Saturday, March 9, 2013

बाजार महिलाओं का दुश्मन है ..




महिलाओं के बारे में शहरों से लेकर गाँव तक एक बात अक्सर चटखारे लेकर कही जाती है कि वे सबसे ज्यादा खुश तब होती हैं, जब वे बाजार में होती हैं याने जब वे खरीददारी कर रही होती हैंगहनों, कपड़ों, बरतनों, यहाँ तक कि किराना की दुकानों पर भी हमें खरीददारों की भीड़ में महिलाओं की संख्या ही हमेशा अधिक नजर आयेगी पर, खरीददारी करते समय शायद ही कोई महिला इस बात की चिंता करती होगी की बाजार का उसके प्रति रवैय्या क्या है और आज जिन सामाजिक प्रताड़नाओं से वह दो चार हो रही है, बाजार उनके लिए कितना जिम्मेदार है?

विश्व बाजार व्यवस्था में महिलाओं का महत्त्व एक सबसे बड़े खरीददार के रूप में नहीं उपयोगी माल के रूप में आंका जाता है और सभी यह जानते हैं की बाजार माल से ही फलता फूलता है बाजार की इस व्यवस्था में महिलाओं का उपयोग मुनाफ़ा बढ़ाने के अनेक उपायों में से एक ऐसा उपाय है, जो बाजार के अनुकूल बैठता है बाजार के सारे प्रयास इस सोच के अनुरूप समाज और संस्कृति के निर्माण को प्रोत्साहित करने के होते हैं| महिलाओं के प्रति समाज (महिलाओं सहित) का रुख और व्यवहार बड़ी हद तक बाजार की इस सोच का हिस्सा होता है

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में वैश्वीकरण और नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के जिस दौर से आज विश्व समाज गुजर रहा है और दुनिया के तमाम देशों की सरकारें अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जिस तरह से बाजार के हवाले करती जा रही हैं, उसका नतीजा यह है की एक उपभोगन्मुखी समाज का निर्माण हो रहा है, जिसमें बाजार है, माल है, उपभोग की अति महत्वाकांक्षा है और उपभोक्ता हैं, पर, श्रम और श्रमिक का कहीं कोई महत्त्व तो दूर, उल्लेख भी नहीं होता है श्रम की इस अवेहलना का विपरीत प्रभाव महिलाओं पर दुर्दशा की हद तक पड़ा है, जो मूलतः श्रमजीवी होती हैं, चाहे वे प्रत्यक्ष श्रम याने वैतनिक श्रम या स्वरोजगार से जुड़ी हों या नहींनई नीतियों के फलस्वरूप अनेक ऐसे छोटे और घरेलु उद्योग धंधे नष्ट हो गए जो बड़ी संख्या में महिलाओं को पारिवारिक आय बढ़ाने में मदद करते थे मुक्त व्यापार व्यवस्था ने अनेक परंपरागत आजीविका के साधनों को बर्बाद कर दिया सरकारी क्षेत्रों में रोजगार मिलना बंद होने और निजी क्षेत्रों में रोजगार संकुचन की वजह से परिवारों की आय में कमी होने लगी आर्थिक नीतियों में आये इन परिवर्तनों के चलते परिवार की आय में योगदान देने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी महिलाओं के कंधे पर आई है आज पहले के किसी भी दौर से बहुत ज्यादा संख्या में महिलाएं स्वेच्छा से या मजबूरी में, जैसे भी हो, पर, काम की तलाश में घर से निकलने के लिए मजबूर हुई हैं तकनीकी विकास ने रोजगार के ऐसे अवसरों को पैदा किया है, जिनको इस्तेमाल करने के लिए विस्थापित होना जरुरी हो गया है लगभग चार माह पूर्व आये एक वैश्विक सर्वे के मुताबिक़ आने वाले दस वर्षों में विश्व में लगभग एक अरब महिलाएं श्रमिक के रूप में बाजार से जुड़ेंगी जिन आर्थिक नीतियों के दबाव के फलस्वरूप उपजी आर्थिक तंगी को दूर करने वे घर से विस्थापित होंगी, वे ही आर्थिक नीतियाँ समाज में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण भी कर रही हैं, जो महिलाओं के लिए संकट स्वरूप हैं

सामाजिक जीवन के लगभग प्रत्येक पहलू को बाजार के हवाले करते जाने का नतीजा यह हो रहा है कि बड़े बड़े कारपोरेट्स और कंपनियां ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपने उत्पादों की तरफ खींचने की होड़ में कुत्सित विज्ञापनों का सहारा लेकर लोगों की रुची और प्रवृति दोनों को ही बिगाड़ने पर तुल गए हैं इस पूरी प्रक्रिया में माल बेचने के लिए धूर्तता पूर्वक महिलाओं को वस्तु के रूप में पेश/इस्तेमाल किया जा रहा है बाजार की महिलाओं के साथ यह दोहरी संबद्धता, माल बेचने के लिए महिलाओं का वस्तु के रूप में इस्तेमाल और माल की खपत के लिए तैयार खड़ा विशाल बाजार, एक ऐसी परिस्थिति और प्रक्रिया को निर्मित करता, जहां स्वयं महिलाएं भी अधिकाधिक आय अर्जन की लालच में स्वयं के वस्तुकरण के लिए लालायित हो जाती हैं मीडिया भी चूंकि उसी बाजार का एक अस्त्र है, वो भी सौन्दर्य स्पर्धाओं, फेशन परेडों, सफल माडलों की कहानियों जैसे कार्यक्रमों के जरिये समाज में कुत्सित अभिरुचियों को बढ़ाने में लगा रहता है इस कार्य में अधेड़ और वृद्ध महिलाओं को भी वस्तु के रूप में पेश करने में बाजार को कोई हिचक नहीं होती, क्योंकि बाजार के लिए वे वस्तु और खरीददार दोनों होती हैं

बाजार के इस रुख से समाज में महिलाओं के प्रति और उनकी सामाजिक स्थिति के प्रति एक अधोगामी और अवांछित भावना पैदा होती है, जो महिलाओं के दमन और उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार है
अरुण कान्त शुक्ला
8मार्च,2013                                  

Tuesday, March 5, 2013

राहुल बाबा..आप खुद समझदार हैं!



राहुल बाबा..आप खुद समझदार हैं!

एकदम सच कहते हो राहुल बाबा! शादी, बोले तो एकदम झमेला शादी करेंगा तो बीबी, बच्चों की रिस्पांसबिलिटी तो लेना का होता| अब अपने अखिलेश भैया की बात को ही ले लो शादी किया तो मुख्यमंत्री बनने के बाद बीबी को सांसद बनाया की नहीं और वो भी निर्विरोध अपुन को नहीं मालूम की कभी आपका मां, दादी या नाना भी कभी निर्विरोध सांसद बना है की नहीं? अपुन को तो लगता है राहुल बाबा की कांग्रेस के कल्चर के बारे में आपसे ज्यादा कोई नहीं जानता आप एकदम ठीक बोला, ये हाईकमान आपका दादी का शुरू किया हुआ ही है जब सब तरफ से आक्रमण होगा तो कोई न कोई को कमान तो संभालना ही होगा| फिर, आपका फेमिली क्यों न संभालेआपका दादी, आपके चाचा को कार बनाने का कारखाना खुलवा दिया| सबको बड़ा तकलीफ हुआ अटलजी को लम्बी उम्र मिले , अभी तो सुना है वो बोल नहीं पाते, उस समय खूब बोलते थे, बोले की इंदिरा सरकार गाय है और आपके चाचा, याने संजय चाचा, बछड़ा अब बोले तो सबके मां, बाप को अपने बच्चों की रोजी रोटी का फिकिर होता है आपके दादी को था तो क्या गलत था आप ये भी बोले की आप यदि दादी की जगह होते तो वही करते जो दादी ने किया| अपुन आपको एक और बात कहता हूँ, बोले तो ये कि अगर आपका दादी आज अगर आपकी जगह होता तो वो भी ये ही करता, जो आज आप या आपकी मां कर रहे हैं| बोले तो अंडा दे मुर्गी और ऐश करे फ़कीर पर, आप शादी नहीं करेगा, ये एकदम परफेक्ट डिसीजन है, आखिर देश के वास्ते सबको कुछ न कुछ कुरबान करना मांगता है वैसे भी, अपुन फिल्मों भी देखा है, खासा हीरो, बोले तो समाज की हर बुराई के खिलाफ लड़ने को हरवक्त तैयार, पर, शादी करने के बाद बीबी के चक्कर में बोले तो खलनायकों से बहुत मार खाता है बीबी भी बोले तो उसे बुराई के खिलाफ लड़ने की परमीशन तब देती है, जब प्रोड्यूसर, डायरेक्टर सब का सब फिलिम बनाते बनाते थक जाता है और फिलिम ख़त्म होने को होती है आपका फिलिम का तो भी शूटिंग भी शुरू नहीं हुआ है, आप इस झमेले एकदम ईच नहीं पड़ना आप बोले की आपका आदर्श गांधी हैं, वहां तक तो ठीक है और बोले तो निष्काम कर्म में विश्वास रखते हैं, वहां तक भी ठीक है| पर, आगे गांधी बाबा को फालो करने की जरुरत नहीं है बोले तो इस वास्ते की फिर आगे का रास्ता बहुत कठिन है गांधी गलत को बिलकुल बर्दाश्त नहीं करता था, बोले तो एकदम सनकी माफिक| पर, आपको तो सब बर्दाश्त करना है आप कर भी रहे हैं इस देश में वो सब है, जो गांधी नहीं चाहता था और आप वो सब बर्दाश्त कर रहे हैं बोले तो आपकी सरकार करप्शन में दुनिया में नंबर वन है गांधी बोलता था की पहले गरीब को खाना मिलना चाहिए फिर अमीर के खाने की चिंता करनी चाहिए आपकी सरकार पहले अमीर की चिंता करती है फिर गरीब की बात करती है गांधी बोलता था पाप से घृणा करो पापी से नहीं आपकी सरकार पापी और पाप दोनों से प्यार करती है गांधी रोज शाम को प्रार्थना सभा में कुछ न कुछ बोलता था आपकी पार्टी के प्रधानमंत्री और आपकी माँ जहां बोलना चाहिए , वहां भी चुप रहते हैं आप बोले की गांधी हर तबके के लोगों को प्रेरित किया पर, अपुन को ऐसा नहीं लगता यदि गांधी सबको प्रभावित किया होता तो सबसे ज्यादा तो कांग्रेसी प्रभावित होने चाहिए थे, पर, आपको लगता है क्या कि कांग्रेसी गांधी से प्रभावित हैं? आप बोलेंगे की गांधी सूत कातते थे और अधिकाँश कांग्रेसी खादी पहनते हैं तो फिर सबसे ज्यादा प्रभावित तो वो हुए जिनके पास आपके राज में पहनने को कपडे नहीं हैं, क्योंकि गांधी जी भी आधे नंगे ही रहते थे( गांधी माफ़ करें) अपुन से इसीलिये आपको एकदम मुफ्त की सलाह, बोले तो गिफ्ट में क्या, कि गांधी का पूरा पूरा इस्तेमाल करने का, पूरा दूध निकालने का, पर, फालो नहीं करने का, फालो करना बोले तो पचड़े में पड़ने के माफिक आप एक बात और बोले की आप सांसदों को अधिकार सम्पन्न बनाना चाहते हो बोले तो मुफ्त के खाने से लेकर भ्रष्टाचार, बलात्कार, सवाल पूछने का पैसा लेने जैसा कौन सा अधिकार है जो उनके पास नहीं है? अब आप उनको क्या सरे आम अपुन का खून करने का अधिकार दिलाना चाहते हो? राहुल बाबा, अपुन आपको एक राज की बात बोलता हूँ, अधिकार बोले तो देश के उन 70 करोड़ लोगों के पास नहीं है, जिनके लिए आप मनरेगा चलाते हो और उनको उनकी मजदूरी नहीं मिलती, जिनके लिए आप पिछले 9 वर्षों से खाद्य सुरक्षा क़ानून ला रहे हो(कभी सोचा की 9 साल कोई भूखा ज़िंदा भी बचेगा), अपना हाथ जिनके साथ होने की बात करते हो, पर, वो हाथ हमेशा लेने के लिए ही बढ़ता है, कभी देने  के लिए नहीं उठता पर, ये आपको कभी पता नहीं चलेगा, बोले तो क्यूं , इस वास्ते की ये गांधी को भी नहीं पता था वो जब साऊथ अफ्रिका से वकालत करने के बाद आया तो आपके माफिक सूटेड बूटेड था जस्ट लाईक गोल्डन स्पून इन सिल्वर माऊथ| अपुन का अंगरेजी कमजोर है, पर लगता है ये लाइन भी परफेक्ट कहावत बनेगा देश का गरीबों का हाल जानने के वास्ते उसको पूरे देश का दौरा बिना चमचों के(उस जमाने में दिग्गी जैसे चमचे होते थे की नहीं अपुन को नहीं मालुम) करना पड़ा और वो आधे रास्ते में आधा नंगा हो गया आगे अपुन क्या बोलेगा आप खुद समझदार हैं
अरुण कान्त शुक्ला
6 मार्च, 2013
                                          

Tuesday, February 19, 2013

नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ ट्रेड यूनियनों का संघर्ष काफी पुराना है-




प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की अपील के बावजूद यह तय है कि देश के संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और कर्मचारियों का बहुत बड़ा हिस्सा 20 और 21 फरवरी को महंगाई पर नियंत्रण रखने, सार्वभौम सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये खाद्य सुरक्षा को निश्चित करने, न्यूनतम वेतन को 10000 रुपये करने, समान कार्य के लिए समान वेतन देने और कामगारों के शोषण के सबसे बड़े हथियार ठेका पद्धति को समाप्त करने, की मांगों को लेकर हड़ताल पर रहेगा प्रधानमंत्री ने यधपि ऐके एंटोनी, शरद पवार, पी चिदम्बरम और और श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खर्गे जैसे वरिष्ठ मंत्रियों को ट्रेड यूनियनों को फुसलाने के लिए लगाया है, पर, इसका कोई नतीजा निकलेगा, ऐसा लगता नहीं है इसका सबसे बड़ा और पहला कारण यह है की प्रधानमंत्री की झोली में इस देश के गरीबों और आम आवाम को देने के लिए वंचनाओं और गुरबत के सिवा कुछ भी नहीं है दूसरी बात, देश के अन्दर ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम होगी, जो प्रधानमंत्री या उनकी सरकार पर या उनके द्वारा किये जाने वाले वायदों पर भरोसा करते हों, फिर ट्रेड यूनियनों के द्वारा विश्वास करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता तीसरी बात, भारत के कामगारों का बहुसंख्यक हिस्सा, विशेषकर असंगठित क्षेत्र के कामगार या निजी क्षेत्र के कामगार, आज जिस बदहाली और जिल्लत को झेल रहे हैं, वह नवउदारवाद की उन्हीं नीतियों के कारण है, जिन पर मनमोहनसिंह चल रहे हैं और उस रास्ते से टस से मस भी नहीं होना चाहते, जबकि ट्रेड यूनियनों का सारा संघर्ष ही उन नीतियों और उनके परिणामों के खिलाफ है और काफी पुराना है

वस्तुतः, भारत का ट्रेड यूनियन आन्दोलन बीसवीं सदी के नौवें दशक में ही आईएमएफ और विश्वबैंक निर्देशित नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल चुका था, जब इंदिरा गांधी सरकार ने विश्वबैंक और आईएमएफ से लिए गए कर्जों के एवज में उनकी निर्देशित नीतियों को भारत के कामगारों पर थोपने की कोशिशें शुरू कीं ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रीय अभियान समिती (National Campaign Committee) के आव्हान पर 19 जनवरी 1982 को की गयी उस हड़ताल ने ही भविष्य में नवउदारवाद के खिलाफ किये जाने वाले मजदूरों के संघर्षों की नींव रखी थी 19 जनवरी 1982 की उस हड़ताल में देश में पहली बार कामगार, किसान, कृषी मजदूर और बेरोजगार युवा एक साथ लामबंद हुए यह स्वतंत्र भारत में पहली संयुक्त एकताबद्ध कार्रवाई थी और कामगारों, किसानों, और युवाओं के उस एकताबद्ध संघर्ष का ही परिणाम था की इंदिरा सरकार को विश्वबैंक से कर्ज लेने वाले कदम को तो वापस लेना ही पड़ा, अन्य अनेक ऐसे क़दमों को भी वापस लेना पड़ा, जिनसे सामाजिक कल्याण की योजनाओं के खर्चों में मितव्ययिता के नाम पर कटौती की जाती और आम आदमी के जीवन को दूभर बनाया जाता राष्ट्रीयकृत बैंकों का निजीकरण, जीवन बीमा निगम को पांच टुकड़ों में विभाजित करने वाला प्रस्ताव, ऐसे कदम थे, जो इंदिरा सरकार आईएमएफ और विश्वबैंक के दबाव में नौवें दशक की शुरुवात में ही उठाना चाहती थी

1991 में, जब, नरसिम्हाराव की सरकार में वित्तमंत्री रहते हुए मनमोहनसिंह ने नवउदारवादी नीतियों  को लागू करना शुरू किया तो स्पान्सरिंग कमेटी और जनसंगठनों के राष्ट्रीय मंच के बैनरों के नीचे कामगारों को एकत्रित होने में कोई देर नहीं लगीतब से लेकर अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर न केवल संगठित और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के सवालों पर बल्कि देश के आम आवाम के प्रत्येक तबके के सवालों को लेकर किसानों, बेरोजगार युवाओं और खेतिहर मजदूरों और महिलाओं के बड़े हिस्से के साथ एकता बनाते हुए 14 सफल हड़तालें की जा चुकी हैं

20 एवं 21 फरवरी को होने वाली यह पंद्रहवीं हड़ताल दुनिया के कोने कोने में नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ चल रहे संघर्षों का हिस्सा है इसमें केवल मजदूरों की मांगें नहीं हैं, यह हड़ताल देश के उन करोड़ों लिए है , जो रात दिन खटते हैं लेकिन दो जून की रोटी सम्मान के साथ जुटा पाना जिनके लिए दुश्वार होता है यह नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ कामगारों गुस्सा है| देश का मेहनतकश, देश के 70 करोड़ से अधिक लोगों के लिए एक खुशहाल और सम्मानजनक जिन्दगी की मांग कर रहा है वो यह एलान भी कर रहा है की देशवासियों के लिए उस सम्मानजनक और खुशहाल जिन्दगी को लाने का उसका संघर्ष पुराना कितना भी क्यों न होता जाए, बंद कभी नहीं होगा
अरुण कान्त शुक्ला
19जनवरी,2013