में लगभग 12 करोड़ 40 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं और इनका बड़ा हिस्सा याने लगभग 1 करोड़ 77 लाख, लगभग 14% भारत में ही है|

दूसरा तर्क कि पारिवारिक कारोबार में मालिक-मजदूर का रिश्ता नहीं होता है, गले उतरने वाला नहीं है| हमारे देश में बच्चों के अधिकार को सुनिश्चित करने या पालक और अभिभावकों को बालकों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है| एक दशक पहले तक हम हर जगह एक न एक छोटु पा जाते थे| बहुत मुश्किल से 5 से लेकर 10-12 तक की आयु के बच्चों को कम से कम खुले तौर पर काम पर लगाने को हम रोक पाये हैं| अब बाबूजी, चाचा, मामा की आड़ में वह गौरखधंधा फिर से खोलने का रास्ता सरकार बना रही है|

तीसरा कि पहले ऐसे व्यवसायों को छान-बीन कर सूचीबद्ध किया गया था जो या तो प्रत्यक्षत: खतरनाक थे या जहां की परिस्थितियाँ बच्चों के काम करने के लिहाज से खतरनाक थीं| यह व्यापक सूची थी और इसमें 83 व्यवसाय थे| अब सरकार इन्हें घटाकर खदान, ज्वलनशील पदार्थ और विस्फोटक उद्योग तक सीमित कर तीन पर ले आई है याने बाकी जगह उसने शोषण के लिए खुली छोड़ दी हैं|

स्थायी संसदीय समिति के सुझावों के भी खिलाफ 

ऐसा लगता है कि मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप की दौड़ में लगातार फेल होती सरकार इन योजनाओं को गरीब बच्चों के कंधे पर रखकर चलाने की योजना में जुटी है तभी इन संशोधनों पर उसने न तो बच्चों के किसी समूह से बात की और न ही बाल श्रम के मामलें में काम कर रहे समूहों से कोई विमर्श किया| यहाँ तक कि उसने श्रम और रोजगार पर गठित संसद की स्थायी समिति के सुझावों को भी दरकिनार कर दिया, जिसने स्पष्ट रूप से बच्चों को स्कूल के बाद परिवार को मदद करने का प्रावधान हटाने, जोखिम वाले काम में किशोरों को स्वास्थ्य, नैतिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से नुकसानदायक व्यवसायों को शामिल करने, किशोरों को किसी भी व्यवसाय में लगने से पहले अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने, और सांसदों के उपर निरीक्षण की जिम्मेदारी सौंपने वाले प्रावधान शामिल करने कहा था|

प्रश्न बड़ा है

सरकार या वे सभी जो वर्तमान संशोधनों का यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि ये गरीब परिवारों को राहत देने के औजार के रूप में हैं, वे इस बात को या तो जानबूझकर अनदेखा कर रहे है या सामाजिक ताने-बाने की जानकारी से बिलकुल बेखबर हैं| किसी बच्चे को उसके बचपन से कम से कम मजदूरी पर शोषित होने के लिए अभिशप्त कर देना और उसे आगे शोषित होने का प्रशिक्षण देने का काम ये संशोधन करेंगे| यह उनकी गरीबी को स्थायी रूप से उनसे चिपकाना है| पारिवारिक व्यवसाय अनौपचारिक ढंग से चलाये जाते हैं| यहाँ काम के घंटे अनेक बार 12 से 14 घंटे तक खिंच जाते है| वहां बच्चों के अधिकारों और हितों की रक्षा कौन करेगा| थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि पालक और बच्चा दोनों स्कूल के साथ समन्वय बिठाकर चलते है तब भी स्कूल के बाद बच्चे के होम-वर्क का क्या होगा? उसके खेलने के समय का क्या होगा? उसके सोने के समय का क्या होगा? वह जो कुछ भी जो अवैधानिक है, वर्तमान सरकार उसे वैधानिक बनाने पर तुली है| यही वह श्रम कानूनों के साथ कर रही है| और यही वह बच्चों के क़ानून के साथ करने जा रही है| यदि इस क़ानून में यही संशोधन बरकरार रहते हैं और लोकसभा इसे पास करती है तो हमें फिर से अपने चारों और चाय-पान-किराना से लेकर मॉल तक की दुकानों में पटाखे से लेकर हर घरेलु उद्योग में छोटु ही छोटु देखने मिलेंगे|

अरुण कान्त शुक्ला
27/7/2016                                  





Thursday, June 30, 2016

       केन्द्रीय कर्मचारियों के वेतन पुनर्निर्धारण के पीछे का सच

आप चाहें तो केंद्र सरकार की इसके लिए प्रशंसा कर सकते हैं कि उसने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के एक हिस्से को मात्र छै माह के भीतर स्वीकार किया है| जबकि इसके पूर्व पांचवे वेतन आयोग की सिफारिशों को 19 माह तथा छटवें वेतन आयोग की सिफारिशों को 32 माह  तक केंद्र की सरकारों ने लटकाया था| सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें को इस मायने में यूनिक माना जा सकता है कि यह पहला वेतन आयोग है जिसने पिछले 70 वर्षों में सबसे कम ही नहीं बल्कि नगण्य वेतन वृद्धि की सिफारिश की है| ज्ञातव्य है कि छटवें वेतन आयोग ने 20% बढ़ोत्तरी की सिफारिश की थी, जिसे 2008 में लागू करते समय यूपीए-1 की सरकार ने दो गुना याने 40% कर दिया था| न्यूज पोर्टल्स, ई-अखबारों और प्रिंट मीडिया में इस वेतन पुनर्निर्धारण को “ढाई गुना बढ़े वेतन और पेंशन”, “वेतन में 23.5% की बढ़ोत्तरी की मंजूरी” जैसे शीर्षकों से नवाजा गया है| वहीं केन्द्रीय कर्मचारियों के असंतोष को भी प्रमुखता से उभारा गया है| यह बात और है कि यह असंतोष क्यों है, इसके विवरण में जाने की जरुरत नहीं समझी गयी| सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ केंद्र सरकार के कर्मचारियों का यह असंतोष नया नहीं है| नवम्बर 2015 में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आने के तुरंत बाद ही केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी संगठनों की राष्ट्रीय संयुक्त कार्यवाही समिति ने इसके अनेक प्रावधानों और सिफारिश की गयी 14.28% की वेतन वृद्धि को अपर्याप्त बताते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा की थी कि वह लागू करने का निर्णय लेते समय इनमें सुधार करेगी| पर, सरकार ने न तो वेतन वृद्धि के प्रस्ताव में कोई सुधार किया और न ही आयोग के द्वारा प्रस्तावित भत्तों में कटौती के प्रस्तावों को नकारा है| उन पर निर्णय आना शेष है|

बुधवार को मंत्रिमंडल के द्वारा प्रस्तावों को हरी झंडी मिलते ही देश में मौजूद कारपोरेट पोषित नवउदारवाद के भगत किस्म के स्तंभकारों ने तुरंत ही केन्द्रीय कर्मचारियों के 1946 के 35 रुपये के वेतन के साथ आज के वेतन की तुलना करते हुए आलोचना भी शुरू कर दी| जबकि आयोग की सिफारिशों में कर्मचारियों के मौजूदा भत्तों के उपर जो कैंची चली है, उस पर वे शातिराना ढंग से खामोश हैं| कर्मचारियों को मिलने वाले वर्त्तमान आवास भत्ते के स्लेबों को  30% से घटाकर 24%, 20% को घटाकर 16%, और 10% को घटाकर 8% करने, छोटा परिवार भत्ता, त्यौहार अग्रिम को समाप्त करने, नवजात शिशु की देखभाल के लिए दिए जाने वाले अवकाश में वेतन को घटाकर 80% करने जैसे अनेक मुद्दे हैं, जो इस बढ़े हुए वेतन की बढ़ोत्तरी को निष्प्रभावित करते हैं| सामान्यत: देश के कर्मचारी वर्ग के अलावा अन्य लोगों को सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों, बैंक, बीमा तथा सरकारी क्षेत्रों में होने वाले वेतन-पुनर्निर्धारण के बारे में अंदरुनी जानकारी नहीं होती है और वे आसानी से सरकार तथा कारपोरेट के पिठ्ठुओं के इस भ्रामक प्रचार को सच मान बैठते हैं|

वेतन पुनर्निर्धारण के पीछे का सच-

वेतन पुनर्निर्धारण किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो, स्वयं अपने आप में सरकार की स्वीकृति है कि वह दो वेतन पुनार्निर्धारणों के बीच की अवधि में महंगाई के बढ़ने पर रोक नहीं लगा सकी है और बढ़ी हुई महंगाई अब किसी भी तरह से वापस नहीं हो सकती| तब, एक तयशुदा समय के बाद, जो केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए 10 वर्ष है, सरकार को कर्मचारियों को प्रदत्त महंगाई भत्ते को मूल वेतन में जोड़ना पड़ता है| इसका अर्थ हुआ कि सरकार केवल पुराने वेतन के स्तर को संभालती है और मूल वेतन में आया परिवर्तन बढ़ोत्तरी न होकर केवल पुराने वेतन के बराबर लाया जाना होता है क्योंकि तब नए वेतनमान पर मिलने वाला महंगाई भत्ता निर्धारित तिथी, जो अभी 1 जनवरी 2016 है, को शून्य हो जाता है| इसे वर्त्तमान सन्दर्भ में इस तरह समझा जा सकता है कि छटवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 7000 रुपये तय किया था| उसमें 1.1.2016 को लागू 125% महंगाई भत्ता 8750 रुपये जोड़ने के बाद कुल न्यूनतम वेतन 15750 रुपये होता है| 18000 रुपये न्यूनतम वेतन तय करने का अर्थ हुआ कि कुल बढ़ोत्तरी मात्र 2250 रुपये अर्थात लगभग 14.28% हुई| यही तरीका सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, कर्मचारियों के दैनिक वेतन को तय करते समय अपनाना पड़ता है, जिसमें वह हमेशा ही हेराफेरी करती है| इस तरह मूल वेतन में वास्तविक बढ़ोत्तरी 23.55% नहीं है, जैसा कि कुप्रचार है| यह केवल 14.28% है|

14.28% की यह बढ़ोत्तरी भी कर्मचारियों पर कोई दया अथवा दान नहीं है| एक कर्मचारी लगभग 30 से 35 वर्ष तक सरकार की सेवा में रहता है, जिसके दौरान उसके ऊपर परिवार के भरण-पोषण के अतिरिक्त देश तथा समाज के लिए अच्छे सुशिक्षित नागरिक प्रदान करने की जिम्मेदारी होती है| जिसके लिए उसे अपने बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा दिलानी होती है, साथ ही उनके वैवाहिक संस्कारों को संपन्न कराने के दायित्व का भी निर्वाह करना होता है| यह हमारी समाज व्यवस्था की विडंबना है कि जिस दायित्व का निर्वाह सरकार और समाज को करना चाहिए उसे एक व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी में डालकर सरकार पल्ला झाड़ लेती है| समाज के अन्दर मौजूद कुपोषण से लेकर अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी अनेक समस्याओं के पीछे का सच यही है कि सरकारें समाज निर्माण के इस दायित्व पर निष्क्रीय हैं| ये दायित्व हमेशा बढ़ते क्रम में होते हैं और वेतन में मात्र 14.28% की बढ़ोत्तरी से उन्हें निभाना असंभव सा कार्य है|

न्यूनतम एवं अधिकतम वेतन में अंतर-

हमें केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों का प्रशासनिक ढांचा पराधीन भारत से विरासत में मिला है| अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए ऐसे प्रशासनिक अधिकारी चाहिए थे, जो न सामान्य देशवासियों को बल्कि केंद्र व राज्य के कमचारियों को भी प्रशासनिक अधिकारों के साथ साथ अपने रुतबे तथा रहन-सहन के ढंग से भी दबा कर रख सकें| इसीलिये, पराधीन भारत में निचले स्तर के कर्मचारयों का ही नहीं बल्कि आम कामगारों का भी वेतन अधिकारी, सुपरवाईजर्स स्तर के लोगों की तुलना में कई गुना कम रखा जाता था| आय में यह असमानता अनेक सामाजिक व्याधियों की जननी होती है| स्वतन्त्र भारत में केन्द्रीय कर्मचारियों के मामले में न्यूनतम और अधिकतम आय में यह अंतर पहले और दूसरे वेतन आयोग ने क्रमश: 36 तथा 37 गुना रखा था| लेकिन, तीसरे वेतन आयोग ने इसे कम कर 18 गुना, चौथे और पांचवें आयोग ने और कम करके 10 गुना तथा छटवें आयोग ने यह 11 गुना रखा| अब सातवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 18000 और अधिकतम वेतन 2,50,000 करके इस अंतर को 13 गुना कर दिया है| यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि नवउदारवाद के दौर में भी इस अंतर को कम नहीं किया गया तो बनाए रखने की कोशिश की गयी| अब इसे बढाने का सीधा अर्थ है कि केंद्र सरकार देश के अन्दर मौजूद और लागातार बढ़ती असमानता की खाई को कम करने की कतई उत्सुक नहीं है बल्कि उसे और बढ़ाने की ओर अग्रसर है| जबकि, केंद्र सरकार के कर्मचारी संगठनों की संयुक्त कार्यवाही समिति ने इसे घटाकर 1:8 करने की मांग की थी| सरकार की इस सोच को नजरअंदाज इसलिए भी नहीं किया जा सकता कि जिस निजी क्षेत्र के मुकाबले वेतन वृद्धि को सरकार ठहरा रही है वहां पहले से ही यह अंतर बहुत व्यापक है और सरकार के इस कदम से वहां उस खाई के और चौड़ा होने की संभावना बनती है|

क्या यह खजाने पर बोझ है-

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आते ही वित्तमंत्री ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया था कि इन सिफारिशों से सरकार के खजाने पर 1 लाख करोड़ रुपये का बोझ आयेगा, जिसे वर्तमान में सहन नहीं किया जा सकता है| केंद्र की सरकार ने नवउदारवाद के जिस दौर को अंतिम चरण तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है, उसमें देश के किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों और आम जनता के कमजोर तबकों के उपर होने वाले व्यय को सरकारें, कारपोरेट और संपन्न तबके  बोझ ही समझते हैं| यह केंद्र और राज्यों की सरकारों की प्रत्येक नीति में देखा जा सकता है| सरकार में वित्तमंत्री वंचित और दबे तबके के रक्षक के बतौर नहीं बल्कि बड़े कारपोरेट घरानों और संपन्न तबकों के रक्षक के रूप में दिखते हैं| तभी काले धन पर सिर्फ शब्द-वर्षा होती है और उसे एक माह में वापस लाया जाएगा, एक राजनीतिक जुमला बन जाता है| 4 लाख करोड़ रुपयों का वह कर्ज, जो कारपोरेट घरानों और संपन्नों ने बैंकों से लिया और डकार गए, वित्त मंत्री की भृकुटी में बल नहीं लाता| दो बजट में हंसते-मुस्कराते 4 लाख करोड़ की टेक्स राहत और कर अदायगी से मुआफी कारपोरेट को दे दी जाती है| जबकि आम लोगों पर अप्रत्यक्ष करों और उपकरों का बोझ लादा जाता है| सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले खर्चों में कटौती की जाती है| छोटी बचत योजनाओं पर दिए जाने वाले ब्याज में कमी की जाती है तथा कर्मचारियों के भविष्यनिधि पर निशाना लगाया जाता है|

14.28% की बढ़ोत्तरी क्यों कम है?-

केन्द्रीय कर्मचारियों तथा राज्यों के कर्मचारियों का वेतन पुनर्निर्धारण सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों तथा बैंक, बीमा अथवा ऐसे ही अन्य संस्थानों की तरह प्रत्येक पांच वर्ष में नहीं होता है| संगठित क्षेत्र में, जहां वेतन पुनर्निर्धारण पांच वर्ष में होता है, अमूमन वेतन वृद्धि 17 से लेकर 22-23% के मध्य कहीं होती है| केन्द्रीय कर्मचारियों की संयुक्त कार्यवाही समिति ने उसी अनुसार न्यूनतम वेतन 26000 करने की मांग की थी| इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए 2008 में यूपीए ने 40% की वेतन वृद्धि दी थी| वित्तमंत्री का यह कहना कि सिफारिशों को मंजूरी देते समय निजी क्षेत्र में दिए जा रहे वेतन से समरूपता हो, इसका खयाल रखा गया, केवल हवाई बात है| जबकि वास्तविकता यह है कि उच्च अधिकारियों के मामले में भी, जहां वेतन बढ़ोत्तरी निचले तबके के कर्मचारियों की तुलना में बेहतर है, उच्च अधिकारियों का वेतन निजी कंपनियों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की तुलना में कुछ भी नहीं है, जो करोड़ों रुपये के पैकेज पर कार्य करते हैं| जहां तक तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों का सवाल है, यह सर्वविदित तथ्य है कि निजी क्षेत्र सबसे बड़ा कम वेतन देने वाला शोषक नियोक्ता है| बल्कि सरकार ने निजी क्षेत्र के दबाव में ही आकर निचले कर्मचारियों के वेतन को कम रखा है| क्योंकि, सरकारी अथवा सार्वजनिक क्षेत्र में वेतन स्तर के ऊंचा उठने पर निजी संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों पर भी निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी का दबाव पड़ता है और उन्हें वेतन स्तर को उठाना पड़ता है| 18000 रुपये पर निर्धारित इस न्यूनतम वेतन में से यदि 1.1.2004 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों के मामले में नई पेंशन योजना की राशी 10% की दर से कम कर दी जाए, जो आवश्यक कटौती है तो वास्तविक बढ़ोत्तरी मात्र 450 रुपये रह जायेगी और वह भी 10 वर्षों के अंतराल के बाद| इसी तरह 1.1.2004 के पहले के कर्मचारियों के वेतन से 6% सामान्य भविष्य निधी की राशी निकाल दी जाए तो वास्तविक रूप से बढ़ोत्तरी केवल 1170 ही रह जाती है| अभी यह भी सपष्ट नहीं है कि सरकार उनके वर्त्तमान भत्तों के साथ क्या करने वाली है? स्वाभाविक है कि 10 वर्षों के अंतराल के बाद केवल आंकड़ों की कलाबाजी दिखाई जायेगी तो केन्द्रीय कर्मचारी असंतुष्ट और रुष्ट दोनों होंगे|

अरुण कान्त शुक्ला

30जून,2016                  

Friday, March 4, 2016

कर्मचारी भविष्य निधी पर आयकर या कर्मचारियों की पेट काटकर की गई बचत पर सेंधमारी-


स्वतन्त्र भारत के इतिहास में शायद ही किसी वित्तमंत्री या उसके विभाग को बजट में किये गए प्रस्तावों में से किसी एक पर इतने स्पष्टीकरण देने पड़े होंगे, जितने अरुण जेटली और उनके वित्त मंत्रालय को कर्मचारी भविष्य निधी के 60% जमा हिस्से को आयकर के दायरे में लाने पर देने पड़ रहे हैं| जाहिर है, वित्तमंत्री और उनका मंत्रालय उनके इस कदम पर जितने भी तर्क दे रहे हैं, वे इतने बेदम हैं कि उनमें से एक भी किसी के गले उतरने वाला नहीं है|

सामाजिक सुरक्षा योजना बनाम अनिवार्य बचत योजनाओं की सच्चाई-

भारत में यह एक कड़वी सच्चाई है कि वह चाहे संगठित क्षेत्र के श्रमिक, कर्मचारी हों अथवा असंगठित क्षेत्र के, उनका वेतन कभी इतना नहीं रहा कि वे अपने जीवन की रोजमर्रा की आवश्यकताओं, आकस्मिक जरूरतों और पारिवारिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए स्वयं होकर भविष्य अथवा वर्तमान की किसी सुरक्षा के लिए अपने वेतन का 8 से लेकर 12 प्रतिशत तक हिस्सा किसी भी बचत योजना में बिना अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं में कटौती किये लगा सकें| यह बात कर्मचारी भविष्य निधी से लेकर अन्य हर तरह की बचत योजना पर लागू होती है| इस बात की पुष्टी के लिए एक ही उदाहरण काफी है, सरकार यदि आज जीवन बीमा, आमबीमा, चिकित्सा बीमा और इससे जुडी सभी योजनाओं से आयकर की छूट समाप्त कर दे तो सारी बीमा कंपनियों का व्यवसाय केवल अति संपन्न तबके तक सिमिट कर रह जाएगा  और उच्च मध्य वर्ग तक के लोग बीमा से किनारा कर लेंगे| इसकी पुष्टी इस तथ्य से भी होती है कि हमारे देश में लगभग 57 करोड़ लोग ऐसे हैं जो बीमा के योग्य हैं,पर, सभी जीवन बीमा कंपनियों का व्यक्तिगत जीवनों पर बीमाधारकों की संख्या पांच करोड़ से उपर नहीं है| इसका अर्थ है कि बीमा के योग्य होने के बावजूद बीमा इसलिए नहीं है क्योंकि उसे खरीदने की ताकत बाकी लोगों में नहीं है|
श्रमिक/कर्मचारी के वेतन के कुछ हिस्से को इसीलिये उनकी भविष्य की जरूरतों और सुरक्षा की दृष्टि से बचत में डालना अनिवार्य किया गया| पूंजीवादी व्यवस्था के होने के बावजूद, इस सच्चाई को महसूस किया जाता रहा कि नियोक्ता/मालिक से श्रमिक/कर्मचारियों को कभी भी श्रम का उचित (पूरा) मूल्य नहीं मिलता है| इसीलिये, नियोक्ता/मालिक को भी कर्मचारी भविष्य निधी में कर्मचारी के लिए तय न्यूनतम अंशदान के बराबर की राशी जमा करने की बाध्यता रखी गई| श्रमिक/कर्मचारी के द्वारा कर्मचारी भविष्य निधी में जमा राशी कभी भी उनकी आय का हिस्सा नहीं रही, इसीलिये उसे इस अंशदान पर आयकर से छूट भी मिली और नियोक्ता को भी तय मानदंडों के अनुसार उस एकत्रित कोष को निवेश करके आय करने की छूट रही, जिसका एक हिस्सा ब्याज के रूप में जमा राशी पर दिया जाता रहा है| इस पूरे मायाजाल का एक दिलचस्प पहलू और है| नियोक्ता/मालिक कर्मचारी भविष्य निधी में दिए गए उनके योगदान के लिए उसी प्रकार आयकर में छूट प्राप्त करते हैं, जैसे श्रमिक कर्मचारी को मिलती है| अब यदि उस एकत्रित कोष, जिसका प्रबंधन भविष्य निधी के लिए बनाया गया ट्रस्ट करता है, के 60% हिस्से पर आयकर लगाया जाता है तो श्रमिक/कर्मचारी उस मूल हिस्से और उसके ब्याज पर भी आयकर देंगे, जिस पर नियोक्ता/मालिक आयकर की छूट प्राप्त कर चुका है| याने अपने जिस हिस्से पर कर्मचारी को आयकर की छूट मिली थी, उस पर तो वह आयकर देगा ही,साथ ही उस हिस्से पर भी आयकर देगा जिसकी छूट नियोक्ता/मालिक ले चुका है| यह घालमेल कितना अनैतिक है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है|

नीयत में खोट है-

सर्वप्रथम, हम बजट भाषण में कही गई इस बात को लेते हैं कि ये प्रस्ताव 1 अप्रैल 2016 के बाद जमा किये गए अंशदान पर लागू  होगा| यह सीधे सीधे श्रमिकों/कर्मचारियों में भेद करके उनकी एकता को तोड़ने वाला प्रस्ताव है| वे श्रमिक/कर्मचारी जो आनेवाले कुछ वर्षों में सेवानिवृत होने वाले हैं, यह सोचकर प्रस्ताव का विरोध करने में ढीले पड़ सकते हैं कि यह सरदर्द तो पिछले कुछ वर्षों में नौकरी पर आये तथा भविष्य में कामगार दुनिया में प्रवेश करने वालों का है क्योंकि उनको ही बड़ा नुकसान होगा| चूँकि, उन्हें (पुराने कर्मचारियों को) हानी का बड़ा हिस्सा नहीं झेलना है, अतएव वे क्यों पचड़े में पड़ें? अब यह किसी से छुपा नहीं है कि श्रम नियमों में सुधार मोदी सरकार का सबसे बड़ा एजेंडा है और इसके लिए विभाजित श्रम समुदाय सरकार को चाहिए, उसी अनुरूप ये प्रस्ताव भी है|

दूसरी बात, वित्तमंत्री का मुस्कराते हुए यह कहना है कि इस प्रस्ताव से यह फ़ायदा होगा कि निजी कंपनियों के कर्मचारी अथवा वे श्रमिक/कर्मचारी जो किसी पेंशन योजना के सदस्य नहीं हैं, उस 60% हिस्से को किसी बीमा कंपनी के एन्युटी (पेंशन) योजना में लगाकर स्वयं के लिए नियमित पेंशन का इंतजाम कर सकते हैं| यह सीधे सीधे बीमा कंपनियों के माध्यम से शेयर बाजार के जुआरियों के पास श्रमिक/कर्मचारियों की पेट काटकर की गई बचत को पहुंचाना है| यह सभी जानते हैं कि सरकार की शेयर मार्केट से जुड़ी कर्मचारी पेंशन योजना का पहले से ही श्रमिक/कर्मचारी विरोध करते आ रहे हैं, जहां उनका पैसा सदा जोखिम में रहता है| कुल मिलाकर संपन्नों के ऊपर हाथ डालने से हमेशा ही डरने वाली सरकार (चाहे वह कोई भी सरकार हो) वैश्विक मंदी में देशी/विदेशी कारपोरेट को पूंजी मुहैय्या कराने के लिए श्रमिक/कर्मचारियों की जीवन भर पेट काटकर की गयी बचत पर सेंधमारी कर रही है| बेहतर यही है कि यह श्रमिक/कर्मचारी पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह किस तरह अपनी गाढ़ी बचत का उपयोग/निवेश करना चाहता है|

देश की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में समझ की कमी-  

सरकारें जब कभी भी गरीब-गुरबा, श्रमिक/कर्मचारी/किसानों के बारे में इस तरह के घड़ियाली प्रस्ताव लेकर आती है तो अक्सर कहा जाता है कि एयर-कंडीशन में बैठकर प्रस्ताव बनाते समय सरकार के मुखियाओं और अधिकारियों को देश में व्याप्त सामाजिक सच्चाई का कोई ज्ञान नहीं होता| वित्तमंत्री का कर्मचारी भविष्य निधी के 60% हिस्से पर आयकर लगाने का प्रस्ताव उस धारणा को एक बार पुन: पुष्ट करता है| आज के सामाजिक हालात की सच्चाई यह है कि एक नवजवान की आयु पढ़ाई पूरी करके किसी स्थायी प्रकृति के रोजगार में लगते लगते 35वर्ष के आसपास हो जाती है और जब उसके रोजगार से सेवानिवृत होने की आयु आयेगी/आती है तब उसके बाल बच्चे रोजगार की बात तो दूर पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाते हैं या कर पायेंगे| यह वह समय होता है जब उसके समक्ष स्वयं के लिए घर, बच्चों की पढ़ाई (उच्च शिक्षा), शादी के अलावा अन्य तरह की सामाजिक जिम्मेदारियां मुंह बाए खड़ी होती हैं या होंगी| इन सबसे निपटने के लिए उसे एकमुश्त बड़ी धनराशी की जरुरत होती है और वह पूरी तरह भविष्य निधी की अपनी जमा राशी पर ही निर्भर रहता है, जिसे वित्तमंत्री बजट प्रस्तावों के जरिये शेयर बाजार के लुटेरों के हवाले करना चाहते हैं| इस क्रूर सामाजिक सच्चाई से सैकड़ों करोड़ की दौलत रखने वाला वित्तमंत्री भिज्ञ नहीं हो सकता, समझ में आता है| पर, प्रधानमंत्री क्यों नहीं समझ रहे, यह समझ से परे है!

अरुण कान्त शुक्ला

4मार्च, 2016