Sunday, October 14, 2012

आओ मलाला के सपनों की दुनिया को बनाने एकजुट हों..





अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता समिति के पुडुचेरी में 5एवं6 अक्टोबर को संपन्न हुए राष्ट्रीय सम्मेलन पर एक दृष्टिपात..


चौदह साल की एक लड़की अफगानी तालिबान की गोलियों का शिकार होकर अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है। उसे अफगानी तालिबान मार देना चाहते है, क्योंकि वो लड़की तालबानी आतंकियों के लिए आतंक बन चुकी है। क्योंकि वो स्वयं तो पढ़ना ही चाहती है, वो चाहती है कि उसकी जैसी अनेक लड़कियां भी पढ़े लिखें और आधुनिक सभ्य समाज का हिस्सा बनें। वो औरतों के ऊपर किये जाने वाले जुल्मों और लगाई जाने वाली अन्यायपूर्ण बंदिशों का विरोध करती है। उसका कुसूर यह भी है कि उसने ये सब उस उम्र में किया है, जब बच्चे समझना भी शुरू नहीं कर पाते हैं। उसका कुसूर यह भी है कि वो डरी नहीं, उसने उनके फरमानों को मानने से इनकार कर दिया। वो बच्ची उस दौर में निडर हो गई, जब व्यस्क भी निडर होने से डरते हैं। वो आतंकियों के आतंकी मंसूबों के लिए आतंक बन चुकी थी। उन्होंने उसे गोली मार दी| उस छोटी लड़की का ज़िंदा रहना उनके ज़िंदा रहने पर खतरा बन चुका था। उन्होंने उसे गोली मार दी।

यह एक संयोग है कि यह सब तब घटा जब मैं अखिल भारतीय शांति और एकजुटता समिति के सम्मलेन से वापस लौटा और 9 अक्टोबर को मैंने नेटीजनों के बीच अपनी उपस्थित डालते हुए लिखा कि पुंडुचेरी में 5एवं6 अक्टोबर को संपन्न हुए सम्मलेन का सार जल्द ही मैं नेट पर डालूँगा। 9अक्टोबर की शाम को जब मैं रिपोर्ट तैयार करने बैठा, मलाला को गोली मार दी गई थी। वह सवाल जो सम्मलेन के दोनों दिन मुझे मथता रहा और जो पूर्व में भी जब मैं ट्रेड युनियन में काम करता था, अनेकों बार मुँह बाए सामने खडा होते रहा, एक बार फिर मुँह बाए सामने खड़ा था कि दुनिया में रहने वाले लोगों में से शतप्रतिशत के लगभग ये चाहते हैं कि सभी ओर शान्ति बनी रहे| युद्ध न हों। कोई भूख से न मरे। समाज में समानता हो और सभी सम्मान के साथ सर उठाकर जी सकें| वे लोग संख्या में कितने कम हैं, दुनिया की आबादी की तुलना में मुठ्ठी भर भी न होंगे, जो युद्ध चाहते हैं। जो ये चाहते हैं कि समाज में असमानता बनी रहे। जो दौलत को अपने कब्जे में करके, धरती, जमीन, हवा और आसमान पर कब्जा करके, धरती की आधी से अधिक आबादी को भूख से मरने के लिए छोड़कर, अपने लिए धरती पर ही स्वर्ग का निर्माण कर लेते हैं। पर, वे आबाद हैं क्योंकि वो दुनिया के आवाम को, देशों को एक दूसरे से लड़ाने में कामयाब हैं। वे आबाद हैं क्योंकि वे लोगों को जाती, धर्म, नस्ल, भाषा, सरहदों, के नाम पर एक दूसरे से लड़ाने में कामयाब हैं। वे कामयाब हैं क्योंकि दुनिया के आवाम के 90% लोगों के ज़िंदा रहने के साधन उनके कब्जे में हैं। वे कारखानों के मालिक हैं। वे खदानों के मालिक हैं।सरकारें उनकी हैं। वे ही आतंकवादी हैं। वे ही आतंकवादियों को पैदा करते हैं और फिर वे ही उनके खिलाफ लड़ने के लिए हमसे कहते हैं।

पुडुचेरी के सम्मलेन का निष्कर्ष मलाला युसुफजई की कहानी कहता है। वो लोग कितने गलत हैं, जो यह कहते और समझते हैं कि केवल युद्ध का न होना ही शांति का स्थापित होना है। सोवियत रूस के पतन के बाद यह कहा गया कि अब दुनिया में शांति होगी, पर, हुई क्या? ईराक पर दो बार युद्ध थोपा गया। अफगानिस्तान में आज भी अमरीकी सेनाएं डटी हुई हैं और मानवता को शर्मसार करने वाले कारनामों को अंजाम दे रही हैं। पुडुचेरी में शांति के लिए एकजुटता के सवाल पर हुए सम्मेलन में, जिसका उद्घाटन पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने किया था, बोलते हुए एप्सो के अध्यक्षों में से एक सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा था कि दुनिया के कुछ देश मसलन अफगानिस्तान, सीरिया, ईराक, लीबिया, अमेरिका की रहनुमाई में पश्चिमी शक्तियों के अवांछित और अवैधानिक घुसपैठ के चलते बेमिसाल अव्यवस्था और समस्याओं को झेल रहे हैं। ये ताकतें भारत सहित अनेक विकासशील देशों पर अपनी शर्तों को थोप रही हैं ताकि विकसित देशों के आर्थिक और जैविक हितों की रक्षा हो सके।उन्होंने कहा कि ये सबसे ज्यादा उपयुक्त समय है, एप्सो को केवल भारत तक सीमित न होकर, अपनी गतिविधियों को सभी दूसरे देशों तक बढ़ाना चाहिये ताकि साम्राज्यवादी देशों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष छेड़ा जा सके।

कोई कह सकता है कि मलाला का पुडुचेरी के सम्मेलन से क्या सरोकार है? मलाला का पुडुचेरी सम्मेलन के साथ गहरा सरोकार है। पुडुचेरी का सम्मेलन अमेरिकन साम्राज्यवाद की युद्धोन्मादी नीतियों के खिलाफ है। पुडुचेरी का सम्मेलन अमरीका की रहनुमाई में जड़ जमाये साम्राज्यवाद और उसके एजेंट विश्व बैंक, आईएमएफ तथा विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के खिलाफ है, जिनकी नीतियों और सलाहों के कारण दुनिया की संपदा का आधा भाग मात्र 2% लोगों के कब्जे में है और दुनिया की आधी से अधिक आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, वस्त्र जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में मनुष्य जैसा जीवन जीने से वंचित है। और सबसे बढ़कर पुडुचेरी का सम्मेलन उस आतंकवाद के खिलाफ है, जिसे साम्राज्यवाद पैदा करता है, जिसे धार्मिक तत्ववादी और अलगाववादी ताकते पैदा करती हैं, जो अल्पसंख्यकों, स्त्रियों को उनके अधिकार से वंचित करता है। मलाला उसी आतंकवाद के खिलाफ लड़ी है, जिसे बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में अमेरिकन साम्राज्यवाद ने सोवियत रूस के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए पाला पोसा था। जिसे अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आठवें और नौवें दशक में न केवल हथियार और पैसा मुहैय्या कराया था बल्कि दुनिया भर से कट्टरवादी मुस्लिम युवकों को इकठ्ठा करने में भी मदद की थी ताकि उनका इस्तेमाल सोवियत रूस के खिलाफ किया जा सके। ओसामा-बिन-लादेन ने अमेरिका और पाकिस्तान की मदद से ही विदेशी मुसलमानों को ट्रेनिंग देने के बड़े बड़े केम्प चलाये| 1987 तक प्रत्येक वर्ष अमेरिका में बने 65000हजार टन हथियार और गोला-बारूद तालिबान के पास पहुंचते थे।


मलाला का संघर्ष केवल तालिबान के खिलाफ नहीं था। वह जाने अनजाने उस साम्राज्यवाद से टकरा रही थी, जो आज भी तालिबान के लिए नरम दिल रखता है। जैसा कि सीबीएस न्यूज और 60 मिनिट्स की रिपोर्टर लारा लोगन ने ओबामा के लिए हाल ही में कहा भी है कि वे तालिबान के लिए नरम रुख रखते हैं। मलाला पाकिस्तान के जिस हिस्से में रहती थी, 2007 में उस पर तालिबान ने कब्जा किया था। 2009 में पाकिस्तान उस कब्जे को हटा पाया। इस बीच तालिबान ने स्कूलों को तोड़ा, महिलाओं के अकेले घर से निकलने पर पाबंदी लगाई गई, उनकी पोशाक और यहाँ तक उनके हंसने पर भी पाबंदी लगाई गई। मलाला, जो उस समय मात्र 11वर्ष की थी उसे ये रास नहीं आया। उसने विरोध किया। उसने इन सब बातों को बीबीसी के उर्दू ब्लॉग पर डाला। वह समझती थी या नहीं! वह जानती थी या नहीं! पर, ये प्रमाण है कि शांति इस दुनिया में जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। जैसा कि विश्व शांति परिषद के प्रथम, संस्थापक अध्यक्ष फ्रेडेरिक जोलिओट क्यूरी ने कहा भी था कि शांति सभी का कर्तव्य है (Peace is everybodys Business) मलाला को उसी कर्तव्य के पालन के लिए गोली मारी गई उसी कर्तव्य के पालन के लिए मलाला को 2011 में अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरूस्कार(International Childrens Peace Prize) के लिए नामांकित किया गया था 2011 में ही मलाला को पाकिस्तान का पहला राष्ट्रीय युवा शांति पुरूस्कार(National Youth Peace Prize) मिला था

पुडुचेरी के  सम्मेलन का केन्द्रीय नारा था आओ एक बेहतर भारत के निर्माण के लिए अपने संघर्षों को और शक्तिशाली बनायें, ताकि भारत का आवाम एक बेहतर दुनिया के निर्माण में अपना योगदान दे सके। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि मलाला के साथ घटित घटना सम्मेलन के समापन के पूर्व हो जाती तो देश के कोने कोने से आये 300 से ज्यादा प्रतिनिधि, वियतनाम, श्रीलंका, साऊथ अफ्रिका, नेपाल सहित, अन्य देशों से एप्सो के 7 अक्टोबर को संपन्न हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत करने आये हुए प्रतिनिधि, एकमत से ये प्रस्तावित करते कि सम्मेलन का केन्द्रीय नारा होना चाहिये आओ मलाला के सपनों की दुनिया को बनाने एकजुट हों

अरुण कान्त शुक्ला                                                       14अक्टोबर’2012   

Monday, October 1, 2012

शास्त्री जी को इस कहानी से छुट्टी दो...

Like · · Promote ·

Thursday, September 27, 2012

रोज सर कटाओ, रोज शहीद कहलाओ..



रोज सर कटाओ, रोज शहीद कहलाओ..

कल भगत सिंह का जन्म दिवस है| बीते हुए कल देश के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का जन्म दिन था यह विडम्बना नहीं चुने हुए रास्ते पर चलने की अवश्यंभावी नियति है कि न तो मीडिया में और न ही इंटरनेट पर मनमोहन सिंह को जन्म दिवस की बधाई देते हुए कोई दिखाई दिया, सिवाय एक अपवाद के, वह भी फेसबुक पर अखबारों में कोई उल्लेख अगर मिला भी तो वह प्रशंसा या बधाई का न होकर, मनमोहन सिंह के पूरे कार्यकाल का आलोचनात्मक विवरण ही था जबकि, पिछले दो दिनों से अखबारों (निश्चित रूप से हिन्दी) के सम्पादकीय पृष्ठ उन लेखों से भरे हुए हैं, जो भगत सिंह की सोच और देश के लोगों के प्रति उनकी चाहत को न केवल प्रदर्शित करने के लिए लिखे गए हैं, बल्कि उनका उद्देश्य आज की परिस्थितियों में लोगों के अंदर उस क्रांतिकारी जागरूकता को पैदा करना है, जो भगत सिंह के अंदर बलवती थी और जिसने उन्हें (भगतसिंह को) देश के लिए उस आयु में बलिदान करने के लिए प्रेरित किया, आज जिस आयु में बच्चे अपना शिक्षण भी पूरा नहीं कर पाते हैं

मैं चंद (पांच) महीनों बाद अपने जीवन के 63 साल पूरे करूँगा लगभग 39 वर्ष की मेरी वेतन गुलामी में, (मार्क्स के शब्दों में, वैसे मैं अभी भी स्वयं को वेतन गुलाम ही समझता हूँ, क्योंकि मुझे अपर्याप्त ही सही, पर पेंशन प्राप्त होती है) मैंने लगभग 34 वर्ष एक ट्रेड युनियन कार्यकर्ता के रूप में बिताये हैंअपने ट्रेड युनियन जीवन में, मैं अक्सर अपने साथियों को मोटिवेट करने के लिए कहा करता था, रोज सर कटाओ, रोज शहीद कहलाओ इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में ट्रेड युनियन में काम करना कोई आसान काम नहीं है, विशेषकर, नवउदारवादी नीतियों के आक्रमण के बाद उन ट्रेड युनियन वर्करों के लिए तो ये एक जटिल और दुरूह कार्य था, जो वाकई सोचते थे कि नवउदारवादी नीतियां देश के किसानों, असंगठित मजदूरों और स्वरोजगारियों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं हैं और ये सब मिलाकर देश के 80% हिस्से से कम नहीं है उसके बावजूद, आज मुझे लगता है कि आजाद देश के ट्रेड युनियन आंदोलन और वह भी विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के ट्रेड युनियन में यह कहना कि रोज सर कटाओ और रोज शहीद कहलाओ, भगत सिंह जैसे शहीदों के साथ किया गया अन्याय है देश के ट्रेड युनियन और विशेषकर वामपंथी ट्रेड यूनियन आंदोलन और वामपंथी राजनीतिक आंदोलन में भगतसिंह सिंह के साथ यह अन्याय रोज किया जाता है

जब में सेवानिवृत हुआ, अपने एम्प्लायर से सेवानिवृति लाभों के रूप में काफी धन भी मुझे मिला त्याग थे, पारिवारिक जीवन में खलल, अपने अनेक शौकों की तिलांजलि, कुछ सस्पेंशन, कुछ लेटर्स, मगर, आजाद देश के ट्रेड युनियन आंदोलन और ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद होना, दोनों में कोई तुलना हो ही नहीं सकती मैं ऐसे ट्रेड युनियन नेताओं के बारे में भी सुना है, जिन्होंने सेवानिवृति के बाद लाखों रुपयों की थैली इसलिए ली है कि उन्होंने ट्रेड युनियन में काम करते हुए अनेक त्याग किये हैं और कुर्बानियां दी हैं

भगत सिंह को शहीद, उनके जोश और देश के लिए मर मिटने वाले जज्बे ने नहीं बनाया भगत सिंह को शहीद बनाया इन्कलाब के साथ खुद को एकाकार करने वाले जज्बे ने प्रसिद्द क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने अपनी किताब भगत सिंह और उनका युगमें फांसी के ठीक पहले लिखे गए भगत सिंह के एक पत्र का उल्लेख किया है, जो उन्होंने अपने साथियों को लिखा था पत्र में भगत सिंह ने मृत्यु के ठीक पहले ज़िंदा रहने की अपनी ख्वाहिश को किस जज्बे के साथ बयां किया था, वह इन्कलाब के बारे में उनकी उत्कृष धारणा को दिखाता है पत्र इस प्रकार हैः

ज़िंदा रहने की ख्वाईश कुदरती तौर पर मुझमें भी होनी चाहिये मैं इसे छिपाना नहीं चाहता, लेकिन मेरा ज़िंदा रहना एक मशरूत (एक शर्त पर) है मैं कैद होकर या पाबन्द होकर ज़िंदा रहना नहीं चाहता

मेरा नाम हिन्दुस्तानी इन्कलाब का निशान बन चुका है और इन्कलाब पसंद पार्टी के आदर्शों और बलिदानों ने मुझे बहुत ऊंचा कर दिया है इतना ऊंचा कि ज़िंदा रहने की सूरत में इससे ऊंचा मैं हरगिज नहीं हो सकता

आज, जब, विश्व पूंजीवाद नवउदारवाद का चोला पहनकर नए सिरे से दुनिया की दबी कुचली आबादी और मेहनतकशों पर आमादा है और ट्रेड युनियन में काम करने वालों और वामपंथ में काम करने वालों से वक्त की गुजारिश है कि वे अपनी सम्प्पूर्ण उत्सर्गता के साथ इस आक्रमण के खिलाफ खड़े हों, हम सुविधाभोगी ट्रेडयूनियन आंदोलन और सुविधाभोगी वामपंथी राजनीति से दो चार हो रहे हैं वे सब, जो पूंजीवाद के फेंके टुकड़ों के अभ्यस्त हो गए हैं, आज, भगत सिंह को याद करेंगे, पर, वो विचार, जो भगत सिंह को शहीद बनाता है.. कहाँ से आएगा?
      

अरुण कान्त शुक्ला,                                                                   27 सितम्बर,2012           

Tuesday, September 18, 2012

20 सितम्बर का आह्वान, बहुत हुआ यूपीए, अब जाओ,



20 सितम्बर का आह्वान, बहुत हुआ यूपीए, अब जाओ,

आज शाम से चैनलों पर अंकगणित चालू है और कल के अखबार भी ममता के यूपीए सरकार से बाहर निकलने वाले समाचारों के साथ साथ उस अंकगणित से भी भरे रहेंगे कि किस तरह मुलायम और माया के बाहर से समर्थन के बल पर यूपीए सरकार 2014 तक टिकी रहेगी इसमें कोई शक नहीं कि ममता के तेवरों से जो निर्ममता यूपीए के लिए टपक रही थी, ढाई घंटे की मेराथन बैठक के बाद उसमें थोड़ी नरमी दिखाई दी और शुक्रवार तक के लिए मंत्रियों के इस्तीफे टालकर ममता ने यूपीए के लिए गुंजाईश छोड़ी है कि वो रिटेल में विदेशी निवेश, डीजल की कीमतों में एक-दो रूपये की कमी करके और सबसीडी से मिलने वाले सिलिंडरों की संख्या को 6 से 10-12 तक बढ़ाकर अपना स्पष्ट बहुमत बनाए रख सकता है

13 तारीख को डीजल की कीमत में पांच रुपये की बढ़ोत्तरी और सबसीडी से मिलने वाले सिलिंडरों की संख्या को छै तक सीमित करने तथा 14 तारीख को रिटेल, एविएशन में विदेशी निवेश की घोषणा तथा सार्वजनिक क्षेत्र के शेयरों को बेचने की घोषणा करने के बाद शनिवार को योजना आयोग की बैठक में मनमोहनसिंह का रुख दबंग के सलमान जैसा था कि जब मैं एक बार कुछ कमिट कर देता हूँ तो उसके बाद मैं अपनी भी नहीं सुनता। मनमोहन सिंह को तब शायद यह लगता होगा कि बार बार कमिट करके हर बार रिट्रीट करने वाली ममता इस बार भी ऐसा ही करेंगी। या, फिर उन्हें अपने जुगाड़ मेनेजमेंट पर पक्का भरोसा है क्योंकि जब वे वित्तमंत्री थे, उन्होंने नरसिम्हाराव को न केवल अल्पमत सरकार चलाते देखा था बल्कि उसे जुगाड़ करके बहुमत में लाते भी देखा था 2007 में वह अनुभव उनके काम आया, जब उन्होंने उसी जुगाड़मेंट के जरिये वामपंथियों को धता बताते हुए अमेरिका के साथ न केवल न्यूक्लियर समझौता किया, अपनी सरकार भी बचा ली

पर, इस बार परिस्थिति में जमीन आसमान का अंतर है 20 सितम्बर के विरोध में, जो सभी प्रायोगिक लिहाज से भारत बंद में ही परिणित होने जा रहा है, न केवल सभी विरोधी राजनैतिक दल, एमएनएस जैसे एक दो दलों को छोड़कर, शामिल हैं बल्कि समाजवादी पार्टी, बीएसपी जैसे बाहर से समर्थन दे रहे दल भी शामिल हैं जो रिटेल में विदेशी निवेश के सवाल पर तीव्र खुला विरोध जता चुके हैं यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार है और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव घोषणा कर चुके हैं कि यूपी में वे विदेशी किराना स्टोरों को नहीं आने देंगे डीएमके जो तृणमूल की तरह ही यूपीए सरकार में शामिल है एफडीआई के सवाल पर 20 तारीख के बंद में शामिल होने जा रहा है एक बार विरोध में शामिल होने के बाद, उसके ऊपर अधिक नैतिक दबाव होगा कि यूपीए के पीछे नहीं हटने पर वो भी ममता के समान सरकार से हटे

रिटेल में एफडीआई का पूरा मामला, अब,  देश के किसानों, उपभोक्ताओं के लिए कितना लाभदायक है या इससे कितने रोजगारों का सृजन होगा, इससे हटकर यूपीए के लिए विश्वास और भरोसे के संकट में बदल चुका है कामनवेल्थ, 2जी, आदर्श सोसाईटी और अब प्रधानमंत्री की नाक के नीचे कोयला आबंटन में घपला और फिर पहले प्रधानमंत्री से लेकर सरकार के सभी जिम्मेदारों का उससे इनकार और फिर कोर्ट से मामलों के खुलने का नतीजा यह है कि यूपीए के पास विश्वासमत जुटाने के लायक आंकड़े आ भी जाएँ तो भी जनता का भरोसा खो चुकी सरकार ही वो रहेगी

यही कारण है कि बीस तारीख के विरोध के बाद यदि समाजवादी पार्टी इस आधार पर यूपीए को समर्थन देती है कि वो यूपी में इसे लागू नहीं होने देगी और साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए यूपीए का समर्थन जरूरी है तो अवसरवाद और अविश्वसनीयता(राजनीतिक धोखा देने) के लिए जाने वाले मुलायम अपनी बची खुची साख भी खो देंगेयही स्थिति माया के लिए भी है वो भी यूपीए को समर्थन देने के पीछे साम्प्रदायिक ताकत को रोकना सबसे बड़ा कारण बताती हैं पर, यदि अब वे ऐसा करती हैं तो उनका रिटेल का विरोध महज दिखावा ही होगा

दरअसल सभी क्षेत्रीय दलों की साख इस आधार पर इस पूरे प्रकरण में दांव पर लगी है कि यदि वे अखिल भारतीय राजनीति में अपनी भूमिका निभाना चाहते है, तो उन्हें, डीजल की कीमतों के  मामले, रसोई गैस का मामले और रिटेल में विदेशी निवेश का मामले में, जो देश और देशवासियों से संबंधित है, अपने राज्यों में लागू होने नहीं देंगे जैसे संकीर्ण सोच वाले निर्णय से बचना होगा ममता ने दो टूक फैसला करके उनके सामने उदाहरण रख दिया हैआखिर, समाजवादी पार्टी और बसपा के भी समर्थन वापस लेने के बाद, देश में होना तो मध्यावधी चुनाव ही हैं और उसमें सत्ता की बागडोर किसके पास जायेगी, ये निर्णय तो देशवासियों को ही करना है यदि आज समर्थन जारी रखा जाता है तो इसका मतलब है कि चुनाव 2014 में तय समय पर ही होंगे, तब भी देश की जनता ही चुनाव में सत्ता, जिसको वो पसंद करेगी, उसे ही सौपेंगी किन्तु रिटेल में एफडीआई आ जायेगी

वह चाहे यूपी हो या भाजपा शासित राज्य, जिन्होंने ये घोषणा करके रखी है कि वे अपने राज्यों में विदेशी रिटेल स्टोर नहीं खुलने देंगे, उन्हें एक बात समझनी होगी कि वे अधिक समय तक अपने उस रुख पर कायम नहीं रह सकते केन्द्र का यह कहना, कि राज्यों को छूट होगी कि वे चाहें तो अपने राज्यों में रिटेल स्टोरों को आने दें या नहीं आने दें, एक बहलावे के अलावा कुछ नहीं है जैसा कि जाने माने कृषि और खाद्य विश्लेषक देवेन्द्र शर्मा का कहना है कि जिन भीमकाय रिटेलर्स को भारत में आना है, वे अच्छी तरह जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के अंतर्गत बाईलेट्रल इन्वेस्टमेंट प्रमोशन एंड प्रोटेक्शन एग्रीमेंट्स (BBIPAs) के सदस्य देशों को विदेशी निवेशकों को राष्ट्रीय पहुँच और व्यवहार देना होगा भारत इसका सदस्य है और भारत को  रिटेल में आने वाली भीमकाय कंपनियों को राष्ट्रीय पहुँच उपलब्ध करानी होगी इस एग्रीमेंट पर सत्तर देश हस्ताक्षर कर चुके हैं यदि राज्य अड़ंगा लगाएंगे, तो आने वाली कंपनियां राज्यों को मजबूर करने के लिए कानूनी दबाव लाएंगी

बड़े शहरों तक ही ये स्टोर सीमित रहेंगे, एक झांसे के अलावा कुछ नहीं है थाईलेंड, मेक्सिको, अमेरिका और यूरोप के देशों का ही अनुभव बताता है कि ये राजनीतिक दलों , नौकरशाही के बीच करोड़ों रुपया लाबिंग पर खर्च करते है ताकि इनके पक्ष में नियम बनें और ये तेजी से विस्तार करें यह पहली बार हो रहा है कि केन्द्र सरकार के नीतिगत निर्णय के विरोध में वो राजनीतिक दल शामिल हो रहे हैं, जिनके संख्या बल पर सरकार टिकी है और जो सरकार की नीति के पूरी तरह खिलाफ हैं देशवासी समाजवादी पार्टी और बसपा की तरफ देख रहे हैं केवल यूपीए की नहीं इन दलों की भी साख दांव पर लगी है यदि, 20 सितम्बर के देश स्तरीय विरोध के बाद भी रिटेल में एफडीआई पर, डीजल की कीमत पर और गेस के सिलिंडरों की संख्या पर सरकार अपने निर्णय नहीं बदलती तो समाजवादी पार्टी और बसपा को कह देना होगा बहुत हुआ यूपीए, अब जाओ यदि, वो ऐसा नहीं कहते तो फिर उन्हें 20 सितम्बर को विरोध आयोजित करने का भी कोई नैतिक अधिकार नहीं है

अरुण कान्त शुक्ला                                                       19सितम्बर,2012