Thursday, April 28, 2011

जरूरी है राजनीतिक लोकतंत्र को बचाए रखना -


जरूरी है राजनीतिक लोकतंत्र को बचाए रखना -

भारत के अंदर लोकतंत्र को लेकर जो एक बहस छिड़ी हुई है , उसमें लोकतंत्र , आंदोलन और अनशन को लेकर तरह तरह के विचार सुधी ज्ञानी जन दे रहे हैं | मेरा पिछले लेख पर एक सुधी पाठक ने दूरभाष पर मुझसे सीधा सवाल किया कि क्या लोकतंत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण करप्शन को रोकना नहीं है | ब्लॉग पर भी एक विचार आया था | उस सुधी पाठक को और ब्लॉग पर दिए गये अपने विचारों को पुनः आप लोगों तक एक लेख के रूप में रखने का प्रयास कर रहा हूँ | स्वतंत्रता के सातवें दशक में पहुंचते पहुंचते शुरू हुआ विचार विमर्श आम और मध्यमवर्ग के अंदर एक अच्छी बहस का रूप ले रहा है | मेरा उद्देश्य किसी को जबाब देना न होकर , अपनी बात को रखना है | सभी को याद होगा कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने अंतरात्मा की आवाज पर राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के बदले व्ही व्ही गिरी के पक्ष में कांग्रेस के बड़े तबके को लामबंद किया था और गिरी को जितवाया था | उस दौरान किसी अखबार या पत्रिका में मैंने एक लेख भारत में डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) के ऊपर पढ़ा था | उस लेख में भारत के प्रथम प्रधान जवाहरलाल नेहरु के व्यक्तिगत इंग्लिश मित्र को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि ब्रिटिश राज के उत्तराधिकारी के रूप में नयी सरकार ( जवाहरलाल नेहरू की सरकार ) की भूमिका शासक और शासित वर्ग के बीच में एक खाड़ी के तरह ही है और नए शासकों की जीवनशैली और व्यवहार से इसी बात का प्रमाण मिलता है कि भारत को मिली राजनीतिक आजादी ने विदेशी शासकों को हटाकर देशी लोगों के समूह को शासन देने से अधिक भारतीयों को और कुछ नहीं दिया है | लेख में विस्तार से बताया गया ताकि भारत में संपन्न वर्ग के लोगों का शासन है जो अपनी विशेष स्थिति को बनाए रखने के लिये उन्हें प्राप्त राजनीतिक ताकत का उपयोग करते हैं | लेख का अंत कुछ इस तरह था कि भारत में लोकतंत्र ने भारत के बहुसंख्यक गरीब लोगों को संगठित होने और राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करने की शक्ति इस तरह नहीं दी है कि वे अपने हितों को आगे बढाने में उसका इस्तेमाल कर सकें |

यह  कमेन्ट नेहरू के दौरान के लोकतंत्र के ऊपर था | क्या परिस्थतियां आज कुछ भिन्न हैं ? मुझे नहीं लगता | उस लेख को पढ़ने के लगभग चालीस वर्षों के बाद आज भी जहां तक गरीब और वंचित तबकों का सवाल है संसदीय लोकतंत्र उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है | यह अब कोई छिपी हुई बात नहीं है कि यह लोकतंत्र जिसमें हम रह रहे हैं , लोगों को वे शक्तिशाली हैं , का आभास दिलाने का बहत अच्छा तरीका है , जबकि वास्तविकता में उन्हें उस लोकतंत्र की ताकत का बहुत थोड़ा अंश ही प्राप्त होता है और शासक वर्ग का प्रभुत्व समाज पर बनाए रखने में इस लोकतंत्र का भारी उपयोग होता है | उपरोक्त तमाम तथ्यों के बावजूद लोगों ने इस लोकतंत्र के लिये संघर्ष किया है और संघर्ष के बाद उसे प्राप्त किया है | इतना ही नहीं लोगों ने इस लोकतंत्र के ऊपर हुए हमलों के खिलाफ भी संघर्ष किया है और उसे बचाया है | इसलिए , उनके लिये यह महत्वपूर्ण है |          

 द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान बुरी तरह तबाह हुआ था | बीसवीं सदी के आठवें दशक के अंत तक उसका पुनर्निर्माण चलता रहा | उस दौरान , जैसा की बाह्य संकट के समय सभी देशों के आम लोगों और श्रमिक , किसान तबके के साथ होता है , जापान में भी आम जनता ने देश प्रेम से ओतप्रोत होकर अपने रोष को जाहिर करने काली पट्टी बांधकर कार्य करने का तरीका आंदोलन के विकल्प के रूप में अपनाया था और वहाँ सरकार हस्तक्षेप कर विवादों का निपटारा भी कराती थी | दुनिया के लगभग सभी पूंजीवादी देशों के मालिकान और सरकारें अपने मजदूरों को उसका उदाहरण देकर आंदोलन करने से रोकती थीं | इसी आधार पर सारे विश्व में यह मशहूर है कि जापान के लोग अत्यंत देशभक्त होते है और देश के लिये कितने भी घंटे और अत्यंत कम वेतन पर भी काम करने को तैयार रहते हैं | बीसवीं सदी के नौवें दशक के बाद से परिस्थिति में बहुत फर्क आ गया है और अब वहाँ भी आंदोलन के उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल होता है , जो शेष दुनिया में अपनाए जाते हैं | लेकिन , द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पैदा हुई उस भावना का अभी पूरी तरह अंत नहीं हुआ है | उस दौर की एक रोचक बात यह भी है कि एक तरफ जब जापान के आम लोग , मजदूर ,किसान इतने त्याग कर रहे थे , जापान के पूंजीपतियों , राजनीतिज्ञों , वहाँ काम कर रही ब्रिटेन और अमेरिका बेस मल्टीनेशनल कंपनियों ने इस तरह के किसी त्याग को नहीं दिखाया | उनका मुनाफ़ा वैसा ही बरकरार रहा , पूंजी का एकत्रीकरण तेज रफ़्तार से होता रहा और वहाँ के राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार करने से नहीं चूके | यहाँ तक कि वहाँ के प्रधानमंत्री तक इसमें शामिल रहे |

 दरअसल एक ऐसी व्यवस्था में , जैसी में हम रह रहे हैं , आंदोलन का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता | पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपती वर्ग सरकार के दुधमुंहे बच्चे के समान होता है |सरकारें उसे स्पून फीडिंग कराती हैं और मजदूरों , किसानों तथा कम्मैय्या वर्ग को वे उस कुत्ते , बिल्ली के समान देखती हैं , जो उस बच्चे का दूध या निवाला झपटना चाहता है | इसीलिये सरकार का व्यवहार इस वर्ग के लिये प्रताड़ना से भरा होता है | एक उदाहरण काफी होगा , केन्द्र सरकार ने पिछले छै वर्षों में कारपोरेट सेक्टर को 21 लाख करोड़ से ज्यादा की राहतें आयकर , एक्साईज और कस्टम में छूट के मार्फ़त दी हैं और उसी सरकार ने इस बजट में यह कहते हुए वेट को पांच प्रतिशत कर दिया कि कुछ राज्यों में यह पांच है और कुछ राज्यों में चार , इसलिए एक समान करने इसे पांच किया जाता है |जबकि यह तय है कि बाकी वस्तुओं के छोड़ भी दिया जाए तो इससे खाने पीने की वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि तय है , जिसका सबसे ज्यादा असर आम आदमी पर ही पड़ना है | क्या समानता लाने इसे चार नहीं कर सकते थे ?  सोचिये , केन्द्र सरकार के द्वारा छटा वेतनमान दिए जाने के बाद केन्द्र के कर्मचारियों को , पीएसयू  के अधिकारियों को शायद 2006 या 2007 से दस लाख तक की ग्रेच्युटी का भुगतान हो रहा है , लेकिन यही क़ानून अन्य क्षेत्र के लोगों के लिये पिछले साल मई से लागू किया गया है | कारपोरेट के मामले में एलर्ट ओर आम जनता के मामले में आपराधिक लापरवाही इसका चारित्रिक गुण है |

आज तक जनता ने जो भी पाया है आंदोलन के माध्यम से पाया है | तानाशाही में आंदोलन कितना कठिन होता है , इसे उस देश  के लोग ही जानते हैं जो तानाशाही में रहते हैं | हमारे देश के लोग लोकतंत्र के चलते ही आंदोलन कर पाते हैं | इसलिए लोकतंत्र उनके लिये महत्वपूर्ण है | मिश्र में लोकतंत्र के लिये हुए आंदोलन में प्राप्त शीघ्र सफलता के पीछे वहाँ के मजदूरों और कर्मचारियों के आंदोलन का बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि वे हड़ताल पर गये , लेकिन उनकी मांगे आज तक नहीं मानी गईं हैं | अन्ना के अनशन का अपना बहुत  महत्त्व है , उसे किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता | पर , ज़रा सोचिये , यदि अन्ना ने इस मांग पर आमरण अनशन किया होता कि शिक्षा के निजीकरण को सरकार के द्वारा दिए गये प्रोत्साहन और सहूलियतों के चलते झुण्ड के झुण्ड ढेरों हिंदी ,  अंग्रेजी स्कूल खुले है , जहां शिक्षकों को 500 , 700 , रुपयों से लेकर 1500 . 2000 या अधिकतम 3000 रुपयों में शिक्षा देने कहा जाता है और सामाजिक और आर्थिक स्थितियों के मारे हमारे युवा उसे स्वीकार करने बाध्य हैं , इन शिक्षकों को वही वेतनमान दिया जाए , जो राज्य सरकारें अपने शिक्षा कर्मियों को दे रही हैं , तो क्या सरकार अन्ना के सामने झुकती और इससे भी अहं कि क्या अन्ना ऐसी किसी मांग को लेकर अनशन के लिये तैयार होते ?  भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई बहुत महत्त्व पूर्ण है , अन्ना का अनशन भी सफल रहा और बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु श्रंगारिक है | मैं नहीं मानता , जैसा कि कुछ लोगों ने ( बड़े बड़े लोगों ने ) कहा कि 2जी का 176000 करोड़ रुपये से नरेगा या राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की किसी योजना का कोई भला सरकार ने किया होता | आखिर इस घपले में , राजा को रिश्वत मिली होगी , पर , फ़ायदा तो कारपोरेटस  को ही हुआ | यदि वे ज्यादा बोली देकर 2 जी खरीदते तो जनता से वसूल कर लेते और नहीं तो सरकार अन्य किसी छूट के माध्यम से उन्हें कम्पनसेट कर देती लेकिन उस पैसे को आम आदमी पर तो खर्च करने का कोई सवाल ही नहीं है | जो ऐसा सोचते हैं , वे मुगालते में हैं और हमारे देश में जो ,यह नया, भ्रष्ट अफसरों , भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और उनकी बिगड़ैल औलादों का नया वर्ग तैयार हुआ है , उस मुगालते को बढाने में बहुत बड़ा योगदान दे रहा है | लोकतंत्र हमारे लिये बहुत जरूरी है | इसका , जो विकल्प , सोवियत संघ के रूप में हमारे सामने था , उसके टूटने के बाद मजदूर आंदोलन वैसे भी कमजोर हुआ है | खुद हमारे देश में विकल्प पेश करने वाली राजनीतिक ताकतों की स्थिति कमजोर है | भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई महत्वपूर्ण और जरूरी है , पर , उससे ज्यादा जरूरी है राजनीतिक लोकतंत्र को बचाये रखना , जिसने अन्ना को अनशन पर बैठने का अधिकार दिया |

अरुण कान्त शुक्ला

Wednesday, April 27, 2011

क्या लोकतंत्र को बचाने के लिये अनशन का तरीका ब्लेकमेलिंग है ?


क्या लोकतंत्र बचाने के लिये अनशन का तरीका ब्लेकमेलिंग है ?

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त लोकपाल बिल लाने की मांग करते हुए आमरण अनशन पर बैठने और उसके बाद हुए घटना विकास ने देश के समाज और भारतीय राजनीति में न केवल उपरोक्त सवाल को केंद्रबिंदु में ला दिया है , बल्कि देश के लोकतंत्र और उसकी कार्यप्रणाली को भी खासी भ्रमपूर्ण स्थिति में डाल दिया है | भारत सरकार ने अन्ना के अनशन शुरू करने पर सबसे पहले उसे नैतिक ब्लेकमेल कहा था | पर , यह देखने के बाद कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में अन्ना को जबरदस्त समर्थन मिला है , सरकार ने करीब करीब सभी मांगे केवल मान ही नहीं लीं , तुरंत ही प्रधानमंत्री और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से लेकर विपक्ष के प्रायः सभी नेताओं ने इसे लोकतंत्र की भारी जीत बताया | सिविल सोसाईटी के लोगों ने भी इसे लोकतंत्र की जीत बताया | इतना ही नहीं , जितने लोग अन्ना के समर्थन में खड़े हुए थे , चाहे वे देश के कोने कोने में रेलियां निकालने और धरना देने वाले हों या फिर ब्लॉग , फेसबुक , ट्वीटर के माध्यम से समर्थन देने वाले , सभी को उस समय ऐसा लगा कि सही मायनों में लोकतंत्र की जीत हुई है | कोई माने या न माने , किन्तु आम लोगों के मध्य इस भावना को बलवती बनाने में कुछ समय पहले मध्यपूर्व और विशेषकर मिश्र में हुए आंदोलन को मिली सफलता ने बेशुमार असर डाला और लगभग उसी तरह के आंदोलन में शामिल होकर सफलता हासिल करने से उनका विश्वास कि लोकतंत्र की जीत हुई है , पुख्ता हुआ |

इसमें कोई शक नहीं कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी और भ्रष्टाचारियों और आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने और मामलों को रफा दफा करने में सहयोग करने की दोषी यूपीए-2 सरकार स्वयं में   बहुत बड़े नैतिक दबाव में थी | किन्तु , लोग , अन्ना के पीछे इस कारण से एकत्रित नहीं हुए थे कि अन्ना के आमरण अनशन में सरकार के ऊपर दबाव डालने की ताकत थी , बल्कि , लोग इसलिये इकठ्ठा हुए कि जिस कारण , और , सरकार तथा राजनीतिज्ञों की जिस नाकामी के खिलाफ अन्ना ने अनशन किया , वह कारण और परिस्थिति लोगों की भावनाओं के  साथ गहराई से जुड़ी थी | अन्ना के अनशन में सरकार को मजबूर करने का नैतिक दबाव , अनशन के उद्देश्य और कारण से आया | कुछ लोग अन्ना के अनशन को लोकतंत्र के लिये ब्लेकमेलिंग बताने , संविधान सभा में 25’नवंबर 1949 को दिए आम्बेडकर के भाषण का हवाला देते हैं , जिसमें आम्बेडकर ने आन्दोलन के क्रांतिकारी तरीकों , अवज्ञा और असहयोग आन्दोलनों तथा सत्याग्रह को गैरसंवैधानिक करार देते हुए न्यायायोचित नहीं माना था और उन्हें त्याग देने की सलाह दी थी |  अतिउत्साह या अतिविश्वास में दिए गये उस भाषण का केवल एक ही अर्थ निकलता था कि संविधान के तहत देश में लोकतंत्र के नाम पर एक चुनी गयी सरकार की तानाशाही कायम की जा रही है | आम्बेडकर के बताए हुए संवैधानिक उपायों का केन्द्र और राज्यों में की सत्ता में बैठे राजनीतिक दल कितना आदर करते हैं , यह हम समय समय पर देख चुके हैं , जब बोफोर्स के सवाल पर विपक्ष विहीन संसद चलती रही और हाल ही में पूरा शीतसत्र जेपीसी की मांग की भेंट चढ़ गया किन्तु सरकार ने उसे नहीं माना | इसलिए आम्बेडकर की प्रयोजन खो चुकी व्याख्या के आधार पर अन्ना हजारे के अनशन को लोकतंत्र को ब्लेकमेल करना नहीं कहा जा सकता | पर , यह लोकतंत्र की जीत भी नहीं है | यह कुछ लोगों की जीत है जिनकी कहीं भी कोई जबाबदेही और जिम्मेदारी नहीं है | यदि अन्ना संवैधानिक ढाँचे के तहत ड्राफ्ट कमेटी बनाने की मांग रखते और सरकार उसे स्वीकार करती तो इसे लोकतंत्र की जीत कहा जा सकता था |

पर ऐसा हुआ नहीं , सरकार स्पष्ट रूप से फिलहाल इस मुसीबत को टालो की मुद्रा में थी | लोगों को ऐसा लग सकता है कि सरकार ने अन्ना की मांगों के सामने समर्पण कर दिया है और उन्हें इससे खुशी मिली है , क्योंकि वे सार्वजनिक संस्थाओं , सरकारी उपक्रमों , मंत्रियों , नौकरशाहों और इन जनरल राजनीतिज्ञों के चरित्र में आयी गिरावट और उनके भ्रष्ट कारनामों से व्यथित थे और शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे | पर, एक महत्वपूर्ण तथ्य इस पूरे एपीसोड में भुला दिया गया कि जिन संस्थाओं के अंदर गिरावट आई है , वे सभी देश के चुनावी लोकतंत्र की महत्वपूर्ण स्तंभ हैं और जरुरत उन्हें नवीनीकृत करने और उनमें सुधार लाने की है , न कि उनको बरकाकर गैरलोकतांत्रिक तंत्र खड़ा करने की | भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं , दुनिया के अलग अलग देशों के लोकतंत्र में हुए प्रयोगों के अनुभव समेटे हुए हैं | विश्व की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक भी ऐसी नहीं है , जिसमें प्रशासक शक्तियां किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह में निहित हों , जिसकी जबाबदेही चुनावी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति न हो तथा जो चुनावी लोकतंत्र से न गुजरे हों , फिर चाहे उसका स्वरूप कोई भी क्यों न हो | हम एक ऐसे लोकतंत्र में रहते हैं , जहां हम हमारे ही द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों के द्वारा शासित होते हैं | देश का यह पूरा राजनीतिक संस्थान हमसे अलग नहीं है , हमारा हिस्सा है | पर , जैसे ही हम यह मान लेते हैं कि इनमें से अब कोई भी विश्वसनीय नहीं है और वे हमारा प्रतिनिधित्व नहीं करते , वैसे ही हम पूरे राजनीतिक लोकतंत्र को खोने की कगार पर चले जाते हैं |  इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि हम हमारे द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को हर करप्ट प्रेक्टिस करने की छूट दें या फिर उनका अंधानुसरण करें | नहीं उन्हें ठीक रास्ते पर लाने के लिये हमें ज्यादा से ज्यादा आंदोलन करने होंगे , सत्याग्रह करने होंगे | उनमें से जो भी भ्रष्ट हैं , उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने के लिये और भ्रष्टाचार के रास्तों को बंद करने के लिये नए क़ानून भी बनाने होंगे और ऐसे क़ानून बनाने के लिये सरकारों को मजबूर करने आंदोलन भी करने होंगे | लेकिन ऐसे कानूनों का स्वरूप देश के लोकतांत्रिक ढाँचे के साथ मेल बिठाता हुआ होना चाहिए | एक ऐसी व्यवस्था में , जिसमें हम रह रहे हैं , तानाशाही और फासिज्म के बीज हमेशा मौजूद रहते हैं , लोकतंत्र से ज़रा सा भी भटकाव उनके लिये खाद और पानी का काम करेगा | इसका हमेशा ख्याल रखना होगा |            

अरुण कान्त शुक्ला

Thursday, April 21, 2011

माओवाद : फोकस बदलने की आवश्यकता -


माओवाद : फोकस बदलने की आवश्यकता

अनेक बार देश के अंदर ऐसी घटनाएं घटती हैं , जो , देश की राजनीतिक , सामाजिक और आर्थिक स्थिति से सरोकार रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को , उस घटना के सम्बन्ध में , सोचने के लिये विवश कर देती हैं | डा.विनायक सेन को राष्ट्र द्रोह के आरोप में दी गयी आजीवन कारावास की सजा भी एक ऐसी ही घटना थी , जिसने न केवल अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान भारत की न्यायायिक व्यवस्था की और खींचा बल्कि सोचने के लिये मजबूर किया था कि क्या भारतीय लोकतंत्र में धीरे धीरे अपक्षय और विघटन घर कर रहा है | इसके बावजूद कि अभी उनकी अपील पर उच्च न्यायालय में सुनवाई होकर फैसला आना बाकी है , उन्हें सर्वोच्च न्यायालय से मिली जमानत लोगों को आश्वस्त करती है कि सर्वोच्च स्तर पर न्याय और लोकतंत्र सुरक्षित है |

प्रदेश में माओवादी गतिविधियों का इतिहास लगभग चार दशक पुराना है , किन्तु पिछले दो वर्षों में और विशेषकर राजनांदगांव जिले के मानपुर में एक एस.पी और 36 पोलिस जवानों के तथा अप्रैल’2010 में दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों के माओवादी हमलों में मारे जाने के बाद हालात ऐसे बन गये हैं कि माओवादियों के साथ सुहानभूति की बात तो दूर , आदिवासी क्षेत्र में सुरक्षा बलों , पोलिस , तथाकथित एसपीओ या सरकार (राज्य) के द्वारा की गयी किसी ज्यादती के बारे में बोलने मात्र से , बोलने वाले के प्रति शासन और पोलिस की भौंहें तन जाती हैं | मई’2010 में बस्तर इलाके में एक बस के ऊपर किये गये हमले में एसपीओ के साथ साथ नागरिकों के मारे जाने की घटना के बाद आम नागरिकों में भी इस हिंसा के प्रति रोष उत्पन्न हुआ है | बीबीसी के अनुसार वर्ष 2010 में शासन-माओवादी मुठभेड़ों में 372 लोग मारे गये , जिसमें सबसे ज्यादा खामियाजा सुरक्षा बलों को उठाना पड़ा | 129 नागरिकों और 70 गुरिल्लों को भी अपनी जान गवानी पड़ी | आज, वे ही अग्निवेश , प्रदेश की सरकार और पोलिस के कोपभाजन बने हुए हैं , जिन्होंने कुछ समय पहले ही पोलिस के अगुवा किये गये जवानों को माओवादियों से छुड़वाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी | उनका कुसूर है कि वो ताड़मेटला में उन लोगों से मिलने जा रहे थे , जिनके घर सुरक्षा बलों द्वारा जला दिये  गये | प्रदेश के गृहमंत्री ने तो यहाँ तक कहा है कि यदि अग्निवेश छत्तीसगढ़ आये तो उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्यावाही की जायेगी | परिस्थिति की सचाई यही है कि माओवादियों के खिलाफ आज जिस अभियान को चलाया जा रहा है , उसे कांग्रेस-भाजपा से लेकर सीपीएम (मार्क्सवादी) तक , सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त है और प्रदेश के 10 लाख से ज्यादा आदिवासी माओवादी और सुरक्षाबलों के बीच बुरी तरह फंसे हुए हैं | उन्हें , उनके दुखों और परेशानियों से निजात दिलाने वाला कोई नहीं है |

बहरहाल , जो कुछ हो रहा है , वह उस लंबी कहानी का हिस्सा है , जिसमें भारत के शासक वर्ग ने देश के विकास के लिये नवउदारवाद के रास्ते पर चलने का निर्णय विश्व बैंक , आईएमएफ तथा अमेरिका की अगुवाई में विकसित राष्ट्रों के दबाव में लिया | इस निर्णय ने जहां एक और देश के गरीब तबकों के जीवन को  बदहाल बनाया तो वहीं देश के अनेक राज्यों और क्षेत्रों में रह रहे आदिवासियों के जीवन और जीवनयापन के ऊपर गंभीर खतरे खड़े कर दिए | इसके अतिरिक्त , परिस्थिति की विशेषता है कि नवउदारवादी विकास के रास्ते पर तेजी से चलने की उतावली में आदिवासियों के मध्य शिक्षा , स्वास्थ्य , क्रय शक्ति , नए रोजगारों में खप सकने वाली योग्यता का निर्माण किये बिना , सरकार जंगलों को देशी और विदेशी कंपनियों को औने पौने दामों पर बेचने पर तुली है और अपने इस प्रयास को वह सुरक्षाबलों और पोलिस की मदद से अंजाम देने की कोशिश में है | इसी का नतीजा है कि माओवादियों को आदिवासियों का समर्थन भी हासिल हो रहा है और माओवाद के बस्तर के आदिवासी अंचल से निकलकर  रायपुर , धमतरी , राजनांदगांव दुर्ग और महासमुंद के सेमी-अरबन इलाके तक फ़ैलने की रिपोर्ट आ रही हैं | इन परिस्थितियों में माओवादियों से जब हिंसा का रास्ता छोड़ने कहा जाता है तो उनका उलट प्रश्न यही होता है कि तब फिर सरकार भी भारतीय समाज के सबसे अधिक दबे-कुचले , आजादी के बाद भी अवेहलना के शिकार और हाशिए पर पड़े आदिवासियों के ऊपर नवउदारवादी हिंसा को छोड़े | 

पर , इस जद्दोजहद में माओवादी जिस एक बात को भूल रहे हैं  वह यह है कि सरकारें और शासक वर्ग  जनसाधारण के मध्य माओवादी हिंसा को फोकस करने में और उसके खिलाफ एक आम वातावरण आदिवासी और शहरी क्षेत्रों में बनाने में सफल हुईं हैं , जो न केवल माओवादी राजनीति की साख को खत्म कर रहा है बल्कि सामान्य रूप से सभी तरह की क्रांतिकारी राजनीति की साख पर से लोगों का विश्वास हटा रहा है | माओवादी हिंसा का यह रास्ता राष्ट्रीयता , लोकतंत्र जैसे नारों की आड़ में सरकार और शासक वर्ग की नीतियों और विकास के उनके विनाशक नवउदारवादी रास्ते को भी पुख्ता कर रहा है | माओवादी हिंसा के प्रति आम लोगों के मन में पैदा हो रही इस घृणा की सरकार को बहुत जरुरत है और विकास की विनाशक नीतियों को भविष्य में और तेजी से लागू करने के लिये और भी जरुरत होगी | माओवादी जाने अनजाने इसमें मददगार हो रहे हैं | इसलिए , आज की आवश्यकता है कि माओवादी सहित सम्पूर्ण क्रांतिकारी वामपंथ अपनी विचारधारा और कार्रवाईयों पर बहस और संघर्ष का फोकस हिंसा से हटाकर उनकी नीतियों , कार्यक्रमों , देश के विकास के मुद्दों तथा जनमुखी नीतियों की तरफ करे ताकि विकास के इस पूंजीवादी रास्ते के खिलाफ संघर्षों को अंजाम तक पहुंचाया जा सके | हमें याद रखना होगा कि क्रांती केवल हथियारबंद संघर्ष या राजद्रोह ही नहीं है , हालाकि इसकी सम्भावनाओं को एकदम नकारा नहीं जा सकता | क्रान्ति को ज्यादा बेहतर तरीके से इस तरह समझा जा सकता है कि यह समाज में ढांचागत कायाकल्प करने की ऐसी प्रक्रिया है – बुर्जुआ लोकतंत्र में जिसे पूरा करने की अपनी विशेष जटिलताएं हैं |  मैं जानता हूँ , मेरे विचार से खांटी क्रांतिकारी , बुद्धिजीवी , मानवाधिकार के समर्थक नाराज हो सकते हैं लेकिन उनको भी आज नहीं तो कल इस लिहाज से सोचना पड़ेगा |

अरुण कान्त शुक्ला -                      

Monday, April 18, 2011

कहाँ खो गये सारे सपने -


कहाँ खो गये सारे सपने

तेरे सपने मेरे सपने
कहाँ खो गये सारे सपने
गगन से बरसती है काली राख
तारे मुँह चिढ़ाते हैं
फूल खिले हैं बँगलों की बगियों में
हमें कूड़े की बदबू सताती है
नदियाँ सूखी पड़ी हैं
कैद आँखों में है पानी
पवन में घुला है जहर
चिडियाँ अब कम नजर आती हैं
तेरे सपने मेरे सपने
कहाँ खो गये सारे सपने 

अरुण कान्त शुक्ला -