Friday, December 10, 2010

आज का ग्रेकस –


 

"घर और परिवार और इज्जत और शराफत और नेकी और जो कुछ भी अच्छा था और पवित्र था उसके मालिक गुलाम थे और वही उसकी रक्षा कर रहे थे – इसलिए नहीं कि वे अच्छे और पवित्र थे बल्कि इसलिए कि जो कुछ भी पवित्र था सब उसके मालिकों ने उन्ही गुलामों के हवाले कर दिया था |"

हावर्ड फ़ास्ट की महाकथा स्पार्टकस में उपरोक्त विश्लेषण रोम की सीनेट का एक सदस्य ग्रेकस करता है | "स्पार्टकस" में ईसा से 73 वर्ष पूर्व के रोम की कथा है जब गुलामी की प्रथा अपने चरम पर थी और उन्ही गुलामों में से एक "स्पार्टकस" ने उस पाशविक प्रथा को चुनौती देने का विवेक और साहस अपने आप में पाया था | ग्रेकस के उपरोक्त विश्लेषण का अर्थ कदापि यह नहीं लगाया जा सकता कि कि उसे विद्रोही गुलामों से कोई सुहानाभूति थी या फिर वह उस व्यवस्था को बदलना चाहता था | स्वयं ग्रेकस के अनुसार राजनीतिज्ञ चालबाज होता है और राजनीतिज्ञ के अंदर इस चीज (चालबाजी) को देखकर लोग अकसर इसको ईमानदारी समझने की भूल किया करते हैं | ग्रेकस की गणतंत्र के बारे में राय देखिये ;

"देखो हम लोग एक गणतंत्र में रहते हैं | इसका मतलब है कि बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है और मुठ्ठी भर लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत कुछ है | और जिनके पास बहुत कुछ है उनकी रक्षा , उनका बचाव उन्हीं को करना है जिनके पास कुछ भी नहीं |"

ग्रेकस के अनुसार इस तरह के गणतंत्र को बनाए रखने के लिये सीमेंट का काम राजनीतिज्ञ ही करते हैं | उच्चवंश (सम्पतिवान) इस काम को नहीं कर सकते क्योंकि उनकी निगाह में जनता भेड़ बकरी के सामान होती है | उच्चवंशीय को साधारण नागरिक के बारे में कुछ नहीं मालूम | अगर यह सब उसके भरोसे छोड़ दिया जाए तो समूचा ढांचा एक दिन में भहरा पड़े | इसे बचाने का काम राजनीतिज्ञ करते हैं | कैसे करते हैं , ग्रेकस से सुनिए ;

" ............ जो चीज नितांत असंगत है हम उसके अंदर संगती पैदा करते हैं | हम लोगों को यह समझा देते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता अमीरों के लिये मरने में है | हम अमीरों को यह समझा देते हैं कि उन्हें अपनी दौलत का कुछ हिस्सा छोड़ देना चाहिए ताकि बाकी को वे अपने पास रख सकें | हम जादूगर हैं | हम भ्रम की चादर फैला देते हैं और वह ऐसा भ्रम होता है जिससे कोई बच नहीं सकता | हम लोगों से कहते हैं – तुम्हीं शक्ति हो | तुम्हारा वोट ही रोम की शक्ति और कीर्ति का स्त्रोत है | सारे संसार में केवल तुम्हीं स्वतन्त्र हो | तुम्हारी स्वतंत्रता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज नहीं है , तुम्हारी सभ्यता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज नहीं है , तुम्हारी सभ्यता से अधिक प्रशंसनीय कुछ भी नहीं है | और तुम्ही उसको नियंत्रित करते हो ; तुम्हीं शक्ति हो , तुम्ही सत्ता हो | और तब वे हमारे उम्मीदवार के लिये वोट दे देते हैं | वे हमारी हार पर आँसू बहाते हैं , हमारी जीत पर खुशी से हँसते हैं | ................चाहे उनकी हालत कितनी भी गिरी क्यों न हो , चाहे वे नालियों में ही क्यों न सोते हों , .............. चाहे वे अपने बच्चों के पैदा होते ही उनका गला क्यों न घोंट देते हों , चाहे उनकी बसर खैरात पर ही क्यों न होती हो और चाहे पैदाईश से लेकर मरने तक उन्होंने एक रोज काम करने के लिये हाथ न उठाया हो , .......... यह मेरी कला है | राजनीति को कभी तुच्छ नहीं समझना |"

उपरोक्त भूमिका लंबी होने के बावजूद भारत की आज की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर एकदम सटीक बैठती है | एक तरफ , बड़े कारोबारियों , राजनीतिज्ञों , अधिकारियों , लाबिस्टों के अपवित्र गठबंधन हैं , जो देश की संपदा और आय (जोकि वस्तुत:देश के मेहनतकशों की खून पसीने की गाढ़ी कमाई है ) को लूटने में लगे हैं | जिनके सामने इज्जत और शराफत की कीमत दो कौड़ी भी नहीं है , जो नेकी और पवित्रता को त्याग चुके हैं क्योंकि नेकी और पवित्रता उनकी लालच , उनकी विलासिता , उनके ऐश-आराम के रास्ते में रुकावट पैदा करती हैं , क्योंकि देश की अस्मिता से लगाव , देशप्रेम उनके राह में बाधक है , इसलिए वे उसे त्यागकर , उनकी सत्ता में देश का जितना भी हिस्सा आया है , उसे बेचकर अपने घर को भरने में लगे हैं ताकि उनके बाद भी उनकी आने वाली बीसीयों पीढ़ी विलासिता और ऐश की जिंदगी गुजार सकें | इन्होने गणतंत्र के तीनों खम्भों को अपने अपवित्र घेरे में ले रखा है | इन्होने गणतंत्र के चौथे खम्भे पत्रकारिता को भी अपने अपवित्र घेरे में लेकर दलाली में लगा दिया है | दूसरी तरफ , देश की आबादी के लगभग पचास प्रतिशत याने पचास करोड़ लोग हैं जो भीषण गरीबी का शिकार हैं | सत्तर प्रतिशत परिवार बीस रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजारा कर रहे हैं | दुनिया के कुपोषित बच्चों में से आधे भारत में हैं | देश की आबादी का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा झुग्गी झोपडियों में अमानवीय जीवन जीने को अभिशप्त है और इनका बड़ा हिस्सा फुटपाथों , रेलवे स्टेशनों , बस स्टेंडों , दुकानों के सामने के पटियों , मंदिरों , घाटों पर रातें गुजारता है | लोगों को रोजगार देने के बजाय खैरात पर रहने की आदत डाली जा रही है | इस अपवित्र गठजोड़ के कारनामों की वजह से भारत को सर्वाधिक भ्रस्ट देशों में से एक माना जाता है | भारत में भी एक ग्रेकस है जो स्थिति की भयानकता के लिये जिम्मेदार भी है और इन विसंगतियों को संगत बनाने की पूरी कोशिश में लगा है | आईये , यह पता लगाने के लिये कि वह ग्रेकस कौन है , कुछ उद्धरणों पर ध्यान दें ;

"आगामी दशक , व्यैक्तिक वाणिज्य संस्थानों और सामूहिक प्रयासों के सृजन का दशक होना चाहिये | दरबारी पूंजीवाद (Crony Capitalism) और लोकप्रियता की राजनीति हमें अधिक दूर नहीं ले जायेगी |" (19.11.2004)

"क्या हम दरबारी पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं ? क्या यह आवश्यक है या फिर आधुनिक पूंजीवाद को भारत में विकसित करने के दौरान की यह एक संक्रमण अवस्था है ? क्या हम उपभोक्ता और छोटे व्यवसायियों को दरबारी पूंजीवाद से सुरक्षित रखने के लिये पर्याप्त कर रहे हैं ?...... ऐसा तो नहीं कि उनको ( घरेलु व्यापारिक संस्थानों ) सुरक्षा देने के नाम पर दरबारी पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं ?" (1.5.2007

"मैं मानता हूँ कि जब भी हमें नियमों की आवश्यकता होती है , मैं समझता हूँ कि वो नियंत्रक प्रभावी होने चाहिये , और , किन्तु , दरबारी पूंजीवाद वह खतरा है जिसे चाहने से दूर नहीं किया जा सकता | वह एक खतरा है , जिसके खिलाफ हमें सुरक्षा करनी होगी |" (6.11.2010)

दरबारी पूंजीवाद याने पूंजीवाद की वह अवस्था जिसमें कारोबार में सफलता कारोबारियों , राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों के घनिष्ठ (मित्र) संबंधों पर निर्भर होती है | यह सरकारी ग्रांट , सरकारी परमिटों के वितरण में पक्षपात , टेक्सों में विशेष छूट के रूप में होती है | अपने बदतरीन रूप में दरबारी पूंजीवाद भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में विकसित कर लेता है , जहाँ राजनीतिज्ञ और सरकारी अधिकारी घूस लेना सम्मान समझते हैं तो कारोबारी टेक्स में चोरी अपना अधिकार | इस अवस्था को अर्थशास्त्र में कई बार प्लूटोक्रेसी (धनिकों का राज) या क्लेप्तोक्रेसी ( Kleptocracy - चोरों का राज) कहा जाता है | उपरोक्त उद्धरणों में कोई इसी दरबारी पूंजीवाद के खिलाफ बार बार सावधान कर रहा है | यह हमारे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह हैं जिनके कुछ भाषणों से उपरोक्त उद्धरण लिये गए हैं | यदि याद किया जाए तो ऐसी ही बातें उन्होंने तब भी की थीं , जब वो नरसिम्हाराव के मंत्रीमंडल में वित्तमंत्री थे |

नवउदारवादी अर्थशास्त्री दरबारी पूंजीवाद को लायसेंस–परमिट राज के साथ जोड़ कर दिखाते हैं | यदि आप प्रधानमंत्री के 1 मई 2007 के भाषण पर गौर करें तो पायेंगे कि वो दरबारी पूंजीवाद को एक संक्रमण की स्थिति तो बता रहे हैं , साथ ही उसे आधुनिक पूंजीवाद के निर्माण के लिये आवश्यक भी बता रहे हैं | जहाँ तक मेरी याददाश्त जाती है , ऐसा ही उन्होंने 1994 में भी पंजाब नॅशनल बैंक के एक समारोह में भाषण देते हुए भी कहा था | समय ने सिद्ध कर दिया है कि कि यह भ्रष्ट आचरण कभी भी संक्रमण काल का नहीं हो सकता , बल्कि यह विशुद्ध रूप से उन नीतियों का प्रतिफलन है ,जो स्वयं प्रधानमंत्री ने वित्तमंत्री रहते हुए 1991 में शुरू की थीं | यह सच है कि आज दरबारी पूंजीवाद के स्वरूप में परिवर्तन आया है | तीन दशक पहले घूस देकर आउट आफ़ टर्न लायसेंस – परमिट हासिल कराने वाले दरबारी पूंजीवाद का अर्थ अब हो गया है स्पेशल इकानामिक जोन के अंतर्गत लाखों एकड़ जमीन हथियाना , एनरान जैसे सफ़ेद हाथी को प्रश्रय देना , वेदान्त , जिंदल , मोनेट , नेनो , जैसे बड़े घरानों को , किसानों से छीनकर हजारों एकड़ जमीन देना और उन्हें अनाधिकृत रूप से जंगलों को काटने देना और जंगल जमीन पर कब्जा जमाने देना | 2 जी स्पैक्ट्रम , कामन वेल्थ , आदर्श सोसाईटी , होम लोन और अब यू. पी. में अनाज घोटाले का पर्दाफ़ाश दरबारी पूंजीवाद का ही नतीजा हैं , जिसमें अरबों रुपये की घूस खाई गई होगी |

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री के रूप में इस घूसखोरी और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कोई कदम उठा सकते हैं ? 2 जी स्पैक्ट्रम के मामले में कुछ दिन पूर्व दिया गया उनका बयान कि कैग को घोटाले और प्रक्रिया संबंधी गलती में अंतर करना आना चाहिये , जे पी सी बनाने से उनका इनकार , निराश करने वाला ही है | उनके द्वारा दरबारी पूंजीवाद का भय दिखाना या उसके खतरे के प्रति चेतावनी देना मात्र एक असंगत को संगत बनाकर लोगों के गले उडेलने की कोशिश ही है | वे , यदि इन परिस्थितियों से यदि खुद को पज़ल (परेशान) दिखाते हैं तो यह पाखंड लोगों को गुमराह करने के लिये किया जा रहा है | वे क्या सोचते हैं ? आज जिस असमानता , असंतुलन , अराजकता , भ्रष्टाचार , घूसखोरी , लूट , शोषण , अव्यवस्था को भारत के लोग झेल रहे हैं , उन्हीं की नीतियों का परिणाम हैं | यदि वे दरबारी पूंजीवाद से सचमुच में पज़ल हैं और परिस्थितियों में सुधार देखना चाहते हैं तो उनके पास वर्तमान समय एक अच्छे अवसर के रूप में उपस्थित है | वे उजागर करें कि देश के संसाधनों की यह भयावह लूट कैसे हुई है ? वे इस लूटी हुई राशी को देश के खजाने में वापस लाएं और उस रकम को स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं तथा खाद्य सुरक्षा पर खर्च करें , जिसकी जनता को बहुत जरुरत है | यही एक रास्ता है , जिससे वे दिखा सकते हैं कि वे ग्रेकसनुमा राजनीतिज्ञ नहीं हैं |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"


 



 

Wednesday, November 17, 2010

क्या मनमोहनसिंह एक ईमानदार राजनीतिज्ञ हैं ?


 

सर्वोच्च न्यायलय की टिप्पणी ने मुझे एक बहुत पुरानी , लगभग सत्रह , अठारह वर्ष पुरानी घटना की याद दिला दी | बात उस समय की है , जब नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार में मनमोहनसिंह वित्तमंत्री थे | उस समय ऐसा कहा जा रहा था कि भारत अपनी देनदारियों को भी चुकाने की स्थिति में नहीं है और दिवालिया होने की कगार पर है | कहा जा रहा था , का प्रयोग मैंने इसलिए किया कि , न तो उस समय और न ही आज मैं भारत सरकार और उसके अर्थशास्त्रियों से सहमत हूँ कि भारत का ट्रेड बेलेंस दिवालिया होने की कगार पर था | यदि उस समय भी , और आज के दौर में भी यह बात उतनी ही सच है , स्विस बैंकों की बात छोड़ दीजिये , केवल भारत के अंदर छिपे हुए काले धन को बाहर निकाला जाता तो भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के किसी भी देश से बेहतर होती | बहरहाल , एक ऐसी व्यवस्था में , जैसी कि हमारे देश में है , काले धन को बाहर निकालने की बात सोचना उतना ही मूखर्तापूर्ण है , जितना मनमोहनसिंह से आज यह पूछना कि वो राजा के कारनामों पर दो वर्ष खामोश क्यों रहे या उन्होंने सुब्रमणियम स्वामी को राजा पर आपराधिक मुकदमा चलाने की अनुमति क्यों नहीं दी | खामोश रहने की कला मनमोहनसिंह ने नरसिम्हाराव से सीखी या मनमोहनसिंह ने नरसिम्हाराव को सिखाई थी , यह भी राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों के लिये शोध का एक अच्छा विषय हो सकता है | तो , मैं आपको उस दौर की बात बता रहा था , जब मनमोहनसिंह नरसिम्हाराव मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री थे और जगत प्रसिद्द शेयर मार्केट का घोटाला हुआ था , जिसे हर्षद मेहता कांड के नाम से उस दौर के लोग आज भी याद करते हैं | आज सारा का सारा विपक्ष , यह जानते हुए कि भी संयुक्त संसदीय समिति की जांचों का क्या हश्र होता है , टेलीकाम में हुए घोटाले के लिये संसदीय कमेटी से जांच करवाए जाने की माँग को लेकर अड़ा हुआ है | उस जगत प्रसिद्द घोटाले की जांच के लिये भी एक जेपीसी बनी थी , जिसके सामने मनमोहनसिंह पेश हुए थे | जब उनसे पूछा गया कि शेयर मार्केट में इतना बड़ा घपला हो रहा था , तब आप क्या कर रहे थे , तो मनमोहनसिंह का जबाब था , "मैं सो रहा था" | जब उनसे कहा गया कि आप ऐसा जबाब कैसे दे सकते हैं , तो उन्होंने जबाब दिया कि "मैं मजाक कर रहा था"|

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश और देशवासियों के साथ यह मजाक पिछले दो दशकों से निरंतर जारी है | आप यदि अपनी याददाश्त पर जोर डालेंगे तो पायेंगे कि हर प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री विशेषकर सरकारी विभागों में उदारीकरण की नीतियों को लागू करते समय किये जा रहे भ्रष्टाचार की तरफ से आँखे मूंदे रहा याने सोते ही रहा | चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र
की इकाइयों को निजी क्षेत्रों को ओने पौने दामों में सौंपने का मामला हो , जिसमें मार्डन फुड से लेकर व्हीएसएनएल और बाल्को तक सभी आ जाते हैं या फिर टेलीकाम इंडस्ट्री में हुए घोटालों का मामला हो , क्या कांग्रेसनीत और क्या भाजपानीत सभी सरकारों का रवैय्या जबाबदेही से भागने वाला ही रहा है | वैश्वीकरण के इस दौर में किये जा रहे निजीकरण को यदि रिश्वतीकरण और भ्रष्टाचारीकरण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |

भारत में 1991 , याने उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से ही जबाबदेही का बहुत ही संकुचित अर्थ लिया जा रहा है | जबाबदेही सिर्फ भ्रष्टाचार या अनैतिकता में लिप्त नहीं होने तक ही सीमित नहीं होती | जनतंत्र में व्यक्ति या संस्थान अपनी सार्वजनिक जिम्मेवारी के पालन के लिये उठाये गए कदमों के नतीजों के लिये भी जबाबदेह होते हैं | लेकिन भारत में इस तरह की जबाबदेही सरकार , प्रशासन और देश के विभिन्न संस्थानों तथा संस्थाओं से तो लुप्त हो ही चुकी है , विडम्बना यह है कि यह जबाबदेही हमारे देश के राजनेताओं , नौकरशाहों और संपन्न तबके के पास से भी गधे के सर से सींग की तरह गायब हो गयी है | जब चीजें गलत हो जाती हैं तो उसे व्यवस्था का दोष बताया जाता है और आजकल तो एक और नया फलसफा आ गया है , "गठबंधन" की मजबूरी | मानो व्यवस्था ईश्वर निर्मित हो और इसके लिये किसी इंसान को दोष देना पाप होगा या फिर गठबंधन बनाये रखना ऐसा ईश्वरीय आदेश है , जिसके लिये बेईमानी , भ्रष्टाचार और अनैतिकता को अनदेखा करना पुण्य का काम है |

एक बार पुनः 1992 में हुए उपर उल्लेखित वित्तीय घोटाले का स्मरण कीजिये | जब इस घोटाले का भेद खुला और उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे तब तात्कालीन वित्तमंत्री ने संसद में यह व्यक्तव्य दिया था कि , "अगर शेयर बाजार में एक दिन उछाल आ जाए और दूसरे दिन गिरावट हो तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी नींद हराम कर लूँ |" ( उद्धरण :प्रतिभूति एवं बैंक कारोबार में अनियमितताओं की जांच के लिये गठित संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट , खंड 1 , पेज 211 , लोकसभा सचिवालय , दिसंबर 1993 )| यह बताने की तो कोई जरुरत नहीं है कि 1992 में वित्तमंत्री कौन था | स्वतन्त्र भारत में मनमोहनसिंह पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो देश की जनता , संसद या फिर खुद के मंत्रीमंडल के सदस्यों का विश्वास हासिल किये बिना छै वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं | सार्वजनिक जीवन में उनकी छवि एक साफ़ सुथरे और ईमानदार व्यक्ति की है | प्रसिद्द पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपनी किताब "
Absolute Khushwant : The low down on life , Death and most things in-between " में मनमोहनसिंह को जवाहरलाल नेहरू से भी बेहतर प्रधानमंत्री बताया है | शायद इसकी वजह वे दो लाख रुपये हों जो मनमोहनसिंह ने उनके जीवन के एकमात्र चुनाव लड़ने के लिये , लिये थे और फिर उपयोग नहीं होने पर वापस कर दिए थे | बहरहाल , खुशवंतसिंह के साथ कोई पंगा लिये बिना इतना तो कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण सादगी के साथ मनमोहनसिंह के अंदर किसी भी कीमत पर सत्ता के साथ नजदीकी बनाए रखने की चतुराई भी हमेशा मौजूद रही | क्या कभी यह भुलाया जा सकता है कि मनमोहनसिंह 1991 में आर्थिक सुधारों को लागु करने से पहले भी वित्त सचिव , रिजर्व बैंक के गवर्नर या भारत सरकार के वित्त सलाहकार के रूप में भारत में उन्हीं नेहरूवियन नीतियों को आगे बढ़ाने में लगे थे , जिनके बारे में उन्होंने पहला बजट पेश करते हुए संसद में कहा था कि "लम्हों ने खता की थी ,सदियों ने सजा पायी" | पर , भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रहते हुए मनमोहनसिंह ने कभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाने या लाईसेंस , परमिट राज खत्म करने की वकालत नहीं की |

मनमोहनसिंह के नरसिम्हाराव मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री रहते हुए और उनके प्रधानमंत्रित्व के प्रथम कार्यकाल के दौरान घटी दो घटनाएं भी सत्ता और राजनीतिक शुचिता के प्रति उनकी सोच को प्रगट करती हैं | नरसिम्हाराव की सरकार अल्पमतीय सरकार थी , जो बाद में जोड़ तोड़ कर बहुमतीय सरकार बनी | मनमोहनसिंह के प्रधानमंत्रित्व में भी जब न्यूक्लीयर समझौते के विरोध में वामपंथी दलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया तो सरकार जोड़ तोड़ करके ही बचाई गयी | इससे पता चलता है कि सत्ता में बने रहने के लिये कुछ भी करने से उन्हें भी कोई परहेज नहीं है और इसा मायने में वे अन्य किसी राजनीतिज्ञ से बिलकुल अलग नहीं हैं और उनका स्वयं का कोई कनविक्शन नहीं है | वे नरसिम्हाराव के विश्वस्त थे , पर , जैसे ही सत्ता का केंद्र सोनिया गांधी बनीं , उन्होंने अपनी निष्ठा अविलम्ब बिना हिचक बदल कर सोनिया गांधी के प्रति कर ली | वे सौम्य हैं , पर अपने लिये चतुर भी हैं | सर्वोच्च न्यायालय कुछ भी पूछे , उन्होंने तो अपनी सफाई कैग को धौंसा कर दे दी , " जानबूझकर की गई गडबडी और भूलवश हुई गलती के बीच कैग को फर्क करना चाहिये , साथ ही आधिकारिक फैसलों के पीछे के संदर्भ और परिस्थितियों को समझना चाहिये | कैग पर भारी जिम्मेदारी है , इसलिए उसे ध्यान रखना चाहिये कि उसकी रिपोर्ट सटीक , संतुलित और समुचित हो "| अब आप चिल्लाते रहिये कि यह सटीक , संतुलित और समुचित की शब्दावली तो देश को दो लाख करोड़ की चोट देने वाली है | पर , जिसे ओबामा ध्यान से सुनता है , वो क्यों आपको ध्यान से सुनेगा ? वैसे , मैं आपको एक बात बता दूं कि सौम्यता और योग्यता बहत अच्छे गुण हैं , पर वे तो अमूमन हर सेल्समेन में पाए जाते हैं , एक अरब लोगों के देश के प्रधानमंत्री में तो लोग इससे कुछ ज्यादा ही देखना चाहेंगे |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"


Sunday, November 14, 2010

बराक ओबामा जाना पहचाना चेहरा –


 

बराक ओबामा जब मुम्बई के रास्ते भारत आये तो मुझे उनका चेहरा बहुत जाना पहचाना लगा | ऐसा लगा वो इसके पहले भी भारत आ चुके हैं | जबकि ओबामा पहली बार भारत आये थे |

जबसे उनके भारत आने की बात पता चली थी , जेहन में उस व्यक्ति का चेहरा उभरता था , जो अश्वेत होने के बावजूद अमेरिका का प्रेसीडेंट चुना गया था | 47 वर्ष का एक व्यक्ति जो ईराक पर हमले से लेकर , हर उस गलती को ठीक करने की इच्छा रखे था , जो बुश और उसके पहले के जमाने में की गईं थीं | एक ऐसा व्यक्ति , जिसने अपने कार्यकाल के पहले साल में अमेरिका के चेहरे पर लगे बदनुमा दागों को धोने की कोशिशें की थीं और पूरी दुनिया को यह सन्देश देने की कोशिश की थी कि अमेरिका जैसे हठीले , गर्वीले और दुनिया को अपने इशारों पर नचाने की इच्छा रखने वाले राष्ट्र के अंदर भी अपनी गलतियों को सुधारने और उनसे सीख लेने का माद्दा है | एक ऐसा व्यक्ति , जो टर्की से लेकर त्रिनिदाद तक यह सन्देश दे रहा था कि वह अपने पूर्ववर्तियों से इस लिहाज से अलग है कि उसके अंदर राष्ट्र के प्रति गहन जिम्मेदारी के साथ साथ विश्व के नागरिक होने के दायित्व का बोध भी था |

पर , यह बराक हुसैन ओबामा , जो मुम्बई के रास्ते भारत आया और जिसने आते ही दस अरब डालर का माल भारत को बेचा , जिसने बच्चों के साथ मय पत्नी नृत्य किया , जिसने मुम्बई में आतंकीयों के शिकार लोगों को श्रद्धांजली दी और फिर सेंट जेवियर्स की क्षात्रा के सवाल के जबाब में न केवल भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू पर तोल दिया बल्कि पाकिस्तान में स्थायित्व भारत के नौजवानों के भी हित में है , यह भी कहा , वह ओबामा निश्चित रूप से नहीं था , जिसने दो वर्ष पहले अमरीका का राष्ट्रपति पद संभालते समय अमेरिका के बाहर भी करोड़ों लोगों के दिल में खुशनुमा ख्याल पैदा किये थे | दिल्ली पहुंचते ही ओबामा का असली चरित्र बाहर आ गया | दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष होने के गुमान को प्रदर्शित करने वाला चरित्र | दिल्ली के अंदर हैदराबाद हाऊस में हुई पत्रकार वार्ता के बाद ओबामा ने जिस तरह मनमोहनसिंह की पीठ थपथपाई , वह क्या प्रदर्शित करता है ? इस थपथपाहट से मनमोहनसिंह भले ही गदगद हो गए हों , लेकिन , भारत की अमेरिका परास्त लाबी को छोड़कर , शेष करोड़ों भारतीयों को यह थपथपाहट काटों से कम नहीं चुभी होगी | यही वह क्षण था जब मुझे बराक हुसैन ओबामा का चेहरा पहचाना हुआ लगा | लगा यही तो बुश है | यही क्लिंटन , यही कार्टर ,यही आईजनहावर है | हमारे देश की यह राष्ट्रीय विडम्बना है कि देश में राष्ट्रीय शर्म नहीं है | यदि है भी तो उसे राष्ट्रीय नहीं कह सकते , क्योंकि वह केवल आम  देशवासियों के पास है ,राजनेताओं के पास नहीं |

 अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"  

Friday, November 5, 2010

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं ---

ब्लॉग जगत के समस्त पाठकों , ब्लॉगर बंधुओं , समस्त नाते-रिश्तेदारों , मित्रों , प्रियजनों को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं | 
अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"


























































Sunday, October 24, 2010

सी ज़ेड.आई.ई.ऐ. सम्मलेन और जनवाद – सम्मलेन अवैध है --


 

भोपाल में आज से सीजेडआईईऐ का त्रिवार्षिक सम्मलेन प्रारम्भ होने जा रहा है | मुझे तुरंत जबलपुर निकालना है , इसलिए सीधे सीधे बात को रख रहा हूँ | इसका विश्लेषण कभी बाद में समय आने पर करूँगा | इस सम्मेलन तक के लिये मैं तकनीकी सहित सभी नार्म्स के हिसाब से सम्मलेन का एक्स आफिसियो प्रतिनिधी हूँ , ठीक वैसे ही जैसे इस अपेक्स बाडी के अन्य वर्किंग कमेटी मेंबर हैं और मुझे न केवल सम्मलेन में शामिल होने का नोटिस मिलना चाहिये था बल्कि परंपरा के अनुसार रायपुर डिवीजन की मंडलीय इकाई को मेरा इंतजाम भी करना चाहिये था | लेकिन न तो मुझे नोटिस मिला और नहीं मूल संगठन ने उसके किसी साथी के साथ हो रही सांगठनिक प्रक्रिया के उल्लंघन के प्रति कोई ध्यान दिया और वे देते भी कैसे ? बासिज्म , फासिज्म और चमचागिरी की संस्कृति पर चलने वाले व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह किसी अन्य साथी के जनवादी अधिकार के लिये संगठन को संघर्ष के लिय प्रेरित करेगा बुद्धिहीन से पहाड़ा सुनने की इच्छा रखने के सामान है | लेकिन नोटिस देने और सम्मलेन में प्रतिनिधि पहुंचे इसे इंश्योर करने की जिम्मेदारी तो संगठन के महासचिव की होती है , पर जनवाद के नाम पर फासिज्म और तानाशाही चलाने वालों से यह अपेक्षा तो और भी व्यर्थ है , जिसके लिये कोई उपमा भी नहीं दी जा सकती | मंडलीय इकाई के एक उच्च नेता को मैंने यह बताया , तो उसका सीधा कहना था कि कामरेड वे सीधा झूठ बोल देंगे कि उन्हें नोटिस दिया गया था पर वे स्वयं नही आये | उसके अनुसार सीजेडआईईऐ का क्रियाशील नेतृत्व के एग्रीकल्चर में खप नहीं पाया | एग्री याने सहमती और कल्चर याने संस्कृति |बहरहाल, ट्रेड यूनियन में जनवाद को दफनाने वाले जनवाद पर भाषण झाड़ेंगे , किसी भी संगठन का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है | कुल मिलाकर यह सम्मलेन अवैध है | जल्दी में हूँ और भी बातें है समय आने पर बताउंगा |

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"

Saturday, October 23, 2010

अर्थ शास्त्र में नोबेल 2010 , बाजार की वास्तविकताओं से परे--


 

अर्थशास्त्र में दिया जाने वाला नोबेल , इस वर्ष " रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के बावजूद बेरोजगारी कम नहीं होने के कारणों की पड़ताल " करने वाली थ्योरी पर अमरीका के पीटर डायमंड और डेल मोर्टेन्सन तथा ब्रिटेन के क्रिस्टोफ़र पिसारिदेस को दिया गया है | मैसच्यूसेट्स इन्स्टीट्यूट आफ़ टेकनालाजी में प्रोफ़ेसर पीटर डायमंड ने " खोज संघर्ष के सिद्धांत के साथ बाजार का विश्लेषण " करते हुए सिद्धांत दिया कि " किसी भी बाजार में विक्रेता और खरीददार को एक दूसरे को ढूँढने में कठिनाई होती है , क्योंकि इसमें बहुत समय और संसाधनों की जरुरत होती है |" नार्थवेस्ट यूनिवर्सिटी के डेल मोर्टेन्सन तथा लंदन स्कूल आफ़ इकानामिक्स तथा पालिटिक्स साईंस के क्रिस्टोफ़र पिसारिदेस ने इस सिद्धांत को श्रम बाजार पर लागू करते हुए निष्कर्ष दिया कि बहुत से बाजारों में नौकरी देने वाले ( नियोक्ता ) जिन्हें कर्मचारियों की तलाश है और ऐसे लोग ( बेरोजगार ) जिन्हें नौकरी की तलाश है , एक दूसरे के संपर्क में नहीं आ पाते क्योंकि तलाश की इस प्रक्रिया में समय और संसाधन दोनों की जरुरत होती है , जिसके कारण बाजार में " संघर्ष की स्थिति ( खोज संघर्ष ) " पैदा होती है | इसके फलस्वरूप , कुछ खरीददारों ( नियोक्ताओं ) की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं तो कुछ विक्रेता ( बेरोजगार ) भी अपना उत्पाद ( श्रम ) नहीं बेच पाते हैं | यही वजह है कि श्रम बाजार में रिक्तियां होने के बावजूद लोग बेरोजगार रह जाते हैं |

उनका विश्लेषण , श्रम बाजार में खड़े करोड़ों लोगों की बेरोजगारी को इतने सहज और सरल ढंग से उचित ठहराते हुए रुक नहीं जाता , बल्कि एक कदम आगे बढ़कर वे कहते हैं कि बेरोजगारी भत्ता देने से बेरोजगारी बढ़ती है क्योंकि फिर नौकरी तलाशने में लोग ज्यादा वक्त लेते हैं |
यह विश्लेषण , चाहे वे शास्त्रीय हों या नवशास्त्रीय , दोनों ही तरह के अर्थशास्त्रियों के पूर्व विश्लेषणों से अलग नहीं है , जिसके अनुसार लोग इसलिए बेरोजगार हैं क्योंकि या तो वे नियोक्ताओं के द्वारा न्यूनतम वेतन पर अपेक्षित उत्पादन क्षमता को पूरी करने में असमर्थ हैं या फिर लोग अपनी उत्पादन क्षमता की तुलना में अधिक वेतन की माँग कर रहे हैं | दोनों परिस्थितियों में निष्कर्ष एक ही है कि लोग बेरोजगार हैं क्योंकि उन्होंने ने बेरोजगार रहना पसंद किया है | इसलिए यह बेरोजगारी स्वैच्छिक है | उपरोक्त तीनों महानुभावों ने इसी थ्योरी को कुछ ज्यादा अच्छे सभ्य ढंग से प्रस्तुत किया है कि नियोक्ताओं और बेरोजगारों का मेल समय और संसाधनों की उपलब्धता की कमी की वजह से नहीं हो पाता है |

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि " ढूँढते ही रह गए " कि इस थ्योरी को नोबेल मिलने के दस दिनों के भीतर ही ब्रिटेन के वित्तमंत्री जार्ज आसबार्न ने सरकारी खर्चों में कटौती के प्रस्ताव संसद में पेश करते हुए लगभग पांच लाख नौकरियाँ अगले चार वर्ष में खत्म करने की घोषणा की है | यह केवल ब्रिटेन के साथ ही नहीं है | वैश्विक आर्थिक संकट के वर्तमान दौर में प्रत्येक देश में सरकारों तथा निजी नियोक्ताओं ने करोड़ों की संख्या में रोजगारशुदा लोगों का रोजगार छीनकर उनको पहले से बेरोजगार खड़े लोगों की फ़ौज में धकेला है | दरअसल , श्रम बाजार के अंदर रिक्तियों और बेरोजगारों , दोनों की एकसाथ मौजूदगी का यह एक बहुत ही सरलीकृत विश्लेषण है , जो "मुक्त बाजार" की अवधारणा के प्रबल समर्थक नवशास्त्रीय अर्थशास्त्रियों के द्वारा दुनिया की विभिन्न देशों की सरकारों को मुंह छिपाने का अवसर प्रदान करने के
साथ ही नियोक्ताओं के द्वारा किये जा रहे श्रम के शोषण को ढकने का काम ही करेगा | अर्थशास्त्रियों के लिये , चाहे वे , शास्त्रीय हों या नवशास्त्रीय , विडम्बना यही है कि उनका मुक्त बाजार कभी भी उनके सिद्धातों पर नहीं चला बल्कि उन्हें हमेशा ही मुक्त बाजार की शैतानियों ( संकटों ) की तरफ से आँखें मूदनी पड़ी हैं या फिर पलटी मारकर अपने सिद्धातों को मुक्त बाजार के अनुसार ढालना पड़ा है | पूंजीवाद का इतिहास इस बात का गवाह है कि बाजार ने किसी भी दौर में अर्थशास्त्र के किन्ही भी नियमों का पालन नहीं किया है | बाजार को संचालित करने वाला एक ही नियम ( कारक ) है , और वह है , मुनाफ़ा और अधिक तेजी से अधिक मुनाफ़ा , चाहे उसके लिये बाजार को स्वयं को संकट में क्यों न डालना पड़े | मुक्त बाजार के इस व्यवहार पर इन अर्थशास्त्रियों का मुंह कभी नहीं खुलता और इनके बताए गए नुस्खे कभी भी बाजार को अनुशासित करने के लिये नहीं होते , बल्कि ये नुस्खे आमजनों की जेब से पैसा खींचकर बाजार की बेलगाम ताकतों के पास पहुंचाने का काम ही करते हैं | जैसा , हमने हाल के संकट के दौरान देखा कि दुनिया के करीब करीब सभी मुल्कों की सरकारों ने अपने अपने देश के भीमकाय वित्तीय और औद्योगिक निगमों को सार्वजनिक कोष से खरबों रुपयों के पैकेज दिए और जनता के ऊपर कर थोपे , जीवनोपयोगी वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि की और गरीब वर्ग के लिये चल रहे कल्याणकारी कार्यों के खर्चों में कटौतियां कीं |

वैश्विक आर्थिक संकट , जिससे पूरी दुनिया वर्ष 2008 से दो-चार हो रही है , बाजार की बेलगाम ताकतों की मुनाफे की हवस और उस मुनाफे को जल्दी से जल्दी बटोर लेने की लालच का ही परिणाम था , अब यह पुष्ट हो चुका है | अब समय आ गया है कि इन व इस तरह के सभी अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की विकासपरक उपादेयता पर चर्चा की जाए | इन अर्थशास्त्रियों के द्वारा दिए गए सिद्धांतों में से किसी ने भी मुक्त बाजार की मुख्य समस्या "आर्थिक मंदी" या "दबाव" को रोकने के लिये कोई भी असरदायक रास्ता कभी नहीं सुझाया | नवशास्त्रीय अर्थशास्त्रीयों की पूरी फ़ौज , जिनमें हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह भी शामिल हैं , वर्तमान संकट को रोकने का कोई उपाय तो सुझा ही नहीं पाई , बल्कि उन्हें आने वाले संकट का भान तक नहीं हुआ | उनकी पूरी की पूरी जमात शेयर बाजारों में आ रहे उछाल पर मुग्ध होकर , बाजार के गुणगान करती रही | आश्चर्यजनक तो यह है कि मुक्त बाजार के पैरोकार इन अर्थशास्त्रियों को अपनी अक्षमता या असफलता पर शर्म भी महसूस नहीं हुई , उलटे , सरकारों के द्वारा दिए गए बेलआउट को उन्होंने अपने सिद्धांतों की विजय बताया और आज भी वे इन पैकेजों को जारी रखने की वकालत कर रहे हैं |

बद से बदतर यह है कि कोई भी आज यह बताने की स्थिति में नहीं है कि विश्वव्यापी आर्थिक संकट के किस मुकाम पर दुनिया आज खड़ी है | संकट के गुजर जाने या खत्म हो जाने के कयासों के बीच , हमें कुछ अर्थशास्त्रियों से , जिन्होंने वर्तमान संकट के लिये भी चेताया था , हमें अगले संकट की भविष्य वाणी भी मिल रही है | इस मध्य में "नियोक्ता और बेरोजगार , दोनों को एक दूसरे को तलाशने में कठिनाई है" का सिद्धांत उन अर्थशास्त्रियों को सुकून देने वाला है , जो मुक्त बाजार की अनुशासनहीनता के खिलाफ किसी भी तरह के कड़े फैसले से बचना चाहते हैं | नोबेल पुरूस्कार देने वाली समीती सहित मुक्त बाजार के हिमायतियों का कहना है कि यह सिद्धांत बेरोजगारी की स्थिति पर सरकार की आर्थिक नीतियों से पड़ने वाले प्रभाव को समझाने में मददगार होगा | प्रश्न यह है कि क्या वर्त्तमान में सरकारों के पास इस प्रभाव को जानने का कोई तरीका नहीं है क्या ? जबाब यही है कि एक नहीं ढेरों तरीके हैं , पर उनका नतीजा तब सामने आएगा , जब सरकारें बाजार को नियंत्रित करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति रखेंगी | जब आर्थिक सिद्धांत ही बाजार में हस्तक्षेप नहीं करने का है तो "ढूंढते रह गए" का सिद्धांत तो सरकारों के मुंह छिपाने के ही काम आएगा | यह उम्मीद करना बेकार ही है कि सरकारें बाजार में नियोक्ताओं और बेरोजगारों को मिलाने के कुछ नीतिगत कदम उठाएंगी |

तीनों नोबेल प्रतिष्ठितों के इस निष्कर्ष का , कि बेरोजगारी भत्ता देने से बेरोजगारी बढ़ती है , बहुत से देशों में स्वागत हो सकता है जहाँ बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है या जहाँ इसकी माँग की जाती है | वैसे इस निष्कर्ष का निहितार्थ यही है कि ऐसे लोग जिनकी आय का कोई साधन नहीं है , कोई सा भी काम कितनी भी अल्प मजदूरी पर करने के लिये तैयार हों | भूखा मरे , क्या न करे | तीनों नोबेल सम्मानितों ने ठीक वही सुझाया है , मुक्त बाजार जो माँग रहा है |

Saturday, October 2, 2010

देश में अमन-चैन बनाए रखने की कीमत मत मांगो-


 

देश के अमन-चैन में सेंध लगाने वाले अमन-चैन बनाए रखने की कीमत के रूप में देश के संविधान , धर्मनिरपेक्ष चरित्र , न्याय प्रणाली और क़ानून व्यवस्था की कुर्बानी माँग रहे हैं | दुर्भाग्य से अयोध्या में विवादित स्थल के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का फैसला इस कीमत को चुकाता नजर आता है | हमारे देश के उच्चतम न्यायालय और अयोध्या मामले में 21 वर्ष पूर्व बनाई गई जस्टिस के सी अग्रवाल , जस्टिस यू सी श्रीवास्तव और जस्टिस सैय्यद हैदर अब्बास की खंड पीठ को यह अंदेशा पहले से ही था कि न्यायायिक प्रक्रिया का निष्पक्ष पालन इस मामले में मुश्किल होगा | शायद इसीलिए जब 21 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैजाबाद की जिला अदालत से रामजन्म भूमी बनाम बाबरी मस्जिद मुकदमा अपने पास बुलाया तो उपरोक्त तीनों जस्टिसों ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के अंत में टिप्पणी की थी कि "इसमें संदेह है कि मुकदमे में शामिल सवालों को न्यायिक प्रक्रिया से हल किया जा सकता है |" इतना ही नहीं 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर राय देने से मना कर दिया था कि क्या वहाँ पहले स्थित कोई हिंदू मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी ? इसका अर्थ हुआ कि हमारे देश की न्याय प्रणाली को उस समय लगा कि न्यायिक प्रक्रिया में तर्कों के ऊपर भावनाओं और आस्था के हावी होने की पूर्ण संभावनाएं इस मामले में मौजूद हैं और एक निष्पक्ष फैसला देने में रुकावट पड़ सकती है | दुर्भाग्य से जस्टिस धर्मवीर शर्मा , जस्टिस सुधीर अग्रवाल , जस्टिस एस यू खान का फैसला न केवल इसकी पुष्टि करता है बल्कि अनेक सवाल भी खड़े करता है |

  1. हमारे देश में धर्मस्थल क़ानून है जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति को मान्यता देता है | भारत के बहुरंगी धार्मिक एवं सांस्कृतिक समाज में विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों की टकराहट सर्वज्ञात है | मंदिर टूटे , मस्जिद टूटे , गिरजा और मठ भी टूटे हैं | लेकिन , इस टकराहट ने गंगा-जमुनी संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता वाले समाज को भी जन्म दिया है , उसे आगे बढ़ाया है | इसीलिये अतीत के सारे धार्मिक सांस्कृतिक विवादों को विराम देते हुए विवेकपूर्ण फैसला किया गया था कि 1947 में जो जहाँ है , वैसा ही माना जाए | वर्त्तमान फैसले में लखनऊ खंडपीठ के इस कथन को कि किसी हिदू मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद खड़ी की गई थी , यदि सही भी मान लें , तब भी उक्त क़ानून के मद्देनजर न्यायालय का फैसला न्यायोचित नहीं है तथा उपरोक्त क़ानून को कमजोर बनाता है | इस फैसले से अतीत में जो धर्मस्थल तोड़े गए हैं , और जो ऐतिहासिक रूप से सत्य है , उनका विवाद बड़े पैमाने पर उभरने की संभावना बनती है | विहिप के तोगड़िया और अन्य कुछ संतों के बयान इसकी पुष्टि भी करते हैं |
  2. राम मिथकीय पुरुष हैं , न कि ऐतिहासिक | मिथकों का अपना इतिहास होता है लेकिन इतिहास मिथक नहीं होता | अतः कोई भी कोर्ट राम की पैदाइश स्थल का सर्टिफिकेट नहीं दे सकता | न ही किसी पक्ष ने राम के जन्म का प्रमाण पत्र ही कोर्ट के सामने रखा है | अतः विवेक और क़ानून से संचालित कोई भी कोर्ट यह नहीं कह सकता कि राम वहीं पैदा हुए थे , जहाँ बाबरी मस्जिद का केन्द्रीय गुम्बद था और जहाँ दिसंबर 1949 की एक रात को राम की मूर्ति चोरी छिपे रखी गई थी | यही कारण है कि संघ और उसके विहिप , भाजपा सहित सभी अनुषांग बार बार यही कहते रहे कि राम के जन्मस्थल का सवाल आस्था का सवाल है और कोई कोर्ट इसका फैसला नहीं कर सकता | भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र , संविधान , न्याय और क़ानून व्यवस्था के दुर्भाग्य से कोर्ट के फैसले पर तर्क और विवेक की जगह आस्था हावी हो गई | इसीलिये , यह फैसला किसी भी स्तर पर विवाद समाप्त करने में सहायक नहीं हो सकता | कोर्ट के सामने विवाद भूमी के स्वामित्व निर्धारण का था , न कि इसका कि राम कहाँ पैदा हुए थे ? वैसे भी पैदाइश स्थल का स्वामित्व से सीधा संबंध नहीं होता |
  3. कोर्ट को 1949 में दायर शिकायत का फैसला करना था | यह फैसला 1949 की स्थिति पर ही हो सकता था , ना कि 2010 की स्थिति पर , जैसा कि कोर्ट ने किया है | इस फैसले में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात यह है कि ये हिंसा , अराजकता और साम्प्रदायिक राजनीति करने वाली आक्रांता ताकतों के राजनीतिक उपद्रव फैलाने के बाहुबल को कानूनी मान्यता देता है | सच यही है कि पूरे विवाद के दौरान "यथास्थिति" बनाए रखने के अदालती आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए साम्प्रदायिक राजनीतिक ताकतों ने "यथास्थिति" को हमेशा ध्वस्त किया लेकिन कोर्ट ने उसके आदेशों की अवेहलना करने वालों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की |
  4. कोर्ट को विवादित भूमी के स्वामित्व का फैसला करना था | लेकिन , कोर्ट ने मान्यता के आधार पर भूमी का बटवारा कर दिया | मालिकाना हक के मामले में मान्यता की दलील को मानकर , उस आधार पर फैसला देना क़ानून और निष्पक्षता के सभी सिद्धांतों के खिलाफ है |
  5. कोर्ट के फैसले से ऐसा लगता है कि कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट को अहं महत्त्व दिया है | पर , यह जगजाहिर है कि जिस दौरान याने 5 मार्च 2003 से 5 अगस्त 2003 के मध्य एएसआई ने विवादग्रस्त स्थल की खुदाई की , केंद्र में भाजपानीत गठबंधन की सरकार थी , जिसने इस संस्था के साम्प्रदायिकीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी थी | देश के जाने माने इतिहासकारों ने 28 अप्रैल 2003 को कोर्ट के सामने पेश की गई एएसआई की पहली रिपोर्ट पर ही अपनी आपत्तियां जता दी थीं |
    हाल ही में फैसले के परिप्रेक्ष्य में देश के जाने माने 61 नामचीन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने बयान जारी कर कहा है कि फैसले में कई ऐसे साक्ष्यों का जिक्र नहीं है जो फैसले के विरोध में पेश किये गए थे | फैसले में शामिल तीन जजों में से दो ने कहा है कि बाबरी मस्जिद एक हिंदू ढाँचे के गिराने के बाद बनाई गई | लेकिन , इन इतिहासकारों का कहना है कि इस मत के विरोध में एएसआई ने जो साक्ष्य प्रस्तुत किये , उन्हें दरकिनार किया गया है | खुदाई में मिलीं जानवरों की हड्डियां और इमारत तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सुर्खी और चूना से मुसलमानों की उपस्थिति साबित होती है और ये भी साबित होता है कि वहाँ मस्जिद से पहले मंदिर था ही नहीं , जैसे सभी तथ्यों को कोर्ट ने इग्नोर कर दिया है | इन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के अनुसार एएसआई की उस विवादित रिपोर्ट को फैसले का आधार बनाया गया है जिसमें खुदाई में खम्बे मिलने का उल्लेख है , जबकि खम्बे कभी मिले ही नहीं थे |
  6. यदि एकबारगी मान भी लिया जाए कि बाबरी मस्जिद के निर्माण में उपयोग की गई सामग्री में किसी हिंदू ढाँचे के अवशेष हैं भी तो इसमें अजूबा क्या है ? हमारे देश में अनेक इमारतें हैं , जिनमें मुस्लिम , इंग्लिश , फ्रेंच , हिंदू स्थापत्य कला का उपयोग किया गया है | मात्र क्या इस कारण से बाबरी मस्जिद गैर इस्लामिक हो जायेगी | कोर्ट ने एक सैकड़ों साल से जीवित खड़ी ऐतिहासिक इमारत को तरजीह न देकर , 1992 के बाबरी मस्जिद को ढहाने के आपराधिक कृत्य को ही मान्यता देने जैसा काम किया है , जो आने वाली पीढ़ियों के सामने कल्पनातीत मुश्किलें खड़ा करेगा |

देशवासियों ने जिस परिपक्वता , सौहाद्र और भाई-चारे को अभी निभाया है , उसमें न तो मंदिर समर्थकों की कोई भूमिका है और न ही मस्जिद समर्थकों की , और न ही सरकार के स्तर पर किये गए सुरक्षा प्रबंधों की कोई भूमिका है | यदि कोई बात महत्त्व रखती है तो वह यह है कि 1992 के बाद देशवासियों ने जिस साम्प्रदायिक तांडव को देखा है , उसने उन्हें साम्प्रदायिक मुद्दों की व्यर्थता का बोध अच्छी तरह करा दिया है और उन्होंने राजनीतिक रूप से साम्प्रदायिक ताकतों को हाशिए पर डालने के पूरे प्रयास किये हैं | उन्हें अच्छी तरह अहसास था कि हाई कोर्ट का निर्णय जो कुछ भी हो , कानूनी प्रक्रिया यहाँ समाप्त नहीं होती है | अब परिस्थिति यह है कि फैसला आने के तुरंत बाद जो प्रफुल्लित होकर जोरशोर से देशवासियों से मंदिर बनाने में सहयोग करने की मांग कर रहे थे , खुद सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रहे हैं | निश्चित रूप से देश में अमन–चैन , साम्प्रदायिक सदभाव बहुत जरूरी है | पर , यह दिल में रंज या मलाल के साथ नहीं होना चाहिये | यह अमन-चैन , सदभाव , भाई-चारा , उसे देश के संविधान , धर्मनिरपेक्ष ढाँचे , क़ानून व्यवस्था और न्याय व्यवस्था से मिलना चाहिये | इनकी कीमत पर प्राप्त अमन चैन स्थायी नहीं होगा , सुकून नहीं देगा | एक बैचेन समाज आने वाली कई पीढ़ियों के लिये बैचेनी और तल्खी छोड़ जाता है , इतिहास का यही सबक है , जिसे सभी को याद रखने की जरुरत है |


अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य"